चार कंधे
आज मिश्रा जी को आईसीयू में पड़े पड़े तीन दिन हो गये थे । आँखें बंद रहती थीं लेकिन सुन सब लेते । बड़े थे तो छोटे भाई भी कभी कभी चक्कर लगा लेते थे । उन्हें पता था कि सब मजबूरी में हाजिरी लगा रहे हैं ।
उनकी चारों बेटियाँ और दामाद भी आज आ चुके थे । उन्हें अपने भाइयों पर शर्म आती थी कि जिन्हें बेटे की तरह पढाया लिखाया और नौकरी में लगवाया , वे बेमन से आते हैं तो उन्होंने तय कर लिया कि आज उन्हें मुक्त कर दिया जाय ।
सब लोगों को बुला भेजा और अपने चारों दामादों को बुलाकर कहा –  “बच्चो अब वक्त आ गया है , मुझे अपने चार मजबूत कंधों पर ले जाने का ।”
“मैंने जीवन भर ये दंश झेला है कि आखिर कंधा तो हम और हमारे बच्चे ही देंगे । अब मैं अपने ही चार मजबूत कंधों पर जाऊँगा ।”
सब स्तब्ध थे कि मिश्रा जी कह क्या रहे हैं ? लेकिन वे बेटियाँ पापा का मंतव्य समझ गयीं थी और उन्हें विश्वास था कि अब पापा में जिजीविषा जागी है ।
नीला निशान
आज मदन लाल सेवानिवृत्त हो रहे थे । विभाग में विदाई समारोह की व्यवस्था की गई थी । अच्छे पद पर कार्यरत मदन लाल अपने पूरे सेवा काल में अपने दलित होने का दंश झेलते रहे लेकिन धीरता से सब सह गये ।
विभाग प्रमुख आये और उनके कार्यों और व्यवहार की प्रशंसामें कसीदे काढ़ने लगे । एक एक करके सब साथियों ने कुछ न कुछ बोला ।
अब मदन लाल जी से बोलने को कहा गया । उच्च शिक्षित होने के साथ धीरता उनका गुण था , लेकिन अप्रत्यक्ष अलग थलग रखने के प्रतीक उनकी आँखों में काँटे की तरह अटके हुए थे और उन काँटों को वो आज यहीं निकाल कर फेंक कर जाने वाले थे ।
उन्होंने बोलना शुरू किया -” मैं शुक्र गुजार हूँ अपने विभाग द्वारा मिले सम्मान और सहयोग के लिए । मेरे सभी साथी मुझे प्रिय रहे । “
“कुछ दंश भी हैं जिन्हें आज यहाँ से जाने के साथ छोड़ कर जाना चाहता हूँ ।  मेरे चाय के कप के हैंडल पर सदैव एक नीला निशान रहा और आज की चाय के बाद इसे मैं साथ ले जाने वाला हूँ ताकि फिर किसी को नीले निशान के कप में चाय न मिले ।”
“मेरे सब गुणों को बताने वाले सवर्ण साथियों ने मेरे साथ बैठकर कभी खाना नहीं खाया ।”
“कभी कोई मेरे घर नहीं आया जबकि मेरा घर आप सभी से ज्यादा अच्छा बना और सुसज्जित है । अब तो मैं बुलाना भी नहीं चाहूँगा । आप सब का कृतज्ञ हूँ ।”
समारोह में सन्नाटा छा गया था और सब सवर्ण सिर झुकाये बैठे थे ।

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