Wednesday, October 7, 2026
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स्मृतियों के झरोखे से झरती मनुष्यता : ‘स्मृति के झरोखे से’ का साहित्यिक मूल्यांकन

पुस्तक : स्मृति के झरोखे से,   लेखिका : डॉ. सुरेखा भारती, प्रकाशन : सितंबर 2025,
प्रकाशक : क्रांतिकारी विचार मंच, इंदौर, समीक्षा- -डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे, नीदरलैंड

डॉ. सुरेखा भारती की पुस्तक स्मृति के झरोखे से को पढ़ना केवल चौबीस संस्मरणों से गुजरना नहीं है, बल्कि यह उन मनुष्यों, संबंधों और जीवन-मूल्यों के बीच से होकर गुजरना है, जिन्होंने लेखिका के व्यक्तित्व और चेतना को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया। यह पुस्तक स्मृति को अतीत की निष्क्रिय गठरी न मानकर जीवन से अर्जित अनुभवों, संस्कारों, संबंधों और प्रेरणाओं की जीवित निधि में रूपांतरित करती है। लेखिका स्वयं इस संग्रह को चौबीस संस्मरणों के रूप में प्रस्तुत करती हैं और चौबीस की संख्या को भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं की परंपरा से जोड़ते हुए जीवन में निरंतर सीखते रहने की आवश्यकता पर बल देती हैं। मेरी उनसे पहला परिचय इंदौर में शुभ-संकल्प “ साहित्यिक संस्था की संस्थापिका व वरिष्ठ पत्रकार व समाजसेवी डॉ. सुनीता श्रीवास्तव जी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हुआ था। वहाँ मैंने उनकी कविताओं ने मेरे मन को बहुत प्रभावित किया।डॉ. सुरेखा भारती जी की इससे पहले भी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। मध्यप्रदेश के साहित्यकारों में उनका नाम सम्मान से लिया जाता है। यह पुस्तक मेरे लिए बहुत विशेष रही। इस पुस्तक के माध्यम से मुझे उन्हें  कुछ औक पास से जानने समझने का अवसर प्राप्त हुआ ।

स्मृति से साहित्य तक की यात्रा

संस्मरण साहित्य की वह विधा है जिसमें निजी अनुभव सार्वजनिक संवेदना का रूप ग्रहण करता है। लेखक किसी व्यक्ति, घटना अथवा समय को याद करता है, लेकिन अच्छी रचना केवल ‘मैंने क्या देखा’ तक सीमित नहीं रहती; वह यह भी पूछती है कि उस अनुभव ने मुझे क्या दिया और उससे पाठक क्या ग्रहण कर सकता है। स्मृति के झरोखे से की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यही है कि यहाँ व्यक्तिगत स्मृति धीरे-धीरे सामूहिक जीवन-मूल्यों का दस्तावेज बनती जाती है।

लेखिका के ‘आत्मनिवेदन’ में यह दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है। उनके जीवन में आए व्यक्तियों को वे अपने लिए सीख और प्रेरणा के स्रोत के रूप में देखती हैं। कोई साधना की ओर ले जाता है, कोई कर्म की ओर, कोई साहित्य की ओर और कोई मानवीय संवेदना की ओर। इसीलिए पुस्तक के पात्र एक समान प्रकृति के नहीं हैं। संत और आध्यात्मिक व्यक्तित्व हैं तो कवि और साहित्यकार भी; कलाकार हैं तो सामाजिक कार्यकर्ता भी; माता-पिता और आत्मीय संबंध हैं तो एक रिक्शा चालक और ट्रक ड्राइवर जैसे सामान्य जीवन के पात्र भी हैं।

यही विविधता इस पुस्तक की संरचना को रोचक बनाती है।

बड़े नामों के साथ छोटे-से दिखने वाले जीवन की बड़ी रोशनी

पुस्तक में पं. रामाकांत त्रिपाठी, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, लता मंगेशकर, सुरेश चंद्र दुबे ‘ज्योति कानपुरी’, पं. सत्यनारायण ‘सत्तन’, सद्गुरु भैय्यूजी महाराज, ब्रह्मर्षि पत्री, डॉ. योगेंद्र नाथ शुक्ल, निर्भय हाथरसी, शांता शेळके और प्रो. गणेश दत्त त्रिपाठी जैसे अनेक उल्लेखनीय व्यक्तित्वों के संस्मरण हैं। पर पुस्तक की वास्तविक उपलब्धि केवल इन प्रसिद्ध नामों का स्मरण करना नहीं है।

इसके समानांतर लेखिका उन व्यक्तियों को भी अपनी स्मृति में प्रतिष्ठित करती हैं जिनका सार्वजनिक जीवन शायद उतना चर्चित नहीं रहा—माँ, मामी, पिता, सामाजिक सहयोगी, डॉक्टर, पत्रकार, ड्राइवर अथवा रिक्शा चालक। इस दृष्टि से पुस्तक का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक संदेश सामने आता है—मनुष्य की महत्ता केवल उसकी प्रसिद्धि से निर्धारित नहीं होती।

‘मैडम, चाबियाँ मिल गई’ में एक रिक्शा चालक की ईमानदारी और मानवीयता सामने आती है। बैंक की चाबियों वाला पर्स मिलने पर उसका उसे सुरक्षित लौटाना एक साधारण घटना प्रतीत हो सकती है, लेकिन लेखिका उसे विश्वास और मानवता के अनुभव में बदल देती हैं। इसी तरह ‘डोली की रात और वह फरिश्ता’ में यात्रा के दौरान संकट में फँसे लोगों की सहायता का प्रसंग भय, असहायता और अप्रत्याशित मानवीय सहयोग को एक साथ सामने लाता है।

इन संस्मरणों का साहित्यिक सौंदर्य इस बात में है कि लेखिका बड़े विचारों को छोटी घटनाओं से सिद्ध करती हैं।

लता मंगेशकर : विराट व्यक्तित्व का आत्मीय स्पर्श

लता मंगेशकर से जुड़ा संस्मरण पुस्तक के अत्यंत आत्मीय प्रसंगों में है। लेखिका उनके साथ बिताए चार घंटों को अपने जीवन के अविस्मरणीय क्षणों के रूप में देखती हैं। यहाँ किसी महान कलाकार का मूल्यांकन संगीत-शास्त्रीय भाषा में नहीं किया गया, बल्कि एक निकट साक्षात्कार से उनकी सरलता, सहजता और आत्मीयता को पकड़ा गया है।

चप्पल संभालने, पूजा के समय रुमाल देने और उस छोटे-से आत्मीय संवाद जैसे प्रसंगों के माध्यम से लेखिका ने एक विराट सार्वजनिक व्यक्तित्व को निजी मानवीय क्षण में देखा है। संस्मरण की शक्ति यहीं है—वह प्रसिद्ध व्यक्ति को ‘प्रतिमा’ से फिर ‘मनुष्य’ में बदल देता है।

गुरु, अध्यात्म और आस्था का संसार

पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा आध्यात्मिक अनुभवों से निर्मित है। पं. रामाकांत त्रिपाठी से प्राप्त श्रीरामचरितमानस की प्रेरणा, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य से गायत्री मंत्र की दीक्षा, सद्गुरु भैय्यूजी महाराज के साथ जुड़ी स्मृतियाँ, ब्रह्मर्षि पत्री के पिरामिड ध्यान और अवधूत बाबा शिवानंद की साधना—ये सभी प्रसंग लेखिका की आध्यात्मिक यात्रा के अलग-अलग पड़ाव हैं।

पं. रामाकांत त्रिपाठी के प्रसंग में यह विशेष रूप से दिखाई देता है कि गुरु केवल धार्मिक व्यक्ति नहीं, बल्कि लेखिका के लिए ज्ञान और भाषा के द्वार खोलने वाले व्यक्तित्व बन जाते हैं। लेखिका स्वीकार करती हैं कि श्रीरामचरितमानस के अध्ययन ने उनकी हिंदी को भी समृद्ध किया। इस प्रकार गुरु-स्मृति व्यक्तिगत श्रद्धा से आगे बढ़कर आत्मनिर्माण की कथा बन जाती है।

हालाँकि इन प्रसंगों में लेखिका की आस्था बहुत प्रबल है और कई स्थानों पर उनका स्वर श्रद्धा-प्रधान हो जाता है। इसे संस्मरण की कमजोरी के बजाय उसकी प्रकृति के रूप में समझना अधिक उचित होगा—क्योंकि यहाँ लेखक निष्पक्ष जीवनीकार नहीं, बल्कि अनुभव की साक्षी और श्रद्धाभाव से जुड़ी स्मृतियों की संवाहक हैं।

स्त्री-अनुभव की अंतर्धारा

पुस्तक को केवल व्यक्तित्व-संस्मरणों का संग्रह मानना उसके एक महत्वपूर्ण पक्ष को अनदेखा करना होगा। इसके भीतर स्त्री-अनुभव की एक शांत लेकिन मजबूत धारा बहती है।

माँ, मामी, शैलजा राजे, डॉ. सुनीता श्रीवास्तव, अंजलि ताई भोयर और अन्य महिला व्यक्तित्वों के संस्मरणों में स्त्री के त्याग, स्वाभिमान, सामाजिक सहभागिता, आत्मनिर्भरता और रचनात्मकता के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

‘माँ का स्वाभिमान’ विशेष रूप से घरेलू स्मृति को सामाजिक अर्थ प्रदान करता है। एक ऐसी माँ की कथा, जिसने सीमित साधनों और पारिवारिक परिस्थितियों के बीच नर्सिंग प्रशिक्षण लेकर अपने जीवन को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया, केवल व्यक्तिगत मातृ-स्मरण नहीं रह जाती; वह उस पीढ़ी की स्त्री-संघर्ष कथा बन जाती है जिसने परिस्थितियों के भीतर रहते हुए अपने लिए रास्ते बनाए।

इसी तरह डॉ. सुनीता श्रीवास्तव का प्रसंग महिलाओं को लेखन और अभिव्यक्ति के लिए मंच उपलब्ध कराने की पहल को सामने लाता है। इस प्रकार पुस्तक में स्त्री केवल ‘स्मरण की पात्र’ नहीं है; वह निर्माता, संघर्षकर्ता, मार्गदर्शक और सामाजिक सक्रियता की वाहक भी है।

साहित्य और साहित्यकारों के प्रति आत्मीय ऋण

लेखिका स्वयं साहित्य और कविता की दुनिया से जुड़ी हैं। इसलिए कवियों और साहित्यकारों के संस्मरणों में एक विशेष आत्मीयता दिखाई देती है। ‘ज्योति कानपुरी’ के संस्मरण में केवल एक कवि और गीतकार की चर्चा नहीं है, बल्कि उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को रेखांकित किया गया है जिसने लेखिका के जीवन में आत्मनिर्भरता का मार्ग खोला।

निर्भय हाथरसी का संस्मरण मंचीय कविता की एक पूरी सांस्कृतिक दुनिया की याद दिलाता है,वह दौर जब कवि सम्मेलन देर रात तक चलते थे, कवि तत्काल कविता रचते थे और श्रोता कविता के साथ जीवंत संवाद करते थे। यह प्रसंग निजी स्मृति के साथ-साथ हिंदी के लोकप्रिय कवि-सम्मेलन की सांस्कृतिक स्मृति भी बन जाता है।

प्रो. गणेश दत्त त्रिपाठी के प्रसंग में बाजारवाद और साहित्य के बदलते मूल्य-मानदंडों पर लेखिका की चिंता सामने आती है। यहाँ संस्मरण अपने निजी दायरे से निकलकर साहित्य की सामाजिक भूमिका पर विचार करने लगता है।

पुस्तक का सबसे सुंदर पक्ष : मनुष्य को याद रखने की नैतिकता

इस पुस्तक को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि लेखिका की मूल चिंता ‘प्रसिद्ध लोगों को याद करना’ नहीं, बल्कि अच्छे मनुष्यों को विस्मृति से बचाना है।

यही कारण है कि पुस्तक में प्रसिद्धि का कोई कठोर पदानुक्रम नहीं है। लता मंगेशकर और एक रिक्शा चालक एक ही स्मृति-लोक में उपस्थित हो सकते हैं; एक संत और एक माँ, एक कवि और एक सामाजिक सहयोगी—सभी लेखिका के जीवन में अपनी-अपनी जगह रखते हैं।

यह दृष्टि पुस्तक को मानवीय बनाती है।

भाषा और शिल्प

स्मृति के झरोखे से की भाषा सहज, आत्मीय और संवादधर्मी है। लेखिका ने कठिन साहित्यिक शब्दावली के स्थान पर बोलचाल की हिंदी को प्राथमिकता दी है। अनेक जगह घटनाएँ सीधे संवादों के माध्यम से जीवंत होती हैं। इस कारण पाठक को ऐसा अनुभव होता है जैसे लेखिका सामने बैठकर अपने जीवन की घटनाएँ सुना रही हों।

शिल्प की दृष्टि से पुस्तक का आधार घटना → स्मृति → आत्मानुभूति → मूल्यबोध का क्रम है। यही इसकी स्वाभाविक गति है।

हाँ, कुछ संस्मरणों में घटनाओं के बाद आने वाला नैतिक निष्कर्ष अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष है। कई स्थानों पर एक ही प्रकार के मूल्य—सेवा, श्रद्धा, संघर्ष, संस्कार, मानवता—दोहराते हुए आते हैं। साहित्यिक दृष्टि से यदि इन निष्कर्षों को थोड़ा अधिक संकेतात्मक छोड़ा जाता और पाठक को स्वयं अर्थ ग्रहण करने का अधिक अवकाश मिलता, तो रचनात्मक प्रभाव और गहरा हो सकता था। इसी तरह कुछ प्रसंगों में भावुकता और श्रद्धा का स्तर इतना बढ़ जाता है कि आलोचनात्मक दूरी कम हो जाती है। लेकिन संस्मरण की आत्मकथात्मक प्रकृति को देखते हुए यह उसकी मूल संरचना का हिस्सा भी है।

स्मृति का निजी एल्बम नहीं, एक सामाजिक दस्तावेज

पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि यह अपने समय की कई सांस्कृतिक परतों को सुरक्षित करती है। इसमें इंदौर का साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश है, कवि सम्मेलनों की दुनिया है, आध्यात्मिक संस्थाओं की गतिविधियाँ हैं, महिलाओं के साहित्यिक मंच हैं, सामाजिक सेवा है और बदलते समय के बीच मनुष्यता को बचाए रखने की चिंता भी है।

इस अर्थ में स्मृति के झरोखे से को केवल ‘संस्मरण-संग्रह’ कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह एक व्यक्ति के जीवन से होकर एक सामाजिक-सांस्कृतिक समय का अनौपचारिक इतिहास भी रचती है।

लेखिका जिन लोगों को याद करती हैं, उनके माध्यम से वास्तव में वे अपने समय के उन मूल्यों को याद करती हैं—गुरु-शिष्य परंपरा, माता-पिता के संस्कार, साहित्य के प्रति समर्पण, समाजसेवा, स्त्री की आत्मनिर्भरता, कलाकार के प्रति सम्मान, संकट में सहयोग और मनुष्य के प्रति विश्वास—जो आज के तेजी से बदलते समय में पुनर्विचार की माँग करते हैं।

निष्कर्ष : स्मृति से संस्कार तक

स्मृति के झरोखे से का वास्तविक महत्व इस बात में है कि यह अतीत को केवल याद नहीं करती, अतीत से वर्तमान के लिए अर्थ निकालती है। डॉ. सुरेखा भारती ने अपने जीवन में आए चौबीस व्यक्तित्वों को अपने ‘गुरु’ की तरह देखा है—कहीं वे ज्ञान देते हैं, कहीं संघर्ष की शक्ति, कहीं सेवा का भाव, कहीं साहित्य का संस्कार और कहीं सामान्य मनुष्य होने की गरिमा।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए अंततः एक प्रश्न पाठक के सामने भी खड़ा होता है—हमारे जीवन में आए लोग हमें क्या देकर गए और हमने उनकी कौन-सी सीख अपने भीतर बचाकर रखी?

यही प्रश्न इस पुस्तक को महज संस्मरण-संग्रह से ऊपर उठाता है।

स्मृति के झरोखे से की लेखिका ने अपने अतीत की खिड़की खोली है; उस खिड़की से केवल पुराने चेहरे नहीं दिखाई देते, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों, संबंधों, साहित्य, अध्यात्म और मानवीय संवेदना की अनेक रोशनियाँ दिखाई देती हैं। पुस्तक का सबसे बड़ा साहित्यिक अवदान शायद यही है कि यह हमें बताती है—स्मृति तब सार्थक होती है, जब वह केवल बीते हुए समय को नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए मनुष्यता को बचाकर रखे।

 यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो संस्मरण-साहित्य में व्यक्ति के साथ-साथ समय, समाज, संबंध और संस्कार की धड़कन सुनना चाहते हैं।

समीक्षक

डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे

शिक्षाविद, लेखिका, अनुवादिका,समीक्षक संपादक व

अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी संगठन नीदरलैंड

संपर्क [email protected]

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