भारत और पाकिस्तान एक मामले में बहुत समान रवैया रखते हैं और वह है विदेशियों के प्रति नज़रिया। विदेशों में वे भारतीय एवं पाकिस्तानी मूल के लोगों की उपलब्धियों पर गर्व करते दिखाई देंगे, मगर अपने देश में विदेशी को कभी देसी नहीं मानेंगे।
जब ऋषि सुनक, प्रीति पटेल, विरेन्द्र शर्मा, लॉर्ड पोपट, कमला हैरिस जैसे नाम और उनकी उपलब्धियों की बात होती है, तो हर भारतीय सोचता है कि जैसे यह उसकी अपनी निजी उपलब्धियाँ हों। ठीक वैसे ही हर पाकिस्तानी को लगता है जैसे सदीक ख़ान, शबाना हबीब या ब्रिटेन के तमाम पाकिस्तानी मूल के काउंसलर पाकिस्तान का मान बढ़ा रहे हैं।
मेरी पहचान का एक पाकिस्तानी मूल का दोस्त पाकिस्तानियों की ब्रिटेन में उपलब्धियों की बात कर रहा था। बात-बात में उसने कहा, “सर जी, यहाँ के लोग अपने मज़हब के पक्के नहीं हैं। इनके चर्च बिक रहे हैं और हम उन्हें ख़रीदकर वहाँ मस्जिदें बना रहे हैं।”
मैंने बहुत धीमी आवाज़ में उस मित्र से पूछा, “बंधुवर, यह बताओ कि पाँच हज़ार ब्रिटिश ईसाई पाकिस्तान सरकार को या फिर 56 इस्लामी देशों की सरकारों को अपनी अर्ज़ी भेजें, जिसमें वे गुज़ारिश करें कि उन्हें उस इस्लामिक देश में रहने की अनुमति दी जाए और साथ ही उन्हें अपने लिए चर्च बनाने की इजाज़त भी चाहिए… क्या आप ऐसी रिक्वेस्ट स्वीकार कर लेंगे?”
उसके चेहरे की रंगत बदल गई और उसने अविश्वसनीय आवाज़ में मुझसे पूछा, “कैसी बातें करते हैं सर जी! ऐसे थोड़ी ही होता है!”
मैं एक बार फिर अपनी जन्मभूमि भारत के बारे में सोचने लगा। मेरे पास ओ.सी.आई. यानी कि ओवरसीज़ सिटिज़नशिप ऑफ़ इंडिया का सर्टिफ़िकेट है। मुझे भारत जाने के लिए वीज़ा नहीं लेना पड़ता। मैं भारत में जाकर नौकरी भी कर सकता हूँ। मगर मैं चुनाव में वोट नहीं डाल सकता और न ही भारत में चुनाव लड़ सकता हूँ। पाकिस्तान इस मामले में भारत से अलग है। वहाँ दोहरी नागरिकता का प्रावधान है। वहाँ के नागरिक एक ही समय में पाकिस्तान और किसी भी एक अन्य देश के नागरिक हो सकते हैं। और दूसरे देश की नागरिकता होने के बावजूद वे पाकिस्तान में चुनाव लड़ भी सकते हैं और वहाँ के सांसद या मंत्री बन सकते हैं।
‘पुरवाई’ के पाठक शायद हैरान हो रहे हों कि आज हमारा संपादक क्या कथा-पुराण ले बैठा है। भला इससे हमें क्या फ़र्क पड़ता है कि हमारा संपादक भारत में चुनाव लड़ सकता है या नहीं। हम तो चाहते ही नहीं कि वह चुनाव लड़ने के चक्कर में अपना संपादकीय लिखना भूल जाए। चुनावी राजनीति से हमारा संपादक दूर ही रहे तो अच्छा है।
दरअसल, बात कुछ ऐसी है कि ब्रिटेन में इन दिनों हम दो प्रकार की स्थितियों से दो-चार हो रहे हैं। एक तरफ़ तो लंदन में अवैध प्रवासियों के विरुद्ध विशाल प्रदर्शन हो रहे हैं, दूसरी तरफ़ ग्रेट ब्रिटेन के ही एक अन्य देश स्कॉटलैंड में संसदीय चुनावों के नियम इस प्रदर्शन के पूरी तरह विरोध में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
शनिवार, 16 मई को एक्टिविस्ट टॉमी रॉबिन्सन द्वारा एक विशाल प्रदर्शन आयोजित किया गया, जिसका नाम दिया गया- “यूनाइट द किंगडम”। यानी कि उनका मानना है कि इस समय ‘यूनाइटेड किंगडम’ नाम सही नहीं है। आवश्यकता से अधिक लीगल और इल-लीगल प्रवासियों ने देश को मुश्किल हालात में खड़ा कर दिया है। उनके इस प्रदर्शन में साठ हज़ार से अधिक लोगों ने भाग लिया। कुछ ऐसा लग रहा था, जैसे सेंट्रल लंदन में इंसानों का एक बड़ा-सा हुजूम एकत्रित हो गया हो। यह ज़ोरदार प्रदर्शन प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की सरकार की अप्रवासी-तुष्टीकरण नीति के विरोध में किया गया था।
जुलूस में बहुत से लोगों ने यूनियन जैक के झंडे उठा रखे थे, तो किसी-किसी ने लाल रंग की टोपी पहन रखी थी, जिन पर लिखा था- “Make England Great Again (MEGA)”, यानी कि इंग्लैंड को फिर से महान बनाया जाए। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के विरुद्ध नारे लगाए जा रहे थे- “स्टार्मर को बाहर निकालो!”
रॉबिन्सन ने लोगों से मतदान के लिए पंजीकरण कराने और किसी राजनीतिक दल में शामिल होने सहित राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने का आह्वान किया। उन्होंने लोगों के हुजूम से प्रश्न किया, “क्या आप ब्रिटेन की लड़ाई के लिए तैयार हैं? 2029 में चुनाव हैं। हम किसी से भी बाहर जाकर लड़ने के लिए नहीं कह रहे हैं, लेकिन यह हमारी पीढ़ी के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षण है।”
टॉमी रॉबिन्सन ने अमेरिकी अरबपति एलॉन मस्क द्वारा रैली के सार्वजनिक समर्थन की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा, “अगर यह एक व्यक्ति न होता, तो आज कुछ भी संभव नहीं होता। ग्रेट ब्रिटेन की ओर से एलॉन को धन्यवाद।” उनके इस कथन पर भीड़ में मौजूद हज़ारों लोग “एलॉन-एलॉन” के नारे लगाने लगे।
लंदन के लिए तो जैसे शनिवार के दिन शनिदेव पूरी तरह से अपना प्रकोप दिखा रहे थे। टॉमी रॉबिन्सन की रैली के विरोध में शनिवार को ही फ़िलिस्तीन के समर्थन में एक रैली का आयोजन किया गया।
फ़िलिस्तीन समर्थक रैली के आयोजकों ने, जो साउथ केंसिंग्टन से शुरू होकर वाटरलू प्लेस की ओर बढ़ी, बताया कि उसमें 25 से 30 हज़ार लोग शामिल हुए। सांसद डायन एबॉट भी उपस्थित लोगों में शामिल थीं और उन्होंने प्रदर्शनकारियों से कहा कि जो लोग इकट्ठा हुए हैं, उनका सामना “अति-दक्षिणपंथी” विचारधारा से है। उन्होंने आगे कहा, “वे घोर दक्षिणपंथी, घोर नस्लवादी, अश्वेत-विरोधी, मुस्लिम-विरोधी और घोर यहूदी-विरोधी हैं। हमें एकजुट होना होगा… नस्लवादियों से लड़ने के लिए, फ़ासीवादियों से लड़ने के लिए, यहूदी-विरोधियों से लड़ने के लिए।”
टकराव की आशंका को देखते हुए राजधानी में 4,000 से अधिक पुलिस अधिकारियों को तैनात किया गया। वे दोनों रैलियों को आमने-सामने आने से रोकने के लिए लगाए गए थे। अधिकारी ड्रोन, घोड़ों और कुत्तों के ज़रिये चप्पे-चप्पे पर नज़र रख रहे थे। बख़्तरबंद वाहन भी तैयार रखे गए।
प्रदर्शनों से पहले, मेट्रोपोलिटन पुलिस जेम्स हरमन ने कहा कि इस पुलिसिंग अभियान पर पुलिस बल को 4.5 मिलियन पाउंड का ख़र्च आएगा। मेट्रोपोलिटन पुलिस ने कहा कि जोखिमों को देखते हुए उन्हें “उच्चतम स्तर की नियंत्रण व्यवस्था” लागू करनी पड़ी, जिसमें विरोध-प्रदर्शन के दौरान पहली बार लाइव फ़ेशियल रिकग्निशन कैमरों का उपयोग भी शामिल था। मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने इसे पिछले कई वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण पुलिस अभियानों में से एक बताया।
इसके विपरीत भारत के दो 23 वर्षीय युवकों ने ब्रिटेन के इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया है। पहला नाम है काउंसलर तुषार कुमार का जिसने 23 वर्ष की आयु में एलस्ट्री एण्ड बोरहमवुड क्षेत्र का मेयर बनने का गौरव हासिल किया है। तुषार का जन्म हरियाणा (भारत) के शहर रोहतक में हुआ था और वे दस वर्ष की आयु में अपने परिवार के साथ ब्रिटेन में आ बसे थे। तुषार ने किंग्स कॉलेज, लंदन से पढ़ाई की और बीस वर्ष की आयु में लेबर पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ कर काउंसलर बने। ब्रिटेन के इतिहास में तुषार सबसे युवा मेयर बनने का रिकॉर्ड बना चुके हैं।
हम कई बार पहले भी ‘पुरवाई’ के पाठकों को बता चुके हैं कि ग्रेट ब्रिटेन में तीन देश शामिल हैं- इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड। जहाँ एक ओर इंग्लैंड में यह सब चल रहा था, वहीं स्कॉटलैंड में संसद के चुनाव हो रहे थे। स्कॉटलैंड की संसद ने नियमों में और ढील देते हुए विदेशों से पढ़ने आए छात्रों को न केवल वोट डालने का अधिकार दिया, बल्कि चुनाव लड़ने का हक़ भी प्रदान कर दिया।
इस नीति का लाभ उठाते हुए भारतीय मूल के (तमिल) एक ट्रांसजेंडर विद्यार्थी क्यू मणिवन्नन ने ब्रिटेन की ग्रीन पार्टी की ओर से स्कॉटिश संसद का चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया। स्कॉटलैंड की प्रवासी नीति का कमाल कहा जाएगा कि मणिवन्नन को ग्रीन पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाया और स्कॉटलैंड की जनता ने यह जानते हुए कि उनका प्रत्याशी एक ट्रांसजेंडर है, उसे विजयी बनाया।
विजयी होने के बाद मणिवन्नन ने अपने भाषण में कहा, “मेरा नाम डॉ. क्यू. मणिवन्नन है। मैं एक ट्रांसजेंडर तमिल अप्रवासी हूँ। मेरे लिए ‘वे/उनका’ सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है।” मणिवन्नन ने अपने समर्थकों के बीच खड़े होकर यह बात कही। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अंग्रेज़ी में ‘he’ या ‘she’ के स्थान पर ‘they/them’ का प्रयोग किया जाता है।
मणिवन्नन ने आगे कहा, “इस देश में कुछ लोगों के लिए मैं वह सब कुछ हूँ जिससे नफ़रत करने वाले लोग घृणा करते हैं, और मैं आज यहाँ स्कॉटिश संसद के सदस्य के रूप में पूरी सावधानी के साथ खड़ा हूँ। कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं की कला है, लेकिन मैं कहूँगा कि यह देखभाल की राजनीति उन सभी के लिए संभावनाओं का विस्तार करती है, जिन्हें पीछे छोड़ दिया गया है, बाहर कर दिया गया है या जिन्हें कभी आमंत्रित नहीं किया गया है।”
एक मज़ेदार स्थिति यह है कि एक विद्यार्थी ब्रिटेन में फ़ुल-टाइम नौकरी नहीं कर सकता, मगर सांसद या काउंसिल का चुनाव जीतना नौकरी नहीं, बल्कि सेवा माना जाता है। इसलिए अब मणिवन्नन आराम से 77 हज़ार पाउंड, यानी लगभग 99 लाख रुपये प्रतिवर्ष के मानदेय का आनंद उठा सकेंगे।
स्कॉटलैंड में नियम परिवर्तन होने के कारण ही यह संभव हो पाया। नए नियमों के अनुसार, अल्पकालिक वीज़ा पर रहने वाले या स्थायी निवास वाले लोगों को भी स्कॉटलैंड में चुनाव में भाग लेने के योग्य बनाया गया है। आप्रवासन पर अंकुश लगाने के लिए अभियान चलाने वाले माइग्रेशन वॉच ने कहा कि राजनेताओं को ब्रिटिश चुनावों में राष्ट्रमंडल नागरिकों के स्वतः मतदान के अधिकार और गैर-ब्रिटिश नागरिकों के चुनाव लड़ने की क्षमता समाप्त करनी चाहिए।
ऐसा नहीं है कि मणिवन्नन के चुनाव को अप्रवासन-विरोधी आवाज़ों की आलोचना का सामना नहीं करना पड़ा। उनके चयन पर बहुत से सवाल उठाए गए। स्कॉटलैंड में रहने वाले कुछ विदेशी नागरिकों को चुनाव लड़ने की अनुमति देने वाले नियमों पर भी सवाल उठाए गए। आप्रवासन-विरोधी रिफॉर्म यूके के पूर्व टोरी मंत्री और अब शैडो चांसलर रॉबर्ट जेनरिक ने कहा, “डॉ. मणिवन्नन एक अच्छे युवा व्यक्ति हो सकते हैं, लेकिन मैं ऐसे देश में नहीं रहना चाहता जहाँ छात्र वीज़ा पर रहने वाले लोग राष्ट्रीय संसदों में निर्वाचित प्रतिनिधि बन सकें।”
मेरे प्यारे पाठकों, अब आपको समझ आ गया होगा कि इस संपादकीय की शुरुआत में मैंने भारत और पाकिस्तान का मुद्दा क्यों उठाया। क्योंकि अंत में हमें इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की स्थिति को उसी परिप्रेक्ष्य में समझना था। यह तो सच है कि मणिवन्नन ने इतिहास रच दिया है। तमिलनाडु में पैदा हुए मणिवन्नन मात्र 23 वर्ष के हैं। उन्होंने दिल्ली के पास सोनीपत स्थित ओ.पी.जिंदल यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और 2021 में स्कॉटलैंड गए। वहाँ वे यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंट एंड्रूज में इंटरनेशनल रिलेशंस में पीएचडी करने पहुँचे थे।

शानदार संपादकीय, पुनः एक महत्वपूर्ण जानकारी के लिए आपका आभार।
यही आपके लेखन की खासियत है कि हमेशा की तरह बहुत कुछ लिखा आपने। खूब शुभकामनाएं
महत्वपूर्ण जानकारी है, जिस पर भारतीय मीडिया का ध्यान नहीं है।
इंग्लैण्ड और स्कॉटलैंड के संसदीय प्रणाली की बेहतरीन जानकारी तथा भारत और पाकिस्तान के अप्रवासी नीति की जानकारी अच्छी लगी। ट्रांसजेंडर को He/She के बदले they/them कहकर संबोधित करने की प्रथा लाजवाब है।
हमेशा की तरह इस बार का संपादकीय जानकारियों से भरपूर रहा। हार्दिक धन्यवाद।
एक बार फिर से महत्वपूर्ण जानकारी देता शानदार ज्ञानवर्धक सम्पादकीय पढ़ने को मिला। यह आपकी लेखनी का कमाल ही तो है। साधुवाद तेजेंद्र जी।
बढ़िया उम्दा और आईना से मुद्दों का समूह है इस बार का संपादकीय। भारत पाकिस्तान की सोच को तौलता और विचारोत्तेजक अंदाज़ से हमें आईना पेश करता है कि आप क्या हैं एक दोगलेपन की मानसिकता के सतत वाहक। पाकिस्तान का दुष्टता पर्याय है तो सज्जन भारतीय भी नहीं!
अब अगर ग्रेट ब्रिटेन या यूनाइटेड किंगडम तो स्कॉटलैंड वालों की लन्दन वाली से कभी नहीं बनीं और नतीज़ा ग्रेट ब्रिटेन अब आने वाले समय में बेमानी हो जायेगा?;?
अब यह भी प्रकृति का न्याय है कि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे।हिन्दू और मुस्लिम को धर्म के नाम पर बाँटा ,,,दो मुल्क बनाये और विश्व की त्रासदी झेलने को मजबूर किया। वही पाकिस्तान का दंभी जन समूह अब वोटिंग बैंक बना और आज अंग्रेजों की स्थिति सभी के सामने है। याद आती है,,,,माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोहे एक दिन ऐसा होगा मैं रुड़ूंगी तोहे
अब स्कॉटलैंड में ट्रांसजेंडर का चुनाव लड़ना और जीतना उस समाज की सहिष्णुता और सकारात्मक रुख को रेखांकित करता है।
यह संपादकीय एक व्यवहारिक उदाहरण और सीख दोनों ही है शोषण करने वाले देश और दो भ्रमित देशों के लिए।
बधाई हो ,,,साफगोई से संपादकीय हेतु।
क्या कहने uk की राजनीति का पोस्ट मार्टम अच्छा किया है साधुवाद
पुरवाई के पाठक के रूप में हम कतई हैरान नहीं है। संपादक महोदय प्रत्येक अंक में देश विदेश की घटनाओं पर लिखते रहते हैं। लेकिन हर बार एकदम अलग विषय पर लेखनी चलाना, यह पाठकों के लिए रोचक जानदार प्रदान करता है। आपको शत शत प्रणाम है सर!
इस बार पुरवाई के सम्पादकीय में दुनिया के विभिन्न राष्ट्रों के नीतिगत और व्यावहारिक सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को सूक्ष्मता पूर्वक सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा जी ने उजागर किया है । कई राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वैविध्य को संदर्भित करते हुए बदलती दुनिया की प्रगति और अवनति दोनों पहलुओं को को दर्शित किया गया है ।
सम्पादक के “कथा-पुराण “ में बहुत सारे मत मतांतरों के बीच वैश्विक स्तर पर राजनीतिक , सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक दृष्टिकोण उभरते हैं । इसलिए सम्पादकीय के केंद्रीय चिंतन में
भारतीय मूल के एक ट्रांसजेंडर विद्यार्थी क्यू मणिवन्नन के स्कॉटिश संसद बनने के तथ्य का से ज़िक्र प्रमुखता से किया गया है ।उस सांसद के लिए
राजनीति , संभावनाओं की कला मात्र नहीं बल्कि
“देखभाल की राजनीति से संभावनाओं का विस्तार “ है । बदलते परिवेश और परिदृश्य के ऐसे उदाहरणों से आज के वैज्ञानिक युग में सामाजिक परिवर्तन को देखा जा सकता है ।
इस अंक के अन्य स्तंभ और साहित्यिक विधाएँ पठनीय हैं ।
व्यावहारिक जीवन के मुद्दों को उठाने वाले प्रख्यात कहानीकार और सम्पादक
श्री तेजेंद्र शर्मा को बहुत बधाई ।
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मीनकेतन प्रधान
भारत