Sunday, September 6, 2026
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…जो हिंदी की ओर खिंचे चले आये

  • एफ एम सलीम

हिंदी दिवस पर विचार करते हुए अगर मैं आपबीती पर ही नज़र डालूँ तो याद आता है कि मैंने लगभग दो साल पहले खुद को यह बात स्वीकार करने के लिए सहमत कर लिया था कि हिंदी कई साल पहले ही मेरी सोच में शामिल हो गयी है। हाई स्कूल छूटने के लगभग 37 साल बाद मैं यह बात अपने आपसे कह रहा हूँ कि मैं हिंदी में सोचने लगा हूँ…। यह कहते हुए मैं बिल्कुल असहज नहीं हूँ। हालाँकि हिंदी न मेरी मातृभाषा है और ना ही मैंने हिंदी माध्यम से शिक्षा अर्जित की है। जहाँ तक उर्दू की बात है, वह मेरी मादरी ज़ुबान है, लेकिन मैंने यह भाषा स्कूल में नहीं सीखी। जब एहसास हुआ कि मातृ भाषा सीखनी चाहिए, तब एक मौलवी साहब से अलिफ बे.. सीखी और फिर स्नातकोत्तर की डिग्री हिंदी के साथ-साथ उर्दू में भी प्राप्त की। उर्दू में ख़ूब लिखा भी और कुछ साल पहले तक मैं अपनी लेखन सामग्री के बारे में बहुत कुछ उर्दू में सोच लिया करता था, लेकिन पांच-छह वर्षों से महसूस कर रहा हूँ कि शायद यह पूरी तरह सत्य नहीं है कि आदमी अपनी मातृभाषा में ही सोचता है। कम से कम मेरे अपने बारे में मैं यह कह सकता हूँ। आप इसे अपवाद भी कह सकते हैं। फिर मैं यह भी सोचता हूँ कि भला वो लोग अपनी मातृभाषा में कैसे सोचते होंगे, जिन्हें वह भाषा मन-मस्तिष्क को सुकून पहुँचाने के स्तर तक समझ में आती ही न हो, जिन्होंने वह सीखी ही न हो और जो अंग्रेज़ी या जो कोई उनका माध्यम हो (मातृभाषा से अलग) उसमें शिक्षा प्राप्त की हो?

मैं मराठी माध्यम का छात्र रहा हूँ और छठी-सातवीं कक्षा तक भी हिंदी से कोई मुठभेड़ हुई हो, याद नहीं है। बच्चन की कविता ..कोशिश करने वालों की हार नहीं होती… के अलावा माध्यमिक स्कूल के पाठ्यक्रम से बहुत टटोलने के बावजूद भी पाता हूँ कि हिंदी की कोई कविता स्मृतियों का हिस्सा नहीं है। हो सकता है कि ऐसा कुछ पढ़ा ही न हो, या फिर जो पढ़ा, वह समझ के स्तर तक पहुंचा ही न हो। कुछ याद है तो बस.. संत तुकडोजी महाराज की मराठी कविता ‘या झोपडीत माझ्या’… बचपन की महत्ता पर एक मराठी निबंध और हिंदी पाठ्यपुस्तक में शामिल एक हास्य निबंध ‘बीमार न होने का दुख’ … हिंदी साहित्य में प्राथमिक रूप से दिलचस्पी बढ़ने के कारणों में यह निबंध भी एक है। याद आता है कि यह पहली ऐसी साहित्यिक रचना रही होगी, जिसे परीक्षा के दबाव में आकर नहीं पढ़ा, बल्कि कई बार इसलिए पढ़ा कि कुछ था, जो पढ़ने के लिए लालायित करता था। हालाँकि यह स्वीकार करने में कोई कोताही नहीं करूँगा कि लेखक का नाम केवल परीक्षा में याद रखने के लिए पढ़ा होगा, जो कुछ ही दिन में भूल गया। बाद में जब स्मृतियों के पन्ने पलटने शुरू किये तो इस निबंध के लेखक का नाम बहुत ढूंढता रहा। गूगल बाबा बहुत दिनों तक गुमराह करते रहे कि यह हरिशंकर परसाई का हो सकता है, लेकिन उनकी किताबों में टटोलने पर ‘अपनी-अपनी बीमारी..’ के अलावा इस तरह का कोई और निबंध नहीं मिला। जब एआई की मदद से इसे टटोला तो पाया कि यह निबंध लतीफ घोंघी का है, जो महाराष्ट्र की बालभारती की किताबों में आठवीं कक्षा में अब भी मौजूद है।

शिक्षा और रोजगार के संघर्ष के बीच भाषा और साहित्य का संबंध उतना ही रहा, जितना परीक्षा लिखकर उत्तीर्ण होने के लिए अनिवार्य था। परीक्षाओं का सिलसिला खत्म हुआ तो महसूस हुआ कि अब पढ़ना चाहिए। लगता है अब भी उसी लम्हे में कहीं ठहरा हुआ हूँ। सोचता हूँ कि मेरी तरह बहुत सारे लोग होंगे, जो स्कूल, कॉलेज के दौरान या फिर रोजगार के प्रारंभिक दिनों में सीधे हिंदी से ना जुड़े हों, उसे धीरे-धीरे आत्मसात किया हो। आहिस्ता-आहिस्ता खिंचते चले गये हों।

हिंदी-उर्दू की साझा संस्कृति में सांसे लेते हुए बीते चार-पाँच दशकों में मैंने अपने तौर पर जो कुछ लिखा है, विशेषकर साहित्य के रूप में तो मानना पड़ता है कि एक अदना से लेखक कवि ने भी इससे कहीं अधिक लिखा होगा। इसलिए मुझे नहीं लगता है कि मैंने भाषा को कुछ दिया है, लेकिन भाषा के कारण जो कुछ मैंने पाया है, वह अपार है।.. और शायद उन सब की ज़िंदगी में जिन्होंने इसे अपनाया, इसके साहित्य में अपना योगदान किया और बदले में ले गये दिल का सुकून, अच्छी भली लोकप्रियता और मौत के बाद भी इस दुनिया में कुछ और पल जीने का सामान।

हिंदी, उर्दू, हिंदुस्तानी, जैसे बेकार के विवादों से परे जब मैं सोचता हूँ कि वे लेखक इस ओर क्यों आए होंगे, जिनकी प्राथमिक जिंदगी में हिंदी न उनके लिए शिक्षा या रोज़गार का माध्यम थी और ना ही उनकी ऐसी कोई मजबूरी कि … ना ना करते प्यार तुझी से कर बैठे… वाली स्थिति।

हिंदी की भाषिक विशेषताओं और लाखों की संख्या में देश-दुनिया में फैले पाठक वर्ग से आकर्षित होकर इसकी चाशनी में रच-बसने की चाह के साथ अनेक साहित्यकार इसमें समाते गये। आज मैं विशेष रूप से उन साहित्यकारों को याद करना चाहूँगा, जिनके बारे में यह कहने की जुर्रत की जा सकती है कि वे अगर हिंदी-उर्दू में नहीं आते तो शायद उतने लोकप्रिय नहीं हो पाते, जितनी शोहरत के वे भागीदार बने।

सोचता हूँ तो इस परंपरा में सबसे पहले अधिकांश पाठकों के प्रिय लेखक प्रेमचंद याद आते हैं।  मुंशी प्रेमचंद ने बहुत कम ज़िंदगी पायी, लेकिन तीस-बत्तीस साल के लेखकीय जीवन ने उन्हें अमर कर दिया… और उन्हें अमर करने वालों में निश्चित रूप से उर्दू-हिंदी की साझा संस्कृति की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उससे भी महत्वपूर्ण था, उनका उर्दू से हिंदी में आना। उसी रूपांतरण ने उन्हें कथा सम्राट बनाया। लगभग अठारह से बीस साल तक निरंतर उर्दू में लिखने के बाद वे हिंदी की ओर आकर्षित हुए और लगभग इतने ही समय में उन्होंने अपना लगभग सारा नया और पुराना लेखन देवनागरी लिपि में परिवर्तित किया। उनके जीवन के बहुत से दूसरे पहलू हैं, जिससे किताबों के दफ्तर भरे पड़े हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि यदि वे हिंदी की तरफ़ नहीं आते तो इतनी लोकप्रियता उनके हिस्से नहीं आती और ना ही उनके पाठकों का इतना विस्तार होता, जो आज है।

आज चूँकि एआई के कारण यांत्रिक अनुवाद आसान हो गया है और लोग एक क्लिक पर दूसरी भाषाओं के साहित्य की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन आज से पच्चीस तीस बरस पहले तक भी किसी भाषा के साहित्य को उस भाषा की लिपि जाने बिना पढ़ पाना आसान नहीं था। यही कारण था कि कई साहित्यकारों ने देवनागरी लिपि सीखकर उस साहित्य का रसपान किया और एक लेखक या कवि के रूप में हिंदी भाषा भाषियों के निकट पहुँचे। यह हिंदी के प्रति उनका आकर्षण ही था कि वे इस ओर चले आये। प्रेमचंद की तरह ही उर्दू की समृद्ध साहित्यिक पृष्ठभूमि से आकर हिंदी में अद्वितीय लोकप्रियता हासिल करने वालों में कुछ और साहित्यकार भी हैं। बद्रिनाथ शर्मा सुदर्शन, मुंशी प्रेमचंद की परंपरा के ही कहानीकार थे और शुरुआत में केवल उर्दू की प्रसिद्ध पत्रिकाओं लिखते थे। बाद में वे पूरी तरह हिंदी लेखन में रम गए। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘हार की जीत’ हिंदी साहित्य की सबसे लोकप्रिय और कालजयी कहानियों में गिनी जाती है, जिसे दशकों तक विद्यालयीन पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता रहा है।

राजेन्द्र सिंह बेदी ने हिंदी और उर्दू दोनों में समान अधिकार से लिखा। वे मूल रूप से उर्दू के शीर्ष कथाकार थे, लेकिन बंटवारे के बाद के दर्द और मानवीय संवेदनाओं को दर्शाने वाली उनकी कहानियों व हिंदी सिनेमा के संवादों ने तत्कालीन हिंदी जगत में भी उन्हें अत्यधिक लोकप्रिय बनाया। यही हाल कुछ कृष्णचंदर,  बलराज साहनी, साहिर और बहुत बाद में निदा फाज़ली का भी रहा, जिनके विचारों को हिंदी ने अपने पाठक वर्ग तक विस्तार दिया।

उपेन्द्रनाथ अश्क ने अपने लेखन की शुरुआत उर्दू से ही की थी। बाद में प्रेमचंद की सलाह पर उन्होंने हिंदी में लिखना शुरू किया। वे नाटक, कहानी और उपन्यास तीनों विधाओं में छा गये। रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी यूं तो उर्दू के महान शायर और आलोचक थे, लेकिन उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ हिंदी और हिंदुस्तानी तहजीब का ऐसा संगम था कि वे हिंदी और उर्दू दोनों साहित्य प्रेमियों के दिलों पर समान रूप से राज करते रहे।

राही मासूम रज़ा मूल रूप से उर्दू के विद्वान थे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पी एच.डी. की थी। उन्होंने हिंदी में ‘आधा गाँव’, ‘टोपी शुक्ला’ और ‘ओस की बूंद’ जैसे अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास लिखे। भारत के घर-घर में प्रसिद्ध दूरदर्शन के ‘महाभारत’ धारावाहिक के संवाद उन्होंने ही हिंदी में लिखे थे, जिसने उन्हें अमर बना दिया।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, जिनकी प्रारंभिक हिंदी रचनाओं को प्रेमचंद ने अज्ञेय के नाम से प्रकाशित किया था, वे मूल रूप से विज्ञान और अंग्रेज़ी साहित्य के अध्येता रहे, लेकिन क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान वे हिंदी साहित्य से कुछ इस तरह जुड़े कि हिंदी के ही हो गये और हिंदी उनकी हो गयी। पत्रकारिता से लेकर साहित्य की अनेक विधाओं में इतना कुछ लिखा कि नई कविता और आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रभावशाली निर्माताओं में अपना नाम दर्ज करा गये।

हिंदी भाषा में कुछ ऐसे साहित्यकारों का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा, जिनके लिए अध्ययन, अध्यापन या आजीविका का सीधा संबंध हिंदी से नहीं था, वे अंग्रेज़ी या किसी और भाषाकर्म से जुड़े थे, लेकिन जब हिंदी में आये तो हिंदी ने उन्हें सिर आँखों पर बिठा लिया। ऐसे ही नामों में डॉ. रामविलास शर्मा का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है। उन्होंने अंग्रेज़ी में एमए और पीएच डी की। लंबे समय तक अंग्रेज़ी विभाग में अध्यापन किया और विभागाध्यक्ष रहे, लेकिन आज उन्हें हिंदी आलोचना और प्रगतिशील साहित्य में योगदान के लिए याद किया जाता है।

नई कविता के आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर माने जाने वाले कुँवर नारायण ने अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया था, लंबे समय तक अंग्रेज़ी माहौल में रहे, लेकिन उनके हिंदी में रच बस जाने का इससे बढ़कर और क्या होगी कि उन्हें हिंदी के सर्वोच्च ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

आधुनिक हिंदी कविता और पत्रकारिता के बड़े नामों में रघुवीर सहाय ने भी अंग्रेज़ी साहित्य से हिंदी की ओर यात्रा की थी। उन्होंने कई अँग्रेज़ी पत्रिकाओं में काम करने के बाद प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका ‘दिनमान’ का संपादन किया और हिंदी में अपनी अलग पहचान बनाई।

अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य से गहरा रिश्ता होने के बावजूद जो केवल हिंदी के कहलाए, उनमें हरिवंश राय बच्चन के बारे में कहा जा सकता है कि अगर वे मधुशाला अंग्रेजी या किसी और भाषा में लिखते तो वह लोकप्रियता उन्हें नहीं मिल पाती, जो हिंदी में मिली। बच्चन कैंब्रिज के छात्र थे और उन्होंने शेक्सपियर के नाटकों का काव्यात्मक अनुवाद किया।

हिंदी गद्य का एक और नाम है, जो अंग्रेज़ी और पाश्चात्य परंपराओं के करीब रहने के बावजूद हिंदी लेखन की ओर खिंचे चले आये, निर्मल वर्मा। उनका जीवन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि किसी व्यक्ति की अकादमिक भाषा और उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति की भाषा अलग-अलग हो सकती है। सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली से इतिहास में एमए करने के बाद उन्होंने अध्यापन किया और यूरोप में लंबे प्रवास के दौरान पश्चिमी समाज, संस्कृति और साहित्य को निकट से समझा। अंग्रेज़ी और यूरोपीय साहित्य की गहरी समझ तथा अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से समृद्ध होने के बावजूद उनकी रचनात्मक संवेदना अंततः हिंदी की ओर खिंची और उन्होंने हिंदी को अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। ‘परिंदे’, ‘वे दिन’, ‘लाल टीन की छत’, ‘रात का रिपोर्टर’ और ‘एक चिथड़ा सुख’ जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी कथा साहित्य में आधुनिक मनुष्य की जटिल संवेदनाओं को विशिष्ट शिल्प और भाषा दी।

हिंदी साहित्य के कुछ और नाम याद आ रहे हैं। मनोहर श्याम जोशी, श्रीलाल शुक्ल, अशोक वाजपेयी, विजयदेव नारायण साही, रमेशचंद्र शाह … इन साहित्यकारों की रचनात्मक यात्रा भी इस बात का उल्लेखनीय उदाहरण है कि अध्ययन, पेशे और बौद्धिक संस्कार की भाषा अंग्रेज़ी से जुड़ी होने के बावजूद उनकी साहित्यिक अभिव्यक्ति का स्वाभाविक माध्यम हिंदी बनी। किसी ने अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया, किसी का अकादमिक और प्रशासनिक जीवन अंग्रेज़ी के परिवेश में रहा, तो किसी ने पश्चिमी साहित्य और विचार परंपरा को गहराई से आत्मसात किया, लेकिन विचारों को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त करने की बात आई तो वे हिंदी की ओर मुड़ गये। मनोहर श्याम जोशी ने हिंदी उपन्यास और टेलीविजन लेखन को नई भाषा दी, श्रीलाल शुक्ल ने एक व्यापक वर्ग को अपने लेखन से प्रभावित किया,  अशोक वाजपेयी ने साहित्य और संस्कृति की दुनिया में अपना अलग स्थान बनाया।

इसके अलावा दक्षिण भारतीय भाषाओँ, विशेषकर तेलुगु, कन्नड़, तमिल और मलयालम के अलावा मराठी और दूसरी उत्तर पूर्वी भाषाओं से भी कई साहित्यकार हिंदी की ओर आकर्षित हुए, जिनके लिए हिंदी का रिश्ता केवल भाषिक और साहित्यिक रहा। उन्होंने अपनी भाषाओं से हिंदी में और हिंदी से अपनी भाषाओं में अनुवाद के झरोखों से वैचारिक आदान प्रदान किया। इसकी एक लंबी सूची है, जिस पर किसी और दिन बात हो सकती है। कई नाम हैं, जिनके जीवन में ‘बचपन से पसंद है’, या ‘विरासत में मिली है’, जैसे सवाल बेमानी रहे, वे जब हिंदी साहित्य में आये तो फिर अपने-अपने स्तर पर विभिन्न विधाओं में रच-बस गये। कुछ हद तक कह सकते हैं कि उन्होंने हिंदी में सोचना शुरू किया।

F m Saleem
F m Saleem

एफ एम सलीम

ब्यूरो चीफ, डेली हिंदी मिलाप, हैदराबाद
[email protected], (9848996343)
मूल रूप से पत्रकार, कहानी, कविता, ललित निबंध एवं आलोचना सहित विभिन्न विधाओं में लेखन, 13 पुस्तकें प्रकाशित।

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