Sunday, July 26, 2026
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प्रवीण बनजारा की कविता

मैं बड़े होकर पत्ता बनूँगी

आज मैं एक कोंपल हूँ
नवजात, रक्तिम
दुनिया से नए नए हुए परिचय
से उत्तेजित
हवा में इठलाती
जीवन का स्वागत करती
एक ताजा ताजा कोंपल

पेड़ की डाल से लटकती
फुनगियों से घिरी
जीवन को दोनों हाथों से लूटती
चमकती धूप में
स्वयं भी चमकती
पेड़ की दृढ़ पकड़ के प्रति आश्वस्त
झूमती मदमाती
एक कोंपल

कल को
मैं बड़ी होकर पत्ता बनूँगी
मेरी चाल में
कुछ गांभीर्य होगा
पेड़ की टहनी पर
अपने स्थान पर
साधिकार प्रतिष्ठित
मेरे भीतर भी अभिमान होगा,
यह पेड़
जो मेरा घर होगा
उसमें जमी मेरी जड़ मेरा
आधार होगी,
पेड़ का अस्तित्व
उसकी गरिमा,
मेरा अस्तित्व और
मेरी गरिमा होगी,
पेड़ का मिट्टी में स्थान
मेरा भी स्थान होगा,
कल को जब
मैं पत्ता बनूँगी

कितनी ही गिलहरियों, चिड़ियों, चीलों
और कौवों को
स्थान देने वाली टहनियों
को बनाए रखने में मेरा
भी कुछ लेखा जोखा होगा
पेड़ को पेड़ बनाने में मेरा
भी अंशदान होगा
पेड़ का गर्व
मैं भी अनुभव करूँगी
कल को जब मैं पत्ता बनूँगी

उसके भी बाद
जब मेरी शिराएं सूख जाएंगी
मेरी टहनी
जो मुझे पेड़ से जोड़ती है
जब सूख जाएगी,
फिर चटख जाएगी,
एक दिन इसी पेड़ की
जड़ों में
विश्राम लूँगी
और हवा में उड़ती
मिट्टी से ढँक कर
मैं सो जाऊँगी।
धीरे धीरे मेरा एक एक पोर
क्षरित होगा
बनेगा उस मिट्टी का हिस्सा
जिसमें पेड़ खड़ा है,
जो अपने पोषण के साथ
मुझे खींच लेगा अपनी
शिराओं में
मैं
उन शिराओं का रक्त बन
पेड़ के तने, उसकी टहनियों
और पत्तों में दौड़ूँगी,
पेड़ में ही समा कर
पेड़ का अवयव बन
कोंपलों में प्रकट हूँगी
कल को जब मैं पत्ता बनूँगी

  • प्रवीण बनजारा
    दिल्ली विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातकोत्तर। सेवा निवृत्त बैंक अधिकारी।
    एक कहानी संग्रह ‘मोरपंख’ 2025 में प्रकाशित।
    सम्पर्क – एच-0012, विंडसर कोर्ट, सेक्टर 78, नोएडा, उत्तर प्रदेश 201305
    मो – 9717879719
    मेल – [email protected]
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