Tuesday, November 3, 2026
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डॉ. अनुप्रिया की कहानी- माँ का अनकहा द्वंद्व

विनय का कॉल आया तो राधा ने प्रश्नवाचक दृष्टि से फोन की स्क्रीन की ओर देखा और फिर फोन उठा लिया।

उधर से विनय की घबराई हुई आवाज सुनाई दी, “राधा, बाबू उल्टी कर रही है। तीन बार उल्टी कर चुकी है और अभी चौथी बार भी उल्टी की है। देखो, अगर तुम कॉलेज से घर आ सकती हो तो आ जाओ। मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।”

राधा उस समय अपनी क्लास ले रही थी। विनय के फोन ने जैसे उसे अचानक स्टैच्यू बना दिया था। कुछ क्षणों के लिए उसके हाथ-पाँव ठिठक गए। क्लास में सामने बैठे विद्यार्थी उसे देख रहे थे, लेकिन उसका मन कहीं और पहुँच चुका था।

उसने घबराते हुए पूछा, “कोमल कहाँ है?”

कोमल उसकी होम टेकर थी, जो दिन में आद्या की देखभाल करती थी।

“ठीक है, आप उसे डॉक्टर के पास ले आइए। मैं भी वहीं आती हूँ।”

इतना कहकर राधा ने फोन काट दिया। उसने अपनी घबराहट को चेहरे पर आने से रोकने की कोशिश की। बच्चों के सामने स्वयं को संयत रखते हुए उसने कहा, “आज मैं आपको दस मिनट पहले ही फ्री कर दूँगी।”

उसके भीतर कितनी उथल-पुथल मची हुई थी, इसका अंदाजा सामने बैठे विद्यार्थियों को नहीं था। वह तुरंत कैब बुक करके डॉक्टर के पास जाने के लिए निकल पड़ी।

मन में घबराहट और अपराधबोध एक साथ उमड़ रहे थे। कैब की खिड़की से बाहर भागते दृश्यों को देखते हुए वह सोच रही थी कि अब तक उसका जीवन कितना व्यवस्थित और नियमित था। राधा एक अध्यापिका थी। समय की पाबंद, कर्मठ और अपने विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय। अपने काम के प्रति उसकी निष्ठा ऐसी थी कि वह विद्यार्थियों के लिए हमेशा तत्पर रहती थी। लेकिन एक बेटी के जीवन में आने के बाद उसका जीवन मानो दो धाराओं में बँट गया था—एक ओर उसका विद्यालय और दूसरी ओर उसकी आद्या।

वह सोच रही थी, कैसी माँ है वह, जो अपनी बच्ची की ऐसी हालत में उसके पास नहीं है? आखिर माँ होने का अर्थ क्या केवल बच्चे को जन्म देना है? क्या उसके रोने, हँसने, उसकी छोटी-छोटी जरूरतों और बदलते हुए भावों को अपनी आँखों के सामने देख पाना ही मातृत्व की सबसे बड़ी तृप्ति नहीं है?

लेकिन उसकी अपनी जिंदगी थी, उसकी नौकरी थी, उसकी जिम्मेदारियाँ थीं। वह चाहकर भी सब कुछ छोड़कर हर समय अपनी बेटी के पास नहीं रह सकती थी।

गाड़ी की रफ्तार और ट्रैफिक के जाम के बीच फँसी राधा को अपनी ही व्यवस्था पर तरस आ रहा था। सुबह आद्या को ठीक से निहार भी नहीं पाती थी। कभी वह सोई रहती और कभी राधा को विद्यालय जाने की जल्दी होती। हर रोज आद्या को घर छोड़कर जाते समय उसे लगता, जैसे अपने दिल का एक टुकड़ा घर पर ही छोड़कर जा रही हो।

आद्या को कोमल के पास छोड़ना उसे ऐसा लगता, मानो किसी पराए के हाथों में अपनी सबसे अनमोल धरोहर सौंपकर जा रही हो। वह जानती थी कि कोमल पैसे लेकर बच्ची की देखभाल करती है और अपने काम के प्रति ठीक भी है, फिर भी एक माँ का मन कहाँ इतनी आसानी से आश्वस्त हो पाता है! उसके भीतर बार-बार यही प्रश्न उठता कि क्या कोई दूसरा व्यक्ति उसकी बच्ची की जरूरतों को उसी तरह समझ सकता है, जैसे वह स्वयं समझती है?

विनय का ऑफिस वर्क फ्रॉम होम था, इसलिए वह भी कहीं न कहीं आद्या को देख लेता था। कई दिनों से राधा विनय से कह रही थी कि वह अपनी माँ को गाँव से बुला ले, लेकिन विनय हर बार यही कहता, “अभी तो काम चल ही रहा है। मैं हूँ ही। मम्मी को तब बुला लूँगा, जब एकदम आवश्यकता होगी।”

आज राधा को अपनी बात न माने जाने का दुख और भी गहरा महसूस हो रहा था। वह मन ही मन बड़बड़ा रही थी कि माँ को पहले ही बुला लेना चाहिए था। वह हमसे अधिक अनुभवी हैं। बच्चों की देखभाल का अनुभव भी उन्हें हमसे कहीं ज्यादा है।

वह विनय पर अंदर ही अंदर चिढ़ रही थी। उसे लग रहा था कि उसकी आशंका को समय रहते समझ लिया गया होता तो शायद आज उसे इस तरह घबराकर भागना नहीं पड़ता।

तभी फोन की घंटी फिर बजी।

राधा ने फोन उठाया। उधर से विनय ने पूछा, “तुम कहाँ हो अभी?”

राधा ने जवाब दिया, “हाँ, मैं बस पहुँचने वाली हूँ।”

डॉक्टर के पास पहुँचते ही राधा ने कोमल की गोद से आद्या को लिया और अपने सीने से लगा लिया। बच्ची को सीने से लगाते ही जैसे उसके भीतर की सारी घबराहट एक साथ बाहर आना चाहती थी। वह उसे बार-बार चूम रही थी, उसके चेहरे को देख रही थी, मानो अपनी आँखों से ही यह सुनिश्चित कर लेना चाहती हो कि उसकी बच्ची ठीक है।

डॉक्टर ने आद्या को देखा और कहा, “ओवरफीडिंग की वजह से बच्ची को परेशानी हुई है। गैस बन गई होगी, इसलिए वह रो रही थी और उल्टी कर रही थी। छोटे बच्चों में ऐसा हो जाता है। घबराने की कोई बात नहीं है। हमने चेक कर लिया है। बच्ची ठीक है।”

डॉक्टर की बात सुनकर राधा ने चैन की साँस ली। कुछ क्षण पहले तक जो भय उसके भीतर घर कर गया था, वह धीरे-धीरे कम होने लगा। एक माँ को अपने बच्चे के ठीक होने की खबर से बड़ा सुकून और क्या हो सकता है!

विनय ने उससे पूछा, “अब तुम कॉलेज जाओगी या घर चलोगी?”

राधा ने कहा, “नहीं, घर चलूँगी। क्लास को मैंने शिफ्ट कर दिया है।”

वापसी के रास्ते में राधा ने कोमल से एक सख्त माँ की तरह पूछा, “आज कितनी बार दूध पिलाया है तुमने?”

कोमल ने कहा, “दो ही बार,दीदी । हाँ, सुबह दाल भी पिलाई थी।”

राधा ने नाराजगी से कहा, “इतना सब खिलाओगी-पिलाओगी तो बच्चा परेशान होगा ही न!”

कोमल ने सफाई देते हुए कहा, “दीदी, मुझे लगा कि भूखी होगी। रो रही थी, मैं कुछ समझ नहीं पाई।”

वैसे तो कोमल अच्छी थी। वह आद्या का ख्याल भी ठीक से रखती थी, लेकिन आज न जाने क्यों राधा उससे बहुत नाराज थी। शायद उसकी नाराजगी का कारण केवल कोमल नहीं थी। वह अपनी विवशता, अपनी अनुपस्थिति और उस परिस्थिति से भी नाराज थी, जिसमें उसे अपनी बच्ची की देखभाल किसी दूसरे के भरोसे छोड़नी पड़ रही थी।

सभी चुपचाप घर लौट आए। राधा ने कोमल को छुट्टी दे दी और कहा, “जाओ, कल आना।”

घर पहुँचने के बाद उसने आद्या को अपने सीने से लगाए रखा। वह उसे गोद में लेकर रो रही थी और उसके मासूम चेहरे पर बार-बार अपने चुंबन लुटा रही थी। उस समय उसे किसी और चीज की जरूरत नहीं थी। उसे बस अपनी बच्ची को अपने पास रखना था, उसे महसूस करना था और यह विश्वास करना था कि अब सब ठीक है।

विनय ने उसे समझाते हुए कहा, “कोई बात नहीं, राधा। बाबू ठीक है। ऐसा कभी-कभी हो जाता है।”

राधा ने उसकी ओर देखा और कहा, “विनय, बात सिर्फ इतनी नहीं है कि आद्या ठीक है। मैं दुखी इस बात से हूँ कि मुझे उसे छोड़कर जाना पड़ता है। मन में कभी-कभी आता है कि नौकरी छोड़ दूँ। इसका अच्छे से ख्याल रखूँ, इसका बचपन जीऊँ। ये मेरी आँखों के सामने बड़ी हो। इसके एक-एक मोमेंट, एक-एक चीज को मैं ऑब्जर्व करूँ।

“ऐसा लगता है कि मैं आद्या को बस आधी आँख से देख पाती हूँ। उसकी कितनी सारी चीजें मुझसे छूट रही हैं। मैं इतनी व्यस्त हो जाती हूँ कि उसका आधा बचपन यूँ ही गँवा दे रही हूँ। इतनी छोटी-सी बच्ची को छोड़कर जाना मुझे बहुत मुश्किल लगता है।

“मुझे नहीं पता कि कोमल इसका ख्याल कैसे रखती है। वह अच्छा ही रखती होगी, लेकिन मुझे तसल्ली खुद इसे खिलाने-पिलाने से होती है, खुद नहलाने-धुलाने से होती है। अपने सामने रखकर इसे दवा पिलाती हूँ तो मन को संतोष होता है। बार-बार यही लगता है कि पता नहीं, उसने कितना कम या कितना ज्यादा पिलाया होगा। मैं इसे हमेशा अपनी नजरों के सामने रखना चाहती हूँ।”

विनय उसकी बातें सुनता रहा। उसे लगा कि यह माँ की ममता है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।

राधा ने अगले दिन की छुट्टी ले रखी थी। उसने विनय से कहा, “गाँव से माँ को बुला लो। वे साथ रहेंगी तो कोमल को भी आराम हो जाएगा। वह चीजों को समझ सकेगी और माँ उसे सिखा देंगी कि बच्चे की देखभाल कैसे करनी है। माँ समय देखकर ही नहीं, अपने अनुभव से भी उसका ख्याल रखेंगी।”

इस बार विनय ने इनकार नहीं किया। उसने गाँव से अपनी माँ को बुलाने के लिए टिकट कर दिया।

राधा को थोड़ी राहत मिली। माँ के आने के बाद वह कुछ अधिक सुकून से कॉलेज जाने लगी। उसे विश्वास था कि अब आद्या के पास एक अनुभवी हाथ है, जो उसकी छोटी-छोटी जरूरतों को समझ सकेगा।

लेकिन माँ की ममता के साथ एक अदृश्य डोर जुड़ी होती है। वह डोर आँखों से दिखाई नहीं देती, फिर भी हर पल अपने बच्चे की ओर खींचती रहती है। राधा कॉलेज में होती तो भी उसका मन बार-बार आद्या के पास चला जाता। वह पढ़ाते समय भी सोचती कि इस समय उसकी बेटी क्या कर रही होगी, सो रही होगी या खेल रही होगी, उसने खाना खाया होगा या नहीं।

आद्या आठ महीने की हो चुकी थी।

एक दिन राधा जब कॉलेज से घर लौटी तो विनय ने उत्साहित होकर बताया, “राधा, पता है, बाबू आज कितना जोर-जोर से हँस रही थी!”

राधा ने तुरंत पूछा , “वीडियो बनाया?”

विनय ने कहा, “नहीं यार, हम तो बस उसे देखकर उसमें ही खो गए थे।”

राधा ने उत्सुकता से पूछा, “कोमल, तुमने बनाया?”

कोमल ने कहा, “नहीं दीदी ।”

राधा ने आद्या को अपने सीने से लगा लिया। लेकिन तभी उसने देखा कि आद्या अपनी दादी की गोद में जाने के लिए दोनों हाथ बढ़ा रही है। वह उनकी ओर जाने के लिए छटपटा रही थी। वह कोमल की गोद में भी बड़ी सहजता से चली जाती थी।

राधा ने कुछ कहा तो नहीं, लेकिन उसका मन फिर व्यथित हो उठा। कहीं उसकी बेटी उससे अलग तो नहीं हो जाएगी? कहीं वह अपनी बच्ची के साथ उस आत्मीय संबंध से वंचित तो नहीं हो जाएगी, जिसकी कल्पना उसने माँ बनने से पहले की थी?

एक अनजाना भय उसे अपनी आगोश में लेने लगा।

वह मन ही मन सोचने लगी, कहीं ऐसा तो नहीं कि उसका बच्चा उसके पास आने से कतराने लगे, उसे पहचाने ही नहीं? इस व्यस्त जीवन में कहीं वह अपनी बेटी को गँवा तो नहीं देगी?

क्या करे वह? उसे लगने लगा कि नौकरी नहीं चाहिए, आत्मसम्मान नहीं चाहिए, वह भाव भी नहीं चाहिए कि वह एक लड़की होकर कमा रही है। ठीक है, वह अपनी बेटी के साथ घर पर ही ठीक है।

उसके मन में उलझनों का जाल बुनता चला गया।

वह सोचने लगी कि पहले भी तो नौकरी और घर के काम के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश करती थी। कितने झगड़े हुए थे उन दोनों के बीच! विनय ने कितनी बार ताना दिया था कि घर तो संभालना पड़ेगा।

भला वह घर के काम कैसे संभालती? उसे तो यह सब आता ही नहीं था।

राधा अक्सर सोचती थी कि लड़कों की माँएँ अपने बेटों को घर संभालना क्यों नहीं सिखातीं? लड़कियों को तो बचपन से ही नसीहतें और हिदायतें मिलने लगती हैं। कैसे रहना है, कैसे बैठना है, कैसे कपड़े पहनने हैं, मेहमान आएँ तो क्या करना है—न जाने कितनी बातें उन्हें बचपन से सिखा दी जाती हैं।

काश, विनय की माँ ने भी उसे खाना बनाना और घर के काम सलीके से करना सिखाया होता! कुछ जिम्मेदारियाँ निभाना सिखाया होता तो आज दोनों मिलकर घर और नौकरी संभाल सकते थे। इतने झगड़ों और शिकायतों की जरूरत ही नहीं पड़ती।

लड़कियाँ ही क्यों घर सँभालना पहले सीखती हैं और नौकरी बाद में? लड़कों को यह सब सीखने की जरूरत क्यों नहीं समझी जाती?

राधा इन प्रश्नों के साथ जी रही थी। वह जानती थी कि अब इन परिस्थितियों को बदलना उसके अकेले के हाथ में नहीं है, लेकिन उसे इनका सामना तो करना ही होगा।

धीरे-धीरे उसने दोनों चीजें संभालना सीख लिया। बिना किसी शिकायत के, बिना किसी ताने के। अब वह अपनी ममता और नौकरी के बीच के द्वंद्व को झेल रही थी। घर, नौकरी और बच्चा—तीनों उसके जीवन का हिस्सा थे और तीनों के प्रति उसकी जिम्मेदारियाँ थीं।

विनय भी धीरे-धीरे उसकी स्थिति को समझने लगा था। वह अब आद्या के लिए समय निकालने लगा था। पहले की तरह हर जिम्मेदारी राधा के हिस्से में ही नहीं आती थी। हालाँकि सब कुछ सहज नहीं हुआ था, फिर भी परिस्थितियों में थोड़ा बदलाव आने लगा था।

लेकिन राधा के भीतर का द्वंद्व अब भी समाप्त नहीं हुआ था।

वह कॉलेज जाती तो कभी-कभी इतनी जल्दी में रहती कि उसे देखकर लोग सोचते कि आखिर उसे इतनी जल्दी किस बात की है। क्लास में भी उसका आधा ध्यान आद्या पर ही रहता। न वह पूरी तरह पढ़ाने के काम पर ध्यान दे पाती और न अपनी बेटी से मन को अलग कर पाती।

वह मन ही मन खामोश और चुप रहने लगी थी। बाहर से वह अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रही थी, लेकिन भीतर एक अनकही बेचैनी लगातार चलती रहती थी।

घर आने के बाद कोमल और माँ अक्सर आद्या को लेकर उससे बातें करतीं। वे उसे बतातीं कि आद्या उसे कितना याद करती है।

“मम्मा आपको मिस करती है। मम्मा कॉलेज जाती है। मम्मा आपको बहुत प्यार करती है। मम्मा लव्स यू मोर दैन एनीवन, एनीथिंग। मम्मा को भूलना नहीं, मम्मा की मजबूरी को समझना।”

ये बातें राधा के मन को एक ओर सुकून देतीं, तो दूसरी ओर उसके भीतर का अपराधबोध फिर सिर उठाने लगता। घर आने के बाद वह आद्या को पूरा समय अपने पास रखती। उसके खाने-पीने की हर चीज का भरपूर ख्याल करती। उस दिन की घटना ने जैसे उसे भीतर तक हिला दिया था।

समय ऐसे ही चलता रहा।

विनय को लगने लगा था कि राधा बाबू को लेकर बहुत पजेसिव हो रही है, लेकिन वह कुछ कहता नहीं था। वह उसकी मनःस्थिति को समझने की कोशिश कर रहा था।

एक दिन जब राधा कॉलेज में थी, विनय ने उसे वीडियो कॉल किया। राधा क्लास में थी। वह सोचने लगी कि क्लास के बीच वीडियो कॉल कैसे उठाए। उसने पहले कॉल काट दिया। फिर क्लास के बाहर जाकर एक खाली जगह ढूँढ़ी और विनय को फोन किया।

विनय ने उत्साह से कहा, “राधा, आद्या तुझको मम्मा-मम्मा कह रही है। मम्मा-मम्मा बुला रही है। तुझको बहुत याद कर रही है।”

यह सुनकर राधा खुश हो गई। उसकी आँखें भर आईं। उसकी छोटी-सी बच्ची उसे याद कर रही थी, उसे पुकार रही थी। उस एक पल में उसे लगा कि उसके और आद्या के बीच की डोर उतनी ही मजबूत है, जितनी वह हमेशा चाहती थी।

राधा ने फोन पर कहा, “मम्मा लव्स यू,” और फोन काट दिया।

उस दिन जब राधा घर आई तो आद्या उसकी गोद में फटाक से आकर उसके सीने से चिपक गई। राधा ने उसे बाँहों में भर लिया। उस छोटे-से आलिंगन में जैसे दिन भर की दूरी सिमटकर समाप्त हो गई।

आद्या अभी इतनी छोटी थी कि शायद यह समझ नहीं सकती थी कि उसकी मम्मा इतने घंटों तक उसके पास क्यों नहीं रहती। वह यह भी नहीं जानती थी कि उसकी माँ किसी काम के लिए घर से बाहर जाती है, उसकी नौकरी है, उसकी अपनी जिम्मेदारियाँ हैं।

लेकिन शायद उस नन्ही बच्ची ने अपने तरीके से इतना जरूर महसूस कर लिया था कि मम्मा उससे दूर जरूर रहती है, पर उससे प्यार बहुत करती है। मम्मा की अनुपस्थिति उसके प्यार की कमी नहीं है।

और राधा को भी धीरे-धीरे यह एहसास होने लगा कि उसकी बच्ची के साथ उसका रिश्ता केवल दिन भर साथ रहने से नहीं बनता। उस रिश्ते में उसका स्पर्श है, उसकी आवाज है, उसकी चिंता है, उसकी उपस्थिति है और वह प्यार है, जिसे दूरी भी कम नहीं कर सकती।

राधा को पहली बार लगा कि उसका अपराधबोध कुछ कम हो रहा है। वह खुश थी। अब राधा और आद्या दोनों एक-दूसरे से थोड़ी देर दूर रहने की स्थिति को धीरे-धीरे स्वीकार करना सीख रही थीं। यह दूरी उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं कर रही थी, बल्कि उन्हें अपने रिश्ते को नए ढंग से समझने का अवसर दे रही थी।

धीरे-धीरे राधा का अपराधबोध कम होता गया।

उसने घर, पति और बच्चे के साथ-साथ स्वयं को भी संभालना सीख लिया। अब वह समझने लगी थी कि एक स्त्री का अस्तित्व केवल उसके रिश्तों में बँधा हुआ नहीं होता। वह माँ है, पत्नी है, बहू है, लेकिन इन सभी संबंधों के साथ-साथ वह स्वयं भी है। उसका अपना व्यक्तित्व है, अपनी पहचान है, अपनी गरिमा है, अपना आत्मसम्मान है, अपनी रुचियाँ हैं, अपना स्वभाव है और अपनी सहजता है।

आद्या ने अनजाने में ही अपनी माँ को यह एहसास करवा दिया था कि ममता और आत्मनिर्भरता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। अपनी बच्ची से प्रेम करने के लिए राधा का अपने अस्तित्व को मिटा देना जरूरी नहीं है। माँ होना उसके जीवन का एक अत्यंत सुंदर और महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन यही उसके पूरे जीवन की एकमात्र पहचान नहीं है।

राधा को अब यह समझ आने लगा था कि माँ होने का अर्थ अपने हर सपने को छोड़ देना नहीं है। माँ होने का अर्थ अपने बच्चे के लिए उपस्थित रहना है—कभी उसके पास रहकर, कभी उससे दूर रहकर भी उसके लिए सोचते हुए, उसकी जरूरतों को समझते हुए और उसके साथ अपने रिश्ते को विश्वास से सींचते हुए।

वह यह भी समझ रही थी कि एक स्त्री से हर समय हर भूमिका में पूर्ण होने की अपेक्षा करना उचित नहीं है। उससे यह उम्मीद करना कि वह एक अच्छी माँ भी बने, अच्छी पत्नी भी, घर को भी सँभाले, नौकरी में भी अपना सर्वश्रेष्ठ दे और इस सबके बीच कभी थके नहीं, कभी विचलित न हो, उसके साथ अन्याय है। उसे भी अपनी थकान स्वीकार करने का, सहायता माँगने का और अपने लिए समय निकालने का अधिकार है।

घर और नौकरी की जिम्मेदारी केवल राधा की नहीं थी। आद्या जितनी उसकी बेटी थी, उतनी ही विनय की भी थी। घर भी दोनों का था और उसे सँभालने की जिम्मेदारी भी दोनों की थी। राधा के मन में उठे प्रश्नों ने उसे इस बात का एहसास कराया कि परिवार का अर्थ केवल एक स्त्री का सब कुछ समेट लेना नहीं, बल्कि एक-दूसरे का हाथ थामकर जीवन की जिम्मेदारियाँ बाँटना है।

अब राधा पहले से अधिक सहज थी। वह अपने सभी संबंधों का निर्वहन बखूबी कर रही थी। वह आद्या से पहले की तरह ही प्यार करती थी, उसके लिए चिंतित भी होती थी, लेकिन अब उसके भीतर पहले जैसा भय नहीं था। वह जानती थी कि उसकी बच्ची के साथ उसका रिश्ता सुरक्षित है और उसकी अपनी पहचान भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

आद्या उसकी जिंदगी का सबसे सुंदर हिस्सा थी, लेकिन राधा की पूरी जिंदगी केवल आद्या तक सीमित नहीं थी। उसकी अपनी एक दुनिया भी थी, जिसमें उसके सपने थे, उसकी मेहनत थी, उसका ज्ञान था, उसकी रुचियाँ थीं और उसका आत्मसम्मान था।

शायद माँ बनने के बाद राधा ने पहली बार स्वयं को भी उसी ममता से देखना सीखा था, जिस ममता से वह अपनी बेटी को देखती थी।

अब उसे अपनी नौकरी और अपनी बेटी में से किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं महसूस होती थी। वह जान गई थी कि जीवन हमेशा दो विकल्पों के बीच किसी एक को चुन लेने का नाम नहीं है। कभी-कभी जीवन उन दोनों के बीच संतुलन खोजने, अपनी सीमाओं को स्वीकार करने और अपनी परिस्थितियों के साथ एक नया रास्ता बनाने का नाम भी है।

राधा ने समझ लिया था कि एक स्त्री का संपूर्ण होना केवल दूसरों के लिए जीने में नहीं, बल्कि अपने लिए भी जीवित रहने में है। उसके सपने, उसकी पहचान और उसका आत्मसम्मान उसकी ममता को कम नहीं करते, बल्कि उसे और अधिक संपूर्ण बनाते हैं।

अब राधा खुश थी। वह माँ भी थी, अध्यापिका भी, पत्नी भी और इन सबके साथ एक स्वतंत्र व्यक्तित्व भी।

उसने अपनी बेटी को प्रेम करना नहीं छोड़ा था, बस उस प्रेम के बीच स्वयं को खो देना छोड़ दिया था।

और शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी—उसने अपनी ममता को बचाए रखते हुए अपने अस्तित्व को भी स्वीकार कर लिया था।

डॉ. अनुप्रिया
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर
हिंदी विभाग,भारती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
ईमेल- [email protected]

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