कॉलेज की गहमागहमी, शोर , लेक्चर शुरू होने वाली घंटियां, शिक्षकों का दौड़ते भागते स्टाफ रूम में प्रवेश और स्टाफ रूम में शिक्षकों के साथ विद्यार्थियों और उनके माता- पिता की भीड़ – ये दृश्य है जुलाई माह का जब कॉलेज में प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ होती है । शिक्षकों की इस समय एडमिशन ड्यूटी लगती है ।किस वर्ग में कितने विद्यार्थी आयेंगे ये सब इन्हीं दिनों पता चलता है। सभी शिक्षक अपने-अपने विषय के लिए विद्यार्थियों को आकर्षित करते रहते हैं । हिंदी-मराठी- सीएस-आई टी ये सभी वैकल्पिक विषय हैं, कॉलेज मैनेजमेंट यही चाहता है कि विद्यार्थी सीएस या आई टी ले क्योंकि इसकी फीस भी अधिक है। लैंग्वेज लेने से उतना फायदा नहीं दिखता फिर सीएस लेने से पर्सेन्टेज भी अधिक अच्छा जाता है। पहले तो सीएस – लैंग्वेज आदि में साठ-चालीस का अनुपात रहता था पर इस बार तो हिन्दी-मराठी विषय मे विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम हो गई थी। कितना समझाया था हर्षा मैडम ने विद्यार्थियों को- “ देखो हिंदी-मराठी आपकी भाषा है उसका साहित्य पढ़ना स्वयं को समृद्ध करने जैसा है, मस्तिष्क को संतुलन देने जैसा है।“
“मराठी आणि हिंदी चांगली भाषा आहे, आप सब हिंदी मराठी विषय लो।” पुष्पा मैडम मराठी भाषा की शिक्षक ने भी कहा था लेकिन विद्यार्थी भी उधर ही अपना भविष्य देख रहे थे जिधर दुनियां भाग रही थी, विज्ञान के विषय जीवन के पदार्थ तत्व को संतृप्त करते हैं, भौतिक दृष्टि से सम्पन्न बनाते हैं और साहित्य जीवन की चेतना को जागृत रखता हैं, मनुष्य को संवेदन शील बनाता है, भौतिक सुख भी देता है लेकिन कच्छप गति से…इसलिए विद्यार्थियों का रुझान विज्ञान के विषयों की ओर अधिक रहा। परिणामस्वरूप हिंदी-मराठी विषय में विद्यार्थियों की संख्या कम हो गई।
“ ये कमी तो आप टीचर्स की है, आप लोग अपने सब्जेक्ट की ओर बच्चों को नहीं खींच पाए इसलिए तो बच्चे विज्ञान वर्ग में चले गए..” कॉलेज की प्रधानाचार्या जी अपने शिकायती लहजे में बोले जा रही थी पर असल में प्रसन्न तो वह भी थी क्योंकि विज्ञान वर्ग की फीस अधिक है इससे मैनेजमेंट की भी चांदी।
खैर हिंदी और मराठी भाषा की शिक्षिकाएं चुप – चाप प्रिंसिपल की बातें सुन रही थी आखिर ये धैर्य उन्हें साहित्य से ही मिला था पर अब उनके धैर्य की कठिन परीक्षा शुरू होने वाली थी। उनके विषय में विद्यार्थियों की संख्या कम हो गई थी इसलिए प्रिंसिपल ने उनके फुल वर्कलोड के छब्बीस लेक्चर को घटाकर बाईस कर दिया। तो अब क्या होगा? हर्षा और पुष्पा मैडम दोनों चिंतित थे कि प्रिंसिपल मैडम ने आदेश सुना दिया
“आप दोनों का वर्कलोड कम हो गया है इसलिए इसे पूरा करने कर लिए आप दोनों को ‘ईवीएस ‘यानी पर्यावरण विज्ञान पढ़ाना होगा। “
“ईवीएस!” हर्षा और पुष्पा मैडम दोनों के चेहरे पर कई सारे प्रश्न उभर आए- ‘ ईवीएस तो हमारा विषय है नहीं, कैसे पढ़ाएंगे हम? कोई छोटा क्लास तो है नहीं कि कुछ भी पढ़ा दिया, अच्छी खासी जानकारी होनी चाहिए…ऐसे कैसे पढ़ा देंगे?’ …पर ये सारे प्रश्न उनके मन में ही रह गए, दोनों ही कुछ कह नहीं पाए।
प्रिंसिपल केबिन से बाहर निकलते ही पुष्पा बोली “ हर्षा!अब तो पढ़ाना ही पड़ेगा ईवीएस चाहे जो कर लो “ और हँसते हुए पुष्पा अपने लेक्चर मे चली गई। लेकिन हर्षा को लग रहा था जैसे कोई सर पर बहुत बड़ा बोझ आ गया हो । उसे सर बहुत भारी-भारी सा लग रहा था और गुस्सा भी आ रहा था ‘ सहित्य पढ़ना-पढ़ाना अलग है और ईवीएस अलग, कैसे क्या होगा…उफ्फ ‘ ।इस समय अगर कोई भी हर्षा का चेहरा देखे तो वह समझ जाएगा कि उसे कितनी उलझन है। आखिर हिंदी साहित्य पढ़ाने के ढंग से कॉलेज में उसकी पहचान बनी है, सभी विद्यार्थी अन्य शिक्षक जानते हैं कि वो कितने मन से हिंदी साहित्य पढ़ाती है लेकिन ईवीएस का तो ई भी ढंग से नहीं पता पाएगी, क्या सोचेंगे उसके विषय में विद्यार्थी…।’ यही सब सोचते हुए हर्षा कॉलेज की लाइब्रेरी जा पहुंची और वहाँ ईवीएस की बुक इश्यू करा ली। साहित्य की कोई किताब ईशू कराते हुए कितनी खुशी मिलती थी लगता था कि कब और कितनी जल्दी उसे पढ़ा जाये लेकिन ईवीएस की किताब को उसने बड़े ही बेमन से अपने बैग में डाल लिया। आखिर जिस काम में मन लगे तो वह बोझ सरीखा ही प्रतीत होता है न!
घर पहुँच कर रात के खाने के बाद हर्षा ने ईवीएस की किताब बड़े बेमन से उठाई– ईवीएस यानी ‘एनवायरनमेंटल साइंस ‘ हाँ पता है इतना, अपने बच्चों को छोटी क्लास में तो पढ़ाया ही है, हर्षा ने मन में सोचा। पहला, दूसरा,तीसरा पन्ना पलटते-पलटते उसे नींद आने लगी,अब ये कोई कहानी या उपन्यास तो है नहीं कि जिसे खत्म किए बिना नींद नआए । ‘ ठीक है पहले क्लास के लिए इतना काफी है… ,अब जो होगा देखा जाएगा ‘ मन को दिलासा देते हुए हर्षा कब सो गई उसे पता ही नहीं चला।
दूसरे दिन कॉलेज पहुँचते ही उसका पहला लेक्चर हिंदी का था। कल ईवीएस विषय पर ध्यान देने के कारण उसने हिंदी लेक्चर में क्या पढ़ाना है यह देखा ही नहीं। क्लास में सीधे पहुँचते ही उसने जब कविता देखी तो वह कविता थी ‘ एक वृक्ष की हत्या ‘ ।’… बचाना है जंगल को मरुथल हो जाने से/ बचाना है मनुष्य को जंगल हो जाने से ‘ …कितने जरूरी हैं ये वृक्ष अगर नहीं रहे तो कैसी त्रासदी होगी … पढ़ाते- पढ़ाते उसे प्रतीत हुआ जैसे कि वो पर्यावरण की क्लास में ही पढ़ा रही है। साहित्य में तो सारे विषय समाहित हैं, राजनीति,समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और पर्यावरण…फिर क्यों परेशान हो रही है हर्षा, पढ़ा लेगी। लेकिन वो ईवीएस के टर्म! ,आजाएगा धीरे-धीरे ‘ । स्वय से प्रश्न- उत्तर करते हुए हर्षा अगली क्लास में पहुँच गई, यहाँ उसे ईवीएस पढ़ाना था। ‘ स्टूडेंट्स, व्हाट डू यू अंडरस्टैड बाय ईवीएस? इसका मतलब होता है एनवायरनमेंटल साइंस ‘ यानी हमारे आसपास का वातावरण, बहुत जरूरी है इसे पढ़ना, आजकल इसे कंपलसरी कर दिया है। आज हम सब पढ़ेंगे ‘एनर्जी कंजर्वेशन ‘। एक विद्यार्थी ने धीरे से अपने मित्रों के कानों में कहा “ ये हिंदी की टीचर हमे अब ईवीएस सिखाएगी” । विद्यार्थी की वो धीमी सी आवाज भी हर्षा के कानों से टकरा गई थी ,मन न जाने कैसा-कैसा सा हो गया था पर उसने तुरंत ही अपने आपको संयत किया और पढ़ाने लगी “एनर्जी यानी ऊर्जा इसके अनेक स्रोत हैं जैसे जल, विद्युत आदि इसका हमे संरक्षण करना चाहिए इसे हमे बचाना चाहिए, सेव करना चाहिए…।”पढ़ाने के बाद हर्षा को पूरी संतुष्टि तो नहीं मिली लेकिन इतना जरूर प्रतीत हुआ कि वो ईवीएस पढ़ा लेगी। सभी विद्यार्थी क्लास से निकल चुके थे। हर्षा भी क्लास से बाहर निकली थी कि आज उसकी नजर दूसरे क्लास के चलते हुए पंखों पर पड़ गई उसने स्वयं उन कक्षाओं में जाकर पंखों के स्विच ऑफ किया जबकि पहले कॉलेज के चतुर्थ कर्मचारियों का ये काम है ऐसा सोचकर छोड़ देती थी। खैर वर्कलोड पूरा करने के लिए उसे यह विषय तो अब पढ़ाना ही था और सिर्फ पढ़ाना ही नहीं पढ़ना भी था। उसे बार-बार लगता कि ये एनवायरनमेंटल साइंस का भारी भरकम बोझ उसके सिर पर आ गया हो और उस बोझ तले वो दबी जा रही है।
कॉलेज से घर आ कर उसने देखा तो उसके बच्चों ने हर कमरे की लाइट पंखे जला रखे थे। “ सौरभ-सुरभि तुम दोनों ने दोनों कमरों की लाइट, पंखे क्यों नहीं ऑफ किए? हमे एनर्जी सेव करनी चाहिए “ हर्षा दोनों बच्चों को डांटने लगी।
“ घर आई नहीं कि बच्चों को डांटना सुरु कर दिहिन “ पूजा घर में बैठी हर्षा की सासू माँ बड़बड़ाती हुई बोली ।
हर्षा ने चुप रहना ही बेहतर समझा । रात के खाने के बाद उसने ईवीएस की किताब उठाई और बड़े बेमन से पढ़ना शुरू किया विषय था ‘ग्लोबल वार्मिंग ‘ ।
“अरे सुरभि! देख मम्मा ईवीएस पढ़ रही है” बेटे सौरभ ने आश्चर्य से कहा
“ हाँ भैया!मम्मा तो ‘ग्लोबल वार्मिंग ‘ चैप्टर पढ़ रही है, हम तो ये सब पहले से ही जानते है “ बेटी सुरभि मुस्कुराते हुए बोली।
“बच्चों!अगर तुमलोग ग्लोबल वार्मिंग के विषय में जानते हो तो पंखे लाइट जब यूज नहीं कर रहे हो तो बंद क्यों नहीं करते? “ हर्षा नाक पर चश्मा चढ़ाते हुए फिर पढ़ने लगी
“तुम्हारी मम्मा बिल्कुल ठीक कह रही है “ राजीव हर्षा के पति ने सहमति जता दी। हर्षा मुस्कुरा दी कि चलो घर का वातावरण तो संतुलित है…. पर हमारी धरती कितनी गर्म हो रही है, पेड़ काटे जा रहे हैं, साहित्य में पढ़ा था ‘एक वृक्ष की हत्या ‘ यहाँ तो हजारों, लाखो वृक्षों की हत्या हो गई, जंगल नष्ट हो गए इसलिए तो हमारी धरती का तापमान कितना बढ़ता जा रहा है…। पढ़ते-पढ़ते हर्षा को नींद आने लगी।
अगले दिन कॉलेज में ईवीएस की क्लास में ग्लोबल वार्मिंग के विषय में हर्षा ने पढ़ाया, पढ़ा तो रही थी पर वो आत्मसंतुष्टि जो मिलनी चाहिए वो नहीं मिल रही थी, जिस विषय में आप पारंगत नहीं उसे पढ़ाना बोझ ही प्रतीत होता है फिर भी वो सहज रहने का प्रयास कर रही थी।
लेक्चर के बाद हर्षा स्टाफ रूम में आकर अपना मोबाईल देखने लगी कि एक समाचार से वो स्तब्ध रह गई ‘ हिमाचल प्रदेश के मंडी में भयंकर भू स्खलन ‘ ।उसने उस घटना के कई वीडियो देखे तो मन सिहर गया। कैसे ताश के पत्तों जैसे मंडी के घर गिरे जा रहे थे, पुल टूट रहे थे, पानी के बहाव में गाड़ियाँ बही जा रहीं थीं..। एक गहरी साँस खींचते हुए उसके मुँह से सिर्फ उफ्फ! भर निकल पाया, आगे बोलने की स्थिति में वो नहीं थी लेकिन उसका मन-मस्तिष्क’ ग्लोबल वार्मिंग ‘के झंझावातों से कम्पित हो रहा था। यही तो वो पढ़ा रही थी, पृथ्वी का तापमान इतना बढ़ता जा रहा है कि प्रकृति असंतुलित होती जा रही है…हम क्या कर रहे हैं अपने पर्यावरण के साथ?? ये प्रश्न हर्षा को परेशान करने लगा था। साहित्य में उसने पढ़ा था सहित भाव तो फिर प्रकृति के साथ वो सहित भाव क्यों नहीं?
अब हर्षा कॉलेज से जब भी घर की ओर वापस लौटती तो उसे ईवीएस का पढ़ाया हुआ लेक्चर याद आता रहता। उस दिन उसने ‘वेस्ट मैनेजमेंट ‘ चैप्टर पढ़ाया था यानी कचरे का समायोजन कैसे किया जाए । इधर-उधर कचरा न फेंका जाए। गीला कचरा, सूखा कचरा अलग किया जाए। जब हर्षा घर पहुंची तो देखा कि वो खुद भी तो गीला कचरा, सूखा कचरा अलग नहीं करती । उसने तुरंत ही अगले दिन से दो कचरे के डब्बे बनाये एक गीले कचरे का, एक सूखे कचरे का लेकिन घर मे सासू माँ और बच्चे दोनों डब्बों मे गीला कचरा-सूखा कचरा मिला देते। बच्चे समझ गए, पतिदेव भी समझ गए लेकिन सासू माँ का कहना था “ सबलोग मिलाकर ही कचरा फेंकत हैं, का होगा हमार एक से करै पर ?”
हर्षा को घर का पर्यावरण भी संतुलित रखना था इसलिए सासू माँ को उसने समझाना उचित नहीं समझा लेकिन अपने स्तर पर उसने कचरों को अलग-अलग कर डालने का प्रयास जारी रखा।
एक दिन हर्षा राजीव के साथ कुछ समान लेने गई थी वहाँ एक बहुत सुन्दर पार्क हुआ करता था, अनेक सुंदर -सुंदर पेड़ पौधे हुआ करते थे लेकिन अब वहाँ एक हाई राइज बिल्डिंग बन रही थी। य़ह सब देखकर हर्षा का मन बहुत विचलित हो गया । ‘ ये कैसा विकास है जहाँ प्रकृति से हम दूर होते चले जाए ,य़ह प्रकृति वन्य जीवन, प्राणी मात्र को प्राण देती हैं ,हमे जीवन की सादगी देती है, जीवन देती है और हम उसे ही नष्ट करते जा रहे हैं, विकास चाहिए पर विनाश के नाम पर नहीं… वास्तव में प्रकृति को ईंट, गारे और सीमेंट से पाटता हुआ मनुष्य ही पृथ्वी पर बोझ है…पर कुछ तो करना होगा प्रकृति की रक्षा के लिए, हर्षा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी ।
घर वापस आकर हर्षा ने रात के खाने के बाद ईवीएस की किताब उठाई और मन से पढ़ना शुरू कर दिया, आज उसे यह बोझ स्वीकार्य था क्योंकि अगली पीढ़ी को उसे पर्यावरण के प्रति सचेत जो करना था!
- डॉ जया आनंद
असिस्टेंट प्रोफेसर
