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प्रगति की एक कहानीनुमा रचना

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सुन लो ज़रा मेरी भी ज़ुबानी… 
मैं तुमसे जब पहली बार मिला था,  तुम्हारे जोश और मस्ती ने मेरा मन मोह लिया था। देखो मैं तुम्हारी तरह तेज़ बुद्धि तो हूँ नहीं, इसलिए यह भूल गया हूँ कि वह कौन था जिसने तुम्हारी कौम से यानी मनुष्य जाति से मेरा परिचय कराया।  तुम्हारे इर्द-गिर्द फैला ज़िन्दगी का जाल, आँखों को अंधा कर दे ऎसी चकाचौंध और कभी न रुकने वाली तुम्हारी भागदौड़ ने मुझे कुछ ऐसा प्रभावित किया कि मैं सोचने लग गया कि एक यह ज़िन्दगी है जीवन से भरी और एक हमारी- बिलकुल नीरस। मैंने तभी तुमसे दोस्ती करने की ठानी और एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे करता तुमसे जुड़ता ही चला गया।  तुम लोग भी मुझे बड़ी आसानी से अपनाते चले गए।  
लेकिन यह क्या? जिन सब से खिंचा मैं तुम तक आया था, तुम उन सब पर ताले लगाने लगे। न रह गयी वह दौड़-धूप वाली ज़िन्दगी, वो दौड़ती सड़कें, वो बच्चों की किलकारियों से गूंजते पार्क, वो नए साल के स्वागत में सँवरे शहर। थकन, गरीबी और कठिनाइयों के बावजूद लोगों के दिल जो उमंग और उम्मीद से भरे होते थे, उनमें एक मायूसी और डर दिखाई देने लगा। मेरे आते ही जैसे वे सब चीज़ें जिनसे आकर्षित होकर मैंने तुम्हारे बीच रहने का फैसला किया था मानो गायब होने लगीं। उनकी जगह एक सन्नाटा, एक उलझन, एक खौफ, एक ना-उम्मीदगी फैले दिखे; मैंने इनकी चाह तो न की थी।  
मैं पहले भी कह चुका हूँ कि मैं तुम्हारी तरह इल्म-ओ-अदब से वास्ता नहीं रखता हूँ, लेकिन कुछ दिनों की तुम्हारी संगत और बदलते परिवेश ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर इस फेरबदल की वजह क्या है? जब मैं बात की तह तक पहुंचा तो पूरी तरह से हिल गया।  मैं तो बड़ी नेकदिली और दोस्ती के जज़्बात के साथ तुम्हारी तरफ बड़ा था और बन गया तुम्हारी बर्बादी का कारण।  
देखो न कितना बेवकूफ हूँ मैं, अभी तक अपना परिचय ही नहीं दिया।मैं तुम्हारे पुराने जानकार कोरोना वायरस का नया रूप COVID-19 हूँ। मैं अपनी करनी पर हैरान हूँ, ग़मज़दा हूँ और खुद से नाराज़ हूँ। मुझसे तुम्हारी बेबसी और बेचैनी देखी नहीं जाती। 
मैं ठहरा बहुत ही निचले स्तर का प्राणी। यह मेरे बस की बात नहीं कि मैं खुद तुमसे दूर होने की तरकीब सोच लूँ।अपनी दोस्ती और तुम्हारे साथ बिताये अच्छे वक़्त की खातिर मैं खुद को मिटाने और तुमसे जुदा होने के लिए तैयार हूँ।लेकिन यह काम मैं तुम्हारी मदद के बगैर नहीं कर सकता हूँ। मुझे तुम्हारे संकल्प और कर्मठता पर पूरा भरोसा है। फिर भी मैं यह दुआ करता हूँ कि तुम्हें जल्दी से मेरा तोड़ मिले और मुझसे निजाद पाकर तुम्हारी ज़िन्दगी की खोई रंगत लौटे। 
मैं जल्दी ही तुमसे बिछड़ जाऊंगा पर जाने के पहले अपने कुछ अनुभव तुम्हारे साथ साझा करना चाहता हूँ। मैं अलग-अलग जगहों पर बेशुमार क़िस्म के लोगों से मिला हूँ। दिखने और रहन-सहन में अलग होने के बावजूद भी मुझे तो सब एक से लगे। सबने मुझे एक सा ही अपनाया। तुम्हारी खुशियों पर मैं भी मचला हूँ और तुम्हारे ग़मों में रोया हूँ। मैं तुम्हारे जज़्बे और जुझारू इरादे को सलाम भी करता हूँ। 
बस एक बात तुम्हारे बीच रह मैं समझ नहीं पाया कि जब मुझे सब एक जैसे लगे तो तुम यह ‘हम और वे’ का फ़र्क़ कैसे कर लेते हो, कैसे कह देते हो कुछ को अपना और कुछ को बेगाना।  क्या यह भी मेरी मूर्खता की ही निशानी है कि यह जो चर्चा आमतौर पर तुम करते रहते हो न  अपने-पराये की, मैं समझ ही नहीं पाया। बुद्धि मेरी कम हो सकती है पर भावना-शून्य नहीं हूँ मैं। मैं तुम्हें यह बताना चाहूँगा कि जब कभी तुम ‘हम और वे’ की बाते करते थे, मुझे तुम्हारी संगत में घुटन महसूस होती थी। और तुम में भी तब मैं वह खलबली पाता था जिसकी वजह से तुम मानवता को भूल जाते थे।  
आगे अब मैं कुछ नहीं कहूंगा – बहुत हो गयीं छोटे मुँह बड़ी बातें। आखिर में बस अपनी चंद ख्वाहिशें बता देता हूँ।  मेरी पहली ख्वाहिश यह है कि तुम्हें जल्दी से जल्दी मुझसे छुटकारा मिले और तुम्हारी ज़िन्दगी में फिर चैन की बांसुरी गूंजे। और दूसरी यह कि मेरी जुदाई तुम्हारी नज़रों पर गिरे गैरियत के परदे उठा दे और तुमको सीखा दे सबको इंसानियत की नज़र से देखना – यानी हर मानव को उसके मनुष्य होने का कर्तव्य याद दिला दे। मुझ जैसी नाचीज़ को यह लगता है कि ऐसा होने पर तुम्हारी दुनिया और खूबसूरत हो जाएगी। 
जानता हूँ जल्दी ही कहना होगा , इसलिए अभी ही कह देता हूँ अलविदा; कभी वापिस न मिलने के वादे और तुम्हारी खुशहाली की अपार शुभकामनाओं के साथ। 
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मेरे प्यारे आदमज़ाद, 
मैं तो तुमसे जुदा होने के लिए अपने कलेजे को मज़बूत कर चुका था, मन बोझिल था, आँखें नम, परन्तु एक आत्मसंतुष्टि थी कि मैं अपनी सबसे चहेती दोस्त-ज़ात के लिए कुछ अच्छा करने की सोच रहा हूँ। लेकिन नियति के आगे तो किसी की नहीं चलती, इसलिए मैं अब भी तुम्हारे साथ हूँ। मैं नहीं जानता कि अभी हमारा साथ कितना और है, पर रोज़ यही प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारी दुनिया में चहलपल और ज़िन्दगी की रवानगी लौट आए, यानी मेरी रुख़सती हो। लेकिन जाने से पहले मैं तुमसे कुछ बातें करना चाहता हूँ। 
तुम निश्चित रूप से थोड़े अजीब हो। तुम ने मुझसे बचाव का टीका बना लिया।  लगभग सभी मुल्कों ने उसे साथ-साथ बनाया, पर अपनी फितरत के मुताबिक़ लम्बे समय तक तुम सब अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में लगे रहे। फिर थोड़ा शांत हुए और तुमने टीकाकरण की मुहीम शुरू की। ये मुहिमें सरकारों ने मुफ्त शुरू कीं, लेकिन तुम में से कुछ खुद को सर्वज्ञाता और बहुत होशियार मानते हो, तुमने टीका लगवाने से साफ इंकार कर दिया और अभी तक कर रहे हो। सच मानो मेरे दोस्तो, बात मेरे और तुम्हारे बिछड़ने की है, फिर भी मैं हाथ जोड़ कर तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि कर लो हर वे मुनासिब तरतीबें जिन से तुमको मुझसे निजात मिल जाए। 
मैं निचली प्रजाति का प्राणी भी यह समझता हूँ कि इस टीके को बनाने में कितने जतन किये गए हैं, तुम तो बुद्धिमान कहलाते हो, फिर तुम यह क्यों नहीं समझते? 
अब हमारी यारी पुरानी हो गयी है, इसलिए मैं खुद को बेतक़ल्लुफ़ी की इजाज़त दे रहा हूँ। तुम्हारा ग़ुरूर और स्वार्थ भी मेरा दिल बहुत दुखाते हैं। मुझसे थोड़ी सी राहत मिलते ही कि तुम गुज़ारे हुए कठिन दौर को भुलाकर अपनी तैश में आकर मुझसे बचाव के तरीकों को नज़रअंदाज़ करने लगते हो। किसी भी देश में चुनाव हो, अब भले वो भारत हो या रूस, मेरी तो चर्चा और वजूद ख़त्म हो जाते हैं, मुझे हारा हुआ मान लिया जाता है। वोट पाने के लिए नागरिकों को सब करने की छूट और आज़ादी  दे दी जाती है। मज़हब से जुड़े सभी कार्यक्रम पूरी गति से दौड़ने लगते हैं। मैं अपने स्वार्थ साधने के लिए दी छूट के बाद के मंज़र देखकर घबरा जाता हूँ। आजतक जब मेरे ज़हन में २०२१ मई-जून के भारत की तस्वीर उभरती है तो मेरी रूह काँप जाती है।  मेरी मंशा तुम्हें यह नज़ारा दिखाने की न थी, अपने संक्रमण को रोकना मेरे हाथ में नहीं है, लेकिन तुम उसे बख़ूबी जानते हुए भी उस पर अमल नहीं करते हो।  मेरी तुमसे यह विनती है कि तुम अपने भेदभाव, स्वार्थ, अंतर एकबार भुला कर तो देखो, एक एकदम नयी और खूबसूरत दुनिया पाओगे, और हाँ मेरा भी नामो निशाँ न होगा वहाँ। 
तुमसे कितना कुछ सीखा है मैंने। तुम्हारे कथन ‘वसुधैव कुटुम्ब्कम’ को मैंने मान लिया और पूरी दुनिया में फैल गया।  और तुम कहना तो खुद को दुनिया का नागरिक चाहते हो लेकिन अपने ही घर में लड़ते झगड़ते रहते हो। कितने जल्दी तुम्हें हर किसी में ग़लती, बुराई दिख जाती है, शायद तुम खुद के अंदर झाँक कर देखना नहीं जानते। अपने इस हितैषी दोस्त की बात मान लो, तुम अब पोथियों को बाद में पढ़ना, पहले खुद को पढ़ना सीख लो।  एक बार जब क़रीब से खुद से रूबरू होंगे तो शायद उँगलियाँ जल्दी दूसरों पर नहीं उठा पाओगे।  
अरे! यह क्या हो गया है मुझे? मैं भी क्या तुम्हारी भाषा बोलने लग गया हूँ? आज जबसे लिखने बैठा हूँ शायद तुन्हें प्रवचन ही दिए जा रहा हूँ।  माफ़ करना दोस्त, संगत का असर तो होना ही था। 
ऐसा नहीं है कि तुम में अच्छाइयाँ नहीं हैं।  तुम्हारी खूबियों की अगर मैं चर्चा करने लग जाऊँ तो शायद यहाँ से जा ही न पाउँ।  यह धरती तुम्हारी है, तुम अपने काम से इस पर जीवन आसान बनाने की कोशिश करते रहते हो और बहुत हद्द तक कामयाब भी रहते हो।  कुछ गलतियां अनजाने में करते हो, चलो वो सबसे होती हैं। लेकिन कई बार सोच-समझकर ऐसे क़दम उठाते हो, जो बुमेरांग की तरह तुम पर ही वार करते हैं।  मैं अब ज़्यादा नहीं कहना चाहता बस आखिर में यही कहूँगा कि स्वर्ग तुम्हें इस धरती पर ही मिला हुआ है उसकी हर तरह से हिफाज़त करो, इस स्वर्ग को स्वर्ग ही रहने दो इसे कूड़े का ढेर न बनाओ। 
मेरी दिली तमन्ना है कि यह मेरा तुम्हें आखिरी ख़त हो।  इस बार साथ बैठकर बातें करने नहीं आया क्योंकि मैं खुद को तुमसे दूर रखना चाहता हूँ और तुमसे भी यही उम्मीद करता हूँ। तुम मुझ पर कर लो हर वो सितम जिससे मेरा नाश हो जाए और मैं अपनी दोस्ती की ख़ातिर उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी झेलूँगा। बस यही एक वादा मैं तुमसे चाहता हूँ। 
तुमसे बेइंतहा मुहब्बत करने वाला (यह अलग बात है कि मेरी मुहब्बत रास नहीं आयी)

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