अब हवा आशिक़ी की ये चलने लगी
तो शम्म-ए-मोहब्बत मचलने लगी
चाँदनी की कसक जाने शबनम फ़क़त
क़तरा क़तरा जो अश्कों में ढलने लगी
रौशनी के परिंदे उतर आए हैं
हर कली पैरहन अब बदलने लगी
है तपिश उसकी आहों में बाकी अभी
बर्फ सी मेरी हसरत पिघलने लगी
एक रंगीं फ़साना हिना लिख गई
शाम भी हाथ अपने मसलने लगी
वस्ल की रात में ये दिया न बुझे
खुद मेरी आरजू इसमें जलने लगी
वक्त-ए-रुखसत वो ‘नीलम’ हटा ही नहीं
फिर घड़ी इक क़यामत की टलने लगी

