अपनी बात……

8 नवम्बर 2016 को भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने एक ऐसी घोषणा कर दी कि पूरे भारत में  हंगामा सा हो गया। राजनीतिक दल, राजनेता, वकील, डॉक्टर, बिल्डर, एस्टेट एजेण्ट जैसे लोगों के पांव के नीचे की ज़मीन एकाएक भुरभुरी हो गई। प्रधानमन्त्री पर आरोप लगाया गया कि यू.पी. और पंजाब के चुनावों के मद्देनज़र यह निर्णय लिया गया है। यानि कि यह मान लिया गया कि चुनावों में राजनीतिक दल काले धन का खुल कर उपयोग करते हैं।  और यह तो सच भी है कि भारत की राजनीतिक पार्टियों को खुली छूट है कि कहीं से भी और कितना भी पैसा दान में ले लें उन्हें कोई हिसाब किताब नहीं देना है। इस मामले में मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, चर्च और राजनीतिक दल सब समान हैं।

नोटबन्दी का सबसे तीव्र विरोध करने वालों में राहुल गान्धी, ममता बनर्जी और मायावती का नाम सामने आता है। ऐसा नहीं अन्य दलों के पास काला धन नहीं है, मगर उन दलों ने शोर करने के बजाए अपने हालात बेहतर करने में अपनी शक्ति लगा दी।

ममता बनर्जी का पागलपन तो यहां तक बढ़ गया कि उन्होंने भारतीय सेना पर विद्रोह का इल्ज़ाम लगाने में भी गुरेज़ नहीं किया। नाटक करने के लिये विख्यात ममता जी ने अपने आपको विधान सभा भवन में कैद कर लिया और यहां तक कह डाला कि सेना के जवान आते जाते वाहनों से पैसा वसूल कर रहे थे। भारतीय सैनिकों पर इतना ओच्छा इल्ज़ाम इससे पहले कभी नहीं लगाया गया। पहली बार सेना को जवानों को हफ़्ता वसूलने वाले ग़ुण्डों के बराबर ला खड़ा किया।

असदुद्दीन ओवैसी ने तो नोटबन्दी को भी हिन्दू मुसलमान का जामा पहना दिया; और आरोप लगा दिया कि मुस्लिम बाहुल्य वाले इलाकों में सरकार नये नोट नहीं ला रही है।

ममता बनर्जी ने इसे ड्रैकॉनियन लॉ कहा तो केजरीवाल ने तुग़लकी फ़रमान। राहुल गान्धी ने तो अपने बचपने को पूरी तरह उजागर कर दिया जब उन्होंने प्रधानमन्त्री के विरुद्ध निजी तौर पर भ्रष्ट होने का इल्ज़ाम लगाया और कहा कि जब वे प्रधानमन्त्री के विरुद्ध बोलेंगे तो संसद में भूकम्प आ जाएगा।

किसी भी राजनीतिक दल ने यह प्रयास नहीं किया कि संसद में इस विषय पर गंभीर चर्चा की जाए और सरकार से जवाब मांगे जाएं। हुआ इसका उलट। सभी विपक्षी दल एकसाथ संसद में नारेबाज़ी करने लगे और हर बार नई नई शर्तें लगाने लगे।

बैंकों के बाहर ए.टी.एम. पर लम्बी लम्बी कतारें लग गईं और बैंकों के पास अपना काम करने के लिये समय ही नहीं बच रहा था। सरकार हर सप्ताह अपने आदेश में नये नये बदलाव करती रही है। जीवन काफ़ी गड़बड़ा गया है।

मगर सवाल यह है कि क्या सरकार ने यह निर्णय भारत की जनता पर थोपने से पहले इसके नतीजों से निपटने का इन्तज़ाम किया था? जिन बैंकों को नये नोट देने का काम करना था, उन्हें तो भनक तक नहीं थी कि ऐसा भूकम्प आने वाला है।

कितने बैंकों के अधिकारी ही भ्रष्ट तरीकों से नये नोट पुराने पापियों के पास पहुंचा रहे हैं। भारतीय नागरिकों को भारत में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, इस पर सोशल मीडिया में बहुत सी पोस्ट पढ़ने को मिली हैं। मगर जो विदेशी भारत में आएंगे उनका क्या हाल होगा। लगता है कि सरकार ने विदेशी सैलानियों के बारे में कुछ नहीं सोचा। क्योंकि विदेशी सरकारें भारत के साथ वही व्यवहार करेंगे जो भारत वहां के नागरिकों एवं दूतावासों के साथ करेगा।

भारतीय मूल के विदेशियों और पूरी तरह से विदेशियों के बैंक अकाउण्ट भारत में हों यह तो कोई ज़रूरी नहीं है। जो सैलानी भारत आता है उसे एअरपोर्ट से होटल तक जाने के लिये 4000 रुपये बदलने की सुविधा है। फिर उसे अपने पैसे बैंक अकाउण्ट में डलवाने पड़ेंगे। सवाल यह है यदि भारतीय सैलानियों के साथ विदेशों में यही बर्ताव होना शुरू होगा तो उसका क्या नतीजा होगा।

ठीक इसी तरह हर विदेशी दूतावास में कैश से बहुत सी चीज़ों का भुगतान होता है। Petty Cash Voucher भारत के हर दफ़्तर में महत्वपूर्ण ज़रिया है। यहां लन्दन में बहुत से ऐसे रेस्टॉरेण्ट हैं जो कि बिल का भुगतान केवल कैश से करते हैं। युरोप और अमरीका के अधिकांश देशों में कैश के बिना इकॉनॉमी नहीं चल सकती। फिर एकाएक भारत में यह कैसे संभव है। यदि अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों के दूतावास को भारत सरकार केवल 5000 या 1000 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से कैश का इस्तेमाल करने देगी, तो क्या वे अपने देशों में भारतीय दूतावास को केवल उसके बराबर के डॉलर या पाउण्ड देने का प्रावधान नहीं कर देंगे।… हमें दूतावास तक बन्द कर देने पड़ेंगे।

अभी तक भारत सरकार 2000 रुपये के नोटों की शुरूआत का कोई ठोस कारण बता नहीं पाई।

 

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भारत शायद पहला देश है जिसके विरोधी दल अपने ही देश की सेना से सुबूत मांगते हैं कि आपने सर्जीकल स्ट्राइक किया या नहीं। यदि किया तो कैसे किया… उसकी फ़िल्म दिखाई जाए सुबूत के तौर पर। ज़ाहिर है कि पाकिस्तान ऐसे बयानों की ताल पर था थैय्या कर रहा है।

 

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तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के निधन से वहां की राजनीति में एक हलचल सी हो गई है। उनकी मृत्यु को लेकर भी तरह तरह की आशंकाएं जताई जा रही है। उनकी मित्र शशिकला को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। पार्टी का एक तबका उनके महासचिव बनाए जाने का विरोध कर रहा है। दूसरी तरफ़ 92 साल के करुणानिधि भी हस्पताल में भर्ती हैं। शायद तमिलनाडु अब एक नये युग की ओर बढ़ रहा है।

 

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नरेन्द्र मोदी शायद भारत के सबसे अधिक गरियाए जाने वाले प्रधानमन्त्री हैं। राहुल गान्धी के अनुसार वे सैनिकों के ख़ून की दलाली करते हैं।  उन्हें मौत का सौदागर, यमराज, दरिन्दा, वायरस, सांप, सामूहिक हत्यारा और ना जाने क्या क्या कहा गया। सच है कि भारत में असहिष्णुता बढ़ गई है तभी तो हम देश के प्रधानमन्त्री को ऐसे विशेषणों से नवाज़ कर खुले घूम सकते हैं।

 

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