1
बदली निगाहें वक़्त की क्या क्या चला गया
चेहरे के साथ साथ ही रुतबा चला गया
बचपन को साथ ले गईं घर की ज़रूरतें
सारी किताबें छोड़कर बच्चा चला गया
मेरी तलब को जिसने समंदर अता किया
अफ़सोस मेरे दर से वो प्यासा चला गया
वो बूढ़ी आंखें आज भी रहती हैं मुंतज़िर
जिनको अकेला छोड़कर बेटा चला गया
रिश्ता भी ख़ुद में होता है स्वेटर की ही तरह
उधड़ा जो एक बार, उधड़ता चला गया
अपनी अना को छोड़के पछताए हम बहुत
जैसे किसी दरख़्त का साया चला गया
2
वक़्त के सांचे में ढल कर हम लचीले हो गए
रफ़्ता रफ़्ता  ज़िंदगी के पेंच ढीले हो गए
इस तरक़्क़ी से भला क्या फ़ायदा हमको हुआ
प्यास तो कुछ बुझ न पाई, होंठ गीले हो गए
क्या हुआ क्यूं घर किसी का आ गया फुटपाथ पर
शायद उनकी लाडली के हाथ पीले हो गए
आपके बर्ताव में थी सादगी पहले बहुत
जब ज़रा शोहरत मिली तेवर नुकीले हो गए
हक़ बयानी की हमें क़ीमत अदा करनी पड़ी
हमने जब सच कह दिया वो लाल-पीले हो गए
हो मुख़ालिफ़ वक़्त तो मिट जाता है नामो-निशां
इक महाभारत में गुम कितने क़बीले हो गए
देवमणि पाण्डेय
काव्यसंग्रह : दिल की बातें, ‘खुशबू की लकीरें’ और ‘अपना तो मिले कोई’। कई फिल्मों, सीरियलों और अलबमों के लिए भी गीत लिखे हैं। फ़िल्म 'पिंजर' के गीत 'चरखा चलाती माँ' को वर्ष 2003 के लिए ''बेस्ट लिरिक आफ दि इयर'' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। देश-विदेश में कई पुरस्कारों और सम्मान से अलंकृत। संपर्क - devmanipandey@gmail.com

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