वह आदतन छः बजे के बाद ही घर लौटता था। बच्चों की छुट्टियां होने की वजह से कल पत्नी को पीहर जाना है तो आज पाँच बजे ही ऑफिस से निकल गया था। घर पर चाय पीने के बाद वह पत्नी व दोनों बच्चियों के साथ त्रिपोलिया की तरफ चल दिया।
जरूरी सामान की खरीदारी के बाद परिवार के साथ उसने शहर की फेमस पाव भाजी खाई, फिर बच्चों की जिद पर पानीपुरी और उसके बाद आइसक्रीम। हालांकि उसे डायबिटीज थी पर कभी-कभी बच्चों के साथ खुश होकर कुछ खा लेता। पत्नी डांटती थी तो कहता -” हम निम्न मध्यमवर्गीय लोगों के लिए यही छोटी-छोटी खुशियां थी उसे भी इस बीमारी ने छीन लिया।
वह एक सरकारी दफ्तर में बाबू था हालांकि अब प्रमोशन होने पर ओ.ए. बन गया था पर वह अक्सर अपने सहकर्मियों से कहता था – हैं तो आखिर बाबू न।
वैसे वह जैसलमेर के छोटे कस्बे से था। यहाँ नौकरी के सिलसिले में आया था। साथी समझाते थे – “क्वाटर में मत रहो, लॉन लेकर घर का मकान बना दो,धीरे-धीरे किश्त से खुद का घर बन जायेगा।”
पर उसका जवाब होता – ” रिटायरमेन्ट के बाद तो सुकून से गाँव में रहेंगे।”
वह अपने ऑफिस में सबका चहेता था। एक तो उसके चेहरे पर सदाबहार हँसी और दूसरा चाहे कोई भी हो – अफसर हो या चपरासी, अंदर का हो या बाहर का काम, जोशी जी से कह दिया तो कभी ना नहीं किया।
साथ वाला विनायक कहता -” जब आपका काम नहीं है फिर भी गधे की तरह क्यों लगे रहते हो, एक मुझे देखो मेरा काम है वह भी जूनियर से करवाता हूँ । स्मार्टफोन का जमाना है थोड़ा स्मार्ट बनो जोशी जी ।”
वह हँसकर बस यही कहता – “कोई उम्मीद से अपने पास आता है तो उसका काम करने से अंगुलियां थोड़ी ही घिस जायेगी।”
” आप कभी समझ नहीं पाओगे चलो चाय पीते हैं” कहकर विनायक सोशल मीडिया पर पोस्ट अपडेट करता – ‘अपने काम से प्यार करो सफलता झख मारकर आपके पीछे आएगी।’
बाकी सहकर्मी विनायक को पीठ पीछे से उसे बुरा भला कहते थे । पर जोशी जी कहते -” मेरे कवि मित्र सोलंकी जी कहते हैं आदमी को शब्दों को सोचकर परोटना चाहिए। हर शब्द की अपनी जगह और वज़न होता है। जब आप ‘लम्पट’ शब्द बोलते हो तो उस आदमी की छवि बननी चाहिए और उस आदमी का नाम लो तो लम्पट शब्द ही जुबाँ पर आये।”
“जोशी जी, आप भी उस… की मदद करते रहते हो वह पैसों के अलावा किसी का नहीं है, संभल कर रहना कहीं आपको ही फंसा न दे।
जोशी का एक ही एक ही जवाब होता- भाई,आदमी अपने कर्मों से ही फँसता हैं वरना कौन किसको फँसाता है। अपनी करनी पार उतरनी।”
जोशी ने विनायक के खिलाफ चल रही दो अनुशासनात्मक जांचों में भी साहब को कहकर मदद की थी। उनका एक ही फ़लसफ़ा था -‘ जहाँ तक हो अपने हाथ से किसी का कभी बुरा नहीं हो ।’
आज रात उसे नींद नहीं आ रही थी । कल पत्नी बच्चों सहित पन्द्रह दिन के लिए बाड़मेर चली जायेगी। ऑफिस का कितना भी तनाव हो या काम का बोझ हो, घर आने पर पत्नी के हाथ की अदरक वाली चाय और बच्चियों की शिकायतें और मांगों के आगे सारा तनाव रफूचक्कर हो जाता। परिवार को लेकर उसे कोई चिंता नहीं थी। बड़ी बेटी अगले साल सत्तरह साल की हो जाएगी, छोटी वाली तेरह की। दोनों ही पढ़ाई में तेज । हालाँकि पत्नी को थायरॉइड की वजह से शरीर में दर्द रहता है पर बेटियां काम में हाथ बंटा देती हैं। माँ-बाप थे, तब जब भी गांव जाता तो बेटा नहीं होने की बात करते तो घड़ी भर उसे बुरा लगता। पर उन दोनों को बेटा नहीं होने का कभी गम नहीं रहा ।
ईमानदारी की वजह से जो तनख्वाह आती उससे बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च ही चलता। पर इस सबके बावजूद भी उसकी यह विशेषता थी कि वह खुद से प्यार करता, भीतर से खुश था, यही भीतरी खुशी बाहर उसके चेहरे पर झलकती थी। नियमित दिनचर्या, संतुलित भोजन और रात को सोने से पहले रोज एक घंटा पढ़ना उसका एकमात्र शौक था। हालांकि वह कॉमर्स के विद्यार्थी रहा पर साहित्य के प्रति बचपन से रुचि थी। ‘ ईदगाह’ कहानी तो आज भी गाहे-बगाहे अपने बच्चों को सुनाता था।
कुल मिलाकर बात यह थी कि वह भीतर और बाहर से वास्तव में खुश था। छोटा सा परिवार, निम्न मध्यमवर्गीय सपने और उसे पूरे करने पर मिलने वाले छोटे-छोटे सुख। सब ठीक चल रहा था।
पत्नी को पीहर छोड़कर ट्रेन से वापस आ रहे थे। लूणी स्टेशन पर रसगुल्ले देखकर मन ललचा गया। पत्नी घर पर नहीं है तो डाँट भी नहीं पड़ेगी, यह सोचकर ट्रेन से उतरे । पुरानी व ओरिजनल दुकान के चक्कर में आगे तक चले गए । वहाँ भीड़ ज्यादा थी। जब नम्बर आया तब ट्रेन छूटने की आवाज सुनाई दी। दौड़कर स्टेशन पर पहुंच रहे थे तभी पाँव टकराया और सर के बल गिरे। प्लेटफार्म पर गिरते ही बेहोश ।दो-चार दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद मृत्यु हो गई ।
खुशहाल परिवार पूरी तरह से बिखर गया । दुख की काली छाया हँसते परिवार पर पड़ गई। अब सरकारी क्वार्टर छोड़ना पड़ेगा। बच्चों को गाँव ले जाने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं। कुछ दिन तक तो ऑफिस वाले,पड़ोसी और मित्रों ने साथ देकर दुख में सहारा बनने की कोशिश की। पर कुछ समय बाद सब अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त हो गये। जब सच में साथ खड़े रहने और सहयोग की जरूरत थी तब सब दूर छिटक गये थे।समय का फेर था। सब बदल गया।
इधर बच्चों के स्कूल खोलने के दिन उधर सरकारी क्वार्टर खाली करने के नोटिस आने लगे। गाँव चले भी जाये तो पीछे कागजों का काम कौन करें ।
पेंशन के कागज अभी तक बने नहीं थे । पत्नी एक- दो बार ऑफिस भी गई तो सहकर्मियों ने जोशी जी की कार्यशैली,उनके हँसमुख व्यवहार आदि के कसीदे पढ़ कर उनके पेंशन प्रकरण को जल्द निपटाने के दिलासे दिए । पर सरकारी सिस्टम भावना से कम सिस्टम से ज्यादा चलता है। कई चक्कर लगाने के बाद पता चला कि विनायक ने ही फाइल को दबा रखा है क्योंकि पेंशन प्रकरण वही देखता है। सहकर्मियों ने उसे जोशी के उस पर किये उपकारों को भी याद दिलाया पर विनायक ने फाइल की तरफ देखा भी नहीं।
तंग आकर जोशी की पत्नी ने संपर्क पोर्टल पर शिकायत की तो ऑफिस के अफसर ने विनायक और जोशी की पत्नी को बैठाकर समझाया। तब विनायक ने गर्दन कटती हुई देख कर जल्दी कार्रवाई का दिलासा दिया और संपर्क पोर्टल पर शिकायत वापस लेने के लिए उन से निवेदन किया। कुछ दिन बाद विनायक ने जानबूझकर आधी-अधूरी सूचना भर प्रकरण भेज दिया। पेंशन विभाग ने ऑब्जेक्शन लगाकर प्रकरण वापस भेज दिया।
विनायक अब तो इतना ढीढ हो गया था कि हर सप्ताह ऑफिस के बाद उनके घर आ जाता। चाय नमकीन खाते हुए बेशर्मी से कहने लगता -” भाभी जी, आगे पैसे देने होंगे । जोशी जी मेरे मित्र थे इसलिए आप तो सिर्फ दस हजार दे दीजिए, बाकी मैं देख लूँगा।
इधर उधारी बढ़ रही थी। बच्चियों के पढ़ाई के लिए भी पैसे चाहिए थे। रिश्तेदार मुँह मोड़ चुके थे।उसे कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। वह उलझन में थी।
बड़ी बेटी ने एक दिन हिम्मत कर कहा – माँ, पापा पूरी जिंदगी ईमानदारी से जिए हम उनके पीछे रिश्वत कैसे दे सकते हैं, हमें एसीडी वाले अंकल से मिलना चाहिए। माँ को पहले तो डर लगा पर निश्चिंतता हुई कि बेटियाँ बाप के कदमों पर चलना चाहती हैं।
सहकर्मी जब भी जोशी के प्रकरण को जल्द भेजने को कहते तो विनायक का एक ही जवाब होता -” मेरा भी परिवार है। इस तरह भावुक होने से कैसे चलेगा। पेंशन प्रकरण तो सभी अपने सहकर्मियों के ही आयेंगे अगर इसमें भावुक हो जाऊंगा तो नई ली गाड़ी की किश्तें कैसे भर पाऊँगा।”
तब सहकर्मी कहते – जिस आदमी के साथ नौकरी की,जिसने सुख-दुख में साथ दिया,आज उसके गुजर जाने के बाद तुम इस तरह की बातें करते हो,जोशीजी ठीक ही कहते थे- शब्दों को सही तरीके से परोटना चाहिए। तुम … नहीं महा … हो ।”
इतना सब कहने के बाद भी उसकी मोटी चमड़ी पर जूँ तक नहीं रेंगी। शाम को ऑफिस से लौटते हुए जोशीजी के घर चला गया।
“भाभीजी आज मौसम अच्छा है ,चाय के साथ पकौड़े भी बना दीजिए।” कहते हुए रुपये गिनने लगा।
अगले दिन अख़बार में ख़बर थी – पेंशन प्रकरण के एवज़ में दस हजार रुपये लेते बाबू गिरफ़्तार।
- माधव राठौड़
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सम्प्रति – वरिष्ठ विधि अधिकारी,राजस्थान सरकार
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