Sunday, October 18, 2026
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बीज और आकाश-निस्संतानता, चिकित्सीय उपलब्धियां और बाजारवाद 

पुस्तक: बीज और आकाश (2026), उपन्यासकार: ममता सिंह,  
प्रकाशक:  शिवना, सीहोर, मध्य प्रदेश, मूल्य: 350/, समीक्षक- डॉ. मधु संधु

 

‘बीज और आकाश’ ममता सिंह का दूसरा उपन्यास है। ममता सिंह मुंबई ‘विविध भारती’ की रेडियो उद्घोषिका हैं। ‘हेलो सखी’, ‘छायागीत’, ‘हेलो फरमाइश’, ‘गीत माला’ जैसे सुपरहिट कार्यक्रमों ने उन्हें ‘रेडियो सखी’ की पहचान दी है। उनके कहानी संकलन ‘राग मारवा’ और उपन्यास ‘अलाव में कोख’ पाठकों से हाथों- हाथ लिए जा चुके हैं। ‘बीज और आकाश’ पर उन्हें ‘आशीर्वाद भाषा सेतु पुरस्कार’ भी मिला है।

उपन्यास का कथ्य इक्कीसवीं शती से, मेडिकल साइन्स के इन्फ़ेर्टिलिटी पक्ष से जुड़ा है। आईवी. एफ., ओवुलेशन, सेरोगेसी और दूसरी ऐसी खरीद- फरोख्त के लिए यहाँ अनेक चाहवान द्वार खटखटा रहे हैं। उपन्यास में चार युगल हैं-  तन्वी- सागर, मोनिका- विवेक, करिश्मा- राज, गिन्नी और उसका पति  ।

तन्वी ने प्रेम विवाह किया है। लेकिन आज विश्वविद्यालय के सुनहरे दिन और गुलाबी सपने, हंसौड़ सहेलियाँ और बेफिक्री, असूल और हर जंग जीतने का जज़्बा, किताबें और बहसें, पहाड़ और झरने- सब अतीत में गुम हो चुके हैं। मुंबई में वह एक्टिविस्ट पत्रकार और दैनिक अखबार की उप संपादक रही। फ्रीलंसिंग भी करती थी। टी. वी. के लिए स्क्रिप्ट राइटिंग भी करती थी और बड़े तथा छोटे पर्दे के लिए डाकुमेंटरी भी लिखती थी। ससुराल के तानों और अपमान से तंग आकर वह आईवी. एफ. से जुड़वां बच्चों को जन्म देती है और आज पाँच लाख के कर्ज, आसमान छूती महंगाई, बच्चों की बढ़ती स्कूल फीस, पति के आत्म केन्द्रण, समय की बचत आदि कारणों से वह वेंडिंग मशीन की तरह अपनी कोख बेच रही है, पैसा डालो सामान निकालो। ओवुलेशन का व्यापार कर रही है। मुर्गी की तरह अंडे बेच रही है। क्योंकि कम समय में ज्यादा मुनाफा कमाने का यही बेहतर तरीका है।

दूसरी कहानी करिश्मा और राज की है। करिश्मा भी अतल गहराइयों वाली यादों की रील में जी रही है। पति राज शारीरिक रूप से अपूर्ण है, ट्रांसजेंडर है, किन्नर है। तन से न सही, पर मन से वह पति से जुड़ी है। सास उसे अस्पताल लाती है और आईवी. एफ. से वह बेटी को जन्म देती है। संतान सुख करिश्मा का जीवन बदल देता है, लेकिन अपनी असमर्थता के कारण कुंठित राज गृहस्थी छोड़ किन्नर समूह में शामिल हो राजी बन जाता है और बेटी भी साड़ी पहनने वाले को कैसे बाप मान ले।

मोनिका को पति विवेक के पर- स्त्री सम्बन्धों ने नितांत अकेला कर दिया है, तोड़ दिया है। क्या औरत का दिल होटल का कमरा है, जहां जब चाहा चेक- इन या चेक आउट कर लिया। वह बिना किसी हिचकिचाहट या गिलट के पत्नी के साथ यह छल कर रहा है और मोनिका है कि रूपहले अतीत को डिलीट ही नहीं कर पा रही। उसका गुस्सा, तड़प, आत्म सम्मान, घुटन, अकेलापन उसे इस अस्पताल की ओर ले जाते हैं।

नेपाल की गिन्नी जान गई है कि किसी स्वामी का मंत्र, पीर बाबा की तावीज़, पादरी की प्रेयर उसकी गोद हरी नहीं कर सकती। बच्चा उसे इंफर्टिलिटी अस्पताल ही देगा। कालांतर में वह घरेलू नौकरानी का काम छोड़ इस अस्पताल के लिए गर्भाशय का बिजनेस करके अपना अर्थतंत्र बुलंदियों पर ले आती है और पति को भी अपनी शराब का खर्च यहीं से पूरा करने का आसान तरीका समझा देती है। रीना पति से बदला लेने के लिए संतान पैदा करना चाहती है। और मानसी के पति के पास समय नहीं है, इसलिए वह इस ओर आई है।

यह बाजारवाद का, मार्केटिंग का समय है, “सब कुछ बिक रहा है—पटकथा, एक्टिंग, वाइसिंग, हुनर, हिंसा, सेक्स, आवाज़, गाना, यहाँ तक कि स्त्री की कोख और पुरुष का बीज भी… सब कुछ अच्छे रेट में बिक रहा है, बशर्ते कि आपको अच्छा बेचने का हुनर मालूम हो।”[1]

उपन्यास में अर्थ स्वतंत्र, बौद्धिक, आधुनिक, महानागरीय उस स्त्री की कहानी है, जो रेगिस्तान में भी पानी खोजकर फूल खिला सकती है, लेकिन त्रासदी यह है कि घर और समाज, नगर और महानगर, पुरानी और नई पीढ़ी, शिक्षित या अर्द्ध शिक्षित- सब स्त्री का मूल्यांकन करने में ही जुटे हैं। “तूफान का प्रकार कैसा भी हो, गृहस्थी की वेदी पर स्वाहा एक औरत को ही होना पड़ता है। स्त्री की तबाही अमूमन सबसे ज्यादा घर में ही होती है।”[2] सारे समझोते स्त्री को ही करने हैं। घर, बच्चे, अर्थतन्त्र का विषैला वाइरस सब उसे संभालना है। क्या वह सच में आइरन लेडी है ? अनंत व्यस्तताओं के बावजूद वह खालीपन के एहसास में क्यों जीती है? अतिपरिचित प्रेमी पति बनते ही अपरिचित क्यों हो जाता है?   

आज की बौद्धिक, उच्चशिक्षित, कामकाजी, अत्याधुनिक, महानगरीय स्त्री को भी बच्चे के बिना स्त्रीत्व अधूरा लगता है। मातृत्व स्त्री का दायित्व भी है, स्वप्न भी, मजबूरी भी और अन्तर्मन की मांग भी। शायद पूरे विश्व में यही स्थिति है। विदेशी स्त्रियाँ भी पति के स्पर्म लेकर अपनी सूनी कोख का बीजारोपण करने के लिए भारत आती हैं। रीटा, नीरा, मानसी, क्रिस्टीना- सब ऐसे ही सोचती हैं।

आई. वी. एफ. के बोर्ड वाला इंफर्टिलिटी विभाग दो मंजिलों तक फैला है। निसंतान दम्पतियों की भीड़ लगी रहती है। विदेशों में इलाज़ महंगा है, इसलिए बहुत से विदेशी भी संतान की लालसा में यहाँ दिख जाते हैं। जरूरतमंदों की कौंसेलिंग करके अस्पताल से जुड़े पुयर बैंक से डिस्काउंट भी दिया जाता है। अस्पताली सत्य यह है कि उपचार एक बाज़ार बन गया है। इतने पैसे में यह- यह और यह जांच, एक साथ ढेर सारी जांच करवाने पर ढेर सारा डिस्काउंट। गर्भ धारण करने से लेकर बच्चा पैदा होने तक का पैकेज। प्रोजेस्ट्रोन टेस्ट, प्रोजेस्ट्रोन की गोली, हार्मोन्स के इंजेक्शन, मल्टी विटामिन की गोलियां, लेप्रोस्कोपी, सोनोग्राफी, एग रैपचर होना, देह पर प्रयोग, ओवुलेशन, आई वी. एफ., परखनली शिशु-  यह एक अलग ही संसार है।

बहुत से प्रसंग और भी हैं जैसे राष्ट्रीय पुरस्कारों का सत्य यह है कि गायनोकोलाजिस्ट डॉ. पिंटो को पदमश्री पुरस्कार मिलता है, जबकि सबको मालूम है कि उसका मुख्य धंधा मातृत्व बेचने का है। निसंतान स्त्री को बांझ कहकर अपमानित नहीं किया जा सकता। संतानेच्छा की पूर्ति के लिए पुरुषीय सहयोग और बीज का भी उतना ही महत्व है।  मुंबई में झट से काम मिल भी जाता है और छूट भी जाता है। फिल्मसिटी में स्क्रिप्ट चोरी जैसी घटनाएँ आम बात है। प्राइवेट सैक्टर में नौकरी पर पहुँचने का समय तो होता है, लेकिन लौटने का नहीं। मध्यवर्ग के भी छोटे-छोटे बिलों जैसे घर होते हैं। पुरुष की महत्वाकांक्षाओं के समक्ष परिवार- पत्नी- बच्चे सब गौण हैं। किसी को अपने बगल वाले व्यक्ति से कोई सरोकार नहीं।

चिंतनजन्य सूत्र कथ्य को सम्पन्न बना रहे हैं-

  1. ज़िंदगी और तूफान का बड़ा गहरा संबंध है। बिना तूफान ज़िंदगी पूरी कहाँ कहलाती है।[3]
  2. इंसान जैसे ही ज़िंदगी का अगला पन्ना पलटता है, पिछला पन्ना अंगूठा दिखाते हुये सामने आ धमकता है।[4]
  3. प्रेम एक चंचल झरना है जो इंसान को दूर बहा ले जाता है, इसलिए इसमें सावन की मध्यम- मध्यम फुहारों के लिए भीगना चाहिए।[5]
  4. एनेस्थेसिया लेने के बाद इंसान दुनिया के झंझावात से, अपनी सारी पीड़ा से मुक्त हो जाता है— खुमारी उतरते ही इंसान पीड़ा की नदी में तर- बतर हो जाता है।[6]
  5. व्यापार चाहे कोख का हो या देह का— अपना आत्मसम्मान तो गिरवीं रखना ही पड़ता है। खुशी खुशी भला कौन स्त्री अपनी कोख या देह का व्यापार करना चाहेगी।[7]
  6. हर स्त्री गृहस्थी की खूबसूरत मशीन है।[8]
  7. इंसान को खुद की बजाय दूसरों की ज़िंदगी की किताब पढ़ना ज्यादा सुहाता है।[9]
  8. कुछ न कहना और न सुनना ही प्यार का राग है— जिसे केवल धड़कनों से महसूस किया जा सकता है।[10]
  9. अमूमन प्यार के लम्हों में खामोशी ज्यादा असरदार तरीके से बोलती है।[11]
  10. अतीत जख्मों पर फाहा लगाने का काम करता है, शायद इसीलिए हम बीते दिनों के पहलू में जाकर सुकून पाते हैं।[12]
  11. जीवन में प्रेम बाढ़ की तरह आता है, जो बरसात खत्म होते ही गंदे पानी का अवशेष मात्र रह जाता है।[13]
  12. अतीत की पीड़ा किताब के पन्नों की तरह होती है। किताब खत्म हो जाती है, लेकिन किताब के शब्द और भाव, कथानक अनवरत पीछा करते रहते हैं।[14]
  13. दर्द की भी एक भाषा होती है, खामोशी और आँखें उंडेल देती हैं सब कुछ भीतर से बाहर।[15]
  14. स्त्री को सफर में कामयाबी का शिखर जल्दी मिले तो पुरुष का अहम चोटिल हुये बिना नहीं रहता।[16]
  15. मुहब्बत ऐसा आफताब है, जो झरोखे से झाँककर अंधेरे कमरे को भी रोशन कर देता है।[17]
  16. जब प्रेम का पोखर सूख जाता है तो दिल की ज़मीन पर सिर्फ दरारें नज़र आती हैं।[18]

उपन्यास के अंत में मातृत्व बेचने के इस खेल में तन्वी डॉन बन जाती है। डॉ. अत्रे के साथ मिलकर फर्टिलिटी नेटवर्क का कारपोरेट हब खोलती है। युवतियों के शोषण और मातृत्व के सौदे का व्यापार चल निकलता है क्योंकि आज माँ बनने का सुख एक प्रॉडक्ट बन गया है। जननी और माँ दोनों पर्याय नहीं रहे।

यहाँ स्मृतियों के चलचित्र, अतीत के पन्ने हैं। यह स्मृत्याभास या पूर्वदीप्ति शैली है। यादों की कंदील नायिकाओं की जलती बुझती आँखों के आगे टिमटिमाती रहती है।  ‘कुछ यादें उम्र नहीं देखती, वे बस साँसों में ठहर जाती हैं।‘ गद्यगीत सी भाषा अनेक स्थलों पर उपन्यास को काव्यात्मक बना रही है-  सफ़ेद नारियल सी मासूम बातें,  शेयर के भाव सी बढ़ती परेशानियाँ।

  • डॉ. मधु संधु, पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष

हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब।

संदर्भ:

[1] ममता सिंह, बीज और आकाश, शिवना, सीहोर, एम. पी., 2026, पृष्ठ 88

[2] वही, पृष्ठ 9, [3] वही, पृष्ठ 9, [4] वही, पृष्ठ 10, [5] वही, पृष्ठ 10, [6] वही, पृष्ठ 15, [7] वही, पृष्ठ 19, [8] वही, पृष्ठ 23, [9] वही, पृष्ठ 24, [10] वही, पृष्ठ 26, [11] वही, पृष्ठ 51, [12] वही, पृष्ठ 52, [13] वही, पृष्ठ 65, [14] वही, पृष्ठ 72, [15] वही, पृष्ठ 86, [16] वही, पृष्ठ 92, [17] वही, पृष्ठ 110, [18] वही, पृष्ठ 171

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