हमें कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी के व्यवहार से ऐसा महसूस होता है कि ये दोनों राहुल गाँधी के मित्र नहीं हैं और उनका भला नहीं चाहते हैं। दोनों उन्हें गुमराह करने में लगे हैं। यह संभव ही नहीं है कि दोनों को इस बात की जानकारी नहीं है कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से कैसे हटाया जा सकता है। इसके बावजूद वे राहुल गाँधी को अराजकता की गलत राह पर डाल रहे हैं। पूरे लाव-लश्कर के साथ राहुल गाँधी और विपक्षी नेताओं को सुप्रीम कोर्ट पर हल्ला बोलने के लिए भेज देते हैं और याचिका में चौदह गलतियाँ कर देते हैं।
राहुल गाँधी को यह बात कोई नहीं समझा पाया कि वे भारतीय संसद की लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। उनका व्यवहार उसके अनुकूल होना चाहिए और जो भी मुद्दे वे उठाना चाहते हैं, उन्हें संसद में नियमों के तहत उठाएँ। यह चिंता का विषय है कि विपक्ष के नेता के तौर पर उनके मन में संसद का कोई सम्मान नहीं है और न ही वे संसदीय कार्यप्रणाली में विश्वास रखते हैं। यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
‘पुरवाई’ के पाठक भी अवश्य जानना चाह रहे होंगे कि क्या सड़कों पर किए जा रहे प्रदर्शनों से मुख्य चुनाव आयुक्त को त्यागपत्र देने के लिए मजबूर किया जा सकता है। क्या किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को उसके पद से हटाया जा सकता है? यदि हाँ, तो फिर उसकी प्रक्रिया क्या हो सकती है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाए जाने के विरुद्ध संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। उन्हें हटाने के लिए दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित करना आवश्यक है और संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत का होना भी अनिवार्य है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की सख्त प्रक्रिया लगभग वैसी ही है, जैसी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाती है। जैसा कि बताया जा चुका है, इसके लिए आधार भी सीमित हैं।
टी. एन. शेषन के दौर से लेकर 2009 के नवीन चावला विवाद और मतदाता सूची को लेकर चल रही मौजूदा बहस तक, चुनाव आयोग का इतिहास संस्थागत स्वतंत्रता और राजनीतिक दबाव को लेकर बार-बार पैदा होने वाले तनावों की एक लंबी दास्तान है।
भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है। यह संसद के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। नियुक्ति के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त की सेवा की शर्तों में भी उनके नुकसान के लिए कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है।
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आयोग की स्वतंत्रता आवश्यक है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को, जो इस संस्थान के प्रमुख हैं, विशेष रूप से मजबूत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। इस मुद्दे को लेकर राहुल गाँधी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं, जिस पर बहुत से लोगों ने अपने विचार रखे हैं। सुप्रीम कोर्ट को भी यह बात बहुत बुरी लगी कि राहुल गाँधी और उनकी पूरी टीम सुप्रीम कोर्ट में नारे लगाती हुई पहुँच गई, जबकि उनके वकील पहले ही याचिका पंजीकृत करवा चुके थे।
वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा, “राहुल गाँधी ने इस विरोध प्रदर्शन का यह कहकर बहुत नुकसान किया है कि उनका मुख्य उद्देश्य तो वर्तमान सरकार को गिराना है। भारत में सरकारें बदलने का केवल एक ही तरीका है और वह है चुनाव। यह नहीं हो सकता कि आप लोकतंत्र और संविधान के लिए लड़ रहे हों, मगर उसके लिए अलोकतांत्रिक एवं असंवैधानिक तरीकों का इस्तेमाल करें।”
वैसे तो यह संभव ही नहीं कि कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी को इस बात का ज्ञान न हो कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया क्या है। उनका यह कर्तव्य था कि वे विपक्ष के नेता को भी यह सूचित कर देते कि सड़कों पर अराजकता फैलाने से किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को नहीं हटाया जा सकता।
हाँ, राहुल गाँधी के अब तक के रवैये से साफ जाहिर होता है कि उन्होंने कभी अपने संवैधानिक पद को गंभीरता से नहीं लिया। वे अपनी बातचीत और प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भी गली-मोहल्ले वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि संवैधानिक प्रक्रिया अपनाए बिना मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटाया जा सकता।
‘पुरवाई’ के पाठक भी संभवतः इस प्रक्रिया से परिचित नहीं होंगे। इसलिए हम आप सबके साथ यह प्रक्रिया साझा करते हुए यह स्पष्ट कर देना चाहेंगे कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके संवैधानिक पद से नहीं हटा सकते। इसके लिए प्रक्रिया कुछ इस प्रकार है-
सबसे पहला कदम: प्रस्ताव की शुरुआत: आधार बताने वाले एक नोटिस या प्रस्ताव पर लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए। इसे लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को सौंपा जाना चाहिए।
इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति उस नोटिस की जाँच करते हैं और तय करते हैं कि इसे स्वीकार किया जाए या खारिज कर दिया जाए। वे अपना निर्णय इस आधार पर लेते हैं कि क्या प्रथम दृष्टया कोई मामला बनता है या नहीं।
यदि इसे स्वीकार कर लिया जाता है, तो जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है। इसमें आमतौर पर निम्नलिखित सदस्य शामिल होते हैं- भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट के कोई न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, कानून का एक प्रतिष्ठित विशेषज्ञ।
यह समिति आरोपों की जाँच करती है। इसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया जाता है और मुख्य चुनाव आयुक्त को अपना बचाव करने का अधिकार भी दिया जाता है। समिति साक्ष्यों एवं गवाहों की जाँच करती है और अपनी रिपोर्ट सौंपती है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यदि दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस जमा किए जाते हैं, तो समिति का गठन दोनों सदनों में नोटिस स्वीकार किए जाने के बाद ही किया जाता है।
यदि समिति आरोपों को सही पाती है, तो संसद के दोनों सदनों में इस प्रस्ताव पर विचार किया जाता है। इसे एक ही सत्र में दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित करना आवश्यक होता है। इसके लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
एक बार जब दोनों सदन इस प्रस्ताव को पारित कर देते हैं, तो इसे भारत के राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है, जो पद से हटाने का औपचारिक आदेश जारी करते हैं।
दो अन्य परिस्थितियाँ भी हो सकती हैं, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद से हट सकते हैं। पहली, यदि वे स्वयं त्यागपत्र दे दें, और दूसरी, जब वे 65 वर्ष की आयु पूरी करने पर सेवानिवृत्त हो जाएँ।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अन्य चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों को राष्ट्रपति केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर ही हटा सकते हैं। उन्हें संसद की उसी प्रक्रिया या विशेष बहुमत वाले संवैधानिक संरक्षण का लाभ नहीं मिलता है।
इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना बहुत कठिन होता है। आज तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को इस प्रक्रिया का पालन करके पद से नहीं हटाया जा सका है। शायद यही कारण हो सकता है कि कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी राहुल गाँधी को संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी करके अराजकता का पाठ पढ़ा रहे हैं।

पुरवाई के पाठक बहुत भाग्यवान है कि उन्हें समीचीन मुद्दों की सटीक जानकारी सप्ताहांत दी जाती है। वर्तमान संदर्भ में, भारत में पक्ष- विपक्ष के बीच एक संघर्ष चल रहा है। जिसेअराजकता, भीड़ – तंत्र या जब विरोधी ,,, कुछ भी कहा जा सकता है। ऐसे में तटस्थ भाव से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने जैसे यक्ष प्रश्न को संवैधानिक परिपेक्ष्य में रखकर उसकी औचित्यपूर्ण तर्कपूर्ण और सरल व्याख्या करके उसे आम जन को बताना ,पत्रकार जगत का अनिवार्य कर्तव्य है।
संपादकीय विपक्ष में दशकों दशक रहे जनों को भी रेखांकित करके प्रत्यक्ष रूप से उन्हें बता और जता रहा है कि नेता प्रतिपक्ष को सही जानकारी नहीं दी जा रही है।इस से लोकतंत्र की छवि धूमिल हो रही है।व्यापार,कार्य संस्कृति,रोजगार ,धन अर्जन और देश की शांति और कानून व्यवस्था पंगु हो सकती थी जिसे सक्षम निज़ाम से बचा लिया गया है।
बोल्ड स्पष्ट और समीचीन संपादकीय हेतु बधाई हो।
भाई सूर्य कांत जी, आपकी टिप्पणी विमान में बैठा पढ़ रहा हूं। विमान उड़ान भरने ही वाला है। अनूठा अनुभव।
इस सम्पादकीय के लिए बहुत बधाई साधुवाद आपको। नेता प्रतिपक्ष को इतनी जानकारी नहीं है, बस चल दिये प्रदर्शन करने।
बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं घट रही हैं। मुझे लगता है इन्हीं के सलाहकार अब इनसे छुटकारा चाहते हैं। पर नहीं, राहुल जी को अपने पद पर बने रहना चाहिये लम्बे समय तक।
निर्देश आपकी टिप्पणी हमारे लिये बहुत विशेष है।
मैं इस पोस्ट पर अपनी भी प्रतिक्रिया लिखना चाहता था, परंतु आपकी टिप्पणी देखकर मुझे लगा कि और कोई नयी प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता ही नहीं है।केवल आप से सहमति जताते हुए, आपका भी आभार व्यक्त करना चाहिए। आपने जो भावना लिखी है वही भावनाएं मेरे मन में भी हैं।
भाई अशोक जी, दिल से शुक्रिया आपको।
बहुत ही कम शब्दों में बड़ी बात और सच्चाई
से सादगी से लिखने की कला ईश्वर ने आपको दी है साधुवाद भ्राता श्री
कपिल भाई बहुत बहुत शुक्रिया।
सादर नमस्कार सर…
देश की ऐसी स्थिति कल्पना में नहीं आई थी… सत्य ही साथ दे… जिस अंधकार में धीरे धीरे देश की युवा लीन होती जा रही है… शीघ्र ही यह अंधकार अदृश्य हो जाए…
कभी भी नैतिक थे नहीं ये लोग… तो आशा भी क्या करना…सबको सबकुछ पता है…
समय ही बलवान है…. निर्णय समय पर छोड़ देते हैं….
धन्यवाद इस संपादकीय के लिए…
अनिमा जी, इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये मन से धन्यवाद।
हमने यह स्कूल में और कॉलेज में राजनीति शास्त्र में ही पढ़ा हुआ है उनको हटाने की प्रक्रिया कैसे हटा सकते हैं! जो विदेशों में पढ़ें हैं उन्हें नहीं पता होगा! क्या कर सकते हैं! देश में अराजकता फैली हुई है जो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।
आपसे सहमत आदरणीय भाग्यम जी।
आदरणीय
नमस्कार
कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंधवी कभी व्यवस्था के नहीं हुए अर्थात जब भी जो सरकारों के ख़िलाफ़ रहा वे उसके साथ हो लिए इस बात की फंडिंग विदेशों से होती रही है और भारत में वकालत की फीस तो मिलेगी ही ।
हमारे प्रदेश में दिग्विजय सिंह को निबटाने में भी दोनों की सलाहें रहीं बाकी विवेक तनखा तो हैं ही ।इन्हें देश से कोई मतलब नहीं ।
Dr Prabha mishra
सही कहा आपने प्रभा जी।
राहुल गाँधी यह कहते नहीं थकते कि “देश का लोकतंत्र खतरे में है, हमारे संविधान के साथ छेड़-छाड की जा रही है।”आपके सम्पादकीय से तो यह पता चलता है कि वह जानते ही नहीं कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया क्या है? वह क्या हमें भी पूरी प्रक्रिया का पता आपसे ही चला है। भाई सूर्य कांत शर्मा जी ने बिल्कुल सही कहा है कि “ पुरवाई के पाठक भाग्यवान हैं जो उन्हें समीचीन मुद्देों पर सटीक जानकारी सप्ताहांत मिल जाती है।”मैं उनकी इस बात से पूर्णतया सहमत हूँ । आप ने फ़्लाइट में बैठ कर इतनी महत्वपूर्ण जानकारी हम तक पहुँचाई है। आपकी प्रतिबद्धता को नमन एवं साधुवाद तेजेंद्र जी।
सुदर्शन जी आपने कहा है कि – आप ने फ़्लाइट में बैठ कर इतनी महत्वपूर्ण जानकारी हम तक पहुँचाई है। आपकी प्रतिबद्धता को नमन एवं साधुवाद तेजेंद्र जी। – यह हमारे लिये किसी पुरस्कार से कम नहीं। हार्दिक आॉभार आपका।
बहुत सार्थक लिखा है sir. सच में संवैधानिक नियमों का ज्ञान होना कितना आवश्यक है l इस तरह के प्रदर्शन से देश की छवि कितनी धूमिल हो रही है, हमे यह भी समझने की ज़रूरत है l जिम्मेदार पद पर रहते हुए पद की गरिमा का ध्यान रखना हर नागरिक का कर्तव्य होना चाहिए l
आपने संपादकीय की आत्मा के सही पकड़ा है चैताली जी।
नमस्कार आज का संपादकीय बहुत जटिल है । मेरा भारत की किसी भी राजनैतिक दल या नेता से कोई लेना देना नहीं है। इसलिए यह विचार केवल मेरे है। किसी दूसरे का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वहाँ चुनाव समय पर होते हैं, सरकारें बनती और बदलती हैं अथवा संसद की कार्यवाही नियमित रूप से चलती है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि वहाँ सत्ता से प्रश्न पूछने की कितनी स्वतंत्रता है, असहमति को कितना सम्मान मिलता है और संवैधानिक संस्थाएँ अपने दायित्वों का निर्वहन कितनी निष्पक्षता से करती हैं। लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि उस बहुमत को भी संवैधानिक मर्यादाओं में बाँधने वाली व्यवस्था है। इसी प्रकार विपक्ष केवल सत्ता का विरोध करने वाला राजनीतिक समूह नहीं, बल्कि जनता की ओर से सत्ता से जवाब माँगने वाली एक महत्त्वपूर्ण लोकतांत्रिक संस्था है।
‘पुरवाई’ में प्रकाशित यह संपादकीय इसी व्यापक विमर्श के एक संवेदनशील और विवादास्पद पक्ष को सामने रखता है। इसमें राहुल गाँधी के राजनीतिक व्यवहार, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी की भूमिका, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया तथा संसद और सर्वोच्च न्यायालय के प्रति राजनीतिक नेतृत्व के उत्तरदायित्व पर प्रश्न उठाए गए हैं। संपादकीय की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह राजनीतिक उत्तेजना के बीच पाठकों का ध्यान संविधान की ओर आकर्षित करता है। लेकिन इसकी कुछ टिप्पणियाँ ऐसी भी हैं, जिन पर लोकतांत्रिक निष्पक्षता और तार्किक विवेक के आधार पर पुनर्विचार आवश्यक है।
संविधान की जानकारी केवल कानूनविदों का विशेषाधिकार नहीं, जागरूक नागरिकता की अनिवार्य शर्त है। किसी भी संवैधानिक पद की शक्तियों और सीमाओं को समझे बिना उस पद के विरुद्ध जनाक्रोश पैदा करना जितना अनुचित हो सकता है, उतना ही अनुचित किसी संवैधानिक संस्था को आलोचना से परे मान लेना भी है। लोकतंत्र में न तो राजनीतिक नेतृत्व को निरंकुश होने की छूट है और न ही संवैधानिक संस्थाओं को जनविश्वास के प्रश्नों से बच निकलने का विशेषाधिकार।
संविधान की मर्यादा और विरोध का अधिकार
मुख्य चुनाव आयुक्त का पद भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला से जुड़ा हुआ है। चुनाव केवल मतपत्रों पर अंकित विकल्पों का गणित नहीं, बल्कि नागरिक की राजनीतिक इच्छा की अभिव्यक्ति हैं। मतदाता जब अपने मताधिकार का प्रयोग करता है, तब वह केवल किसी प्रत्याशी को नहीं चुनता, बल्कि शासन की वैधता निर्धारित करने वाली प्रक्रिया में भाग लेता है। इसलिए चुनाव कराने वाली संस्था की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर कोई भी संदेह स्वाभाविक रूप से व्यापक सार्वजनिक चिंता का विषय बन जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का दायित्व सौंपता है। इसी अनुच्छेद के खंड (5) के अंतर्गत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान कठोर संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित की गई है। प्रमाणित दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। इसके बाद राष्ट्रपति पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं। यह व्यवस्था किसी व्यक्ति को निरंकुश बनाने के लिए नहीं, बल्कि चुनाव आयोग को सत्तारूढ़ सरकार के मनमाने हस्तक्षेप से सुरक्षित रखने के लिए है।
इस संवैधानिक व्यवस्था का महत्त्व निर्विवाद है। यदि किसी सरकार को चुनाव परिणामों या आयोग के निर्णयों से असहमति होने मात्र पर उसके प्रमुख को पद से हटाने की स्वतंत्रता मिल जाए, तो स्वतंत्र चुनाव की अवधारणा ही संकट में पड़ सकती है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। यदि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न उठें, तो उन प्रश्नों का उत्तर देना, तथ्यों को स्पष्ट करना और आवश्यक जाँच के लिए उपयुक्त व्यवस्था सुनिश्चित करना भी लोकतांत्रिक संस्थाओं के दायित्व का हिस्सा है।
यहीं एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है, किसी पदाधिकारी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया और उसके कामकाज की आलोचना करने का लोकतांत्रिक अधिकार दो अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति को पद से हटाना कठिन बनाया गया है, परंतु उसके निर्णयों पर प्रश्न उठाना असंभव नहीं बनाया गया। संवैधानिक संरक्षण का अर्थ आलोचना से मुक्ति नहीं, बल्कि मनमाने निष्कासन से सुरक्षा है।इसलिए राहुल गाँधी अथवा किसी अन्य विपक्षी नेता द्वारा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना अपने आप में असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। उन प्रश्नों की विश्वसनीयता का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों, तथ्यों और संबंधित प्रक्रियाओं के आधार पर होना चाहिए। आरोप प्रमाण का विकल्प नहीं हैं, लेकिन आरोपों को केवल इसलिए निरर्थक भी नहीं माना जा सकता कि उन्हें राजनीतिक विपक्ष ने उठाया है।
संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता किसी एक व्यक्ति के पद पर बने रहने से ही सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उसके निर्णयों की निष्पक्षता, कार्यप्रणाली की पारदर्शिता और शिकायतों के प्रति उसके उत्तरदायित्व से निर्मित होती है।
यहाँ यह भी समझना चाहिए कि किसी पदाधिकारी को हटाने की माँग करना और किसी पदाधिकारी के विरुद्ध संवैधानिक रूप से पर्याप्त आधार सिद्ध करना एक समान नहीं हैं। राजनीतिक असंतोष अपने आप में पद से हटाने का कानूनी आधार नहीं बनता। दूसरी ओर, यदि गंभीर आरोपों के समर्थन में विश्वसनीय साक्ष्य हों, तो उन्हें निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के समक्ष रखना लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का हिस्सा है।
अर्थात् संविधान न तो राजनीतिक आरोपों को स्वतः सत्य मानता है, न ही किसी संस्था को प्रश्नों से परे रखता है। वह तथ्यों, प्रक्रिया और प्रमाण के आधार पर निर्णय लेने की व्यवस्था देता है।
पत्रकारिता: पक्षधरता नहीं, विवेक की कसौटी
‘पुरवाई’ के संपादकीय पर विचार करते हुए पत्रकारिता की भूमिका पर चर्चा करना भी आवश्यक है। संपादकीय किसी समाचार की निष्पक्ष पुनरावृत्ति मात्र नहीं होता। उसमें लेखक के विचार, विश्लेषण और मूल्यांकन के लिए पर्याप्त स्थान होता है। फिर भी संपादकीय की विश्वसनीयता इस बात से बढ़ती है कि वह अपने विचारों के समर्थन में तथ्य प्रस्तुत करे और असहमति के पक्ष को भी समझने का प्रयास करे।
राजनीतिक ध्रुवीकरण के समय पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह पाठकों की पहले से बनी धारणाओं को केवल पुष्ट करने का माध्यम न बन जाए। यदि किसी नेता की आलोचना की जा रही है, तो आलोचना के आधार स्पष्ट होने चाहिए। यदि किसी संस्था का बचाव किया जा रहा है, तो उसके निर्णयों और आचरण का भी वस्तुनिष्ठ परीक्षण होना चाहिए। यदि किसी राजनीतिक सलाहकार की भूमिका पर प्रश्न उठाया जा रहा है, तो उसकी मंशा के बारे में निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके तर्कों और कार्यों की समीक्षा की जानी चाहिए।तथ्य और मत के बीच अंतर पत्रकारिता की बुनियादी कसौटी है। उदाहरण के लिए, यह कहना कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में विशेष बहुमत आवश्यक है, एक संवैधानिक तथ्य है। इसके विपरीत यह कहना कि किसी नेता के सलाहकार जानबूझकर उसे गलत रास्ते पर ले जा रहे हैं, एक व्याख्या या आरोप है, जिसके समर्थन में स्वतंत्र प्रमाण अपेक्षित हैं।
दोनों को एक ही स्तर पर प्रस्तुत करने से पाठक के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि कौन-सी बात कानून पर आधारित है और कौन-सी लेखक की राजनीतिक धारणा। एक जिम्मेदार संपादकीय इन दोनों के बीच स्पष्ट रेखा खींचता है।
इसी तरह राहुल गाँधी की भाषा या उनके सार्वजनिक व्यवहार पर आलोचना की जा सकती है, लेकिन आलोचना का उद्देश्य व्यक्ति को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक आचरण का मूल्यांकन होना चाहिए। सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा सभी दलों और नेताओं पर समान रूप से लागू होती है। लोकतांत्रिक संस्कृति तभी परिपक्व होती है, जब हम अपने पसंदीदा नेताओं के लिए भी वही कसौटी अपनाएँ, जिसकी अपेक्षा हम उनके विरोधियों से करते हैं।
लोकतंत्र की असली परीक्षा लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा तब होती है, जब कोई संस्था विवादों के केंद्र में आ जाए और राजनीतिक पक्ष एक-दूसरे के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाने लगें। ऐसे समय में नागरिकों को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि कौन-सा नेता सही है और कौन गलत; उन्हें यह भी पूछना चाहिए कि उपलब्ध प्रमाण क्या हैं, कानून क्या कहता है, जाँच का उचित मंच कौन-सा है और जवाबदेही सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी तरीका क्या हो सकता है।
विपक्ष यदि चुनावी प्रक्रिया पर प्रश्न उठाता है, तो उसे प्रमाणों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। चुनाव आयोग यदि उन आरोपों को निराधार मानता है, तो उसे अपने उत्तर में तथ्य और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए। संसद को गंभीर संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा का अवसर देना चाहिए, और न्यायपालिका को उसके समक्ष प्रस्तुत मामलों का निर्णय कानून के आधार पर करना चाहिए। इनमें से कोई भी पक्ष लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं है।
राजनीतिक नेतृत्व की परिपक्वता इस बात से नहीं आँकी जा सकती कि वह कितनी बार सड़क पर उतरता है या कितने तीखे शब्दों में सरकार की आलोचना करता है। उसकी परिपक्वता इस बात में दिखाई देती है कि वह अपने आरोपों को प्रमाण में, जनाक्रोश को रचनात्मक दबाव में और राजनीतिक विरोध को संस्थागत सुधार की दिशा में कितना बदल पाता है।
इसी प्रकार किसी सरकार की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि वह विरोध प्रदर्शनों को अनुमति देती है या नहीं। उसकी वास्तविक परीक्षा इस बात में है कि वह आलोचना का उत्तर किस प्रकार देती है, स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता की रक्षा कैसे करती है और नागरिकों के अधिकारों के प्रति कितनी संवेदनशील रहती है।
लोकतंत्र को केवल विपक्ष की मर्यादा की आवश्यकता नहीं होती; उसे सत्ता की विनम्रता, संस्थाओं की निष्पक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की निर्भीकता भी चाहिए। इन सभी के बीच संतुलन बिगड़ने पर संवैधानिक व्यवस्था का बाहरी ढाँचा भले बना रहे, उसके भीतर नागरिक विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।
अंत में मैं कहना चाहूँगी की संविधान किसी पक्ष का नहीं, पूरे राष्ट्र का है।
इस संपादकीय का मूल संदेश, कि संवैधानिक पदों से जुड़े विवादों का समाधान संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर खोजा जाना चाहिए, निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है। राजनीतिक नेतृत्व को अपने पद की गरिमा समझनी चाहिए, वरिष्ठ अधिवक्ताओं को अपनी कानूनी सलाह के प्रभाव के प्रति सजग रहना चाहिए और विपक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए। साथ ही, संवैधानिक संस्थाओं को भी अपने कार्यों के माध्यम से जनता का विश्वास अर्जित करते रहना चाहिए।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे-नीदरलैंड
ऋतु, आप जिस तरह खुल कर संपादक के सामने अपनी बात रख पाती हैं, वही पुरवाई की लोकतत्रीय परंपरा का सुबूत है। इसी तरह अपनी बात साफ़गोई से रखती रहें।
तेजेन्द्र भाई: भारत के राष्ट्रपिता कहलाने वाले गान्धी की महरबानी और धोखे से बने प्रधान मन्त्री नेहरू और नेहरू के ख़ान्दान के राहुल गान्धी (जिनका अपना नाम भी शायद इनको पता न हो और जिन्हें ज़िन्दगी में कामयाब होने के लिए गान्धी नाम का वरदान भी इन्हीं राष्ट्रपिता की देन है) के लिए ‘खिस्यानी बिल्ली खम्बा नोचे’ वाली कहावत एकदम ठीक बैठती है। यही राहुल बाबा जब प्रधान मन्त्री तो नहीं बन पाए तो कुर्सी के लिए ‘एक से बढ़कर एक’ सारे हथकण्डे अपना लिए। जब सब चालों में मात मिलती गई तो जगदगुरू कपिल सिब्बल और मनु सिंघवी की शरण में जाकर गुहार लगाई। वहाँ से मिले गुरूमन्तर ‘चढ़ जा बेटा सूली पर और भली करेंगे राम’ के आदेश अनुसार सुप्रीम कोर्ट पर जाकर मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाना का आदेश दिया। यहाँ कुछ ऐसा लगता है कि जब इन दोनों गुरूओं ने भारत की सुप्रीम कोर्ट पर हल्ला बोलने का आशीर्वाद दिया था तो शायद उन समय दोनों ने चिलम का सुट्टा लगा रखा होगा और इसी सुट्टे की मदहोशी में वो यह बात भूल गए कि भारत के संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के कुछ नियम होते हैं और सुप्रीम जाकर शोर मचाने से कुछ भी हाथ नहीं आने वाला।
क्योंकि भारत का प्रधान मन्त्री बनना तो राहुल गान्धी का जन्मसिद्ध अधिकार है तो उनके लिए ‘साम’, ‘दाम’, ‘दण्ड’, ‘भेद’ का प्रयोग करना एकदम जायज़ है। ऐसा सुनने में आया है कि अब इन महाश्य ने भारत की ‘रिजीम चेंज’ करने का आन्दोलन शुरू कर दिया है।
विजय भाई आपने अपने दिल की बात सही ढंग से सब तक पहुंचाई… यही तो है पुरवाई।
आपने बहुत स्पष्ट तरीके से बता दिया है कि सीईसी को हटाने की वैधानिक प्रक्रिया क्या है। क्या एसओपी को इतनी भी जानकारी नहीं है? एकदम है। फ्रस्ट्रेटेड आदमी छलबल से अपनी पर उतारु हो जाता है। वही महानुभाव कर रहे हैं। एकदम टपोरी की तरह। लफंगे जैसा। क्या यह व्यक्ति भारत के प्रधानमंत्री पद के लायक है?
अब तो सारे आंदोलन की हवा निकल गयी है जबसे इनकी मंशा उजागर हुई है। ये बेहूदे सशस्त्र क्रांति से भारत में सत्ता पलट करना चाहते थे। और यह भारत सरीखे संप्रभु देश में संभव नहीं। यह बांग्लादेश और नेपाल नहीं है। उमर खालिद की अनुगामिनी और बांग्लादेश देश विप्लव से प्रेरित नेहा बोरा और प्रशांत भूषण सरीखे राष्ट्रद्रोहियों की दाल गलने वाली नहीं। सारा आंदोलन भीगी फुलझड़ी सा फुस्स हो गया। ठोको ताली ☺️
अरविंद भाई, आपकी सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिये दिल से शुक्रिया।