आप सोच रहे होंगे कि मैं यह क्या विपरीत बात लिख रही हूं… रिश्तों में बंधन और आज़ादी…! 
जी हां! रिश्तों में इन दोनों का एक समान महत्व है। लेकिन फिर भी सच यही है कि अधिकतर लोग रिश्तों में सिर्फ बंधन बनाकर रखना चाहते हैं। दरअसल रिश्ता खुद स्वयं में बंधन ही है। प्रेम का बंधन अच्छा है लेकिन यही बंधन जब कसने लगे तो प्रेम भी कसमसाने लगता है। बड़ी अजीब बात है कि प्रेम में बंधन न हो तो प्रेम अतृप्त रहता है और प्रेम में बंधन कस जाए तो प्रेम अधीर हो उठता है। 
रिश्ते स्नेह का बंधन पसंद करते हैं लेकिन बिलकुल वैसे ही जैसे आटे में नमक का संतुलन। बच्चों को अच्छा लगता है कि मां-बाप उनसे उनके बारे में पूछें, भाई-बहन खुश होते हैं जब उनके आत्मज उनकी फ़िक्र करते हैं, पति-पत्नी को यह बहुत अच्छा लगता है कि उनका जीवन साथी उनके लिए उत्सुक है।… लेकिन दूसरी तरफ़ यदि इसका संतुलन गड़बड़ा जाए तो यही सब बंधन बन जाता है।
बच्चे शिकायत करने लगते हैं कि मां-बाप पूछ-पूछ कर उनके जीवन में हस्तक्षेप कर रहे हैं; भाई-बहन भी ज्यादा फ़िक्र किए जाने पर परेशान हो उठते हैं; पति-पत्नी को लगने लगता है कि उनका पार्टनर उनके स्पेस का हनन कर रहा है। रिश्तों में ‘स्पेस’ का बड़ा महत्त्व है। 
‘आज़ाद कर देना’ रिश्तों को प्रेम के धागे से बांधे रखने की एक अनूठी कला है। रिश्तों के धागे ऐसे ही होते हैं। धागे के बिना मोती एक लय नहीं हो सकते। धागा ही उन्हें पिरोए रहता है। वह खुद को छुपाकर भी मोतियों का ही सौंदर्य निखारता है। उसी तरह से थोड़ी-सी आज़ादी किसी भी रिश्ते को न सिर्फ बचाए रखती है बल्कि संवारती भी है।
आजादी रिश्तों के लिए जीवनदायिनी सांस के समान है। व्यक्ति सांस लेता रहे तो जीवन चलता रहता है, रिश्ते भी सांस लेते रहें तो उसमें घुटन नहीं होती। लेकिन फिर भी संतुलन बहुत आवश्यक है। प्रेम के रिश्तों को इतना भी आज़ाद नहीं कर देना चाहिए कि फिर कोई बंधन ही न रहे। अक्सर लोग नाराज़गी में एक-दूसरे से पूछना-बताना बंद कर देते हैं। शुरू में तो इससे बड़ा सुकून महसूस होता है लेकिन बाद में यही आदत रिश्तों में दूरियां बढ़ाने का काम करती है और आपसी प्रेम खत्म होने लगता है। 
आज़ादी इतनी भी नहीं होनी चाहिए कि एक-दूसरे के बिना जीने की आदत ही हो जाए। इसीलिए प्रेम के रिश्ते में आज़ादी और बंधन दोनों का संतुलन जरूरी है। 
प्रेम इतना अतृप्त न रहे कि असंतुष्ट हो उठे और इतना संतुष्ट भी न हो जाए की अधीरता ही न बचे। प्रेम ऐसा ढीला-ढीला सा बंधन हो जिसमें जुड़ाव भी रहे और स्पेस भी…

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