भारत में विकास के दावों और अत्याधुनिक स्मार्ट शहरों की चमचमाती तस्वीरों के समानांतर एक ऐसी कड़वी सच्चाई भी सांस ले रही है, जिससे तंत्र और समाज लगातार आंखें चुराते आए हैं। यह सच्चाई है देश के करोड़ों दिव्यांगजनों की, जिनके लिए एक बाधा रहित (Barrier-Free) और गरिमापूर्ण जीवन आज भी केवल एक दिवास्वप्न बना हुआ है। दूर-दराज के गांवों या कस्बों की बात तो छोड़िए, देश की सत्ता के केंद्र- राजधानी दिल्ली तक में एक बुनियादी सुलभ परिवेश नहीं मिलता। जब देश की राजधानी में एक नागरिक को अपने सामान्य अधिकारों के लिए कदम-कदम पर गिड़गिड़ाना पड़े, तो यह केवल बुनियादी ढांचे की खामी नहीं, बल्कि समूची व्यवस्था के नैतिक दीवालियापन का प्रमाण है।
वर्ष 2016 में जब ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम’ (RPwD Act) पारित हुआ और उसके साथ ‘सुगम्य भारत अभियान’ का बिगुल फूंका गया, तो लगा था कि शायद अब स्थिति बदलेगी। अधिनियम को बने एक दशक बीतने को है, लेकिन जमीन पर व्यवस्था रत्ती भर भी नहीं बदली।
सरकारी दफ्तरों से लेकर निजी प्रतिष्ठानों तक, रैंप या तो नदारद हैं या फिर इंजीनियरिंग के ऐसे क्रूर मजाक की तरह बने हैं जिनकी 45 डिग्री वाली ढलान सीधे दुर्घटना को न्योता देती है। शिक्षण संस्थानों में बहुमंजिला इमारतें तो खड़ी कर दी जाती हैं, लेकिन उनमें लिफ्ट नहीं होतीं। दृष्टिहीनों के लिए लगाए जाने वाले टैक्टाइल पाथ अक्सर किसी बिजली के खंभे या कूड़ेदान पर जाकर खत्म हो जाते हैं।
सार्वजनिक परिवहन की स्थिति और भी हृदयविदारक है। गिनी-चुनी लो-फ्लोर बसों में भी ड्राइवर रैंप खोलने की जहमत नहीं उठाते। रेलवे स्टेशनों पर बने लिफ्ट और एस्केलेटर का लाभ तब निरर्थक हो जाता है, जब प्लेटफॉर्म और ट्रेन के डिब्बे के बीच का फासला किसी व्हीलचेयर उपयोगकर्ता के लिए मौत की खाई बन जाता है। जो बुनियादी सुविधाएं विदेशों में नागरिक अधिकार के रूप में स्वतः उपलब्ध हैं, वे यहां बार-बार गुहार लगाने पर भी नहीं मिलतीं।
सवाल उठता है कि आखिर कानून होने के बावजूद यह तंत्र इतना बेपरवाह क्यों है? इसका सीधा संबंध हमारी राजनीतिक प्राथमिकताओं से है। दिव्यांगजन इस देश में जातियों, संप्रदायों और क्षेत्रों में बंटे हुए हैं; वे संगठित होकर किसी राजनीतिक दल का ‘एकमुश्त वोट बैंक’ नहीं बनाते। राजनीति और अफसरशाही उसी मांग को प्राथमिकता देती है जिसका सीधा चुनावी नफा-नुकसान हो। इसलिए दिव्यांगजनों के अधिकारों को हमेशा संवैधानिक हक के बजाय ‘सरकारी खैरात’ या ‘चैरिटी’ के चश्मे से देखा जाता है, और बजट में कटौती की पहली गाज इन्हीं परियोजनाओं पर गिरती है।
इस निराशाजनक परिदृश्य में जिन्हें आवाज बनना चाहिए था, उन गैर-सरकारी संस्थाओं (NGOs) का रवैया भी उतना ही सतही और खेदजनक है। अधिकांश संस्थाओं की सक्रियता 3 दिसंबर (विश्व दिव्यांग दिवस) के आसपास कुछ पोस्टर प्रतियोगिताओं, कविताओं और औपचारिक रैलियों तक सिमट कर रह जाती है।
हाल के वर्षों में एक नया चलन ‘सामूहिक दिव्यांग विवाह’ कराने का शुरू हुआ है। कैमरों की चकाचौंध, मंच पर दानदाताओं की कतारें और उपहार बांटने की तस्वीरें जुटाकर कई संगठन इसे ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मान बैठते हैं। यह प्रवृत्ति समस्या की जड़ को ही नकारती है। किसी भी युवा के जीवन में विवाह पहली प्राथमिकता नहीं हो सकता। पहली जरूरत है- शिक्षा, कौशल, बाधा रहित गतिशीलता और आर्थिक आत्मनिर्भरता। जब तक एक व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा होकर आजीविका नहीं कमा सकता, तब तक उसे वैवाहिक बंधन में बांधना उसे सुरक्षा देने के बजाय एक नए आर्थिक और सामाजिक दबाव के भंवर में धकेलना है। लेकिन कठिन नीतिगत व कानूनी लड़ाई लड़ने के बजाय संस्थाएं ऐसे आसान ‘इवेंट्स’ से सस्ती वाहवाही लूटना ज्यादा मुफीद समझती हैं।
विवाह जैसे संवेदनशील मसले पर समाज का दोहरा चेहरा सबसे ज्यादा बेनकाब होता है। समाज किसी दिव्यांग व्यक्ति को बराबरी का मानवीय दर्जा देने को तैयार नहीं है। एक गैर-दिव्यांग व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में किसी दिव्यांग से विवाह करने की इच्छा शायद ही कभी दिखाता है। यदि कहीं ऐसा विवाह होता भी है, तो वह मानवीय संवेदना या प्रेम के आधार पर कम, ‘सशर्त सौदेबाजी’ के आधार पर अधिक होता है।
या तो दिव्यांग पक्ष आर्थिक रूप से असाधारण संपन्न हो, कोई बड़ा कारोबार या प्रतिष्ठित पद रखता हो; या फिर दूसरे पक्ष की कोई गंभीर पारिवारिक या सामाजिक मजबूरी हो। यानी दिव्यांगता की तथाकथित ‘कमी’ की भरपाई पैसे, रुतबे या मजबूरी से करने की उम्मीद की जाती है। महिलाओं के मामले में तो यह संकट और भी गहरा है, जहां परिवार उन्हें ‘जिम्मेदारी’ समझकर किसी भी तरह उनका विवाह कर पल्ला झाड़ लेना चाहता है, जिससे वे आगे चलकर गंभीर उपेक्षा और हिंसा का शिकार होती हैं।
अब वक्त आ चुका है कि हम सहानुभूति और दया के थोथे विमर्श से बाहर निकलें। दिव्यांगजनों को किसी के अहसान या दान की दरकार नहीं है; उन्हें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानपूर्वक जीने का हक चाहिए। इसके लिए कुछ कड़े और निर्णायक कदम उठाने होंगे:
- सख्त जवाबदेही और दंडात्मक प्रावधान: RPwD Act 2016 के तहत तय सुलभता मानकों का उल्लंघन करने वाले ठेकेदारों, वास्तुकारों और विभागों के प्रमुखों पर कानूनी और आर्थिक जवाबदेही तय की जाए। बिना पूर्ण सुलभता प्रमाण-पत्र (Access Audit Clearance) के किसी भी इमारत को इस्तेमाल की अनुमति न मिले।
- आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखना: स्वयंसेवी संगठनों और सरकारी नीतियों का केंद्र बिंदु विवाह या सांकेतिक आयोजन नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा, वोकेशनल ट्रेनिंग और रोजगार के सुरक्षित अवसर होने चाहिए।
- सार्वजनिक संवेदनशीलता का विकास: सार्वजनिक परिवहन के चालकों, परिचालकों, स्टेशन कर्मियों और आम जनता को संवेदनशील बनाने के लिए नियमित प्रशिक्षण अनिवार्य हो।
जब तक हम बुनियादी ढांचे और सामाजिक सोच दोनों से बाधाओं को नहीं हटाएंगे, तब तक किसी भी ‘विकसित भारत’ की कल्पना अधूरी और झूठी ही रहेगी। एक संवेदनशील और सभ्य राष्ट्र की असली पहचान इसमें नहीं है कि वह अपने ताकतवरों को कितनी सुविधाएं देता है, बल्कि इसमें है कि वह अपने सबसे कमजोर और हाशिए पर खड़े नागरिक को कितनी गरिमा और आत्मनिर्भरता प्रदान करता है।
- सन्दीप तोमर
सम्पर्क: ड़ी 2/1 जीवन पार्क,
उत्तम नगर , नई दिल्ली 110059
मोबाइल: 8377875009

संदीप जी, “आश्रितशीलता का चक्रव्यूह, आत्मनिर्भरता और सम्मान का छलावा” जैसे विचारोत्तेजक एवं सार्थक विषय पर लिखने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद। आपके लेख ने सोचने और आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित किया।
Sir apne bilkul theek likha h ,lakin divyaang khud bhee divyaang ka saath nahi dena chahta ,mere school m hum 3 divyaang h but principle ko sirf mei hi inn situations k baare m bataati hoon ,vo iss group m bhee h senior h mere.but koi bhee principle ka anti nahi bannaa chahta,or sochte h ki koi or hi unke liye action leta rahe.group k aise logo ko jagaane k liye kya kehna chahiye.