Thursday, October 29, 2026
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पद, प्रतिष्ठा और चमचागीरी…

कुछ लोगों के नामों का उल्लेख किया गया था – जिनके ओहदे थे

बाकी सब इत्यादि थे

इत्यादि तादाद में हमेशा ही ज़्यादा होते थे….  राजेश जोशी

 हिंदी साहित्य के हर कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से होती है, मगर कार्यक्रम के अध्यक्ष और मुख्य अतिथि लक्ष्मीपति होते हैं। ये लक्ष्मीपति या तो धन-पशु हो सकते हैं या फिर चलते-फिरते पद, जैसे कि राजनीतिज्ञ या दूतावास के अधिकारी। किसी भी पदाधिकारी के साथ फ़ोटो खिंचवाकर साहित्यकार ऐसे धन्य होते दिखाई देते हैं, जैसे कुबेर का ख़ज़ाना हाथ लग गया हो।

निजी तौर पर भी देखा गया है कि साहित्यकार वही फ़ोटो सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, जिसमें वे किसी बड़ी हस्ती के साथ खड़े दिखाई देते हैं। एक ज़माना था, जब हिंदी साहित्य के कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा था कि “साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

नारद मुनि, वशिष्ठ ऋषि, ऋषि विश्वामित्र, द्रोणाचार्य आदि हमेशा सत्ता के गुण गाते रहे। वे तो सही मायने में सरस्वती के सच्चे पुजारी थे। फिर भी वे तमाम उम्र समर्थन के लिए सत्ता की ओर देखते रहे।

मुझे याद पड़ता है कि मुंबई में कहीं बात हो रही थी, तो एक मित्र ने बहुत गर्व से कहा था कि वह अमिताभ बच्चन को जानता है। इस पर दूसरे मित्र ने कटाक्ष किया था- “यह तो अच्छा है कि तुम अमिताभ बच्चन को जानते हो, मगर क्या अमिताभ बच्चन भी तुम्हें जानता है?”

दिखावा एक बहुत बड़ी बीमारी है। यदि देश का कोई मंत्री मुझे साहित्य अकादमी सम्मान दे, तो क्या इससे सम्मान का महत्त्व बढ़ जाएगा?

मुझे निजी तौर पर भारत में हिंदी के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मानों में से एक, ज्ञानपीठ पुरस्कार के समारोह में शामिल होने का अवसर मिला था। सम्मानित होने वाली साहित्यकार थीं उर्दू की लेखिका क़ुर्रतुलऐन हैदर। उन्हें पुरस्कार देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर ने कहा था, “राजनीति में होने का एक लाभ होता है कि स्वयं पढ़े-लिखे न होने पर भी आपको अवसर मिलता है कि आप पढ़े-लिखे लोगों को पुरस्कार दे सकें।”

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने ज़ाहिर है, उनका उपन्यास ‘आग का दरिया’ उपन्यास स्वयं नहीं पढ़ा होगा। उनके किसी सहायक ने उपन्यास और लेखिका पर कुछ लिख दिया होगा, जो उन्होंने मुख्य अतिथि के भाषण में पढ़ दिया होगा। मगर वे अपने दिल की बात भी उसमें जोड़ ही गए।

आज अंतर है तो केवल इतना कि आज के मुख्य अतिथि और अध्यक्ष, चाहे हिंदी का एक अक्षर भी न पढ़े हों, मंच पर अपना सत्कार करवाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।

जब हमने मुंबई में इंदु शर्मा कथा सम्मान की शुरुआत की, तो यह निर्णय लिया गया कि हम सम्मान समारोह में कभी भी किसी राजनीतिज्ञ को आमंत्रित नहीं करेंगे। पाँच वर्षों तक हमने इस सम्मान समारोह का आयोजन भारत में किया, मगर अपने नियम का कठोरता से पालन किया।

हमारे पहले मुख्य अतिथि थे डॉ. धर्मवीर भारती और अध्यक्ष थे जगदंबा प्रसाद दीक्षित। उसके बाद कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मनोहर श्याम जोशी, ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, गुलज़ार, कामतानाथ, कन्हैयालाल नंदन, गोविंद मिश्र आदि ने हमारे मंच को सुशोभित किया।

हमारी दर्शक दीर्घा में पुष्पा भारती, सूर्यबाला, सुधा अरोड़ा, जितेंद्र भाटिया, नंदकिशोर नौटियाल, विश्वनाथ सचदेव, राहुल देव, हरीश पाठक जैसे नाम शामिल रहते थे। सच तो यह है कि उस समय के तमाम हिंदी साहित्यकार एवं पत्रकार इंदु शर्मा कथा सम्मान समारोह का हिस्सा बनते थे।

सोशल मीडिया के आने के बाद से तो हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। कहीं कोई राज्यपाल या मुख्यमंत्री कतार में खड़े साहित्यकारों को सम्मान-पत्र या स्मृति-चिह्न बाँटता जा रहा है, कैमरामैन फ़ोटो खींचे जा रहा है और साहित्यकार फूले नहीं समा रहा है कि उसका चित्र एक बड़ी राजनीतिक हस्ती के साथ खिंच गया।

बेचारे की स्थिति दयनीय तब हो जाती है, जब उसके अपने ही परिवार के लोग पहचान नहीं पाते कि वह हस्ती है कौन, जिसके हाथों पुरस्कार पाकर लेखक धन्य हुआ जा रहा है।

किसी भी साहित्योत्सव की सफलता तभी मानी जाती है, जब उसके उद्घाटन और समापन सत्र में बड़े कद के राजनीतिज्ञ मंच की शोभा बढ़ाएँ। यानी कि साहित्य को सत्ता का आश्रय तो चाहिए ही।

दूसरी तरफ़ कहा जाता है कि साहित्य का काम सरकार की ग़लतियाँ बताना है, तारीफ़ करना नहीं। यानी कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध हम अपना साहित्य रच रहे हैं, उसी से सम्मान और पुरस्कार पाकर हम धन्य हो रहे हैं।

विदेशों में तो हालत और भी ख़राब है। वहाँ की स्थानीय संस्थाएँ सहयोग के लिए भारतीय दूतावास या उच्चायोग की ओर देखती हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मामले में कोई नीति या नियम तय नहीं किए हैं कि हिंदी संस्थाओं के साथ दूतावास या उच्चायोग किस स्तर तक सहयोग कर सकते हैं या फिर करना चाहिए। मगर स्थानीय संस्थाएँ दूतावास और उच्चायोग के अधिकारियों की उपस्थिति के बिना अपने आपको यतीम-सा महसूस करती रहती हैं।

यदि आयोजन दूतावास में हो जाता है, तो साहित्यकार या साहित्यिक संस्थाएँ सातवें आसमान पर पहुँच जाती हैं। उस कार्यक्रम का मुख्य बिंदु बन जाता है राजदूत अथवा उच्चायुक्त के साथ फ़ोटो खिंचवाना। यदि राजदूत के हाथ में साहित्यकार की किताब भी हो, तो वह सोने पर सुहागा वाली बात हो जाती है। कई बार तो यह सोचकर दया आती है कि लेखक स्वयं को इतना बेचारा क्यों महसूस करने लगता है।

ऐसा भी देखा गया है कि विदेशों में हिंदी की संस्थाएँ और लेखक दूतावास को ईमेल करते हैं, तो उसका जवाब नहीं मिलता। निजी रिश्तों के आधार पर हिंदी साहित्य को आँका जाता है। दूतावास का मंत्री-समन्वय (जो कि एक आई.पी.एस. अधिकारी होता है) तय करता है कि किस संस्था के साथ कैसे संबंध रखने हैं या किस लेखक को हाशिए पर छोड़ना है। उनके आदेशानुसार ही निमंत्रण सूची तैयार की जाती है कि दूतावास के आयोजनों में किन हिंदी लेखकों को बुलाया जाना है।

लंदन इस मामले में भाग्यशाली शहर कहा जा सकता है कि यहाँ नेहरू सेंटर में गिरीश कार्नाड, पवन वर्मा, संगीता बहादुर और अमीश त्रिपाठी जैसी साहित्यिक विभूतियाँ निदेशक के पद पर विराजमान रहीं। उनके हाथों से सम्मान पाना अच्छा लगता था, क्योंकि वे राजनयिक से बढ़कर स्वयं महत्त्वपूर्ण लेखक थे।

वहीं उच्चायोग में भी विकास स्वरूप जैसे बड़े नाम कुछ वर्षों तक कार्यरत रहें। हमारे कुछ हिंदी अधिकारी तो अपने आप में पूरे साहित्यकार रहे हैं, जिनमें अनिल जोशी, तरुण कुमार और वर्तमान हिंदी एवं संस्कृति अधिकारी अनुराधा पांडेय के नाम शामिल हैं।

मगर समस्या यहाँ भी वही है कि हम उनसे साहित्यकार के रूप में सम्मानित होने की तुलना में उच्चायोग के अधिकारी से सम्मानित होने पर अधिक प्रसन्न दिखाई देते हैं।

आजकल जब कभी किसी हिन्दी भाषा एवं साहित्य के कार्यक्रम में शामिल होते हैं, तो मंत्री, सांसद, उच्चायुक्त, राजदूत, कुलपति आदि जो भाषण पढ़ते हैं वो उन्होंने स्वयं नहीं लिखा होता। उसे लिखते हैं हिन्दी अधिकारी… किसी-किसी मामले में हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी। आजकल तो वे भी ज़हमत नहीं उठाते और सीधे-सीधे कृत्रिम बौद्धिकता से लिखवा लेते हैं। पद पर आसीन व्यक्ति तो बस आ कर पढ़ देता है। यानी कि आज के युग में हिन्दी पर भाषण लिखने में हिन्दी अधिकारी से बेहतर कोई और नहीं। कई बार तो यहां तक देखा जाता है कि पदासीन व्यक्ति को भाषण मंच पर बैठे हुए मिलता है… बेचारे को ठीक से रियाज़ करने का अवसर भी नहीं मिलता।

अगले दिन के समाचारपत्रों में भी पदों पर बैठे लोगों का वक्तव्य ही हैडलाइन बन कर प्रकाशित होता है। दीन-हीन साहित्यकार  इस प्रेस कवरेज में भी इत्यादि बना रहता है… उसका कोई ज़िक्र नहीं होता।

मुझ से सवाल किया जा सकता है कि ऐ संपादक महोदय, दूसरों को नसीहत दे रहे हो, मगर एक साहित्यकार के रूप में तुम स्वयं क्या करते रहे हो?

यह सच है कि मैं भी ब्रिटेन की महारानी, भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों द्वारा सम्मानित हुआ हूँ। उनमें साहित्यिक व्यक्ति एक ही था- पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी।

वहीं यह भी सच है कि ये तमाम सम्मान मुझे दूसरी संस्थाओं ने दिए। उन समारोहों के आयोजन में मेरा कोई दख़ल नहीं था।

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