अमेरिका न जाने कितने मोर्चों पर अलग-अलग युद्ध लड़ रहा है। कहीं वह रूस और यूक्रेन के युद्ध में परोक्ष रूप से जुड़ा है, तो कहीं ईरान के साथ सीधे-सीधे भिड़ रहा है। वहीं अमेरिका के वैज्ञानिक निरंतर खोजबीन करते रहे हैं कि वहाँ तकनीक के कारण जीवन में किस तरह के बदलाव महसूस किए जा रहे हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध से पहले वैज्ञानिक अनुसंधान का मुख्य केंद्र यूरोप था। हमें ग्रीक, ब्रिटिश, जर्मन और फ़्रांसीसी आविष्कारकों की जानकारी थी। मगर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप अपने ज़ख्मों पर मरहम लगा रहा था और अमेरिका शोध का केंद्र बनता चला गया। सिलिकॉन वैली तो जैसे तकनीकी विकास का मुख्य अड्डा ही बन गई। वहाँ भारतीय वैज्ञानिकों एवं कंप्यूटर विशेषज्ञों ने भी अपनी उपस्थिति शिद्दत से दर्ज करवाई।
ऐसा ही एक आविष्कार हुआ आई-फ़ोन का। कहते हैं न कि फ़ोन तो स्मार्ट होता गया, मगर इंसान बेवक़ूफ़ होता गया। स्मार्टफ़ोन का कमाल यह है कि इंसान के अंगूठे दोबारा काम करने लगे हैं। टाइपराइटर पर उंगलियाँ चलाने की प्रथा लुप्त होती जा रही है। युवा पीढ़ी के लड़के-लड़कियाँ स्मार्टफ़ोन पर द्रुतगति से अंगूठे चलाते हुए और अंगूठा दिखाते हुए दिन भर व्यस्त रहते हैं।
लंदन की मेट्रो रेलगाड़ी में पहले लोग कोई किताब या समाचार-पत्र पढ़ते दिखाई दिया करते थे। अब अस्सी प्रतिशत से अधिक लोग स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन में घुसे दिखाई देते हैं। किसी की प्रेमिका या प्रेमी खो जाए तो युवा पीढ़ी को उतना दुःख नहीं होगा, जितना अपने स्मार्टफ़ोन के खो जाने से होगा।
लंदन में तो आई-फ़ोन कंपनी मेट्रोपॉलिटन पुलिस के लिए उनकी समस्या का एक अनूठा हल भी ढूँढ़ लाई है। जो फ़ोन चोरी किए जाएँगे, उन्हें पूरी तरह ब्लॉक करने का ज़िम्मा आई-फ़ोन कंपनी उठाने जा रही है। ब्रिटेन में स्मार्टफ़ोन छीनने की घटनाएँ हर रोज़ होती रहती हैं। शायद इस तरह इस गुंडागर्दी पर कुछ लगाम लगाई जा सके। फ़ोन ब्लॉक होने के बाद तो वह किसी काम का रहेगा नहीं।
ऐसे में एक महत्वपूर्ण ख़बर अमेरिका से आती है, जो हम सबको हैरान भी करती है और एक चेतावनी भी देती है। जहाँ एक ओर भारत जैसे देश बढ़ती हुई जनसंख्या से जूझ रहे हैं, वहीं अमेरिका में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आ रही है। वहाँ कुछ संस्थाएँ शोध कर रही हैं और उनके अनुसार इस प्रक्रिया का मुख्य दोषी स्मार्टफ़ोन है!….मित्रो, यह जानकर मुझे भी उतनी ही हैरानी हुई, जितनी कि आपको इस समय हो रही है। भला स्मार्टफ़ोन का प्रजनन दर से सीधा रिश्ता कैसे हो सकता है? क्या स्मार्टफ़ोन से ऐसी कोई किरणें निकलती हैं, जो प्रजनन शक्ति को कम करती हैं?
हाल ही में अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ़ इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा प्रकाशित एक शोध-पत्र में यह सवाल उठाया गया कि- “क्या आई-फ़ोन गर्भनिरोधक है?” इस शोध-पत्र में इस बात की भी पड़ताल की गई कि वर्ष 2007 से लेकर अब तक अमेरिका में प्रजनन दर में 22 प्रतिशत की गिरावट क्यों आई है।
अर्थशास्त्रियों और वैज्ञानिकों ने इस विषय पर काफ़ी गंभीरता से अध्ययन करने के बाद स्मार्टफ़ोन की ओर ध्यान दिया। इसी सिलसिले में मिडलबरी कॉलेज की अर्थशास्त्री श्रीमती कैटलीन मायर्स और उनके छात्र इज़ेकिल हूपर ने इस परिकल्पना का परीक्षण किया कि स्मार्टफ़ोन, जो 2007 में पहले आई-फ़ोन के साथ अमेरिकी बाज़ार में आए थे, उसका इससे कोई संबंध हो सकता है।
जब भी कोई शोध किया जाता है, तो उसमें तमाम उपलब्ध जानकारियों का इस्तेमाल किया जाता है। इस टीम ने भी पता लगाया कि जब आई-फ़ोन बाज़ार में आया, तो सबसे पहले उसे किस नेटवर्क से जोड़ा गया और वह अमेरिका के किन-किन राज्यों में अधिक बिकने लगा। पता चला कि सबसे पहले आई-फ़ोन को ए.टी. एंड टी. नेटवर्क से जोड़ा गया था। वर्ष 2011 तक आई-फ़ोन इसी नेटवर्क से जुड़ा रहा।
अब इस टीम ने उन चार वर्षों में प्रजनन दर का एक तुलनात्मक अध्ययन किया, एक तरफ़ वे राज्य जहाँ आई-फ़ोन उपलब्ध था और दूसरी ओर वे राज्य जहाँ अभी आई-फ़ोन अपनी पहुँच नहीं बना पाया था। जो आँकड़े मिले, वे काफ़ी चौंकाने वाले थे। यह पाया गया कि आई-फ़ोन की उपलब्धता के कारण 15 से 19 वर्ष के युवाओं में जन्म दर में 4.5 प्रतिशत से 8.0 प्रतिशत तक और 20 से 24 वर्ष के आयु वर्ग में 3.2 प्रतिशत से 6.6 प्रतिशत तक की गिरावट आई। यहाँ तक कि अधेड़ महिलाओं में भी इस मामले में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई।
टीम ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि आई-फ़ोन प्रजनन दर में गिरावट का ‘एकमात्र कारण’ नहीं है। मगर यह दावा किया गया कि वर्ष 2007 के बाद अमेरिका में जन्म दर में आई गिरावट में स्मार्टफ़ोन के आगमन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि स्मार्टफ़ोन के आने से लोगों के व्यवहार में एक मूलभूत परिवर्तन आया है। लोगों का आमने-सामने मिलने-जुलने का संपर्क बहुत कम हो गया है।
टीम ने निष्कर्ष निकाला कि- “आधुनिक स्मार्टफ़ोन के प्रसार के साथ ही दोस्तों के साथ आमने-सामने बिताया जाने वाला समय और यौन गतिविधियों में तेज़ी से गिरावट आई है। साथ ही पोर्नोग्राफ़ी फ़िल्में देखने में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। पोर्नोग्राफ़ी एक तरह से साथी के साथ यौन संबंध बनाने का विकल्प बन गई है।”
अमेरिका के सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्रियों नैथन हडसन और हर्नॉन मोस्कोसो बोएडो ने भी इस विषय पर अपना एक अध्ययन इसी वर्ष मई महीने में प्रकाशित किया है। इस शोध में भी वर्ष 2007 के बाद से वैश्विक स्तर पर कुछ ऐसे ही रुझानों के प्रमाण मिले हैं। इन दोनों अर्थशास्त्रियों ने 128 देशों में स्मार्टफ़ोन की पहुँच और किशोर प्रजनन दर को मापने वाले विश्व बैंक के आँकड़ों का विश्लेषण किया।
नैथन हडसन और हर्नॉन मोस्कोसो ने पाया कि स्मार्टफ़ोन व्यापक रूप से उपलब्ध होने के बाद से जन्म दर में गिरावट की गति तेज़ हो गई है। यह घटना उन देशों में भी दर्ज की गई, जिनमें स्वास्थ्य सेवाएँ, कल्याणकारी कार्यक्रम तथा आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियाँ काफ़ी भिन्न हैं। इस कारण भी यह टीम इस निष्कर्ष पर पहुँची कि यह एक सामान्य वैश्विक संकट की ओर संकेत करता है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि चीन की वामपंथी सरकार ने वर्ष 2016 में अपनी दशकों पुरानी नीति-‘एक घर, एक बच्चा’ को त्याग दिया। दूसरी ओर जापान और दक्षिण कोरिया ने जन्म दर बढ़ाने वाली नीतियों में भारी निवेश किया है, मगर उसका प्रभाव अभी तक महसूस नहीं किया जा सका है।
समस्या यह है कि दुनिया के सबसे ग़रीब देशों, विशेषकर अफ़्रीका के देशों में अभी भी उच्च जन्म दर देखी जा सकती है। मगर भारत और ब्राज़ील जैसे मध्यम आय वाले देशों में भी प्रजनन दर तेज़ी से घट रही है। भारत में पिछले कुछ दशकों से जनसंख्या वृद्धि दर की गति में लगातार कमी आ रही है। भारत में प्रति महिला प्रजनन दर 1.88 तक पहुँच गई है, जबकि इसे 2.15 होना चाहिए। इस गिरावट के क्या नुकसान हो सकते हैं, इस बारे में बात करेंगे… फिर कभी।
- तेजेंद्र शर्मा

एक शानदार संपादकीय। स्मार्ट फोन कभी स्मार्ट नहीं होता!?बस इंसान ही कभी कभी वैशाख नंदन की मानिंद सोचने और व्यवहार करने लगता है। यही हाल AI को ले कर के है। मोबाइल एक चुनौती के रूप में रक्त बीज की मानिंद है।सारी दुनिया बस इसी के माध्यम से चलनी शुरू हो गई है।पोर्नोग्राफी बतौर यौन विकल्प हो गई है।जिस से मानसिक बीमारियां और यौन अपराध सारे विश्व में बढ़ रहे हैं ।सारी की सारी रूमानियत और मानवीय भावनाएं अब दूषित या उस से भी आगे की स्थिति में पहुंच गई है ।और प्रेम के चाँद में भी यह मोबाइल ग्रहण लगा गया है। मानवीय संबंध जब विच्छिन्न हो गए है तो प्रजनन पर रोक लगना स्वाभाविक ही है।
एक जानदार और सार्थक संपादकीय।
महत्त्वपूर्ण तथा गंभीर संपादकीय। स्मार्ट फ़ोन का अति प्रयोग व्यक्ति के जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित कर रहा, संपादकीय में जो चिंताएँ व्यक्त की गई हैं, उनकी गंभीरता को समझते हुए स्मार्टफोन के प्रयोग पर समझदारी से काम लेना होगा। हमेशा की तरह महत्त्वपूर्ण संपादकीय है सर।
अपूर्वा तुम ने संपादकीय में व्यक्त की गई चिंताओं को समझ कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। हार्दिक धन्यवाद।
भाई सूर्यकांत जी इस त्वरित एवं सारगर्भित टिप्पणी ने संपादकीय का गहरा विश्लेषण किया है। हार्दिक धन्यवाद।
स्मार्ट फोन पर सुन्दर विश्लेषण। अमेरिका की युद्ध नीति लगती है, वह अपनी सेना को हमेशा व्यस्त रखना चाहता है जिससे उसका वर्चस्व दुनिया पर बना रहे।
हार्दिक धन्यवाद महेश भाई।
सादर नमस्कार सर….
बहुत ही सार्थक शोधपूर्ण विश्लेषण…फोन का काम था दूर रहते रिस्तेदार या मित्रों का कुशल मंगल जानना, पर जैसे फोन स्मार्ट होता गया… जीवन में कोई रहस्य ही नहीं रहा…अब सभी सबकुछ जानते हैं…
चिंता का विषय तो है… एक देश को प्रगति की दिशा में लेने के लिए केवल यांत्रिक शक्ति नहीं जन- शक्ति की आवश्यकता तो है… यह संपादकीय हमेशा की तरह महत्वपूर्ण है…..
साधुवाद….
आदरणीय अनिमा जी आपकी टिप्पणी से पता चलता है कि संपादकीय में व्यक्त चिंताओं को आपने किस गहराई से विश्लेषित किया है! हार्दिक धन्यवाद।
काफी महत्वपूर्ण एवं सामयिक विषय पर संपादकीय! आज भारत में भी इसी वजह से कई निस्संतान बने हुए हैं।प्रजनन क्षमता में काफी गिरावट आई है।
हार्दिक धन्यवाद जमुना जी।
“पुरवाई-“ अंक 13/6/26, सम्पादक – तेजेंद्र शर्मा ।
इस अंक के सम्पादकीय का शीर्षक है-“स्मार्ट फ़ोन से परिवार नियोजन…”
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ब्रिटेन के चर्चित हिन्दी कथाकार तेजेंद्र शर्मा की प्रकाशित कहानियों की संख्या 100 से ज्यादा हो चुकी है जिनमें “कब्र का मुनाफ़ा” “संदिग्ध” आदि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बहुचर्चित कहानियाँ हैं । कविता और अन्य लेखन का भी उनका अपना वैशिष्ट्य है ।
एक ऐसा कहानीकार जो साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक जीवन यथार्थ और मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति के लिए जाना -पहचाना जाता है वह संवेदनाओं को केवल अनुभूत ही नहीं करता बल्कि व्यावहारिक जीवन में उसके कारक तत्वों की ठीक ठीक पड़ताल भी करता है । तेजेंद्र शर्मा का यह व्यक्तित्व उनके द्वारा सम्पादित पुरवाई पत्रिका में बखूबी दिखता है । खासकर उनके सम्पादकीय की विषयवस्तु सीधे सीधे दुनिया के किसी भी देश- समाज की ज्वलंत समस्याओं से जुड़ी रहती है ।
इस बार के अंक में भी “स्मार्ट फोन “ के उत्यघिक उपयोग के फलस्वरूप विश्व समाज पर
पड़ रहे नकारात्मक प्रभावों के अन्तर्गत “जन्म दर “ में कमी आने जैसे मुद्दे को तर्क सम्मत रूप में वे उठाते हैं । कई देशों में यह गंभीर समस्या के रूप में है। विषय दुनिया के रोज़मर्रा की समस्याओं से सम्बंधित होते हुए भी प्रकारान्तर से मानव जीवन के दूरगामी दुष्परिणाम को इंगित करता है । स्मार्ट फ़ोन से जीवन के सामान्य व्यवहार , प्रत्यक्ष वार्तालाप, हाव-भाव, सम्बन्धों की निकटता , दुख सुख का अपनापन , सोचने समझने की शक्ति का केन्द्रीकरण आदि प्रसंगों को सम्पादक ने उदाहरण सहित तर्क सम्मत ढंग से उजागर किया है।जैसे -“स्मार्टफ़ोन के आने से लोगों के व्यवहार में एक मूलभूत परिवर्तन आया है। लोगों का आमने-सामने मिलने-जुलने का संपर्क बहुत कम हो गया है।”
तेजेंद्र शर्मा वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी विकास के सकारात्मक पहलुओं के साथ खड़े तो हैं पर उनकी चिंता समग्रत: मानवीय मूल्यों के संरक्षण सहित दुनिया को आगे बढ़ते हुए देखने की है । इसलिए वे लिखते हैं-
“फ़ोन तो स्मार्ट होता गया, मगर इंसान बेवक़ूफ़ होता गया। “
“स्मार्ट फ़ोन से परिवार नियोजन” एक तरह से सांकेतिक शीर्षक है ।
यह सम्पादक के साहित्यिक चिंतन और व्यक्तित्व का परिचायक है । तभी तो साधारण लगने वाला विषय उनकी सोच में रूपांतरित होकर अहम हो जाता है ।
अंक में समाहित लेख, व्यंग्य,समीक्षा खंड भी पठनीय हैं ।
इस अंक के महत् उद्देश्य के लिए सम्पादक को बहुत बधाई ।
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मीनकेतन प्रधान
भारत
13/6/26
भाई मीनकेतन जी, आपकी विस्तृत और सारगर्भित टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। आपने मेरे लेखन, संपादकीय और नये अंक पर विस्तार से अपनी बात रखी है। हार्दिक आभार।
नमस्कार
फोन की तरह सम्पादकीय भी स्मार्ट कही जा सकती है ।
Dr Prabha mishra
हार्दिक धन्यवाद प्रभा जी।
नमसस्कार तेजेंद्र जी
यह महसूस तो काफ़ी लंबे समय से किया जा रहा है किंतु इस पर चर्चा व संवाद कई भिन्न विषयों पर तो होते रहे हैं किंतु रात रात भर इसके साथ आनलाइन बने रहना, मन और तन दोनों को ही तो शिथिल करता है। बच्चों की शारीरिक गतिविधियों पर तो भयंकर प्रभाव पड़ा ही है, सिटिंग रूम में एकसाथ बैठे हुए भी संवादों का न होना, हर रिश्ते के बीच दीवार बनाता रहा है।
पति पत्नी के बीच अपने मुँह घुमाए, हाथ में फ़ोन पकड़े फ़ोन्स डिम लाइट में स्क्रोल करते हुए मन का उन रील्स को समाप्त होने की प्रतीक्षा में समय निकालना अधिक महत्वपूर्ण हो चुका है, असली बात तो यह है कि इस लाइफ़ स्टाइल के आदी हो चुके हैं। संवेदनाएं शिथिल हो गई हैं, यह परिणाम अनअपेक्षित तो नहीं है।
कार्पोरेट वर्ल्ड में वैसे ही स्क्रीन पर अधिक रहना होता है। तकनीक ने बहुत कुछ दिया किंतु संवेदना कहाँ छोड़ी? समयानुसार चलना ज़रूरी है किंतु क्या आम बंदा इस सबकी सीमा तय कर सका? भीड़ के पीछे चलना ही आधुनिकता का आधार बन गया किंतु क्या खोकर और किन शर्तों पर? यह सब व्यक्तिगत चिंतन व उस पर अमल करनै की बात है।
हर बार की भाँति इस बार भी महत्वपूर्ण विषय!साधुवाद आपको
आदरणीय प्रणव जी, आपने किस ख़ूबसूरती से पूरे संपादकीय की आत्मा पाठकों के सामने रख दी है। हार्दिक धन्यवाद आपका।
भारत के प्रजनन क्षमता का गिरना इस बात का सूचक है कि हम केमिकल खाद्य से बने भोजन का उपयोग कर रहे हैं मोबाइल का सीमित उपयोग ठीक है मगर अत्यधिक उपयोग का नुकसान तो झेलना ही पड़ेगा
गंभीर विषय पर बेहद महत्वपूर्ण संपादकीय हेतु धन्यवाद
इस सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद संगीता जी।
आज लोग बच्चे चाहते नहीं है नई-नई शादी होती है वह बच्चे चाहते नहीं है पहले से बोल देते हैं हमें बच्चे नहीं चाहिए। बड़ी विचित्र बात है आपने समसामयिक विषय को लिया। धन्यवाद
सदा की तरह इस बार भी बहुत सुंदर जानकारी के लिए बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद। ब्राज़ील में होने के कारण अधिक नहीं लिख पा रहा हूँ।
स्मार्ट फोन से परिवार नियोजन… संपादकीय वैश्विक स्तर पर घटते जन्म-दर पर केंद्रित है। इसका कारण स्मार्ट फोन को माना जा रहा है।
फोन मानव इतिहास के सबसे उपयोगी आविष्कारों में से एक है। मानव जीवन-शैली को बदलने में इसने अहम भूमिका निभाई है। इसीलिए इसको दुर्लभ आविष्कार कह सकते हैं। दुनिया के लगभग हर मनुष्य के हाथ में यह अपनी पहुंच बना चुका है। लैंडलाइन, की-पैड आदि से लेकर स्मार्ट फोन तक की यात्रा ने बता दिया है कि अभी इसकी यह यात्रा रुकने वाली नहीं है।
एक तरफ आविष्कार मानव को सुविधाजीवी बनाते है तो वहीं दूसरी तरफ ये उस सुविधा की कीमत भी वसूलना जानते हैं। लाभ-हानि, जीवन-मरण, आय-व्यय और यश-अपयश आदि एक साथ जन्म लेते हैं। सृष्टि संचालन में इस प्रक्रिया की महती भूमिका रहती है। या यूं कह सकते हैं सृष्टि इन्हीं सब चीजों का समूह है। स्मार्ट फोन जितना मानवोपयोगी है उतना ही जन्म-दर में कमी का प्रमुख कारक माना जा रहा है। वैज्ञानिक आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं।
हो सकता है इसमें अन्य कारक भी शामिल हों पर स्मार्ट फोन जन्म-दर के लिए वैश्विक समस्या बनकर उभरा है।
संपादकीय हमें इस ओर आगाह तो करा रही है, पर स्मार्ट फोन मानव शरीर से कितनी दूर रहना चाहिए ताकि इन हानियों से बचा जा सके। इस पर कुछ नहीं कहा गया है। समस्या रख दी गई है, पर समाधान नहीं सुझाया गया है।
मानव समाज को सचेत करती यह संपादकीय वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों हेतु चेतावनी का कार्य कर रही है। जो कि संपादकीय उद्देश्य को पूरा करती है।