बहुत अच्छा लगता है जब मित्र लोग पुरवाई पत्रिका को ठेठ अपनी पत्रिका मानते हैं। भाई अशोक चक्रधर जी का वह्ट्सएप संदेश आया – “प्रिय तेजेन्द्र, ये कहीं एक डायरी में पड़ी मिल गई थी, ताज़ा और एकदम अप्रकाशित है…।” इससे आगे उन्हें ना तो कुछ कहने की आवश्यकता थी और ना ही समझाने की। हमें यह बिन माँगी प्रसन्नता हासिल हो गई कि हम अशोक जी की अप्रकाशित कविता पुरवाई के पाठकों को पेश कर पा रहे हैं। – संपादक
ख़ुशियाँ बाँटते हैं तो
हमारे एक पड़ोसी के तेवर अचानक क्रोधीले
और अंदाज रौबीले हो गए,
इतने क्रोधीले-रौबीले कि
उनके आगे हम भी पिचके हुए पतीले हो गए।
…मिस्टर दुआ!
बताइए तो सही क्या हुआ?
…देखिये कविराज
आपने बेटी के ब्याह में बुलाया,
हमारा पूरा परिवार आया।
आफत नहीं काटी,
वहाँ हर संभव खुशी बांटी।
जो भी खाद्य सामग्री बफे में रखी थी,
हमने एक-एक करके चखी थी।
किसी में नमक डलवाया
किसी में मिर्च कम कराई,
सलाद के कॉर्नर पर एक-एक प्लेट जमाई।
और बताओ किसने मंगवाई थी शहनाई?
हर चीज़ का मुआयना, किया सारे काम जांचे
द्वाराचार के समय बारातियों के साथ भी नाचे।
हमें बेटे की शादी में भूल गए,
हमारी मोहब्बत के सारे जज्बात फिजूल गए?
बचुआ…!
…हम बचुआ नहीं हैं दुआ!
मुझे बता रहा था हलवाई,
बेटी के ब्याह में
अच्छी-ख़ासी रसमलाई तो
तुम्हीं ने ख़ामख़ां सड़ी हुई बताई,
दोबारा कहीं से नई मंगवाई।
ताज़ा के नाम पर,
ध्यान भी नहीं दिया उसके औने-पौने दाम पर।
सब याद है, पर छोड़ो,
मोहब्बत के नाम पर रौब ग़ालिब करके
हमारी गर्दन मत मरोड़ो!
तुम्हें हमने सपरिवार बुलाया था,
साफ बता रहे हैं
उस शादी में तुम्हारी तरफ से
कोई लिफाफा नहीं आया था।
खुशियों के लिए
हम किसी के तलुवे नहीं चाटते,
अरे खुशियां बांटने के शौकीन हो
तो, थोड़ा खर्चा भी तो बांटते!
अब हमें अपने एहसान के भाड़ में मत भुनो!
तभी पत्नी बोलीं… अरे सुनो!
तुमने एक बिना नाम का
मोटा सा लिफाफा भी तो
किसी से लिया था,
दुआ बोले…
वो हमने ही तो दिया था।
…अरे-अरे! सॉरी सॉरी वैरी सॉरी भाई दुआ!
…सॉरी की क्या बात है
समझो कि कुछ नहीं हुआ?
पर, हम अगर चखते हैं या खाते हैं
तो देश के बरातियों के लिए खाते हैं,
परिवार को तो सबसे बाद में खिलाते हैं।
लेकिन हमारी नजर में
जो देश को सड़ी हुई रसमलाई परोसते हैं,
उन्हें तो हम जम कर कोसते हैं।
कविराज! हम हर जगह
काम करते हुए ही दिखते हैं,
पहचान यही है कि
लिफाफे पर अपना नाम नहीं लिखते हैं।
और जी आपको क्या बताएं
उस दिन से वे हमारे लिए
आत्मीयता के मर्म की
एक उन्नत पुस्तक हो गए,
और हम शर्म से नतमस्तक हो गए।
- पद्मश्री अशोक चक्रधर
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