Tuesday, November 3, 2026
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प्रतीक झा ‘ओप्पी’ की चार कविताएँ

 

ईमानदारी का आखिरी ठिकाना

अरे! अब क्या—
सरकारी विभाग और योजनाएँ भी कम पड़ गईं
जो तुम अब मंदिरों में भी चोरी करने लग गए?

अरे!
मासूम बच्चों की छात्रवृत्ति खा गए
बेज़ुबान जानवरों का चारा तक चबा गए!

अब तो कम से कम…
कोई एक ऐसा स्थान छोड़ दो
जहाँ ईमानदारी अपना गुज़र-बसर कर सके!

तमाशा शपथ का

तुम सब
शपथ पर शपथ लिए जा रहे हो!
और जनता?
जनता आज भी वहीं की वहीं खड़ी है
उसी बदहाली के मोड़ पर।

मगर तुम…
हर बार अपना स्थान बदल लेते हो
कभी
विधायक, कभी सांसद, कभी मंत्री बनकर
तो कभी
मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और न्यायाधीश बनकर!
तुम हर बार बस…
शपथ पर शपथ लिए जा रहे हो।

नए दौर के सपेरे

ये राजनेता
अब महज़ नेता नहीं रहे
ये तो अब सपेरे बन चुके हैं!

जो अपनी उँगलियों पर
जनता को सर्प की तरह नचाते हैं
और इनकी बीन से…
धर्म, जाति, और आरक्षण का
मंदिर और मस्जिद का
वह सम्मोहक संगीत निकलता है

जिसके नशे में झूमती जनता
खुद अपना ही विनाश नहीं देख पाती!

 

जंतर-मंतर की गूँज

जंतर-मंतर पर दिन-रात
सोनम वांगचुक भूखे बैठे रहे
आखिर किसके लिए?
किसकी समृद्धि के लिए?
किस देश के विकास के लिए?

राजनेताओं की बात तो छोड़िए
आश्चर्य तो इस बात का है
कि खुद को महाज्ञानी मानने वाले
विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर भी
अब तक मौन साधे बैठे हैं!

और न जाने ऐसे ही कितने क्षेत्रों के
तथाकथित बुद्धिजीवी और महाज्ञानी
आज भी चुप्पी ओढ़े खड़े हैं।

उनकी इस खामोशी को देखकर
अब जाकर समझ में आया है
कि आखिर हम सदियों तक
दूसरों के गुलाम बनकर कैसे रहे!

-प्रतीक झा ‘ओप्पी’
शोध-छात्र
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
पता:- ग्राम- पटनवां, पोस्ट- बसन्तनगर, जिला- चन्दौली (उ. प्र.)
पिन कोड़- 221110
मो. 9793252831

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