फ़्रांस में शिक्षा बजट में कटौती हुई तो विद्यार्थी सड़कों पर उतर आए। सितंबर के अंत से पूरे फ़्रांस में छात्र शिक्षा के लिए अपर्याप्त धन के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और कई उच्च विद्यालयों तक पहुँच को अवरुद्ध कर रहे हैं।
कुछ जगहों पर यह आंदोलन हिंसक हो गया है। सैकड़ों छात्र, शिक्षक और पुलिस अधिकारी घायल हुए हैं। हज़ारों लोगों को, जिनमें बाहर से आए अज्ञात संख्या में उपद्रवी भी शामिल हैं, गिरफ़्तार किया गया है। प्रदर्शनकारी देश के हाई स्कूलों और सेकेंडरी स्कूलों में कर्मचारियों की कमी और जर्जर सुविधाओं की शिकायत कर रहे हैं। इन स्कूलों में 15 से 18 वर्ष की आयु के छात्र पढ़ते हैं।
पेरिस की एक छात्रा मदालेना के अनुसार, “कभी-कभी हमारे शिक्षक कई हफ़्तों तक अनुपस्थित रहते हैं और उनकी जगह किसी को नहीं रखा जाता।” वर्तमान प्रदर्शनों में पूरे फ़्रांस में सैकड़ों हज़ार लोग सड़कों पर उतर आए हैं। मदालेना ने आगे कहा कि हाल की गर्मी की लहरों के दौरान उनके स्कूल की इमारतें “बेहद गर्म” थीं।
फ़्रांस के हिंसक दंगों में भारत के वर्तमान दंगों की झलक महसूस की जा सकती है। फ़्रांस में विद्यार्थियों ने आंदोलन शुरू किया और धीरे-धीरे उसके साथ राजनीतिक एवं अराजक तत्व जुड़ते गए और शांत आंदोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया।
यही भारत में हुआ कि आंदोलन युवाओं ने शुरू किया और अब राजनीतिक दल एवं गुंडा तत्व उसे हाइजैक कर गए हैं। दरअसल, भारत में तो राजनीतिक दलों को इस बात का भी डर रहता है कि कहीं कोई दूसरा दल या जमात उनसे आगे न निकल जाए। सबको अपने-अपने अस्तित्व की चिंता लगी रहती है। भाषा की मर्यादा तो कब की चूर-चूर हो चुकी है।
शुरुआत भारत में भी पेपर लीक होने से हुई थी और अब उसके साथ अन्य मुद्दे जुड़ते जा रहे हैं। चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बारे में अलग से एक संपादकीय लिखना होगा… इसलिए फ़िलहाल उस बारे में अधिक चर्चा नहीं।
‘पुरवाई’ पत्रिका के लिए यह चिंता का एक और विषय है, जो ब्रिटेन के शिक्षा जगत से जुड़ा है। पिछले सात वर्षों में लंदन में नब्बे से अधिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं। इसका कारण बताया गया है – “विद्यार्थियों की संख्या में लगातार गिरावट!”
ध्यान देने लायक बात यह भी है कि इनमें सरकारी एवं निजी, दोनों प्रकार के स्कूल शामिल हैं, जिनके दरवाज़ों पर ताला जड़ दिया गया है। थोड़ी हैरानी यह सोचकर अवश्य होती है कि ब्रिटेन की संसद में इतने गंभीर विषय को लेकर भी कोई हंगामा नहीं हुआ… और न ही सड़कों पर जेन ज़ी का कोई आंदोलन हुआ।
लंदन काउंसिल्स की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल बंद करने को लेकर लंबी बातचीत की वजह से परिवार महीनों तक उलझन में रहते हैं और उन्हें समझ नहीं आता कि वे नए स्कूल में जगह तलाशें या नहीं। वहीं, स्टाफ़ को भी यह स्पष्ट नहीं होता कि वे नई नौकरी ढूँढ़ें या नहीं।
सवाल यह है कि स्कूल क्यों बंद हो रहे हैं? निजी स्कूल क्षेत्र को एक साथ कई तरफ़ से भारी आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। फ़ीस पर वैट के अलावा स्कूलों की ट्यूशन फ़ीस पर अतिरिक्त कर लगने से परिवारों के लिए शिक्षा बहुत महँगी हो गई है।
कई स्कूलों को प्रॉपर्टी रेट्स पर मिलने वाली 80 प्रतिशत चैरिटेबल टैक्स छूट का नुकसान हुआ है। साथ ही, नेशनल इंश्योरेंस में अधिक योगदान और स्टाफ़ की पेंशन का ख़र्च स्कूलों के बजट पर बोझ बढ़ाता है। छात्र-छात्राओं के दाख़िलों की संख्या घटने से छोटे स्कूलों को बजट की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
इस्लिंगटन काउंसिल की नेता ऊना ओ’हॉलोरन का कहना है, “कोई भी राजनीति में स्कूल बंद करने के लिए नहीं जाता, चाहे वह किसी भी पार्टी का क्यों न हो।”
“एक पीढ़ी ऐसी भी है, जो बच्चे पैदा नहीं करेगी या शायद एक ही बच्चा पैदा करेगी… मगर यह सचमुच दुखद है। आपको शहर में बच्चों की ज़रूरत है।”
“राजधानी में विद्यार्थियों की संख्या घट रही है… जन्म दर में भी गिरावट आ रही है। वहीं, आवास और बच्चों की देखभाल की सेवाओं की लागत बढ़ रही है। लेकिन जैसे-जैसे लंदन की आबादी बढ़ती जा रही है, विशेषज्ञों को डर है कि लंदन शहर का भविष्य असंतुलित और अस्थिर होने वाला है।”
ब्लूमबर्ग में दी गई लंदन असेंबली की इकॉनॉमी, कल्चर एंड स्किल्स कमेटी (LAECSC) की जानकारी के अनुसार, लंदन की आबादी बढ़ रही है। 2023 तक के दशक में आबादी पाँच लाख से अधिक बढ़ी, फिर भी दस वर्ष से कम उम्र के निवासियों की संख्या 99,100 कम हो गई।
राजधानी के नगर क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन ने शिक्षा विभाग से स्कूलों को बंद करने की प्रक्रिया को मानकीकृत करने के लिए कहा है। उन्होंने यह भी सुनिश्चित करने का आह्वान किया है कि शहर की काउंसिलों को पूर्व स्कूल भवनों का जल्द से जल्द उपयोग करने के लिए आवश्यक अधिकार उपलब्ध कराए जाएँ।
सेंट्रल लंदन विशेष रूप से स्कूलों के बंद होने से प्रभावित हुआ है। देश भर में प्राथमिक विद्यालयों की संख्या में सबसे बड़ी गिरावट का अनुभव करने वाले दस स्थानीय प्राधिकरणों में से आठ सेंट्रल लंदन की ‘बरो’ में हैं।
इस वर्ष की शुरुआत में लंदन असेंबली की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और कौशल समिति ने चेतावनी दी थी कि बच्चों की देखभाल और आवास की लागत सहित गंभीर वित्तीय और व्यावहारिक बाधाओं ने परिवारों के लंदन से बाहर जाकर बसने में प्रमुख भूमिका निभाई है।
एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या लंदन में बढ़ती आबादी का कारण प्रवासियों की बढ़ती तादाद तो नहीं है? दरअसल, ब्रिटेन में प्रवासियों और ग़ैरक़ानूनी शरणार्थियों को लेकर लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। स्कूलों के बंद होने की इस प्रक्रिया की जाँच भी आवश्यक हो जाएगी।
भारत भी स्कूल बंद होने के इस वायरस से बच नहीं पाया। हाल ही में नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दस वर्षों में देशभर में कुल 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11.07 लाख से घटकर 2024-25 में 10.13 लाख रह गई। पिछले दस वर्षों में भारत में हर दिन औसतन 25 स्कूल बंद हुए, जबकि सरकारी स्कूलों में नामांकन में 2.26 करोड़ छात्रों की कमी आई।
दशकों तक भारत की स्कूली शिक्षा नीति का ध्यान पड़ोस के स्कूलों का विस्तार करने पर रहा, ताकि हर बच्चे को घर के करीब शिक्षा मिल सके। आज, हालाँकि, परिदृश्य बदल रहा है… शिक्षा के समवर्ती सूची में होने के कारण कई राज्यों ने स्कूलों को बंद करने, विलय करने या समेकित करने की नीतियाँ अपनाई हैं, जिससे शिक्षा तक पहुँच को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
‘पुरवाई’ परिवार जानना चाहेगा कि क्या यह एक वैश्विक प्रक्रिया है, जिसके तहत आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा से वंचित रखने की योजना पर काम किया जा रहा है। एक तरफ़ कोरोना वायरस था, तो अब रूस में एक प्लेग का वायरस फैल रहा है… यह शिक्षा वायरस कहाँ जाकर रुकेगा, कहना मुश्किल लगता है।

पुरवाई पत्रिका के संपादकीय अब लगता है कि खोजी और वैश्विक होते जा रहे हैं।शिक्षा का वायरस यानी शिक्षा बजट की कटौती,अक्षमता अब फ्रांस,ब्रिटेन और भारत सरीखे देशों में सुर्खियों में है।फ्रांस के विद्यार्थियों द्वारा छेड़ा गया जन आंदोलन अराजक तत्त्वों ने हाईजैक कर लिया और भारत में पेपर लीक से आरम्भ हुआ आंदोलन अब सियासी भंवर में जा पहुंचा है।ब्रिटेन में सरकारी स्कूलों का बंद होना कारण कि विद्यार्थियों की संख्या में कमी ठीक भारत की स्थिति में साम्य देखा जा रहा है।
पत्रिका ने प्रवासी और गैर कानूनी प्रवासियों को वोट बैंक के रूप में ,विभिन्न विकसित देशों की सियासत द्वारा प्रयोग होना एक चिंतनीय विषय माना है ।यह सर्वथा उपयुक्त भी है। देशों की जनसंख्या इन्हीं प्रवासियों के कारण आई विसंगतियाँ ! सांस्कृतिक प्रदूषण को गहराती जा रही हैं यह स्थिति ब्रिटेन के अतिरिक्त भारत में भी देखी जा रही है और इसके दूरगामी भयंकर दुष्परिणामों से इंकार नहीं किया जा सकता है ।
पत्रिका के अनुसार फ्रांस और ब्रिटेन में हो रहे,अशांत वातावरण का यह भी एक अहम कारण है और यह निश्चित रूप से मानवीय प्रवृतियों का वीभत्स रूप की नज़ीर है।
पत्रिका ने इस संपादकीय को लिखकर अपना वैश्विक दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से रेखांकित कर,अपने पाठकों को एक अलग दृष्टि देने का सफल प्रयास किया है।
प्रिय भाई सूर्यकांत जी,आपकी टिप्पणी हमेशा हमारे संपादकीय को गहराई से समझने में सहायता करती है। आपका स्नहे हमारे लिये अनमोल है। हार्दिक धन्यवाद।
शिक्षा पर दोहरा संकट
बेहतरीन संपादकीय आपने सभी पहलू पर अपनी अभिव्यक्ति दी आदरणीय
वास्तव में –
फ्रांस में शिक्षा बजट में कटौती के खिलाफ छात्र सड़कों पर हैं, आंदोलन हिंसक हो गया। वही कहानी भारत में भी – युवाओं ने पेपर लीक पर आवाज उठाई, पर अब उसे राजनीतिक दल और अराजक तत्व हाईजैक कर चुके हैं। जायज मांग हिंसा में बदल जाती है, यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
दूसरी तरफ लंदन में 7 साल में 90 से ज्यादा स्कूल चुपचाप बंद हो गए। कारण – जन्म दर में गिरावट, महंगी फीस और खर्च। कोई हंगामा नहीं हुआ।
भारत दोनों संकटों से जूझ रहा है। नीति आयोग के मुताबिक 10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए, रोज 25 स्कूल।
इसलिए हम यही कह सकते हैं कि फ्रांस में राज्य शिक्षा से पीछे हट रहा है, लंदन में समाज सिकुड़ रहा है, और भारत में हम पहुँच के नाम पर स्कूलों को ही खत्म कर रहे हैं। यह साजिश नहीं, व्यवस्था की थकान है, जिसे रोकना होगा।
भावना जी, आपने लिखा है कि – इसलिए हम यही कह सकते हैं कि फ्रांस में राज्य शिक्षा से पीछे हट रहा है, लंदन में समाज सिकुड़ रहा है, और भारत में हम पहुँच के नाम पर स्कूलों को ही खत्म कर रहे हैं। यह साजिश नहीं, व्यवस्था की थकान है, जिसे रोकना होगा। – आपने तो संपादकीय का निचोड़ ही निकाल लिया है। स्नेह बनाए रखें।
बहुत ही बेहतरीन संपादकीय।
यहां भारत में भी कॉलेज के विद्यार्थियों को किसी न किसी तरह भड़काया जा रहा है और राजनीतिक खेल खेला जा रहा है।
रानी मोटवानी
हार्दिक धन्यवाद रानी जी।
हमेशा की तरह आपका संपादकीय समसामयिक विषय पर तो है ही, साथ ही एक संपादक का कर्तव्य पूरा करता हुआ चिन्ता व्यक्त कर रहा है। भारत की वर्तमान परिस्थितियों में इस विषय पर विचार करना बहुत आवश्यक है। फ्यरास की तरह यहां पर भी जहाँ एक तरफ़ शिक्षा की स्थिति व गुणवत्ता पर स्थिति चिंताजनक है वहीं वर्तमान में हो रहे आंदोलन भी देश की अर्थव्यवस्था व विकास के लिए अवरोधक बन रहे हैं। आपने संपादकीय में अपना दृष्टिकोण व स्पष्ट विश्लेषण किया है। निश्चित रूप से इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
अनीता जी, आपको संपादकीय की सार्थकता महसूस हुई, यह जान कर उत्साह बढ़ा। आपका कहना बिल्कुल सही है कि – वर्तमान में हो रहे आंदोलन भी देश की अर्थव्यवस्था व विकास के लिए अवरोधक बन रहे हैं। – हार्दिक आभार आपका।
बहुत सुंदर sir. सारगर्भित आलेख l बहुत तथ्यात्मक लिखा आपने l साधुवाद sir.
धन्यवाद चैताली।
विश्व युद्ध का नया रूप भ्राता श्री
शानदार लेख के लिए साधुवाद
हार्दिक धन्यवाद कपिल भाई।
यह संपादकीय शिक्षा व्यवस्था के बदलते वैश्विक परिदृश्य पर गंभीर प्रश्न उठाता है। फ्रांस के छात्र आंदोलनों, लंदन में स्कूलों की बंदी और भारत में सरकारी विद्यालयों की घटती संख्या को जोड़कर लेखक ने शिक्षा, राजनीति और सामाजिक भविष्य के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया है। विद्यालयों के बंद होने और विद्यार्थियों की घटती संख्या के बीच संबंध विचारणीय है। हालाँकि, इन घटनाओं को किसी वैश्विक साजिश का परिणाम मानने के बजाय उनके पीछे के जनसांख्यिकीय बदलावों, आर्थिक दबावों और नीतिगत कमियों की पड़ताल आवश्यक है। फिर भी, विभिन्न देशों में शिक्षा तक पहुँच पर मंडराता संकट एक साझा चिंता अवश्य है। अंततः, प्रश्न साजिश का नहीं, बल्कि सरकारों की प्राथमिकताओं और भावी पीढ़ियों के प्रति उनकी जवाबदेही का है। शिक्षा के अवसर सीमित होने से रोकना और प्रत्येक बच्चे के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना ही किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक कसौटी है!
डा विजय दीक्षित
प्रिय भाई विजय जी, आपने संपादकीय पर अपनी बेहतरीन राय रखी है कि – इन घटनाओं को किसी वैश्विक साजिश का परिणाम मानने के बजाय उनके पीछे के जनसांख्यिकीय बदलावों, आर्थिक दबावों और नीतिगत कमियों की पड़ताल आवश्यक है। फिर भी, विभिन्न देशों में शिक्षा तक पहुँच पर मंडराता संकट एक साझा चिंता अवश्य है। – आपकी सार्थक टिप्पणी के लिये दिल से शुक्रिया।
आज का संपादकीय फ्रांस के आंदोलन और कई अनछुए प्रश्नों को पाठकीय वर्ग के सामने रखने के साथ – साथ भारत की सामयिक समस्या पर भी आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने अपनी दृष्टि डाली है।
विदेशी संसद में समस्याओं पर वैचारिक विमर्श न होना अशिक्षा की ओर इशारा कर रहा है।
ज़ेन जी के प्रदर्शन, भारत में ज़ेन जी का सड़कों पर उतरना, उनकी शब्दावली और उनके हाव भाव तथा पारिवारिक संस्कारों के प्रति उदासीनता सब पर संपादक ने चिंता व्यक्त की है।
यह सही है कि कोई भी शिक्षा बंद करने के लिए राजनीति में नहीं उतरता
पर एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ कि बिना किसी सर्वे और हकीकत को जाने बिना सर्वाधिक प्रयोग शिक्षा (विशेषकर उच्च शिक्षा)में किये जा रहे हैं जो युवा पीढ़ी के लिए घातक हैं।
बढ़िया संपादकीय के लिए आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी को साधुवाद।
डॉ पद्मा शर्मा
ग्वालियर
प्रिय पद्मा, आपने कम शब्दों में गहरी टिप्पणी की है कि – पर एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ कि बिना किसी सर्वे और हकीकत को जाने बिना सर्वाधिक प्रयोग शिक्षा (विशेषकर उच्च शिक्षा) में किये जा रहे हैं जो युवा पीढ़ी के लिए घातक हैं। – आपसे सहमत हैं।
एक और समकालीन विषय पर सारवान संपादकीय। भारत में भी यही ट्रेंड चल पड़ा है। भविष्य क्या होगा इन आंदोलन और प्रदर्शनों का समझ में नहीं आ रहा।
धन्यवाद अरविंद भाई।
बहुत बढ़िया भारत में भी यही सब कुछ हो रहा है कहां जाएगा देश कुछ पता नहीं
यही चिन्ता है भाग्यम जी।
फ्रांस और ब्रिटेन की शिक्षा व्यवस्था पर बेहतरीन समकालीन लेख लेखन हेतु हार्दिक आभार
इतने अत्याधुनिक देश में भी शिक्षा व्यवस्था का यह हाल है
यही तो चिन्ता है संगीता जी।
इस सप्ताह का संपादकीय एक गंभीर समकालीन समस्या को लेकर आया है. स्कूली शिक्षा जो कि चरित्र तथा ज्ञान की बुनियाद है, उसकी ऐसी स्थिति निश्चित ही चिंताजनक है. यह मुद्दा सिर्फ एक देशीय नहीं बल्कि वैश्विक होता जा रहा है. आपने फ़्रांस, ब्रिटेन और भारत का यह आंकडा पेश कर सचेत कर दिया है. भारत को भी इस समस्या पर अत्यंत गंभीर होना पडेगा अन्यथा कितनी भी शिक्षा नीति काम नहीं आएगी, महज औपचारिकता भर रहा जाएगी. हार्डी आभार, शुभकामनाएं
भाई जयंत कर शर्मा जी, आपकी चिंता स्वभाविक है। समस्या वैश्विक होती जा रही है और उसमें हिंसा का प्रवेश हो रहा है।
हमेशा की तरह एक बेहतरीन संपादकीय।
इस वक़्त क्या हो रहा है ना जाने विश्व भर में। आंदोलन-आंदोलन और आंदोलन से आंदोलन तो नहीं हैं ये। कारण क्या है, सबकी पृष्ठभूमि कहीं अलग कहीं एक सी। भारत भी परेशान है। पेपर लीक और फिर ये राजनीति की डोर थामते आंदोलन। कमोबेश यही फ़्रांस में।
साधुवाद आपको दुनिया पर नजर बनाए रखने के लिए।
निर्देश जी, आपने संपादकीय के मर्म को समझ कर इतनी ख़ूबसूरत टिप्पणी लिखी है। हमारा हौसला बढ़ाने के लिये हार्दिक आभार।
“फ्रांस जल रहा है… लंदन में स्कूल बंद…” संपादकीय में यूरोप और भारतीय शिक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। सवाल उठाना मुनासिब भी है। शिक्षा के लिए जब लोग सड़कों पर आ जाएं तो कुछ बात तो होगी ही।
यूरोप की शिक्षण व्यवस्था कैसी है, इसका पता या तो गूगल से कर पाते हैं या फिर पुरवाई की संपादकीय से।
फ्रांस की शिक्षा व्यवस्था के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद नहीं है। वहां बालक शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है इसलिए जनता सड़कों पर आ गई है।
बड़े आश्चर्य की बात है कि फ्रांस विकसित देशों में शामिल है, फिर भी जनता, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से महरूम है। इसे क्या समझा जाए? यही कि विकसित राष्ट्र की मानकता पर फिर से विचार किया जाना चाहिए।
फ्रांस की तुलना में इंग्लैंड की स्थिति अलग है। इंग्लैंड में बच्चों की संख्या घट रही है। जन्मदर में गिरावट और पलायन के कारण स्कूलों को बंद किया जा रहा है।
भारत की शिक्षण व्यवस्था की बात की जाए तो यहां भी कुछ स्कूलों को मर्ज किया गया है। क्योंकि छात्र संख्या कम होने के कारण ऐसा किया गया है। भारत में छात्र संख्या कम होने के कारणों पर जाएं तो यहां प्राइवेट विद्यालय सरकारी स्कूलों की अपेक्षा अधिक खुल गए हैं। शहरों की बात तो छोड़ ही दीजिए गांवों तक में प्राइवेट विद्यालय फल-फूल रहे हैं। फीस लेकर बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। बेरोजगार युवाओं से कम वेतन में शिक्षण कार्य आसानी से कराया जाता है। कुल मिलाकर प्राइवेट विद्यालय मालिकों के लिए आय का साधन बन चुके हैं।
कुछ सरकारी स्कूलों में टीचर्स की कमी एक कारण हो सकता है। इसके साथ ही अभिभावकों का बच्चों पर ध्यान न देना, समय से स्कूल न भेजना। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है, अभिभावकों का इस पूर्वाग्रह से ग्रसित होना। मुफ्त में मिल रही शिक्षा की कदर न करना। कुछ टीचर्स का शिक्षण के प्रति उदासीन रहना आदि बहुत से कारण हैं जो भारतीय शिक्षा पर प्रतिकूल असर डाल जाते हैं।
कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को मिड-डे मील तथा मुफ्त किताबें व वेश सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाती है। पढ़ाई से संबंधित गतिविधियां एवं हर माह के पाठ्यक्रम की समीक्षा विद्यालय स्तर पर की जाती है। जहां जहां टीचर्स एवं अभिभावक एक्टिव हैं वहां के विद्यालय आज भी ग्रो कर रहे हैं।
भारतीय समाज में एक ऐसी मानसिकता बन गई है कि अगर आप प्राइवेट विद्यालय में अपने बच्चे को पढ़ाते हैं और साथ में ट्यूशन में पैसे खर्च कर रहे हैं तो आपका सामाजिक स्टेट्स अच्छा है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को कमजोर परिवार का मान लिया जाता है। ऐसी ही धारणाएं माध्यमिक विद्यालयों में साइंस साइड और आर्ट साइड के बच्चों के बीच बना दी गई हैं। क्षेत्र विशेष में ऐसी अपनी-अपनी धारणाएं होती हैं।
इंग्लिश मीडियम विद्यालयों की चकाचौंध के बीच नवोदय विद्यालय एवं केंद्रीय विद्यालय अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए अलग पहचान बनाए हुए हैं। इन विद्यालयों ने यह साबित किया है कि अच्छी शिक्षा के लिए केवल अंग्रेजी माध्यम, आकर्षक भवन और आधुनिक सुविधाएँ ही पर्याप्त नहीं हैं; योग्य शिक्षक, सुव्यवस्थित शिक्षण व्यवस्था और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है।
यद्यपि सरकार की ओर से स्कूलों पर काफी ध्यान दिया जा रहा है। पर्याप्त शिक्षक मिलने से सरकारी विद्यालयों की स्थिति सुधारने में मदद मिल सकती है।
संपादकीय के अंत में इस बात की शंका व्यक्त की गई है कि आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा से वंचित रखने की वैश्विक योजना चल रही है। लेकिन यह नहीं बताया गया है कि इस तरह की योजनाएं कौन चला रहा है!
संपादकीय की यह विशेषता है कि इसमें वैश्विक स्तर के मामले पढ़ने और समझने को मिल जाते हैं। इसीलिए पुरवाई के संपादकीय को पढ़ना ज्ञान अर्जित करने जैसा है।
भाई लखन लाल पाल जी, कभी कभी तो आपकी टिप्पणी पढ़ने के बाद मुझे अपना संपादकीय बेहतर ढंग से समझ आता है।
फ्रांस में शिक्षा के क्षेत्र को लेकर हो रहे युवा आंदोलन को संपादकीय में समेटते हुए लंदन और भारत के सरकारी, गैरसरकारी विद्यालयों का बंद होने के विषय में आपने विस्तार से बताया है। यह सचमुच चिंता जनक है। शिक्षा के विषय में भारतीय सरकार और वैश्विक सरकार को बहुत अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है अन्यथा समाज बहुत उथला हो जाएगा।
प्रिय जया, आपसे पूरी तरह सहमत। शुभकामनाएं।
सादर नमस्कार सर….
चिंता का विषय है… वास्तव में….
हमेशा की तरह आपने वैश्चिक चिंता को पाठकों के समक्ष रखी है… अभी हमारे देश में जो हो रहा है…. युवा पीढ़ी के भविष्य का क्या होगा? ये सब दंगे करने लग गए हैं…. न डर न भय… कुछ नहीं… राजनीतिक दल भी इसका लाभ उठा रहे हैं….. इसका समाधान अति शीघ्र होना चाहिए….
साधुवाद…
सही कहा आपने अनिमा जी। धन्यवाद।
सादर चरण स्पर्श।
भारत सहित यूरोप में भी स्कूली शिक्षा से जुड़े अभियानों में रुचि कम हो रही है संसाधनों की कमी और निजीकरण के चलते भारत में सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम है निजी स्कूलों के। पिछले कुछ वर्षों में यूपी में, कई प्राथमिक स्कूलों को बंद किया गया है उन्हें मर्ज कर दिया गया है। भारत में होने वाले प्रदर्शनों की तुलना उसका मंतव्य यूरोप में होने वाले प्रदर्शन विषयों से सदैव भिन्न नहीं रहता है। मौजूदा परिदृश्य में फ्रांस सहित इंग्लैंड में हो रहे प्रदर्शनों के घटनाक्रम को अपने संपादकीय के माध्यम से रेखांकित किया है और चिंता भी व्यक्त की है। स्थानीय सरकार अथवा किसी भी देश को अपने यहां स्कूली शिक्षा से जुड़े विषय को गंभीरता से लेना चाहिए वह भी तब अधिक जब देश व्यापी प्रदर्शन शुरू हो जाए। फिलहाल हम लोग वोट चोरी, गैस चोरी, बिजली चोरी, पेट्रोल चोरी जैसे अति गंभीर विषयों पर अपना मस्तक खपा रहे। जैसे ही इन विषयों पर फतह हासिल कर ली जाएगी तब शिक्षा बजट पर ध्यान दिया जाएगा
शुभम… राजनीति से फुरसत मिलेगी तभी तो शिक्षा की ओर ध्यान जाएगा।
तेजेन्द्र भाई: फ़्रांस, ब्रिटेन और भारत में जो शिक्षा को लेकर समस्या का आपने अपने सम्पादकीय में बर्णन किया है वो बहुत ही चिन्ताजनक स्थिती है। यदि प्रारंभिक और उच्च शिक्षा को यह देश, या कोई भी और देश, अपनी priority नहीं देंगे और छोटी छोटी बातों को लेकर राजनीति करेंगे तो नुकसान तो देश की आने वाली पीढ़ी का होगा। हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते। चुनौतियाँ तो हर कदम पर आनी हैं। बस इनका रूप बदल जाता है। अब ब्रिटेन की ही बात लें तो विद्यार्थियों की संख्या में गिरावट, आर्थिक दबाव, कम बच्चे या ज़ीरो बच्चे पैदा करने का ट्रैणड, स्कूल की फ़ीस पर अधिक टैक्स, शिक्षा के बजट में कटॉती इत्यादि challenges को यदि ढ़ँग से नहीं हैंण्डल किया जाएगा तो इसके अंजाम तुरन्त नहीं बल्कि कुछ देर बात पता चलेंगे और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी और बीमारी का इलाज करने में अधिक समय के साथ साथ अधिक बजट की भी ज़रूरत पड़ेगी।
देखा जाए तो यह समस्या केवल फ़्राँस, ब्रिटेन या भारत की ही नहीं है। यह तो universal ट्रैण्ड है और कभी न कभी और कहीं न कहीं किसी भी देश में आसकती है। आज के नेताओं और विपक्ष वालों से मेरी अपील है कि हर मौके पर अपनी राजनीती की रोटियाँ सेकना बन्द करो और देश के बारे में सोचो। देश के जीवन में आने वाली चुनौतियों को एक जुट होकर उसका मुकाबला करो। राजनीति करने के लिए तो सारी उमर पड़ी है।
इस जानकारी के लिए बहुत बहुत साधुवाद।
भाई विजय विक्रान्त जी, आपने एकदम सही कहा है कि – आज के नेताओं और विपक्ष वालों से मेरी अपील है कि हर मौके पर अपनी राजनीती की रोटियाँ सेकना बन्द करो और देश के बारे में सोचो। देश के जीवन में आने वाली चुनौतियों को एक जुट होकर उसका मुकाबला करो। राजनीति करने के लिए तो सारी उमर पड़ी है। – आपका स्नेह अमूल्य है।
फ़्रांस में शिक्षा बजट में कटौती के कारण विद्यार्थियों को सड़क पर उतरना एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है किन्तु उनके साथ बाहरी उपद्रवी तत्वों द्वारा आंदोलन का हिंसक रूप लेना, चिंतनीय है। जैसाकि आपने लिखा है कि इस आंदोलन में अनेक छात्र, शिक्षक और पुलिस अधिकारी घायल हुए हैं।
फ़्रांस में हुए आंदोलन के साथ आपने लंदन में पिछले सात वर्षों में विद्यार्थियों की संख्या कम होने के कारण 90 से अधिक स्कूल करने की बात कही है तथा यह भी बताया है कि इसके बावजूद लंदन में जेन जी द्वारा कोई प्रदर्शन नहीं हुआ। मुझे लगता है यह एक स्वस्थ समाज की स्वस्थ सोच का परिचायक है। आंदोलन किसी समस्या का समाधान नहीं करते वरन देश की संपत्ति के नुकसान के साथ, लोगों की असुविधा का कारण भी बनते हैं।
फ़्रांस और लंदन के साथ आपने भारत में भी नीट परीक्षा में पेपर लीक के कारण हुए आंदोलन पर भी बात की है किन्तु क्या ऐसा नहीं लगता कि फ़्रांस और भारत में हुए आंदोलन आयातित हैं? कुछ प्रभावशाली देशों द्वारा अपने हित के लिए इन देशों को अस्थिर करने का काम किया जा रहा है?
फ़्रांस जल रहा है… लंदन में स्कूल बंद…समसामायिक समस्या पर लिखा बेहतरीन लेख है जो आपकी वैश्विक दृष्टि और विश्लेषण का परिचायक है।
साधुवाद आपको।
सुधा जी, इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।
तेजेन्द्र जी, आपका ये संपादकीय सिर्फ दो देशों की खबर नहीं, तीन महाद्वीपों का आईना है।
फ्रांस में छात्र सड़कों पर हैं क्योंकि बजट कटा। ब्रिटेन में छात्र सड़कों पर नहीं हैं क्योंकि स्कूल ही कट गए। और भारत में 10 साल में 94,000 सरकारी स्कूल बंद – बिना किसी शोर के। तीनों तस्वीरें अलग हैं, पर दर्द एक ही है – शिक्षा अब सरकारों की प्राथमिकता नहीं रही।
आपने दो बहुत बड़ी बातें पकड़ी हैं –
*1. आंदोलन का हाइजैक होना -*
फ्रांस में छात्रों ने फीस और स्टाफ के लिए आंदोलन शुरू किया, फिर राजनीतिक तत्व और उपद्रवी घुस गए। बिल्कुल भारत जैसा। यहाँ भी पेपर लीक से शुरू हुई बात अब भाषा की मर्यादा तोड़ने तक पहुँच गई है। छात्र का मुद्दा रह ही नहीं जाता, पार्टी का मुद्दा बन जाता है। शांत लड़का जो क्लास में बैठना चाहता है, वो अंत में लाठी खाने लगता है।
*2. लंदन में 90 स्कूलों का चुपचाप बंद होना -*
ये इस संपादकीय का सबसे डरावना हिस्सा है। फ्रांस में कम से कम हंगामा तो हो रहा है। लंदन में तो बिना हंगामे के ताला लग रहा है। जैसा आपने लिखा – कोई भी राजनीति में स्कूल बंद करने नहीं आता, पर बंद हो रहे हैं। जन्म दर गिरी, फीस पर VAT लगा, प्रॉपर्टी टैक्स की छूट गई, और छोटा स्कूल मर गया।
और आंकड़ा देखिए – लंदन की आबादी 5 लाख बढ़ी, पर 10 साल से कम उम्र के बच्चे 99,100 कम हो गए। मतलब लंदन बूढ़ा हो रहा है। शहर में घर हैं, नौकरी है, पर बच्चे नहीं हैं। क्योंकि एक परिवार लंदन में बच्चा पाल ही नहीं सकता – घर महंगा, चाइल्डकेयर महंगा।
और भारत? नीति आयोग की रिपोर्ट आपने जो जोड़ी, वो रोंगटे खड़ी करती है – हर दिन 25 स्कूल बंद। हम किस अमृतकाल की बात कर रहे हैं, जहाँ स्कूल ही बंद हो रहे हैं?
सबसे बड़ा सवाल जो आपने उठाया – क्या बढ़ती आबादी प्रवासियों की वजह से है? और क्या स्कूल बंद होने की जाँच में ये एंगल भी देखा जाएगा? ये सवाल ब्रिटेन की संसद में क्यों नहीं उठा, ये वाकई हैरानी की बात है।
अंत में एक ही बात कहूँगी – फ्रांस में छात्र इसलिए लड़ रहे हैं ताकि स्कूल खुला रहे। लंदन में छात्र लड़ ही नहीं रहे क्योंकि स्कूल बंद हो गया। और भारत में छात्र लड़ रहे हैं पर सुनने वाला कोई नहीं।
तीनों ही स्थितियों में नुकसान छात्र का ही है।
आपका ये संपादकीय ‘पुरवाई’ की सबसे जरूरी जिम्मेदारी निभा रहा है – हमें याद दिलाना कि स्कूल की घंटी बजनी चाहिए, चाहे वो पेरिस में हो, लंदन में हो l
सादर,
*डॉ. मुक्ति शर्मा*
श्रीनगर
डॉ मुक्ति शर्मा जी, आपने बहुत विश्लेषणात्मक ढंग से संपादकीय पर अपने विचार रखे हैं। अंत में एक ही बात कहूँगी – फ्रांस में छात्र इसलिए लड़ रहे हैं ताकि स्कूल खुला रहे। लंदन में छात्र लड़ ही नहीं रहे क्योंकि स्कूल बंद हो गया। और भारत में छात्र लड़ रहे हैं पर सुनने वाला कोई नहीं। कम शब्दों में गहरी मीमांसा।
जो चल रहा है उसमें मुझे अपने देश के बारे में डर लगने लगा है.. शिक्षा के मुद्दे पर SC के इस निर्णय के बाद कि बिना अनुमति नहीं अंदर जा सकते हैं, मामला नियंत्रित हुआ लेकिन अब इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर जिसका 85 लाख के विज्ञापन कॉंग्रेस द्वारा देने की बात के बाद अपनी ख़बर पर लगभग खण्डन जैसा किया लेकिन मोदी विरोधियों को SIR का मुद्दे मिल गया.. सब इसको लेकर अराजकता फैलाने को आतुर हैं.. . पर जब सबूत मांगे जाते हैं तो कोई सामने नहीं आता.. इनका दोगलापन ये कि केरल तेलंगाना में सब ठीक क्योंकि विपक्ष जीता लेकिन बिहार पश्चिम बंगाल में गलत है क्योंकि वहाँ सत्ता पक्ष को जीत मिली है.. इस दलील पर कैसे भरोसा किया जा सकता.. निश्चित रूप से इसमें अमेरिका का डीप इस्टेट का हाथ लगता है
आपने मुद्दों के साथ हो रही राजनीति का सही पर्दाफ़ाश किया है आलोक भाई। हार्दिक आभार।