संपादकीय – 2022 : बॉलीवुड की लुटिया डुबोती फ़िल्में

हिन्दी सिनेमा के निर्माताओं और निर्देशकों को यह समझना होगा कि किसी भी अच्छी फ़िल्म बनाने के लिये सबसे महत्वपूर्ण तत्व है एक अच्छी कहानी। उन्हें साहित्य जगत से रिश्ता बनाना चाहिये। ऐसी बहुत सी रचनाएं समय-समय प्रकाशित होती रहती हैं जो सिनेमा को...

संपादकीय – कोरोना का ख़तरा और नर्सों की हड़ताल

इन हड़ताली दिनों में कुछ पल ऐसे भी आए कि देखने वाला हर इन्सान नर्सों और एम्बुलैंस स्टाफ़ के पक्ष में खड़ा होने को मजबूर हो गया। नर्सें पिकेट लाइन पर खड़ी थीं यानी कि हड़ताल के नारे लगा रही थीं। ऐसे में जब...

संपादकीय – नदाव लेपिद को ज्यूरी चीफ़ किसने बनाया!

मगर मुख्य प्रश्न यह उठता है कि गोआ का फ़िल्म फ़ेस्टीवल तो सरकारी होता है। उसमें ज्यूरी के सदस्य एवं अध्यक्ष चुनने का काम भी सरकारी तंत्र ही करता है। फिर यह निर्णय किस ने लिया कि नदाव लैपिड को ज़्यूरी के अध्यक्ष के...

संपादकीय – न तुम जीते, न हम हारे

हमारे हिसाब से 2024 के लोकसभा चुनावों के लिये भारतीय मतदाताओं ने कोई इशारा नहीं दिया है। एक राज्य में कांग्रेस, दूसरे में भाजपा और दिल्ली नगर निगम के लिये आम आदमी पार्टी को विजयी बना कर भारतीय मतदाता ने संदेश दिया है कि...

संपादकीय – फफूंद (Mould) जानलेवा हो सकती है…!

दिमाग़ में एक बात चल रही थी कि शायद ब्रिटेन की काउंसिल की ही तरह भारत के सरकारी तंत्र में भी बुरी तरह से फफूंद लग रही है। खाने पीने के सामान पर या घरों में लगी फफूंद कुछ एक इन्सानों को बीमार करती...

संपादकीय – तबस्सुम यानी कि ‘किरण बाला सचदेव’ नहीं रहीं…!

अपने एक टीवी सक्षात्कार में तबस्सुम ने स्वयं बताया था कि उनके पिता एक हिन्दू थे जिनका नाम था अयोध्यानाथ सचदेव और माँ असगरी बेग़म एक मुसलमान थीं। पिता ने अपनी पत्नी की भावनाओं का सम्मान करते हुए पुत्री का नाम रखा तबस्सुम और...