जो लोग बार या क्लब में जाते हैं, वे जानते हैं कि वहाँ एक ऐसा पेय भी मिलता है, जिसे ‘कॉकटेल’ कहा जाता है। इस पेय में किसी भी प्रकार की अल्कोहल (वोडका, जिन) के साथ फलों के सिरप और जूस, फलों के स्लाइस, मसाले तथा अन्य मिक्सर मिलाए जाते हैं। इसमें बर्फ़ मिलाना भी ज़रूरी है।
यदि इस पेय में से अल्कोहल हटा दी जाए और बाकी तमाम चीज़ें मिलाकर उसमें बर्फ़ डालकर पिया जाए, तो उसे मॉकटेल कहते हैं। यानी कृत्रिम या आभासी कॉकटेल। जो लोग शराब नहीं पीते हैं, उनके लिए मॉकटेल एक बढ़िया ड्रिंक है।
मॉक (Mock) अंग्रेज़ी का शब्द है, जिसके अर्थ शब्दकोश में दिए गए हैं- नकली, कृत्रिम, झूठा, बनावटी, दिखावटी, चिढ़ाना, हँसी उड़ाना, नकल उतारना, मज़ाक करना, मुँह बनाना, मज़ाक उड़ाना, तिरस्कार, उपहास आदि।
यानी ‘मॉक’ शब्द का कोई सकारात्मक अर्थ शब्दकोश में नहीं मिलता है। इस शब्द में नकारात्मकता या उपहास का ही अहसास महसूस होता है। तो फिर कांग्रेस पार्टी के साथ उन्नीस दलों ने मॉक संसद का अधिवेशन बुलाने की क्यों सोची? इन दलों के सदस्य किसी स्कूल या कॉलेज के विद्यार्थी तो नहीं थे कि वे एक नकली संसद का अधिवेशन बुलाकर उसमें भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग चलाने का नाटक करें। इस नाटक से इन राजनीतिक दलों को हासिल क्या होने वाला था?
‘पुरवाई’ के लिए यह आवश्यक है कि उस मॉक संसद में क्या कुछ हुआ, उसकी जानकारी भी दी जाए और उस पर टिप्पणी भी की जाए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक प्रतीकात्मक सार्वजनिक महाभियोग के लिए उन्नीस दलों के नेता एकजुट हुए और इस कार्यवाही की अध्यक्षता पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने की। इस नकली संसद की कार्यवाही में 19 विपक्षी दलों ने भागीदारी की।
शुरुआत में ही खड़गे ने कहा, “SIR प्रक्रिया की रूपरेखा में ही बुनियादी तौर पर खामी है। इस प्रक्रिया का मकसद लोगों को मतदाता सूची में शामिल करना नहीं, बल्कि उन्हें बाहर करना है।” उन्होंने इन छह मुद्दों पर मुख्य चुनाव आयुक्त को घेरा-
- कानून तोड़ते हुए BJP को मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) तक पहुँच देना, मतदाताओं के नाम हटाना और जोड़ना तथा चुनाव के नतीजों में हेर-फेर करना। “यह एक आपराधिक कृत्य है और देश तथा भारत के संविधान के खिलाफ देशद्रोह के समान है।”
- 2 करोड़ मतदाताओं के नामों को जानबूझकर इस तरह हटाना, जो “पक्षपातपूर्ण, अपारदर्शी और प्राकृतिक न्याय (नेचुरल जस्टिस) का खुला उल्लंघन” है।
- “संसदीय निगरानी या जानकारी के बिना” फॉर्म 6 में अवैध रूप से संशोधन करना।
- अवैध रूप से शक्तियों का केंद्रीकरण करना और ERONET/ECINET सॉफ्टवेयर के ज़रिए चुनाव पंजीकरण अधिकारियों (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स) को अपना काम करने से रोकना।
- चुनाव आयोग के सात सहयोगियों के साथ मिलकर जानबूझकर “कानून का उल्लंघन करना और अन्य दो चुनाव आयुक्तों को अवैध रूप से बाहर रखना”।
- “लोकतांत्रिक तरीके से कराए गए चुनावों के नतीजों में हेर-फेर करने और उन्हें गलत तरीके से बदलने की आपराधिक साजिश।”
साढ़े तीन घंटे की चर्चा के अंत में राहुल गाँधी ने कहा, “250 सांसद, नागरिक समाज के सदस्य, आम नागरिक और मीडिया के लोग विपक्ष के नेता खड़गे जी के बगीचे में बैठे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सार्वजनिक रूप से महाभियोग चला रहे हैं।”
राहुल ने आगे कहा, “अगर आप इस पर गौर करें, तो यह जो हो रहा है, वह काफ़ी अजीब है। पहली बात, हम खड़गे जी के बगीचे में क्यों मिल रहे हैं? दूसरी बात, क्या हमारे पास यह सवाल पूछने का कोई और तरीका नहीं है?”
“हम यहाँ इसलिए खड़े हैं, क्योंकि हमारे पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हर एक संस्था हमारे लिए बंद है। और इसलिए, यह कुछ बहुत ही अजीब है, और मुझे नहीं लगता कि ऐसा कहीं और कभी हुआ होगा।”
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सीधे-सीधे सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि विपक्ष ने संसद के ज़रिए मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन लोकसभा और राज्यसभा में दिए गए नोटिसों को पीठासीन अधिकारियों ने स्वीकार नहीं किया।
थरूर ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि इसलिए विपक्ष ने संसद के बाहर प्रतीकात्मक कार्यवाही करने का निर्णय लिया है। उन्होंने आगे कहा कि यदि संबंधित अधिकारी उनके नोटिस स्वीकार कर लेते हैं, तो पार्टियाँ औपचारिक संसदीय प्रक्रिया के ज़रिए इस मामले को आगे बढ़ाना पसंद करेंगी।
तृणमूल कांग्रेस के सांसद कीर्ति आज़ाद ने इस कार्यक्रम को राजनीतिक बयान के बजाय जनता की ओर से आया एक संदेश बताया। उन्होंने कहा कि जब संसद में नागरिकों की चिंताओं को ठीक से नहीं सुना जाता, तो उनके साथ खड़े होना चुने हुए प्रतिनिधियों की ज़िम्मेदारी है।
कांग्रेस नेता कुमारी शैलजा ने कहा कि सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त, दोनों पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही है और कहा कि विपक्ष ऐसी कोशिशों के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाता रहेगा।
विपक्ष की इस पहल को “सार्वजनिक महाभियोग” या एक तरह का ‘नकली महाभियोग’ कहा जा रहा है। यह एक राजनीतिक विरोध है, न कि कोई औपचारिक संवैधानिक महाभियोग या पद से हटाने की प्रक्रिया। इस आयोजन का उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रति सार्वजनिक और राजनीतिक विरोध जताना तथा चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़ी चिंताओं की ओर ध्यान आकर्षित करना है।
खड़गे के आवास पर आयोजित ‘नकली संसद’ (मॉक पार्लियामेंट) विपक्ष की व्यापक लामबंदी का हिस्सा है, जिसमें इंडी गठबंधन के कई दलों के नेता शामिल हो रहे हैं। इस कार्यक्रम में राजनीतिक नेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के भाषण होने की उम्मीद है। इसके बाद ऐसे नागरिक अपनी बात रखेंगे, जिनका कहना है कि मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिए गए हैं।
‘पुरवाई’ के पाठकों को बता दूँ कि मैंने जान-बूझकर मॉक संसद और मॉक कॉकटेल की तुलना की है। मॉक कॉकटेल कभी भी कॉकटेल का मज़ा नहीं दे सकती और मॉक संसद कभी भी असली संसद की तरह निर्णय नहीं ले सकती।
मॉक संसद की भी एक परिभाषा होती है- “एक ऐसा शैक्षिक या राजनीतिक अभ्यास, जो किसी वास्तविक संसद या सरकारी निकाय की विधायी कार्यवाही की नकल करता है।”
इसका उद्देश्य होता है- “सार्वजनिक नीतियों पर बहस करना, विधेयक तैयार करना, शासन-प्रणाली सीखना या कोई राजनीतिक बयान देना।” आम तौर पर इसका आयोजन शैक्षिक संस्थानों (स्कूल/कॉलेज), नागरिक केंद्रों या राजनीतिक सम्मेलनों में किया जाता है।
इस मॉक संसद में छात्र, युवा नेता या राजनीतिक कार्यकर्ता ही सांसद, मंत्री और विपक्ष के नेताओं की भूमिका निभाते हैं। मगर खड़गे के घर तो वास्तविक नेता मौजूद थे। लगभग पूरा विपक्ष वहाँ जमा था, फिर ऐसी नकली कार्यवाही की आवश्यकता क्यों आन पड़ी?
राहुल गाँधी और विपक्ष के अन्य नेता लगातार शोर मचाते हैं कि वे संविधान की सुरक्षा के लिए लड़ रहे हैं। वे हाथों में संविधान की पुस्तिका लहराते रहते हैं। मगर वे संसद को चलने नहीं देते और जो काम असली संसद में होना चाहिए, उसके लिए एक नकली संसद का आयोजन करते हैं। इससे विपक्षी दलों की निराशा महसूस की जा सकती है। लगता है, जैसे भारत के सांसदों को संसदीय प्रणाली और मर्यादा का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है।
आजकल तो ‘ऑनलाइन ट्रेनिंग’ का ज़माना है। यह अनिवार्य कर दिया जाए कि जब-जब ब्रिटेन की संसद का सत्र चल रहा हो, उसका लाइव टेलीकास्ट भारतीय सांसदों को दिखाया जाए, जिससे सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को ही सही प्रशिक्षण मिल सके कि संसद में उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए।

सही सटीक सार्थक ,,,सारगर्भित ये सारे शब्द ,इस बार के संपादकीय पर खरे उतरते हैं ।
कॉकटेल और मॉकटेल का उदाहरण बड़ा ही कटाक्ष लिए है।मॉक संसद कोई सकारात्मक कदम तो कतई नहीं है।ये तो अब स्कूल कॉलेज स्तर पर हमारे विपक्ष पर ले आया है।संपादकीय ने ब्रिटेन की संसद में हो रही कार्यवाही को दिखाने और देख कर सीखने की सही नसीहत संपादकीय में दी गई है।
यूं भी भारत की प्रत्येक राजनैतिक पार्टी पक्ष विपक्ष को संसद में रह कर ही समर्थन और विरोध के समीकरण बनाने चाहियें न की सड़क पर लोकतंत्र की मॉक संसद और डॉन किक्सेटिक नौटंकी के माध्यम से।
सादर