शाम की पीली धूप अब धीरे धीरे कम होती जा रही थी।हलके उजाले की मैली-सी चादर बिछती जा रही थी।धुंधले आकाश में अभी भी कितनी ही पतंगे तेज़ ठंडी में हवा कांप रही थी।मेरी छत के कोने पर कुछ पतंगे और एक चरखरी अभी भी रखी थी।लेटी पसरी पतंगों पर जैसे ही थोड़ी हवा गिरती वो मुस्कुराकर नाचने लगती।धागे से बंधे होने के कारण वो खूंटे में बंधे बछड़े की भांति स्वयं को छुडाने की जिद सी करती दिखाई देती।उन्हें हंसता देख मेरी देह भी पल पल पुलकित हो रही थी।सब पतंगे उड़ाने में इतने व्यस्त थे कि किसी को भी भूख प्यास तक का होश ना था।जैसे ही किसी खेमे की पतंग की डोर टूट जाती “वो काटे” का स्वर हर तरफ गूंज जाता मानो किसी दुश्मन पर बहुत बड़ी विजय हासिल कर ली हो।वीकैंड की छुट्टी के कारण ये सिलसिला सुबह से शाम तक चलता रहा और दिन दबे पाँव कब निकल गया कुछ भी पता ना चला।
छतो पर हल्के अन्धेरे में पतंगें अपनी अंतिम उड़ान भर रही थी। आधा शहर अब तक घरों में घुस चुका था।तेज़ हवा में कुछ पतंगें सर्र सर्र उड़ रही थी।छत पर कम उजाले में पंखों के फैलने बंद होने का प्रतिबिम्ब देखकर मैं विस्मय से भर उठता लगता कोई पक्षी मेरे साथ छत पर क्रीड़ा कर रहा हो।मैंने छत के एक कोने में एक काली छाया अजीब सी फड़फड़ाहट के साथ गिरती दिखाई दी। मै छाया का पीछा करता उस ओर दौड़ा।
मैंने धुंधले से कोहरे में छत के एक कोने में क्षत-विक्षत कबूतर को फड़फड़ाते देखा।उसका शरीर मांजे में अटका हुआ था।कम रौशनी में वो काफी सहमा था जैसे वो रास्ता भटक कर अचानक सुनसान जगह पर आ गिरा हो।वो उड़ने में यहाँ तक की आगे बढने में भी असमर्थ-सा दिखा।मैंने उसे अपने हाथों में लेना चाहा वो एक पल वहीँ ठिठका पर उड़ ना सका।उसके पंजे और गर्दन के मध्य पतंग का तीला अटका था और तेज़ मांजे से उसका शरीर लहुलुहान होता जा रहा था।मैं उसे उठाकर एक ओर उजाले में ले गया।
सफ़ेद उजाले में उसकी गीली आँखे फटी थी वो तड़फ रहा था जिसे देखकर मेरी आँखे भी नम हो गयी।जाने कब से वो उस खतरनाक धागे में अटका था ।वो उस खतरनाक मांजे से छूटने की बार-बार कोशिश करता रहा।मैंने कैंची की सहायता से उसके इर्द गिर्द लिपटे धारदार धागे को जैसे ही काटना आरंभ किया वो मुझे आतुर नयनों से देखता रहा और बीच-बीच में कराहता भी रहा।मैंने जैसे तैसे उसे उलझे मांजे से मुक्त किया और साथ ही पतंग के तीले से उसके पंखों को सुलझाया।उसका दाया पंख बुरी तरह से कट चुका था।कम रौशनी में हवा अभी भी तेज़ थी जिसमे दो एक पतंगें पीली लालटेन बांधे दूर आसमा में हिल रही थी।
बारिश का–सा मौसम हो चुका था शायद तभी आज काले बादलो में एक भी तारा नज़र नहीं आ रहा था।हर तरफ गहरा अन्धकार और तेज़ हवा ही थी।मौसम को देखकर लगा कि आज बारिश होगी वो भी तेज़ बारिश।जैसे ही बिजली की महीन-सी रेखा ज़मीन पर गिरती डरा हुआ घायल कबूतर कांपकर अपनी लाल आँखे मूँद लेता जैसे कोई बड़ा पक्षी उस पर झपट रहा हो।हल्की-हल्की बूंदाबंदी कुछ देर में आरम्भ हो गयी ।मैंने उसे छत की एक ओट में बिठा दिया जहाँ वो भीग ना सके।वो चुपचाप बैठा मेरी ओर टुकुर टुकुर देखता रहा।कुछ दाने और पानी का इंतजाम करके मैं उसे खुली हवा में एक कोने में बिठा आया।
रात के खाने के बाद मैंने टोर्च उठाई और छत की ओर बढ़ने लगा ।बारिश अब बंद हो गयी थी।मैंने उसे अब काफी करीब से देखा वो एक ओर दुबका था पर उसका शरीर काफी जगह से ज़ख़्मी था। मांजे से कट जाने से जगह-जगह से लहू निकल रहा था।मैंने ज़ख्मों पर मरहम लगाकर उसे एक सुरक्षित स्थान पर दाने पानी के साथ बिठा दिया ताकि कोई बिल्ली आदि जानवर उस तक ना पहुँच सके।उसकी निराशा से भरी आंखें अभी भी मुझे देख रही थी उसने अपनी काली नुकीली चोंच को मिटटी के सिकोरे में डालकर पानी पीया कुछ दानों को क्षण भर देखकर मेरी और अपराधी की-सी निगाह से ताकने लगा जैसे वो कहना चाहता है कि मुझे कुछ नहीं खाना ।मैं यहाँ क्यों आ गया हूँ।मेरी क्या ग़लती थी।मैं तो रोज़ की भांति खुले आकाश में विचरण कर रहा था।शाम को जब मैं थक हारकर अपने घोंसले में एक तिनके को जोड़ना चाहा तो मेरे साथ ये सब हो गया।वो जैसे ही फड़फड़ाने लगता उसके कटे पंखो से रक्त टपकने लगता उसके ज़ख्म यकीनन असहनीय थे जिन्हें देखकर मेरी आँखे भी भीगती जा रही थी।जैसा ही मैंने अपनी टोर्च अब बंद की घने अन्धेरे में उस स्लेटी कबूतर का भय और दर्द से कांपना बहुत ही दुःखद प्रतीत हो रहा था।
मैंने सिगरेट सुलगाई और बालकोनी से बाहर गहरे अँधेरे को झांकता हुआ उस मासूम पंछी के बारे में ही सोचता रहा कि क्या वो सुबह तक अपने पंखों को तेज़-तेज़ हिलाकर पुन: हवा में ऊँची उड़ान भर सकेगा?
उसके सामने गिराए वो सारे दानों को चट कर चुका होगा?
मुझे लगा उसके ज़ख़्म शायद सुबह तक तो काफी ठीक हो जायेंगे।तेज़ हवा बारिश में भीगने के कारण और भी शीतल हो गयी थी।बारिश के छीटें गिरने से सारा शहर जैसे भीग गया हो।मुझे रह रहकर उस घायल पक्षी का कांपता चेहरा और अनेक अनसुलझे प्रश्न दिखाई देते रहे।मैं सोचता रहा कि ये जीव-जंतु कितने सीधे होते हैं जो बिना किसी चालाकी के अपने सीधे पथ पर चलते हैं पर क्रूर इंसान कुछ देर के आनंद की चाह में ऐसे कर्म करते हैं  कि ये नासमझ (पक्षी)समाज को अपनी जान से हाथ धोना पढता है। पतंग उड़ाना इंसान के लिए कुछ देर का मनोरंजन है किन्तु इस खतरनाक मांजे से कितने ही पक्षी यहाँ तक की अनजाने में मनुष्य भी चपेट में आ जाते हैं और अपनी जान गँवा देते हैं।
रात को बिस्तर पर जैसे ही मैं लेटा मेरी आँख लग गयी तभी उसी रक्तरंजित कबूतर का अक्ष मानो दबे पाँव आकर मेरे सिरहाने बैठ गया हो।उसके उदास भीगे नेत्र जैसे मेरी तरफ हताश नजरों से देख रहे हैं और अब उसे पता है कि वो कभी भी खुले आसमां में नहीं उड़ सकेगा। उसने रोते हुए बताया कि वो अपने परिवार के साथ बगल वाले घर की मुंडेर पर बने घोंसले में रहता है।उसके दो छोटे-छोटे बच्चे भी हैं और वो रोज़ सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही आसमां में दूर तक उड़ान भरता है। वो कभी किसी को तंग नहीं करते बल्कि एक-दूसरे को भाईचारे,प्रेम ,तीज-त्यौहारों व सलामती का पैग़ाम पंहुचाते हैं।इंसान हम पक्षियों पर कितने ही प्रयोग करते हैं पर हम सबकुछ सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।
जब वो छोटा मासूम नटखट-सा चूजा था तो उसने यहीं मेरी ही छत पर पहली उड़ान भरी थी।अब वो भोजन की तलाश में कभी कभी शहर की ओर भी चला जाता है पर अधिकतर यही आसपास की छतों पर ही रहता है।उनके मन में कभी भी कोई इर्ष्या-द्वेष नहीं आया ।उन्हें मंदिर,मस्जिद,गिरिजाघर या गुरूद्वारे में कोई फर्क नज़र नहीं आता क्योंकि उनकी नज़र में सबकुछ एक सामान है।ये सब केवल इंसानों की ही सोच है कि धर्म,जाति,सम्प्रदाय आदि अलग अलग हैं पर उनकी नज़र में तो सब एकसमान हैं और वो जानते हैं कि सबको मिलकर रहना है।वो इंसानो की तरह कभी नहीं लड़ते बल्कि अपने-अपने ठिकानों पर प्रेम से रहते हैं।उसने कराहते हुए कहा कि अगर वो नहीं बचा तो इंसानों को कोई फर्क नहीं पडेगा किन्तु उसका परिवार पूरी तरह टूट जाएगा।
उसके बच्चे अभी ठीक से उड़ भी नहीं पाते क्योंकि अभी वो बहुत ही छोटे हैं और उन्होंने हमारा संसार को ठीक से देखा तक नहीं है। वो सब अभी मुझ पर और कभी कबार  मेरी (प्रिया) मादा कबूतर पर ही निर्भर हैं। हमारे द्वारा लाये भोजन का इंतज़ार करते हैं।अगर मेरी प्रिया (बच्चो की माँ) भी मेरी तरह किसी रोज़ इधर-उधर तेज़ ज़हरीले मांजे में फंस गयी तो फिर उन बच्चों की देखभाल फिर कौन करेगा।हम पक्षियों को बड़े होते ही स्वयं का परिवार खुद बनाना होता है।वो मेरे बिना सब जीते जी ही मर जायंगे या कोई बड़ा पक्षी या जानवर उन्हें जिंदा नहीं छोड़ेगा।हम जैसे कितने बेकसूर पक्षी अब तक तेज़ मांजे से अपनी जान दे चुके हैं ।हम पर रहम करो इंसानों मानो वो हाथ जोड़े मेरे सम्मुख खड़ा हो।वो तड़फता हुआ कह रहा है मुझे बचा लो ,कृपया मेरी जान बचा लो ।हे (इंसान)मित्र मुझ पर कृपा करो। वो मेरी आँखों में अपने जीवित् रहने की उम्मीद देख रहा था।
मैं सपना देखता देखता आधी रात को हडबडाकर उठ गया ।मैं भयभीत था इधर उधर देखा पर मेरे सामने कोई नहीं था।मेरा चेहरा पसीने की बूंदों से भीगा था।रात का तीसरा पहर बीत रहा था।मैं खिड़की से बाहर झांका।बाहर हलके छीटें अभी भी गिर रहे थे।एक पल फिर आँखे मूंदी पर बाहर कहीं आसपास कोई लगातार खांस रहा था।जिसके कारण मैं चाहकर भी दुबारा ढंग से नहीं सो सका।मेरे दिल में अब बहुत सी आशंकाए जन्म ले चुकी थी।आँखे बंद करते ही वो पक्षी सामने मेरे सामने आ जाता।
सुबह तक वो ज़िंदा भी होगा या नहीं?
अब वो कभी उड़ सकेगा या नहीं?
जाने क्यों लगा उस जानलेवा मांजे ने उस पक्षी का एक पंजा और पंख पूरी तरह चीर दिया है जिसके कारण वो शायद ही अब कभी दौड़ उड़ सके या जी सके।खिड़की से ठंडी हवा का झोंका आया जिससे मेरा सारा शरीर सिहर गया।मैंने लाइट जलाकर घडी की तरफ देखा साढ़े पांच के करीब का समय था।एक ओर मस्जिद में पहली नमाज अदा होने लगी थी तो दूसरी ओर मंदिर की घंटियां बजने लगी थी।अब मुझसे रहा नहीं गया ।मैं जल्दी से छत पर पहुंचकर उस कोने की तरफ चला गया जहाँ मैंने रात को उस ज़ख्मी पक्षी को छोड़ा था।
छत पर अभी भी तेज़ हवा बह रही थी।धीरे धीरे हर दिशाओं में उजास फैलता जा रहा था। मिटटी के सिकोरे में रात का पानी ज्यों का त्यों था।दाने भी वहीँ बिखरे हुए थे।सलेटी घायल कबूतर एक ओर सिमटा हुआ अभी भी कांप रहा था।वो ज़िंदा था पर बिलकुल दुबककर एक ओर डरा सहमा सा बैठा था।मैं मन ही मन मुस्कुराकर उसे सहलाने लगा।मंदिर की घंटियाँ अब और तेज़ हो गयी थी।मौलवी के स्वर जैसे ही कानो में सुनाई दिए जाने क्यों लगा कि इसे खुदा (ईश्वर) ने बचाया है।मैंने उसके कांपते पंखों को प्यार से सहेजा।उसकी लाल आँखे मुझे घूरने लगी।वो पल भर ठिठका और खिसककर आगे की तरफ चलने लगा।उसके पंजे कांप रहे थे वो एक डग बढ़ते ही लुढ़क गया।मैंने बहुत सावधानी से उसे पकड़ा और छत की खुली हवा में बिठा दिया।
सुबह की नर्म धूप में वो हल्के से आगे बढ़ने लगा।मिटटी के सिकोरे में उसने दो तीन मर्तबा अपनी चोंच को डुबोया। उसके पंजे चिपक चुके थे।वो गुमसुम सा धूप की तरफ देखता रहा।दाने अभी भी पहले से  बिखरे पड़े रहे।उसने कल दिन से ही एक दाना अपने पेट में नहीं डाला।वो बिलकुल भूखा था।जैसे ही तेज़ हवा चलती उसके पंख हवा में कांपने लगते।उसकी उदास कमज़ोर आँखे जैसे ही बंद होती मेरा दिल बैठ जाता।धूप की गर्मी में अब वो काफी हिलडुल रहा था।मैंने फिलहाल  उसे छत पर छोड़ दिया ताकि वो उन्मुक्त होकर छोटी मोटी उड़ान भर सके।उसकी गंभीर हालत को देखते हुए मैंने यह तय किया कि दस बजे उसे किसी पक्षी सर्जन(डॉक्टर) को दिखा लूंगा ताकि ये भी दूसरे पक्षियों की भांति अच्छे से जी सके।
सड़क पर छतों पर हर तरफ शोर था।गाड़ी की पों पों और आदमियों की चिकचिक से कहीं भी चुप्पी नहीं थी।मैंने उस ज़ख्मी कबूतर को एक डिब्बे में बिठा लिया ताकि उसे बहुत जल्दी जीव जंतु चिकित्सक के पास ले जा सकू।मैंने डिब्बे के एक छोर से देखा वो अलसाए नेत्रों से एकटक देखे जा रहा था।वो बिलकुल गिलगिला सा हो चुका था कमज़ोर मेमने की भांति।मैंने डिब्बे का ढक्कन खोला वो एक और लुढ़का मिला जैसे वो अचेत हो चुका हो।उसके शरीर की हलचल अब बंद हो गयी थी।मैं कांप सा गया।मैंने उसे कितनी ही मर्तबा हिलाया डुलाया किन्तु वो ज्यों का त्यों लुढ़का रहा।मैंने उसे उठाकर अपनी हथेली पर रखा और उसे ध्यान से देखने लगा कि शायद उसके शरीर में कुछ जीवित बचा हो।उसकी रोती आँखे अब बंद हो चुकी थी और उसका शरीर धीरे धीरे ठंडा हो गया।मैं उसे देखता रहा मेरी आँखे उसके निर्जीव शरीर को देखकर नम होती गयी।
मेरी बालकोनी पर कोई दूसरा कबूतर यह सब कुछ देख रहा था।जाने क्यों लगा हो ना हो ये इसी कबूतर की जीवनसंगिनी है जिसके बारे में रात को इस मृत कबूतर ने मुझे मेरे सपने में आकर बताया था।वो पल भर बैठी मृत कबूतर को देखती रही उसे क्या पता कि ये अब कभी उनके पास नहीं आ सकेगा और फिर निराशा से दाने की टोह में वहां से उड़ गयी।अफ़सोस मैं चाहकर भी कुछ ना कर सका।इलाज़ से पहले ही इस मासूम ने अपना दम तोड़ दिया।मैं उदास आँखों से दूर आसमां की ओर देखने लगा।छतों पर आज भी भीड़ हो गयी हैं।चरखरी पर मांजा फिर से लिपटने लगा है ।तेज़ संगीत में आज फिर पतंगे उड़ने लगी ।चारो तरफ जैसे पतंगों का जाल बिछ गया हो।इस मांजे से आज फिर किसी मासूम की मृत्यु?
ओह नहीं!
मैं मरे हुए कबूतर को दुःखी मन से देखता रहा ।किसी को क्या फर्क पड़ता है।नर्म धूप में हवा का झोंका आया हाथों में पतंग चरखरी थामे सबके सिर खुशी से हिलने लगे। तभी पास वाली किसी छत से एक जोर का ठहाका लगा ओह्ह “वो काटे” और सब इस आवाज़ में सुर से सुर मिलाते दिखे।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.