Tuesday, November 3, 2026
होमपुस्तकसुन्दरी का सपना एवं अन्य कहानियाँ- एक समीक्षा

सुन्दरी का सपना एवं अन्य कहानियाँ- एक समीक्षा

कहानी संग्रह- ‘सुन्दरी का सपना एवं अन्य कहानियाँ’ लेखक- डॉ जमुना कृष्णराज,समीक्षक-
पिछले दिनों डॉ जमुना कृष्णराज जी से भेंट स्वरूप मिली पुस्तक ‘सुन्दरी का सपना एवं अन्य कहानियाँ’ पढ़ने का सौभाग्य मिला। इस कृति को पढ़कर मुझे असीम आनंद की अनुभूति हुई।
 पहली कहानी ‘ अधूरा प्यार‘ एक बहुत ही सुंदर और प्रगतिशील सोच को उजागर करती है। कहानी के मुख्य पात्र ‘धनुष’ और ‘संजू’ का प्रेम भले ही अपनी सामाजिक पराकाष्ठा (विवाह या मिलन) तक नहीं पहुँच पाता, लेकिन नायक उसे अत्यंत स्वच्छ मन और परिपक्वता के साथ स्वीकार करता है। यह मोड़ नायक की उच्च मानसिक दशा, संवेदनशीलता और उत्तम चरित्र को दर्शाता है, जो आज के समय में बहुत प्रेरक है।
दूसरी कहानी ‘ अम्मालू ‘ दिल को छू लेने वाली है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति के जीवन का दुखद अंत नहीं है, बल्कि हमारे आधुनिक समाज की संवेदनहीनता और खोखलेपन को पूरी तरह उजागर करती है। अम्मालू, जो सुधा के घर की रसोइन थी, वह वैधव्य के अभिशाप और एकाकीपन को भोगते हुए संपूर्ण कष्टों को झेलते हुए अपने भाग्य को कोसती है तथा यकायक उसे ‘आया’ का कार्य मिलना तथा वहाँ उसका अपनी कार्यस्थली पर परिवार की तरह मिल जाना, अपने जीवन के संध्याकाल में अर्थात बुढ़ापे में उस पर समस्याएँ दस्तक देने लगी तब  सुधा का उसे उसके भाई के परिवार को सौंपना तथा वहाँ से वृद्धाश्रम भेजना, वहाँ की दुर्दशा से पाठक अन्तत: हिल जाता है। उनकी मृत्यु पश्चात सीधे श्मशान, बिना पंडित के क्रिया इत्यादि ने पाठक को हीं नहीं झकझोरा परन्तु आज की सामाजिकता पर भी सवाल खड़े किए। यह कहानी वास्तव में पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम विकास की दौड़ में कितने आगे निकल गए हैं, लेकिन मानवता के स्तर पर कितने पीछे छूट गए हैं।
तीसरी कहानी ‘ अंतक ‘ में जया जिसके पिता ने उसके वर का निर्णय उसके परिवार को देखकर कर दिया तथा बाद में उसकी शराबीपन की लत से जया पर अत्याचार, अंततः उसका स्वयं पर केरोसिन डाल कर आत्मदाह करना, नशे से उपजी इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करता है। जया के शरीर पर लगी आग वास्तव में नशे की आग थी जिसने हँसता-खेलता परिवार बर्बाद और तहस-नहस कर दिया साथ ही एक माँ, एक पत्नी की सहनशीलता को भी मृत्यु की बलि चढ़ा दिया। यह कहानी एक कड़ा संदेश देती है कि नशे की लत केवल उसे पीने वाले को ही नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार को मानसिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से ज़िंदा दफ़न कर देती है।
चतुर्थ कहानी ‘ अतिथि‘ में शंकर आने वाले त्योहार दीपावली की तैयारियों के बारे में चिंतित था, इधर उसके पूर्वज का सगा दोस्त ‘अतिथि’ बनकर उनके घर आ जाता है । अतिथि भगवान होता है, ऐसी परम्परा के अनुसार शंकर और उसका परिवार कार्य कर रहे थे। उन्होंने उस पर विश्वास कर, जो थोड़ी बहुत जमा पूंजी थी, सस्ते दाम में राशन दिलाने के एवज में उसे दे दी, वह राशन की दुकान पर जाने के बाद वहाँ शंकर को धोखा देकर दूसरे दरवाजे से जमा पूंजी लेकर भाग गया, इस बात से शंकर की कंगाली में आटा गीला होने की स्थिति आ गयी। त्योहार के अवसर पर यह
 स्थिति परन्तु पारिवारिक साथ, जो उसकी पत्नी-बच्चों द्वारा ढांढस बंधाया तथा अंत में उसके सास-ससुर द्वारा मिठाई, पटाखे, नए कपड़े लेकर पहुँचना, अच्छी शुरुआत तथा परिवार का दुःख की घड़ी में साथ और महत्त्व को दिखलाता है, इस घटना के द्वारा जो सीख शंकर को मिली वहीं सभी पाठक के लिए भी उपयोगी है कि हमें कभी भी अनजान व्यक्तियों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अंधविश्वास या किसी अनजान व्यक्ति पर अत्यधिक भरोसा करना भारी पड़ सकता है। आज के दौर में सतर्कता ही सुरक्षा है।
पाँचवी कहानी ‘ चुनाव ‘, अत्यन्त छोटी लघु कहानी जो कि सभी पात्रों के नाम के बिना ही एक मुख्य सन्देश देती है। बिना नामों के पात्रों को गढ़ना लेखक का एक अत्यंत प्रभावी शिल्प है, जो इस कहानी को किसी एक व्यक्ति या क्षेत्र तक सीमित न रखकर वैश्विक और सार्वभौमिक बना देता है। जनतंत्र की मृत्यु होना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक सन्देश है जो कि पैसे के बल पर एक-एक मत ख़रीद कर लोगों को उनके वास्तविक अधिकार से वंचित करता है। यह कहानी आज के दौर की चुनावी राजनीति की विद्रूपताओं पर एक कड़ा और सीधा प्रहार करती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम वाकई एक स्वस्थ लोकतंत्र में जी रहे हैं?
छठी कहानी ‘ डकैती ‘ जो रेल के डिब्बे में घटित घटना पर आधारित है साथ ही महिला सुरक्षा को भी बतलाती है। कहानी न केवल रेल यात्रा के दौरान होने वाली एक रोमांचक घटना को दर्शाती है, बल्कि समाज में महिला सुरक्षा और सामूहिक एकजुटता के महत्व को भी पुरजोर तरीके से रेखांकित करती है। जब डकैत डिब्बे में चढ़ा तो किस प्रकार होशियारी दिखाते हुए सभी ने उसका सामना किया व उसे सिर पर पैर रख भागने पर मजबूर किया, यह एकता की शक्ति का परिचायक है। विपरीत परिस्थितियों में घबराने की जगह सूझबूझ और बुद्धिमानी से काम लेना सबसे बड़ा हथियार होता है। सार्वजनिक स्थानों, विशेषकर ट्रेनों में महिलाओं की सुरक्षा एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। यह कहानी यह सीख देती है कि महिलाओं की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी केवल पुलिस या प्रशासन की नहीं, बल्कि समाज के हर जागरूक नागरिक की है।
सातवीं कहानी ‘डॉक्टरेट’ जो कि एक पी.एच.डी. शोधार्थी की है। ‘डॉक्टरेट ‘ कहानी केवल एक पी.एच.डी. शोधार्थी (राधा) की शैक्षणिक यात्रा भर नहीं है, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण, अटूट संकल्प और अकादमिक जगत की कड़वी सच्चाइयों का एक जीवंत दस्तावेज है। वह शोधार्थी अपने पी. एच.डी. चयन से लेकर, शोध प्रबंध को गति प्रदान करने, शोध प्रबंध जमा तथा अंतिम वाइवा वॉक करवाकर मार्गदर्शक तक पहुंचा कर अपनी उपाधि प्राप्त करती है। राधा ने संपूर्ण जिम्मेदारियों के साथ शोधकार्य किया, साथ ही वह नौकरी भी करती रही, महिलाओं को यदि थोड़ा सह‌योग मिले तो वह भी अपने सपने पूरा कर सकती है, यह कहानी उन सभी महिलाओं के लिए भी प्रेरणादायी है जो अपने सपनों को त्यागने के लिए बरबस मजबूर हो जाती है या मजबूर कर दी जाती है। विशेष बात यह भी कि किसी मार्गदर्शक को शोधार्थी का भविष्य अधर में लटकाना  ठीक नहीं है तथा ऐसे लालची मार्गदर्शक से तो शोध मार्गदर्शकता ही छीन लेनी चाहिए। यह कहानी राधा के माध्यम से यह साबित करती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे कोई भी बाधा टिक नहीं सकती। यह जहाँ एक ओर महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने के सपनों को पंख देती है, वहीं दूसरी ओर उच्च शिक्षा तंत्र में फैले भ्रष्टाचार और शोषण के खिलाफ एक मूक विद्रोह भी दर्ज कराती है।
आठवीं कहानी ‘ हनीमून ‘ के पात्र लीला व मोहन दोनो ही जब विवाह के बाद हनीमून पर जाते है, बहुत सी परिस्थितियों का सामना करते है। ‘हनीमून‘ कहानी में लीला और मोहन का यह अनुभव आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं और उम्मीदों के टूटने को बहुत ही सजीव तरीके से दर्शाता है। विवाह के तुरंत बाद एक सुखद और रोमांटिक शुरुआत की चाह में जब वे दोनों हनीमून के लिए निकलते हैं, तो उनके मन में कई सुनहरे सपने होते हैं। लेकिन यात्रा के दौरान उनके सामने आने वाली अप्रत्याशित और अजीबोगरीब परिस्थितियाँ उनके इस सफर को बेहद तनावपूर्ण और ‘खतरनाक’ बना देती हैं। तमाम मुश्किलों से जूझते हुए जब लीला और मोहन आखिरकार अपने घर लौटते हैं, तो उन्हें सुकून मिलता है। वह घर, जो पहले उन्हें शायद सामान्य लगता था, इस विचित्र और खतरनाक यात्रा के बाद दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना महसूस होने लगता है।
नौवीं कहानी ‘ मुखौटा‘ में अनुराधा का विवाह तथा उसके साथ किए गए दुर्व्यवहार का वर्णन बेजोड़ ताने-बाने के साथ बुना गया है। पाठक को बाँधने की क्षमता स्वतः ही प्रतीत होती है। अंत में उसका पुनर्विवाह व सुखमय जीवन ईश्वर के आशीर्वाद से सम्पन्नता के साथ होना अंतत: जीवन की सफलता की निशानी है। तथा मुखौटा कहानी अपने नाम के अनुरूप ही प्रतीत हुई है जो शादी मुखौटा पहन कर करवा दी गयी अर्थात रिश्ते की शुरुआत ही झूठ के साथ हुई वह अंत तक टिकेगा भी नहीं, यही सत्यता भी है। कहानी का अंत केवल दुखों पर खत्म नहीं होता, बल्कि अनुराधा का पुनर्विवाह और उसका सुखमय जीवन यह संदेश देता है कि विपत्तियों के बाद भी जीवन में नया सवेरा आ सकता है। ईश्वर के आशीर्वाद और धैर्य से जीवन को दोबारा सफल और समृद्ध बनाया जा सकता है। निश्चित रूप से, यह कहानी अपने नाम ‘मुखौटा’ को पूरी तरह सार्थक करती है और समाज को आईना दिखाती है।
दसवीं कहानी ’ नारीशक्ति ‘ में सीता का पात्र सहजता से कठिनता की ओर बढ़ता हुआ प्रतीत होता है। यह कहानी नारी के हर प्रकार से जुझने व संघर्ष के बल पर उम्र के हर पड़ाव पर जीत जाने का भाव रखती है। सीता (पात्र) वास्तव में रामायण की सीता की तरह स्त्री वर्ग को गौरवान्वित करती महसूस हो रही है। रामायण की सीता त्याग, धैर्य और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थीं, जिन्होंने महलों के सुख को छोड़कर वनवास चुना और अग्निपरीक्षाओं से गुजरीं। इस कहानी की सीता भी आधुनिक या व्यावहारिक संदर्भ में उसी गौरव को पुनर्स्थापित करती हैं—वह टूटती नहीं हैं, बल्कि हर परीक्षा को पार कर समाज में स्त्री वर्ग का सिर गर्व से ऊँचा करती हैं। यह कहानी वास्तव में केवल एक पात्र की कहानी नहीं, बल्कि हर उस स्त्री की कहानी है जो बिना शोर मचाए अपनी शक्ति से अपने संसार को संवारती है।
ग्यारहवीं कहानी ‘ पदोन्नति ‘ में सच का साथ देने तथा अपनी गरिमा और मर्यादा में रहकर कार्यस्थल पर कार्य करने एवम् आगे बढ़ने के लिए महिला की शक्ति, कार्यप्रणाली व आत्मसंयम को बतलाता है। पदोन्नति का सही मार्ग  चुनना ही सर्वश्रेष्ठ परीक्षा है जो कि ना केवल महिला को अपितु प्रत्येक व्यक्ति को शांति व सुकुन देता है। यह कहानी आज के कॉर्पोरेट और कामकाजी दौर में एक बेहतरीन सीख देती है कि सफलता का पैमाना सिर्फ ऊंचा पद पाना नहीं, बल्कि उस पद तक पहुँचने का ईमानदार सफर भी है।
बारहवीं कहानी ‘ सविता‘ में उसकी स्थिति मनोदशा सच में ही पाठक को अन्दर तक झकझोर देती है। चाची द्वारा उसे अपनी बेटी मानकर पालन पोषण करना तथा बाद में उसकी बीमारी से मृत्यु होना, वह भी ऐसी, जिसका इलाज भी था। बस उसकी पहचान सही समय पर होती तो वह जिंदा रहती। यह कहानी समय पर सही पहचान न हो पाना और एक मासूम जिंदगी का यूँ चले जाना, समाज में स्वास्थ्य जागरूकता और प्राथमिक चिकित्सा की कमी पर एक गहरा कटाक्ष तो करती ही है साथ ही, एक प्यारी सी मुस्कान, प्यारी बच्ची के साथ विदा हो गयी और पाठक को भी दया और करुणा के साथ भावविभोर कर गयी।
महत्वपूर्ण कहानी ‘सुंदरी का सपना’ नाम के अनुरूप ही मूल कथ्य और चेलम्मा के चरित्र को बेहद मार्मिक ढंग से रेखांकित करती है। चेलम्मा का प्रेम वासना या सामाजिक बंधनों से परे एक आध्यात्मिक और एकनिष्ठ साधना की तरह है, जहाँ सिर्फ पाने की चाह नहीं, बल्कि समर्पण का सर्वोच्च भाव है। चेलम्मा अत्यन्त सुंदर थी, नटी का रूप निभाते हुए वह कुशल अभिनय पर राजा द्वारा पुरस्कार स्वरूप दी गयी साड़ी को अपनी सामाजिक रस्म द्वारा स्वयं को उनकी पत्नी स्वीकार कर लेती है तथा आजीवन अपने अनोखे प्यार को निभाने की कोशिश करती है। जीवन के अंतिम पड़ाव में मंदिर के बाहर बैठकर रोज़ राजा का इंतज़ार करना उसकी अटूट निष्ठा को दिखाता है। एक दिन उनके दर्शन होने व राजा द्वारा सुंदरी को देखकर मुस्कुराने पर स्वयं को कृतार्थ मानकर ईश्वर को धन्यवाद देती है। राजा की एक मुस्कान ही उसके लिए जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और ‘आनंद की अंतिम सीमा’ बन जाती है, जिसके बाद वह शांति से दुनिया को अलविदा कह देती है। इसी के साथ उसके अनोखे प्यार की कहानी समाप्त हो जाती है। चेलम्मा का यह चरित्र आज के समाज में प्रेम की पवित्रता और एकनिष्ठता (निष्ठा) का एक बड़ा उदाहरण पेश करती है, जहाँ प्रेम का मतलब केवल भौतिक सुख या स्वार्थ नहीं, बल्कि एक गहरा आत्मिक जुड़ाव होता है। जो कि आज के समाज की उन महिलाओं के लिए एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करती है जो विवाहित होते हुए भी पर पुरुष के प्रति काम लोलुपता रखती हैं ।
तेहरवीं कहानी ‘ उन्नति ‘ में नीलगिरी की गोद में रहने वाली आत्ताल के अदम्य साहस की कहानी है जो बहुत छोटी है परन्तु बहुत समझदार व साहसी, जो कि युवा मन के आक्रोश से भी भरी हुई थी। जो भी अक्षर लिपि उसने सीखी, उसी के आधार पर खदान के ठेकेदार के विरोध में पत्र लिखकर सरकार के कार्यालय को भेज दिया जो कि उसकी जागरूकता के साथ-साथ उसकी सामाजिक जिम्मेदारी को भी दर्शाता है। वह हिम्मत जुटा कर जो कर पायी वह सभी के लिए स्वतंत्रता का प्रतीक चिन्ह तो है ही साथ ही वह सभी की उन्नति का सूचक भी बनी। उसके पत्र से न सिर्फ बंधुआ मजदूरी की कुप्रथा का अंत हुआ बल्कि सभी बंधुआ मजदूर के पक्के मकान, राशनकार्ड सुविधा, बच्चों के लिए स्कूल, शौचालय आदि खोले गये, यह सब देखकर ही प्रसिद्ध स्वायत्त समाज सेवी संस्थान द्वारा उसे सम्मानित किया गया था। यह दिखाता है कि शिक्षा का सही उपयोग समाज में कितना बड़ा बदलाव ला सकता है। वह सही मायने में अपने पूरे समाज की ‘ *उन्नति* ‘ का जरिया बनी। वास्तव में, आत्ताल जैसी साहसी बेटियां ही समाज के सुनहरे भविष्य की नींव होती हैं।
इस कहानी संग्रह की अंतिम कहानी ‘वैराग्य ‘ जो गौरी के वैवाहिक जीवन पर आधारित है। कहानी की पात्र गौरी बचपन से काफी होशियार होती है वह अपनी योग्यता के बल पर यूएस की बड़ी कंपनी नौकरी प्राप्त करती है, उसी कंपनी के राजा नाम के व्यक्ति द्वारा उसकी तरफ आकर्षण से उसकी शादीशुदा जिदंगी- किस प्रकार बर्बाद हो जाती है, यह इस कहानी में दिखलाया है विदेश में तलाक की प्रक्रिया बहुत आसान है, कारणवश उसका पति मुरली उससे तलाक लेकर उससे वैवाहिक जीवन के संबंध खत्म कर लेता है। अंत में उसके माता-पिता उसके दहेज का सामान लेकर घर आ जाते है तथा स्वयं को लाचार व अपमानित महसूस करते है। गौरी वही रहकर अपना जीवनयापन के लिए सोचती है तथा संस्कारी परिवेश में रहने के कारण वह कभी भी अपनी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचकर ईश्वर का सहारा लेकर मंदिर में जाकर पूजा-पाठ करती है, वहाँ एक गुरु जी के मार्गदर्शन से एक माह का आध्यात्मिक प्रशिक्षण लेकर गुरु कृपा स्वरूप नौकरी से त्याग-पत्र देकर गुरु के साथ आश्रम (भारत) में आ जाती है। माता-पिता सूचना पाकर अपनी बेटी से मिलकर प्रसन्न होते है तथा उसके लिए एक दरवाजा बंद होना, दूसरा दरवाजा खुलने की खुशी से (आध्यात्मिकता की ओर उसके झुकाव से) सहमत होकर उसकी जीवन शैली अपना कर स्वयं को कृतार्थ महसूस करते हैं। अंततः सांसारिक बंधनों (नौकरी) को छोड़कर भारत के आश्रम में लौटना यह उसकी आंतरिक दृढ़ता और ‘ *वैराग्य* ‘ की सच्ची भावना को प्रकट करता है।
डॉ जमुना कृष्णराज की पुस्तक ‘सुन्दरी का सपना एवं अन्य कहानियां’ आज के समाज को सही दिशा व सही मार्गदर्शन देने का कार्य करती है ।मैंने यह पुस्तक अत्यंत रुचि के साथ पढ़ी तथा उनकी अंतिम कहानी मैंने अपने कक्षा-कक्ष में भी बच्चों को सुनायी, जो कि बच्चों की सकारात्मक प्रतिक्रिया के साथ, पाठकों में भी नवीन ऊर्जा भरने वाली महसूस हुई। यह पुस्तक न सिर्फ विद्यार्थियों, समस्त पाठक वर्ग के लिए अत्यन्त रुचिकर तथा ज्ञानप्रदायी है। आज तकनीकी के युग में यह पुस्तक ज्ञान के साथ सार्वभौमिक मूल्य भी प्रदान करती है जो कि व्यवहारिक जीवन के लिए अति आवश्यक है।
Asha
डॉ आशा प्रजापति, बंगलूरू 
डॉ जमुना कृष्णराज
9444400820
 
RELATED ARTICLES

6 टिप्पणी

  1. पुस्तक की समीक्षा पढ़कर इतना अच्छा लगा कि अब पूरी पुस्तक पढ़ने का मन कर रहा है।
    आपने बहुत अच्छी समीक्षा लिखी है डॉ आशा जी। अच्छी पुस्तक लिखने के लिए डॉ जमुना जी को बहुत बहुत बधाई।

  2. आपकी समीक्षा पढ़कर मन सच में छू गया।
    आपने कहानियों के भाव को इतने सुंदर और संवेदनशील ढंग से लिखा है कि दिल को बहुत सुकून मिला।
    आपका लेखन प्रेरणा देता है।

    • समीक्षा को ध्यानपूर्वक पढ़ने के लिए और सकारात्मक विचार मंच पर रखने के लिए धन्यवाद।

  3. डॉ. आशा मैम, कहानियों के मूल संदेश को जिस खूबसूरती से आपने शब्दों में पिरोया है, वह सच में सराहनीय है। कक्षा में विद्यार्थियों को इस तरह की मूल्यवान कहानियाँ सुनाना आपकी एक बेहतरीन पहल है। हमें आप जैसी दूरदर्शी शिक्षिका पर गर्व है!

    • धन्यवाद। अपने विचार इस मंच पर उत्तम रूप में साझा किए। आप जैसे होनहार विद्यार्थियों को पाकर हम भी गौरवान्वित महसूस करते है।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest