Monday, July 6, 2026
होमअपनी बातयूरोप में गर्मी का कहर...

यूरोप में गर्मी का कहर…

यूरोप में भीषण गर्मी की लहर ने तापमान के कई रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं और मानव स्वास्थ्य, मूलभूत सेवाओं, कृषि, बुनियादी ढाँचे तथा श्रम उत्पादकता पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है। इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में भयंकर तूफ़ानों और सूखे की स्थिति बिगड़ने के साथ-साथ जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ गया है।

पचास वर्ष पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि ब्रिटेन और शेष यूरोप में इतनी भीषण गर्मी की लहर जनजीवन को इतनी बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। स्पेन, फ़्रांस और जर्मनी में गर्मी के कारण सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो गई।

जून-जुलाई 2026 के हालात को देखते हुए स्पेन और फ़्रांस आने वाले दिनों में एक और संभावित भीषण गर्मी की लहर के लिए तैयारी कर रहे हैं। इस लहर के दौरान तापमान 44 डिग्री सेल्सियस (111 डिग्री फ़ारेनहाइट) तक पहुँच सकता है। आँकड़ों से पता चलता है कि जून में पड़ी भीषण गर्मी के कारण इन दोनों देशों में 2,000 से अधिक अतिरिक्त मौतें हुईं।

स्पेन की सरकारी मौसम विज्ञान एजेंसी एईएमईटी ने कहा है कि शुष्क और अत्यधिक गर्म हवा का एक बड़ा झोंका 4 जुलाई  2026 शनिवार से स्पेन के अधिकांश हिस्सों में लगातार उच्च तापमान लेकर आएगा। एजेंसी ने यह भी बताया कि दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में मंगलवार को तापमान 42 से 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है।

एईएमईटी के प्रवक्ता रुबेन डेल कैम्पो ने बताया, “सप्ताह के अंत तक तापमान बढ़ना शुरू हो जाएगा और हम एक और लू की संभावना से इनकार नहीं कर सकते।” एजेंसी ने यह भी कहा कि उच्च तापमान के कारण अगले सप्ताह जंगलों में आग लगने की आशंका बढ़ सकती है। उन्होंने बुजुर्गों तथा हृदय संबंधी समस्याओं से ग्रस्त लोगों को दिन के समय तेज़ गर्मी में अतिरिक्त सावधानी बरतने की चेतावनी दी।

स्पेन और फ़्रांस से प्राप्त अस्थायी आँकड़ों के अनुसार, भीषण गर्मी के कारण दोनों देशों में लगभग 1,000 लोगों की जान चली गई। स्पेन के स्वास्थ्य मंत्रालय की दैनिक मृत्यु-दर निगरानी प्रणाली (मोमो) के आँकड़ों के अनुसार, जून में उच्च तापमान के कारण 1,029 अतिरिक्त मौतें हुईं।

नवीनतम समाचार मिलने तक फ़्रांस के सूत्रों ने बताया कि जून में यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ने वाली भीषण गर्मी के अंतिम सप्ताह में 2,000 से अधिक मौतें हुईं। मौसम विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आने वाले कुछ दिनों में महाद्वीप में तापमान और अधिक बढ़ सकता है।

जून के अंतिम सप्ताह में उससे पहले वाले सप्ताह की तुलना में मौतों की संख्या में 29 प्रतिशत की वृद्धि हुई। फ़्रांस की स्वास्थ्य मंत्री स्टेफ़नी रिस्ट ने बताया कि 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की मौतों में ‘साफ़ तौर पर बढ़ोत्तरी देखी’ गई है।

24 जून को पूरे फ़्रांस में अब तक का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया। पेरिस में तापमान लगभग 41 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया और देश के आधे हिस्से में ‘रेड हीट अलर्ट’ जारी किया गया।

मौतों की यह खबर ऐसे समय में आई है, जब यूरोप के कई हिस्सों में, जिनमें यूनाइटेड किंगडम (यूके) भी शामिल है, इस सप्ताहांत से और भी भीषण गर्मी पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

बीबीसी के मौसम विभाग का कहना है कि अज़ोरेस से पुर्तगाल और स्पेन की ओर हाई प्रेशर का एक बड़ा क्षेत्र बन रहा है, जिसके प्रभाव से इस सप्ताहांत तक फ़्रांस और दक्षिणी ब्रिटेन में गर्मी और बढ़ने का अनुमान है।

उधर, जहाँ यूरोप भीषण गर्मी के लिए तैयार हो रहा है, वहीं 4 जुलाई के अवकाश सप्ताहांत का आनंद मना रहे लाखों अमेरिकी पहले से ही मध्य और पूर्वी अमेरिका के कुछ हिस्सों में लंबे समय से पड़ रही भीषण गर्मी और बढ़ती उमस से प्रभावित हो रहे हैं।

बेल्जियम में गर्मी की लहर के दौरान 1,222 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं, जो सामान्य से 39 प्रतिशत अधिक थीं। इनमें से लगभग आधी मौतें 85 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की थीं। देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि हीट वेव के दौरान हुई मौतों की यह संख्या “अभूतपूर्व” थी।

इस बीच, डच अधिकारियों ने स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि पिछले सप्ताह नीदरलैंड में भीषण गर्मी के कारण सामान्य से लगभग 480 अधिक मौतें हुईं। इनमें अधिकांश लोग 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के थे।

देश के कुछ हिस्सों में तापमान लगभग 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। सबसे अधिक मौतें नीदरलैंड के दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्रों में हुईं, जहाँ तापमान सबसे अधिक दर्ज किया गया।

इस बार की भीषण गर्मी की लहर के दौरान पूरे यूरोप में तापमान के नए रिकॉर्ड बने। भीषण गर्मी के कारण करोड़ों लोग बेहाल हो गए। स्कूलों और परिवहन सेवाओं को बंद करना पड़ा तथा अनेक लोगों की जान चली गई।

जून के अंत में ‘हीट डोम’ की वजह से उत्तरी अफ़्रीका की गर्म हवाएँ आइबेरियन प्रायद्वीप के ऊपर फँस गईं। इसके बाद ये हवाएँ यूनाइटेड किंगडम तक फैल गईं और अंततः जुलाई की शुरुआत में यूरोप के मध्य तथा पूर्वी भागों में इनका प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा।

ऐसा माना जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के बिना ऐसी भीषण गर्मी की लहर का आना लगभग असंभव होता। जर्मनी में तो स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सड़कों पर चलने वाली ट्राम सेवाओं को रोकना पड़ गया। दरअसल, अत्यधिक गर्मी के कारण सड़क का कोलतार पिघलकर ट्राम की पटरियों पर चिपक गया, जिसके कारण ट्रामों का परिचालन रोकना पड़ा। जर्मनी में इस प्रकार की घटना पहली बार देखने को मिली।

यूरोप में रेलगाड़ी की पटरियाँ भी तीव्र गर्मी के कारण मुड़ जाती हैं, जिससे रेलगाड़ियों के आवागमन में भी कठिनाइयाँ पैदा होती हैं। भारत जैसे देशों में जब रेल की पटरियाँ बनाई जाती हैं, तो लोहे में कुछ अन्य धातुएँ भी मिलाई जाती हैं, जो अत्यधिक गर्मी को सहने में सहायक सिद्ध होती हैं। मगर यूरोप और ब्रिटेन में, क्योंकि पहले इस प्रकार की भीषण गर्मी नहीं पड़ती थी, इसलिए इस ओर कभी विशेष ध्यान नहीं दिया गया।

सच तो यह है कि जब हम यूरोप की कल्पना करते हैं, तो बर्फ़ से ढकी पहाड़ों की चोटियाँ हमारे दिमाग़ में उभरने लगती हैं। हिन्दी सिनेमा ने भी यूरोप की ऐसी ही छवि प्रस्तुत की है। आम भारतीय की कल्पना से परे है कि यूरोप में इतनी भीषण गर्मी भी पड़ सकती है। इंसान यह सोचने पर भी मजबूर हो जाता है कि आख़िर गर्मी पड़ने पर यूरोपीय देशों के लोग घरों में एअर कंडीशनर चलाकर ठंडक में क्यों नहीं बैठते, बल्कि स्विमिंग कॉस्ट्यूम पहनकर समुद्र तटों की ओर क्यों निकल पड़ते हैं।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि ब्रिटेन और यूरोप के अधिकांश घर सर्दियों के मौसम को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। पहले यहाँ इतनी अधिक सर्दी पड़ती थी कि घरों में लकड़ी जलाकर गर्मी पैदा की जाती थी। लगभग हर घर की छत पर एक चिमनी होती थी, जिससे धुआँ बाहर निकल सके। जैसे-जैसे विज्ञान ने प्रगति की, घरों में सेंट्रल हीटिंग प्रणाली का उपयोग होने लगा। ठंड बढ़ते ही हीटिंग चालू कर दी जाती है।

ग्रेटर लंदन की सीमा में स्थित वाटफोर्ड के उपनगरीय क्षेत्र में दक्षिण-पश्चिमी हर्टफोर्डशायर में स्थित कार्पेंडर्स पार्क के पास सुबह के चांद का एक नज़ारा।

घरों की खिड़कियाँ भी डबल-ग्लेज़िंग वाली होती हैं, अर्थात उनके शीशे दो परतों वाले होते हैं। इसका लाभ यह होता है कि जब सर्दी का प्रकोप बहुत अधिक होता है, तो इन दोहरी परतों वाले शीशों के कारण घर के भीतर की गर्मी सुरक्षित बनी रहती है। घरों की दीवारें भी विशेष ढंग से बनाई जाती हैं। दोहरी दीवारों के बीच रूई जैसी इंसुलेशन सामग्री भर दी जाती है, ताकि कमरे गर्म रहें और लोग ठंड से सुरक्षित रह सकें।

अधिकांश घरों में छत के पंखे और एअर कंडीशनर नहीं होते। यही कारण है कि यहाँ के निवासी भीषण गर्मी का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं होते। इस बार की भीषण गर्मी की लहर के दौरान एअर कंडीशनरों और पंखों की बिक्री में ज़बरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है।

हम उम्मीद करते हैं कि अब यूरोपीय यूनियन और यूनाइटेड किंगडम भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए घरों, सड़कों और रेल की पटरियों के निर्माण तथा रखरखाव पर अतिरिक्त ध्यान देंगे और सब कुछ राम-भरोसे नहीं छोड़ेंगे।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
RELATED ARTICLES

14 टिप्पणी

  1. कुछ साल पहले मैं जर्मनी गई थी।
    मैं भी वहां अचंभित थी कि किसी के भी घर में ceiling fan नहीं है।

    खैर अब सब लगा लेंगे अपनी अपनी सुविधानुसार।

    रानी मोटवानी

  2. पर्यावरण परिवर्तन को लेकर लिखा गया अति महत्त्वपूर्ण संपादकीय है।

  3. जलवायु परिवर्तन का इस से भयावह और वीभत्स दृश्य अन्यत्र नहीं देखा जा सकता। इस बार पुरवाई पत्रिका का संपादकीय भीषण गर्मी उस से होने वाली मौतें और अन्य संबंधित क्षेत्रों में हुए नुकसानों का तथ्यात्मक आकलन कर रहा है। यूरोप और इंग्लैंड फ्रांस स्पेन सभी बुरी तरह से प्रभावित हैं और अपने अपने स्तर पर युद्ध स्तर इस प्राकृतिक चुनौतियों से निबटने में लगे हैं।
    पर प्रकृति सही अर्थों में प्रकृति ही है ,,यूरोपीय देशों में उतना मजबूत संरचनात्मक ढांचा नहीं है जितना कि भारत सरीखे देशों में हैं और मज़े की बात है कि यह आधारभूत संरचनात्मक ढांचा इन्हीं मेहनत से जी चुराने वाले चतुर सियारी पूर्वजों ने अपनी नस्ल को दिया है।और आज हालात सभी के सामने हैं।बड़े पैमाने पर मानव जीवन और जान माल का नुकसान हुआ है और दुखद भी है ,सभी पाठकों की शोक संवेदनाएं और योगदान यदि जरूरी हुआ तो सद्य रहेगा।तिस पर भी प्रकृति तो प्रकृति है जैसे अनुकृति इन देशों में दूसरे देशों की बदहाली की बनाई है वैसी ही अब इनके अपने देशों में है।
    आशा है कि इंसानियत की नीयत से सहर होगी।

  4. जलवायु परिवर्तन के कारण प्रकृति में कई विनाशकारी परिवर्तन होने लगे हैं, योरोप भी इससे अछूता नहीं रहा। ठंडे रहने वाले प्रदेश भी उच्च तापमान से झलस रहे हैं।
    वर्तमान परिवेश में होने वाले परिवर्तनों से संबंधित संपादकीय यूरोपीय देशों की स्थिति पर प्रकाश डालने में सक्षम है । इन विभीषिकाओं से समूचा जीव संकट में है। इसके निराकरण हेतु सार्थक कदम उठाने हो चाहिए। देख।डॉ पद्मा शर्मा

  5. आश्चर्यजनक। किंतु दुखद। नुष्य ने पर्यावरण पर जो आघात किया है उसका परिणाम तो उसे भोगना ही होगा।

  6. कई साल पहले भी ऐसा एक बार हुआ था मुझे याद है हमारे लिए तो यह घर में कोई ज्यादा नहीं है पर वहां के लिए क्योंकि वहां ठंड की ही सुरक्षा की गई है ऐसे ही मकान है इसलिए परेशानी है। जलवायु अचानक बदलने से बहुत ही परेशानी होती है बहुत बढ़िया लेख।

  7. “पुरवाई” -4 जुलाई 2026
    ——————
    यह अंक प्राकृतिक परिवर्तनों से प्रभावित ब्रिटेन और शेष यूरोप में भीषण गर्मी के परिदृश्य से संबंधित है। प्रतिष्ठित कथाकार – सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा जी पिछले माह घटित ब्रिटेन के राजनैतिक परिवर्तनों को विचारों के भावी सीमांत क्षेत्र में विराम देते हुए इस बार वहाँ के प्रकृति -परिवर्तन से पाठकों को रू-ब-रू करवा रहे हैं । एक तरह से भौतिक प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के बेशुमार दोहन के फलस्वरूप प्रकृति की कुपित दृष्टि यूरोप पर भी पड़ी है । यह महाद्वीप आम तौर पर शीतल जलवायु के लिए जाना जाता है । जहां लगभग पचास वर्षों बाद अपेक्षाकृत तापमान के बढ़ने से जनजीवन की अस्तव्यस्तता
    और जन हानि दुखद है । वहां भयंकर तूफ़ानों ,सूखे की स्थिति और जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ गया है। विकासशील राष्ट्रों के लिए परिवेशगत प्रतिकूलता कभी-कभी असहज हो जाती है लिहाज़ा प्रगति के रास्ते में आंशिक अवरोध उत्पन्न होता है । सम्पादकीय में इन तमाम पहलुओं का सूक्ष्म विवरण दिया गया है। यह भी सम्पादक के धरातलीय जुड़ाव का प्रमाण है ।
    अंक के अन्य साहित्यिक खंड पठनीय हैं ।
    नियत तिथि और समय पर अंक का प्रकाशन अत्यंत सराहनीय है।
    शुभकामनाएँ ।
    —-
    मीनकेतन प्रधान
    4/7/26

  8. ‘यूरोप में गर्मी का कहर…’ संपादकीय इस बात की ओर इंगित करता है कि विकास की अंधी दौड़ में मानव पृथ्वी के पर्यावरण से खेल कर रहा है। किसी देश का पर्यावरण बहुत खराब हो जाए तो हम दूसरे देश में जाकर बस सकते हैं, अगर पूरी धरती का ही पर्यावरण खराब हो जाए तो मानव किस लोक में ठिकाना ढूंढेगा??? कहना मुश्किल है। कहना क्या सोचना ही मुश्किल है!
    यूरोप के देश आज भयंकर गर्मी की चपेट में हैं। आंकड़े बताते हैं कि बहुत से लोग इस गर्मी की भेंट चढ़ चुके हैं। जिस यूरोप में गर्मी जैसे मौसम की कल्पना नहीं की जा सकती थी, आज वह भयानक गर्मी से झुलसा पड़ा है।
    संपादकीय में आपने सही लिखा है कि हम जैसे भारतीय यूरोप की कल्पना बर्फ़ से ढंकी पहाड़ियों से ही करते रहे हैं। हमेशा ठंडा रहने वाला मौसम।
    भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां मानव के रूप, रंग, भाषा आदि गुणों के लिए उत्तरदाई होती है।अत्यधिक ठंडे प्रदेशों में रहने वाले लोग गोरे होते हैं। अगर ऐसे ही हालात रहे तो ये परिस्थितियां मानव जींस को प्रभावित कर सकती हैं।
    अचानक जलवायु परिवर्तन ने यूरोप को अपनी दिनचर्या बदलने पर बाध्य कर दिया है। लोग पंखे, ए सी आदि लगवा रहे हैं। जबकि इससे पहले इन चीज़ों की वे कल्पना ही नहीं कर सकते थे।
    44 डिग्री तापमान पहुंचने की संभावना से ही वहां की भयावहता को समझा जा सकता है। जिसने मामूली गर्मी का एहसास तक न किया हो, उसके लिए इस गर्मी का कहर त्रासदी से कम नहीं होगा। आधुनिक मानव जिस ओर जा रहा है उसके परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं।
    बीच-बीच में पुरवाई की संपादकीयों से यूरोपीय देशों को समझने में मदद मिल जाती है। मनोहारी चित्र या फिल्मों के दृश्यांकन आंखों को सुख प्रदान कराते हैं, पर वहां की भीतरी परतों को दिखाने में वे असमर्थ रहते हैं। संपादकीय उन भीतरी दृश्यों की तह में जाकर वास्तविकता को पाठक के सामने रख देता है।
    प्रकृति और संपादकीय दोनों ही नए तेवर लिए हुए हैं। जब इस तरह के बदलाव होंगे तो तेवर तो सहने ही पड़ेंगे।

  9. आदरणीय सर,
    सादर प्रणाम।
    ‘पुरवाई’ का ताज़ा संपादकीय ‘यूरोप में गर्मी का कहर….’ समय के सबसे बड़े और आसन्न संकट (जलवायु-परिवर्तन) पर अत्यंत तथ्यात्मक, विचारोत्तेजक और आँखें खोल देने वाला विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पिछले माह के बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों से इतर, इस बार प्रकृति के इस वीभत्स और अभूतपूर्व तेवर पर अपनी सजग कलम चलाना आपके भीतर के संवेदनशील संपादक और दूरद्रष्टा लेखक को रेखांकित करता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि इस बार का संपादकीय वैश्विक पर्यावरण संकट और उसके व्यावहारिक सामाजिक-ढांचागत प्रभावों पर हमें गहराई से सोचने के लिए विवश करता है।
    संपादकीय की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह इस गंभीर विषय को केवल वैज्ञानिक आँकड़ों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि यूरोप के विलासितापूर्ण जनजीवन, वास्तुकला और बुनियादी ढाँचे के अंतर्विरोधों को इसके साथ जोड़कर एक व्यावहारिक धरातल प्रदान करता है। हिंदी सिनेमा और जनमानस में जमी हुई ‘बर्फ़ से ढके यूरोप’ की रूढ़ छवि को तोड़कर, आपने वहाँ की दोहरी परत वाले काँच की खिड़कियों (Double-glazing windows) और दीवारों के ताप-रोधन (Insulation) की उन मजबूरियों को सामने रखा है; जो कभी सर्दियों से बचाने के लिए बनी थीं, पर आज ‘भीषण गर्म हवा के घेरे’ (हीट डोम) के दौर में घरों को ही भट्टी बना रही हैं। आम भारतीय पाठक वास्तव में इस बुनियादी और ढाँचागत बेबसी की परतों से अब तक सर्वथा अनभिज्ञ था।
    जर्मनी में कोलतार पिघलने से ट्राम सेवाओं का रुकना और ब्रिटेन में रेल पटरियों के मुड़ने जैसी बारीक व्यावहारिक जानकारियों को भारत की तकनीकी सजगता से जोड़कर देखना आपके धरातलीय और तुलनात्मक बोध की गहराई को प्रकट करता है। प्रकृति के इस भयानक थपेड़े के बीच आपका यह व्यंग्य और चेतावनी बहुत प्रासंगिक है कि अब यूरोपीय देशों को भविष्य की इन प्राकृतिक विभीषिकाओं से निपटने के लिए अपनी आधारभूत संरचना को बदलना होगा और सब कुछ केवल ‘राम-भरोसे’ नहीं छोड़ा जा सकता।
    सादर, सद्भावनाओं सहित।
    आपका
    चन्द्रशेखर

  10. सादर नमस्कार सर…
    विस्तार से लिखा गया यह संपादकीय वास्तव में महत्वपूर्ण है…. विशेष जानकारी भी मिली है…एक अत्यंत विकासशील देश की स्थिति के बारे में जानना संभव हुआ…प्रकृति अपना प्रभाव भी दिखाती है….
    बहुत सुंदर संपादकीय…..

    साधुवाद सर….

  11. जितेन्द्र भाई: – सदा की तरह इस बार भी बहुत अच्छा सम्पादकीय विषय चुना आप ने।
    परिवार सहित हम ने कैनेडा को फ़र्वरी 1965 में अपना नया घर बनाया था। उस समय कस के सरदी का मॉसम था। धीरे धीरे ऐसा लगा कि प्रकृति ने देश के पूरे साल को चार ढ़ांचों में बांटा हुआ है। Spring (बसंत) मार्च, अप्रैल, मई। Summer (गर्मी) जून, जुलाई, अगस्त। Autumn (पतझड़) सितम्बर, अक्तूबर, नवम्बर। Winter (सरदी) दिसम्बर, जनवरी, फ़र्वरी।
    हमारे देखते ही देखते मौसम में इतनी तबदीलीयाँ आगई हैं कि कोई भी मौसम किसी भी महीने में हो जाता है। कभी कभी तो मई के महीने में भी स्नोफ़ॉल देखने को मिली है। आजकल के मौसम का न कोई दीन है न ईमान है। किसी महीने में कुछ भी हो सकता है। अपने गरेबान में मुँह डाल कर क्या हम ने कभी सोचा है कि यह सब क्या और क्यों हो रहा है? आपने जो अपने सम्पादकीय में बेहद गर्मी और उस से होने वाली मौतों का ज़िकर किया है उसके वजह के लिए हम सब ज़िम्मेवार है। जलवायु के इस परिवर्तन के लिए पर्यावरण से ख़िलवाड़ और छेड़छाड़ करना सब से बड़ा गुनाह है। विकास के नाम पर इस छेड़छाड़ ने प्रकृति के कंप्युटर में एक ऐसा वायरस डाल दिया है जिस से हम परेशान हैं। बिन बादल बरसात और तापमाण में इतना बदलाव यह सब प्रकृति की चेतावनी है कि अब भी संभल जाओ वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest