पुस्तक- मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, कवयित्री- विजयराजमल्लिका
प्रकाशन- वाणी प्रकाशन, दिल्ली मूल्य- रु. 200/-
समीक्षक- डॉ. नितिन सेठी
वाणी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित ‘मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है’ काव्य संग्रह मलयालम भाषा की कवयित्री विजयराजमल्लिका की कविताओं का संग्रह है। इसका हिन्दी भाषा में अनुवाद सुमा एस. ने किया है। ट्रांसजेंडर विमर्श पर आधारित इन कविताओं में एक ट्रांसजेंडर की व्यथा-कथा कही गई है जिसके माध्यम से हम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के दैनिक जीवन में आने वाली अनेक समस्याओं को सामने पाते हैं। मुक्त छंद की ये कविताएँ अपनी अनेक पंक्तियों में पाठकों के सामने विभिन्न प्रकार के प्रश्न उत्पन्न करती हैं।
एलजीबीटी विमर्श को अक्सर ‘प्लस’ चिह्न लगाकर सम्बोधित किया जाता है। अम्ब्रेला टर्म के रूप में इसमें अनेक प्रकार की अस्मिताओं को पहचान दी गई है। ‘तीसरा लिंग’ कविता में कवयित्री कहती है-
क्या है? क्या है वहाँ कितने और हैं?
चौंकिए मत, चिन्ता मत कीजिए
हैरान मत होइए
जीवन-छतरी में विविधताएँ और भी हैं
जीवन छतरी में जो भी विविधताएँ हैं, वे सबकी सब यहाँ आकर एकाकार-सी हो गई हैं। तीसरे लिंग को समाज अक्सर हिजड़ा, बृहन्नला या शिखण्डिनी नामों से पुकारता है। उनके कानों में इस प्रकार की शब्दावली पिघले शीशे की तरह चुभती है और गहरे घाव दे जाती है। परन्तु यहाँ कवयित्री का साहस दर्शनीय है–
मैं अपने बच्चों को
बृहन्नला या शिखण्डिनी नाम दूँगी
ताकि उनके द्वारा भाषा में हुए
घातक घाव भर जाएँ
कॉलम में सिकुड़ें नहीं
भाषा में शब्द यदि घाव देते हैं तो सार्थक शब्द उन घावों की मरहम भी बन जाते हैं। तीसरे लिंग को संख्या के द्वारा संकेत दिए जाने की प्रथा पुरानी है। ‘एक’ और ‘दो’ तो समाज में सम्मानजनक स्थान पाते हैं लेकिन तीन के आते ही सभ्य समाज अपनी गिनती से भटक सा जाता है–
तीन और उससे ऊपर संख्याएँ
खोजे जाने के बावजूद
दो ने कभी ख़ुदकुशी नहीं की
वह तो दुगना होता ही रहा
फिर भी कुछ लोग अब भी
निहारते रहते हैं एक और दो को ही
और निर्धारित करते हैं मान-सम्मान और सीमाएँ
स्तम्भों में अंकित कर अंकुश लगाते हैं
गति और ठहराव दोनों ही मानव जीवन के स्वभाव हैं। रुकना-बढ़ना विभिन्न रूपों में प्रायः सबके साथ ही होता है। रेलवे कूपे में हाथ फैलाए हिजड़े का मार्मिक वर्णन करते हुए कवयित्री ने प्रतीकों के माध्यम से हिजड़ा कविता में अपनी बात कही है-
फिर भी तुम्हारी नज़रों में
है वो एक हिजड़ा ही जो कहीं का नहीं
क्या तुम पूर्ण हो?
रेल और काल एक जैसे…
दोनों आगे बढ़ते रहेंगे लेकिन
बीच में स्टेशन भी आते रहेंगे
‘कुछ लोग’ कविता भी संख्याओं और उनके सम्बोधन पर प्रश्न चिह्न उठाती है–
क्या संख्याओं के लिंग होते हैं?
क्या कोई लिंग स्थिति है?
कोई यौन साज-श्रृंगार है?
कोई सबूत है कहीं इसका?
ग्रीक पौराणिक कथाओं में ‘लेथे’ नदी का वर्णन आता है। कहा जाता है कि इसका पानी पीकर व्यक्ति अपना पिछला जीवन विस्मृत कर देता है। शब्द देखिए–
शब्दों का मन्थन होने के बाद लेथे में डूबकर
व्याख्याओं का नया अर्थ विस्मय बन जाता है
‘न लड़का न लड़की’ कविता लोरी के रूप में लिखी गई है। कवयित्री के हृदय में ममत्व कूट-कूटकर भरा हुआ है। इसीलिए वह महसूस करती है कि तृतीयलिंगी बच्चों को भी माँ-बाप का प्यार-दुलार चाहिए होता है। ममत्व की मार्मिकता देखिए–
अभिशाप नहीं हो तुम पाप नहीं हो तुम
प्यारे मेरे जीवन की किस्मत का तारा हो
प्रथम तारा तुम प्रथम तारा हो
समाज में अनेक तृतीयलिंगी अपनी पहचान को छिपाकर जीवन-यापन करने को मजबूर होते हैं। अपनी पहचान को सामाजिक परम्पराओं की धारा के साथ यदि वे बनाए रख पाते हैं, सामाजिक ताने-बाने में वे तभी फिट हो पाते हैं। ‘सुषुप्ति’ कविता में एक प्रिय अध्यापिका का निधन हो जाता है तो उससे जुड़े छात्र और व्यक्ति व्यथित होते हैं। परन्तु जब उसकी अजीब-सी बीमारी का पता लगता है, तब सब उसे अछूत मानकर उसके नि:स्पंद देह को भी तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं—
सुषुप्ति से उठने के बाद अब भी
चिकित्सा जगत् एक-दूसरे को ताकता है
सर का भार संभालने ठुड्डी पर हाथ रखता है
कि आख़िर प्रिय शिक्षक की मृत्यु का कारण क्या है?
प्रोस्टेट कैंसर
चौंकिए मत, विज्ञान का मज़ाक मत उड़ाइए सुनकर!
संग्रह में कुछ कविताएँ ऐसी हैं जिनमें अमूर्त तत्त्वों को अभिलेखित किया गया है। बिम्बात्मकता का गुण इन कविताओं की विशिष्टता है। ‘काल भैरवी’ ऐसी ही कविता है-
रंग-बिरंगी तितलियाँ सच जाने बिना गिर पड़ीं
विरह वीणा की श्रुति ध्वनियाँ एक से दूसरे में भर जाने वाली
चमकीली, प्यासी कलियाँ स्वप्न घटा वर्ष प्रकृति हैं
‘जन्म और मृत्यु’ कविता में मछली के काँटे के माध्यम से बात रखी गई है। मनुष्य मछली पकाते-खाते समय मछली के लिंग पर कोई विचार नहीं करता जबकि तृतीयलिंगी व्यक्ति के लिंग का भाव सबके गले में मछली के काँटे के समान अटक जाया करता है। तृतीयलिंगी व्यक्ति के सामने आते ही सबसे पहले उसका लिंगचिह्न ही हमें दिखाई देता है। यहाँ कवयित्री लिंगबोध पर प्रश्नचिह्न उठा रही है–
खाने की मेज़ पर तली हुई मछलियों का लिंग
हमें परेशान नहीं करता वे नर हैं या मादा
या नर-मादा से परे हैं तब भी हमारे
अस्तित्व का दिशाबोध वे गले में ठोंकते हैं
मछली के सिर के काँटे की तरह
वास्तव में यह लिंगबोध मछली के सिर के काँटों की तरह ही है जो गले में अटक जाते हैं और जिन्हें बाहर निकलना मुश्किल भी होता है। इसी प्रकार तृतीयलिंगी व्यक्ति के लिंग का बोध उस काँटे के समान है जो लोगों के गले से जल्दी नीचे नहीं उतरता।‘अर्धनारी’ कविता का भाव दर्शाता है कि समाज अर्धनारीश्वर को तो पूर्ण मानकर उसका आदर-सत्कार करता है जबकि अर्धनारी को अपूर्ण कहकर उसे दुत्कारा जाता है–
अर्धनारीश्वर
पूर्णता की तालियों से जिसका
सत्कार किया जाता है
अर्धनारियाँ अपूर्णता के दलदल में धँसी जाती हैं
भगवान चमकता है मानव जलता है
इनके बीच कहीं नीति खुदकुशी करती है
कवयित्री का स्पष्ट कथन है कि तृतीयलिंगी किसी के प्रेम में रोगी हो अथवा रागी, वह होता हरदम अनुरागी ही है। यही अनुराग उसे जिजीविषा प्रदान करता है और जीवन-रस से अनुप्राणित और अनुभावित भी करता है। ट्रांसजेंडर्स की राहों में अनेक बंदिशें हैं, समस्याएँ हैं परन्तु उनके जीने की राह इन्हीं सबके बीच में से होकर निकलती है। उनका अडिग नज़रिया उन्हें अपने लक्ष्य से भटकने नहीं देता। ‘झटका’ कविता का भाव है–
रंग जाति लिंग सेक्स
छिपकर, छुपकर
स्पष्ट झटका, भारी आघात
पर सर उठाकर, सीना तानकर
जियो तो अडिग होगा नज़रिया
‘कितने लोग’ कविता में अपनी अस्मिता से जूझते हुए कवयित्री प्रश्न उठाती है कि एक शख़्स के अंदर कितने शख़्स और छिपे होते हैं। तृतीयलिंगी की पीड़ा, उत्सुकता, आकांक्षा को यह कविता गहराई से दर्शाती है। ईश्वर से प्रश्न-प्रतिप्रश्न करती कविता है ‘सुनवाई’ जिसमें अपने जन्म और अपने अस्तित्व को लेकर कवयित्री ईश्वर से प्रश्न करती है। कवयित्री को प्रकृति के रूप में अपनी साथी भी मिल गई है। ‘सुनवाई’ कविता का भाव देखिए–
तेरे अनुयायी तेरी वकालत करेंगे
मेरी वकालत करेगी यह प्रकृति!
संविधान पर हाथ रखकर
बता सच, केवल सच
क्या मनुष्य जन्म सिर्फ़ स्त्री पुरुष के रूप में हुआ था?
बता ईश्वर, हे करुणानिधान, बता
कि मौन से बड़ा कोई पाप है?
सभ्यता अपने बने-बनाए नियमों में चलती है। इसके कुछ ऐसे अभिजात्य चिह्न होते हैं, जिनके बँधे-बँधाए दायरे में यह अपनी लीक पर चलती है। ‘निशान’ कविता में यही तथ्य दर्शाया गया है–
तुम्हारा चश्मा भले ही मैंने पहना
पर तुझने मुझमें जो फ़र्क देखा
मुझे वह तुममें नहीं दिखा
समस्या चश्मे की है या नज़रिये की?
यही हाल आज ट्रांसजेंडर का है। हम उन्हें एक ऐसे चश्मे से देखते हैं कि उससे बाहर उनकी दुनिया हमें दिखाई ही नहीं देती। कवयित्री मलयालम भाषा में अनेक भावपूर्ण काव्यकृतियों की रचना कर चुकी है। वह इस बात से संतुष्ट है कि उसके हृदय के भाव किसी नदी की भाँति सूख नहीं गए अपितु कविता के रूप में सामने आकर पुनः खिल-से गए हैं। उसके लिए कविता एक सदानीरा नदी है। नदी के रूपक के माध्यम से ‘नदी’ कविता में यह बात आई है-
एक सूखी नदी का कविता के रूप में पुनर्जन्म हुआ
मेरा पुण्य बनकर वह लहराने लगी
जिससे पंक्तियों के बीच में अनजाने ही
लेबल्ड श्रुतियों की जन्मान्तर स्मृति की खोज में
मन के तहख़ानों में
जुगनू बनकर मैं खिलने लगी
खिल रही मैं
‘लिंग च्युति’ कविता एक चुनौती है मनुष्यता को। सामान्यतः हम तृतीयलिंगी व्यक्ति के रंग-रूप, व्यवहार आदि से घृणा करते हैं। तब कवयित्री स्वयं आगे बढ़कर आगाह करती हुई पूरी मानवता को संदेश देती है–
मुझे पसंदीदा कपड़े पहन
रोशनी की नयी राह पर बढ़ते देख
तुम्हारी आँखों में अगर गुस्सा आ जाए
तो समझ लो तुम्हारे अन्दर का मनुष्य
पागल हो गया है और यही लिंग च्युति है
तुम्हें नीचे धकेलना वाला दोहरा भँवर
इसी क्रम में ‘जेंडर’ शब्द की अर्थवत्ता और इसकी स्पष्टता पर भी कवयित्री विचार अभिव्यक्त करती है–
मेरा नाम है जेंडर अंतर जाने बिना
तुम लोगों द्वारा इन्द्रियों से जोड़ दी गई
आत्मतुष्टि हूँ मैं
यह प्रश्न बार-बार प्रकारांतर से अनेक कविताओं में उठकर हमारे सामने आता है कि ‘मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है’। इस प्रश्न का उत्तर कवयित्री भले ही सम्पूर्ण मानवता से माँग रही हो परन्तु मानवता निरुत्तर है, निष्प्राण है, निष्क्रिय है– ट्रांसजेंडर्स के इन प्रश्नों के सामने। पूरे संग्रह में कदाचित् इसी प्रश्न को हम विभिन्न रूपों में, विभिन्न मुद्राओं में और विभिन्न विचारों में अनुभव कर सकते हैं। यह केवल एक प्रश्न नहीं है अपितु पूरी मानव सभ्यता के समक्ष सदियों से उपेक्षित होते आए तृतीयलिंगी समाज की जीवन-व्यथा भी है, जिसका उपयुक्त उत्तर आज तक प्रतीक्षा की दहलीज़ पर ही खड़ा हुआ है। पुरुष और स्त्री के खाँचों से बाहर रहकर कवयित्री अपने अस्तित्व, अपनी पहचान और अपनी जीवनयात्रा की सार्थकता को खोजने के लिए अनेक प्रश्नों को अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती है। संग्रह की अनेक कविताएँ प्रेम संवेदना को भी समेटे हुए हैं। यहाँ प्रेम की प्रतीक्षा है, प्रियतम से मनुहार है, उससे शिकायत भी है और साथ ही हैं प्रणय के नि:शब्द प्रवाह से परिचित करवातीं मधुसिक्त मन की कोमलकांत भावनाएँ। पुस्तक की भूमिका में कवयित्री के मार्मिक शब्द उल्लेखनीय हैं,“भारत की आजादी के 76 साल बाद भी समानता शब्द हमारे लिए आज भी मृगतृष्णा है। लैंगिक न्याय सुनिश्चित किए बिना समानता कैसे स्थापित की जाएगी, यह भी एक प्रश्नचिह्न है। केवल पुरुष-महिला द्वन्द्व और उनके संघर्षों का जश्न मनाने के आदी बने सामाजिक परिवेश में यह जरूरी है कि लैंगिक अल्पसंख्यक मनुष्यों के जीवन और अस्तित्व को राजनीतिक रूप से देखा जाए। हमारी त्रासदी यह है कि समाज को बार-बार याद दिलाना पड़ता है कि हम भी इंसान हैं। यहाँ तक कि जब यह कहा जाता है कि ट्रांसजेंडर को इंसानों के रूप में देखा जाता है, तब भी हमारा मानवाधिकार सम्बन्धी सवाल बिना किसी निश्चित उत्तर के खिंच जाता है। मैं परिकल्पना करती हूँ और इस बात पर ज़ोर देती हूँ कि लेखन के द्वारा, विशेषकर कविता के द्वारा, होने वाला रचनात्मक हस्तक्षेप एक शानदार सामाजिक क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण कदम है।”
उल्लेखनीय है कि कवयित्री के मलयालम भाषा में प्रकाशित सात अलग-अलग काव्य-संग्रहों में से ये कविताएँ चयनित की गई हैं और इन्हें हिन्दी भाषा में अनुवादित किया गया है। इन कविताओं में दैनिक जीवन के प्रश्न हैं, समाज के प्रश्न है और उससे बढ़कर ट्रांसजेंडर्स के जीवन के प्रश्न हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए कल्पना-जगत् नहीं दिखाई देता बल्कि कुछ ज्वलंत समस्याएँ और कुछ चुभते हुए विचार सामने आते हैं। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से मनुष्यता की पहचान को बचाने के लिए, उस पहचान को बनाए रखने के लिए और उसे उजागर करने के लिए बार-बार पूछता है कि ‘मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है।’ शारीरिक विकृति आखिर क्यों दूसरों की दृष्टि में एक सामाजिक विकृति बन जाती है, इस सन्दर्भ में ये कविताएँ बार-बार प्रश्न उठाती हैं। इन चुभते हुए प्रश्नों में ट्रांसजेंडर जीवन की विरह-वीणा की श्रुति ध्वनियाँ स्पष्ट सुनाई देती हैं और बार-बार पाठक के मन को भी उद्वेलित करती हैं।
सबसे उल्लेखनीय बात इन कविताओं की यह है कि कवयित्री विजयराजमल्लिका स्वयं एक ट्रांसजेंडर कवयित्री हैं जो मलयालम भाषा में लिखती हैं। अपने जीवन के दर्द को उन्होंने स्वयं अपनी कविता के शब्दों में ढालकर उन्हें मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। ये कविताएँ पाठकों को उनके जीवन के यथार्थ से परिचित करवाती हैं। कवयित्री के जीवन-संघर्षों का यह काव्यमयी रूपांतरण पाठकों के साथ ही मानो स्वयं उसके सामने भी एक बड़ा प्रश्न कवयित्री के ही शब्दों में छोड़ जाता है– ‘मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है’।
- डॉ. नितिन सेठी
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