अखिल भण्डारी की ग़ज़लें – ‘जिस तरफ़ जाता नहीं कोई उधर जाना है’
गुफ़्तुगू में कुछ न कुछ तो अन-कहा रह जाएगा
वो चला जाएगा उस के बाद क्या रह जाएगा
उस की बातें वक़्त के सहरा में गुम हो जाएँगी
बंद कर लेगा वो दरवाज़े दरीचे सब मगर
ख़्वाब तो ले जाएगा वो नींद भी ले जाएगा
मैं बिखरता जा रहा हूँ ख़ुश्क पत्तों की तरह
इस जहाँ में तेरा भी कोई तो होगा मोतबर
सुब्ह से किस सोच में डूबा हुआ है तू ‘अखिल’
जिस तरफ़ जाता नहीं कोई उधर जाना है
मैं तो भटका हुआ राही हूँ मिरी फ़िक्र न कर
गो तेरे शहर में तफ़रीह के सामाँ हैं बहुत
इक न इक दिन ये मसाफ़त भी गुज़र जाएगी
वो परिंदा है हवाओं से उलझने दो उसे
इतनी शिद्दत से जो इक़रार-ए-वफ़ा करता था
गिर के अख़लाक़ से जीना भी है कैसा जीना
कब तलक ढोना है मुझ को ये तनासुख़का अज़ाब
एक टूटी हुई कश्ती का सहारा ही सही
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