जहां जगह मिले वहीं पसर जाती हैं आवाजें। तब हमारी आँखें कान बन जाती हैं और कान आँखें।
अब देखो ना, इस मायानगरी मुंबई को अरबसागर की कूदती फांदती लहरें उचक-उचक कर विस्मय से देखती हैं।दिन हो या रात भागता रहता है ये शहर और इस शहर के बशिंदे भी।वे पार्को में ट्रैक पर दौड़ते,बैंचों पर पसरते,समुद्र को एकटक देखते,अपने ख्यालों में गुम रहते हैं।ये मुंबई का स्मार्ट हुजूम है जो जीवन की तकलीफ को अपनी जुबां पर नहीं लाता क्योंकि उसे डर है कि वह असफल घोषित कर दिया जाएगा।
यहीं बांद्रा में अरबसागर के किनारे-किनारे भागती सड़क के साथ दौड़ता है जागर्स पार्क।सर ऑलिवर की याद में पार्क के गेट पर लिखा दमक रहा है-
“फ्रॉम सर विद लव “
यहीं दौड़ लगाती दिखेगी जिंदादिल,यारबाश,जीवन से भरी लड़की-सोनिया संचेलकर।
ये रही..आसपास दौड़ती दुनिया के लिए अजनबी,मास्क में मुस्काती सोनिया।कज़रारी आँखें तो देखो इसकी।मास्क में सिर्फ आँखें ही तो नजर आती हैं।
मास्क हटाते ही दिखेगा खूबसूरत चेहरा।सोनिया ने दोनों गालों में दो बोरी भर मुस्कान छिपा रखी है।मामूली कद-काठी पर कभी न भूलने वाली ये आँखें और बेखौफ हँसी बेमिसाल है।
इन ख़ूबसूरत लड़कियों के चक्कर में जिम छोड़,पार्क में दौड़ पड़ते हैं कई शोहदे।भंवरे को किसी आमंत्रण की क्या दरकार!
छुट्टी वाली सुबह हो तो बत्तखों,रंगीन तितलियों के पीछे भागते बच्चे जागर्स पार्क को गुदगुदा कर जगा जाते हैं।आसमान से बतियाते लम्बे- ऊँचें,हरे -भरे नारियल के पेड़, सूरज ढलने से ठीक पहले दिन की चुगली करते,चहकते पंछियों की कुहू-पीहू भी खूब है यहाँ।पार्क में ज़ोर-ज़ोर से हो हो हा हा कर हँस रहे हँसोड़।यहीं से तो शुरू हुआ था मुंबई का पहला लाफ़्टर क्लब।
सोनिया संचेलकर एक़ भौँ ऊँची उठा कर उधर ही देख रही है।
पार्क के साथ-साथ चलती सड़क पर दौड़ रही है सोनिया की कार,ऑडी टीटी।हिंदी,तमिल,तेलेगू फिल्मों, ओ टी टी की इस अभिनेत्री के इंस्टा पर लाखों फॉलोवेर्स हैँ।पहचान छुपाने,भीड़ -धचक्के से बचाने के लिए मास्क जरुरी है।वैसे भी इंसानों से ज्यादा इसे जानवरों पर भरोसा है।कोई करीब से गुजरे, संशय से देखेगी,मुस्कान तो दूर की बात है।पर कुत्ता-बिल्ली गुजरे तो उसे पुचकारेगी।और भी शगल पाल रखे हैँ।पंछियों की आवाज़ निकालने में माहिर है सोनिया।अक्सर हाथियों से बतियाती नज़र आती है।
कल ही सोनिया किसी मार्का कम्पनी के खाने वाले तेल का विज्ञापन करके आई है,शॉट कई बार रिटेक होने के कारण उस तेल से बने केरी के अचार को बार- बार खाने से उसके गले में खराश है।
अब वह घर लौट रही है।
सोनिया का पुराना घर जॉगर्स पार्क के दूसरे छोर पर था,अब यहीं अपना नया बसेरा बना रही है।
किसी का पुराना घर किसी के लिए नया हो जाता है।है न!
सोनिया ने पाँच साल के लिए लीज़ पर लिया है घर।बांद्रा वैस्ट में मॉन्टब्लैंक बिल्डिंग के छठे फ्लोर पर अपार्टमेंट है।कल ही यहाँ गृह प्रवेश का हवन हुआ था।शिफ्टिंग दो हफ्ते बाद होगी पर सोनिया आज ही दो बैग,योगा मैट के साथ खाली फ्लैट में ठहरेगी।ये सामान उसके पीछे आ रही ऑडी टीटी में है।
दौड़ते-दौड़ते सोनिया अपने नये एवेन्यू में दाखिल हो गयी है।बिल्डिंग के बाहर खड़े नारियल के पेड़ को वह गले मिली।कोई देखे, घूरे,उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।वह कहीं भी रहे,अपने पड़ोसी पेड़ से गले मिलना उसका रोज का नियम है।
अब वह लिफ्ट की ओर जा रही है।वॉचमैन की वही पुरानी आदत है।अपने मोबाइल में खोया है ,पर सचेत है।
अरे मैडम.. साइन कर जाओ
आवाज लगा कर वह फिर से मोबाइल में घुस गया है।
सोनिया बड़बड़ा रही है
“हद है,अपने ही घर जाने में इतनी क़वायद!”
लिफ्ट क्या है,माचिस की डिब्बी है।
लिफ्ट में अपने में खोए दो अजनबी पड़ोसी हैं,नीचे नकली हरी घास का गलीचा और बजता संगीत।
क्या ऐसे प्रयोजन बदल देते हैं मन के मौसम!
अजनबीपन उसका पीछा नहीं छोड़ता।उससे पहले कि मन की घुटन बढ़े,लिफ्ट खुलती है।
मेरी याददाश्त बरकरार है-छठा माला।दाएं ओर मुड़ते ही आ जाता है चिरपरिचित फ्लैट।
फ्लैट नहीं घर।घर जिसकी डोर बेल से आती हैँ पीहूssss कुहूssss आवाजें,जो कॉरिडोर के सन्नाटे में और भी गहरा जाती हैँ।
सोनिया के पास चाबी है पर फिर भी ठहर कर सुनती है ये लंबी तान और गुनगुनाती है-खुल जा ssss सिम-सिम
बचपन जिंदाबाद है इस लड़की में!
ओ तेरे की,चाबी जेब में नहीं, नीचे गाड़ी में रखे बैग में है
अचानक सामने वाला फ्लैट का दरवाजा खुलते ही सोनिया को देखते-देखते बंद हो जाता है।सोनिया कंधे उचका रही है।
क्या यह वहम था ?
सामान लेकर ड्राइवर आ गया है।
चहकती हुई घर में कदम रखती है सोनिया।
यह घर जिसे देखकर पहले-पहल मुझे याद आया था एशियन पेंट का ऐड-
हर घर कुछ कहता है.. हर घर चुपचाप से..यह कहता है कि अंदर इसमें.. कौन रहता है।
एक कैमरा ऑन हो गया जैसे।घर टोह रहा है।दीवारों पर चस्पाँ है कुछ अदृश्य।
ड्राइवर सामान रखकर चला गया है।माँ की सीख के कारण सोनिया अपने स्टॉफ से ज्यादा बात नहीं करती।अलबत्ता अपना स्पेस, प्रकृति, अच्छे लोगों और खुद से बातें करना उसे बेहद पसंद है।
आजकल मेरे कान धीमी आवाज़ भी सुन लेते हैं, देखो फिर बुदबुदायी सोनिया-“वेलकम टू योर किंग्डम”
सोनिया चाल बदलकर महारानी की तरह सधे क़दमों से अपना नया घर नापती है।मेरे कदम उसके साथ हैं।
मेन डोर से तक़रीबन,नहीं यक़ीनन तीन कदम चल कर बाईं ओर हॉलनुमा लिविंग रूम और ओपन किचन है।
दाईं ओर ऊपर जाती नौ सीढ़ियाँ।सीढ़ियाँ चढ़ते ही एक लिविंग रूम और उसके साथ एक बड़ी सी बालकनी।
बालकनी,जिस पर कल ही सोनिया के पुराने घर से लाये मिट्ठू तोता और गदबदी गिलहरी उसके इंतजार में हैँ।समुद्र इस घर को देख उछाह मारता है।सी फेसिंग चार बेडरूम वाले इस अपार्टमेंट में तीन बालकनियाँ और एक बड़ी सी छत है,और है ढेर सारा सुकून।इस घर की बालकनी से समुद्र, सड़क और दिखता है जागर्स पार्क।
जागर्स पार्क के बनने की कहानी यहाँ सबसे सुनी मैंने।
पहले-पहल यहाँ डंपीग यार्ड था।अरबसागर से टहलते हुए केकड़े अक्सर पड़ोसियों के बिन बुलाए मेहमान बन जाते थे।पर एक दिन हॉकी और फुटबाल कोच सर ओलिवर एंड्रेड ने इसे जॉगिंग ट्रैक बनाने का सपना देखा।बस तबसे वे दिन-रात इस सपने को पूरा करने में जुट गए।पर वे अकेले नहीं थे,तीन स्कूलों के कोच थे,उनके साथ हजारों विद्यार्थी, जागरूक लोग थे। दिलीप कुमार,सुनील दत्त ने भी फंड जुटाये।फिर तो बड़े बिल्डर्स भी शामिल हो गए और बन गया ये निराला अलबेला जॉगर्स पार्क।
सोनिया ने घर की बालकनी खोल दी है।ठंडी समुद्री हवा करीब आकर गले लग गयी है।
ये लड़की भी न,खुद भी भीगेगी और पूरा घर भी।बारिश बस आने को है।मुंबई के बेईमान मौसम की पूरी खबर है मुझे।
देखो अब नाच रही है।
सोनिया के चेहरे पर गज़ब का आत्मविश्वास है।नाक की लौंग ऐसी दमकती है मानों दुनिया का सबसे सच्चा हीरा उसी में जड़ा हो।
कँगारु जैसे कदम रखती,थिरकती हुई सोनिया हवा-हवाई गाने की याद दिलाने लगती है।श्रीदेवी मेरी भी फेवरेट थी।अबी बी बी ये छिपकली, कीड़े टहल रहे हैं बालकनी में,यहाँ रखे बड़े गेरू रंगे गमलों में हरे पौधों को मिट्टी ने जकड़ रखा है।बालकनी से दिखती दुनिया से घर को छुपाता जामुनी गुलाबी फूलों के प्रिंट वाला लहराता हुआ नया पर्दा है।पुराना नीला पर्दा हटा दिया शायद ।यहाँ विंड चाइम भी नई लगी है जो पुरानी की तरह हवा के हर खटके का रुनझुन जवाब दे रही है।
आहा घर फर्नीचर और ज्यादा सामान के बिना।न भरने से पहले भरा हुआ है आकाश से, खालीपन से।पूरे घर में छितरी है गृहप्रवेश के हवन की सुवास।घर भर में गोल-गोल थिरकती है सोनिया।खाली है पूरा घर,वर्तुल-वर्तुल लहराने से कहीं कोई बाधा नहीं।
कल हवन के बाद ये घर देखते हुए शोभित सही कह रहा था –
असली आवारगी तो घर से शुरू होती है सोनिया।अपने शहर से पहचान होती है और घर की पहचान अपने होने से।जहाँ आप बस आप होते हो, दुनियादारी से दूर अपने पागलपन के साथ।जितना इधर -उधर दौड़ लगा लो,ठौर तो घर ही है।और घर सिर्फ चार दीवारी और छत नहीं है।घर की हर दीवार पर चस्पाँ होते हैं यादों -बातों के झरोखे, आईने, तस्वीरें।जब हम सो जाते हैं तो घर जागता है दीवारें,कुशन,फर्नीचर,आईना चुप नहीं रहते।चुपके चुपके गपियाते हैं। धीरे धीरे हम घर को जितना जानते हैं उससे ज्यादा जानने लगता है यह घर हमको, बुनने लगता है हमारे इर्दगिर्द वही सपनें, जिनमें हम जी रहे होते हैं।
हम जो सोचते हैं न सोनिया,मन ही मन बतियाते हैं, उसे भी सुनता है घर का कोना कोना।
…तुम सुनना सोनिया इस घर को, फिर बातें करना। तुम करोगी देखना,हाथी से कितनी बातें की थी तुमने उस दिन, जब उसने अपनी सूंड तुम्हारे सर पर रख दी थी।
बचपन से जानता है शोभित उसे,पुराने घर का पड़ोसी।शायर है,फ़िल्मी गीतकार बनने की कोशिश में है।संघर्षरत है, कोई गॉडफादर नहीं कि प्रतिभा देखकर काम मिले।नेपोटिज़्म के चलते, प्रतिभा के बावजूद बड़े प्रोडक्शन की फ़िल्में हाथ से जाते देखते होने वाले तनाव तो सोनिया की ज़िंदगी का भी एक हिस्सा है जिसे वह जॉगर्स पार्क में दौड़ लगा कर, घर भर में थिरक कर, जोर -जोर से गाकर,दूर करती है।पंछियों जानवरों के साथ बतियाती सोनिया संचेलकर का बस चले तो सारे पिंजरे खोल दे और सारे जीव जंतुओं को उनके घर जंगल में पहुँचा दे। कल ही कह रही थी किसी से फोन पर -आदिमानव थे पहले हम सब , भूल गये,जंगल ही घर था। फिर जंगल छोड़ बस्ती बसा ली, फिर अपनी पूरी दुनिया भी पर अभी भी लालच खत्म नहीं हुआ। जंगल पेड़ जानवर पंछी सब चाहिए।थोड़े दिन बाद आसमान के तारे भी नीचे चाहिए।
हद है भई!!
हद ही तो नहीं है सोनिया।
फिलहाल तो अपने योगा मैट को बिछौना और बैग को तकिया बना कर बालकनी के गेट के पास ही पसर गई है सोनिया।गले की खराश ने चाय की तलब बढ़ा दी है। बैग की जेब में ताज़ी पोदीना पत्तियां नींबू मिला है, ग्रीन टी का इंतजाम हो गया।अब तो उठना होगा। आज चूल्हा जला सकते हैं, कल हवन के भोग का हलवा बना था। आहा, अभी भी रखा होगा।
पर हलवा किसके संग खाओगी?
मन ही मन सवाल उठा रही भौँ उठा कर सोनिया संचेलकर!
ज़वाब सूझते ही मुस्कुरा उठी सोनिया।फिर दिखी बोरी भर मुस्कान गालों के डिंपल तक छितरी हुई , मास्क तो कब का दराज में धर दिया है।
गर्म करके उसने दो कटोरी में हलवा रखा है और जमीन पर बैठते-बैठते अथरंगी संगी घर को गरमागरम हलवा खाने के लिये आमंत्रित किया है।हाँ सच में सोनिया का साथी है ये घर, शर्त सिर्फ मन की आँखें खोलकर उससे मिलने की है।
शोभित तो कल बोला,मैं और अब सोनिया …कब से इस घर से बतिया रहे।
इस अथरंगी संगी घर के बारे में कौन नहीं जानता।पाँच साल से खाली था ।पाँच साल पहले मैं यहाँ रहता था,याद आया आपको?
ओह मैं भी किस मुगालते में आपसे रूबरू था।मुझे लगा अब तक आप मुझे पहचान गए होंगे।आज स्वरुप नहीं मेरा,पर कुछ साल पहले कुछ लोगों को मेरा चेहरा-मोहरा पसंद था, कुछ को मारक मुस्कान, कुछ लोग सिक्स बायसेप्स के दीवाने थे।
सोनिया मेरी दीवानी है ,ये अब पता लगा मुझे,जब कुछ शेष नहीं रहा।
जाने कितनी बार वह मेरी फ़िल्में देखती, गुनगुनाती रही ..कुछ तो है राब्ता…बहुत कोशिश की उसने मुझसे मिलने की पर संयोग नहीं बना।वह मेरे साथ फिल्मों में काम करना चाहती थी।उसे मुझमें अप्रतिम नायक दिखता था।वह कहती है मेरी हँसी अंतर्मन तक पहुँचती है।जब तक उससे मिलने का मौसम आया मैं बहुत दूर जा चुका था।जहाँ से लौटना असंभव।
मुझसे प्यार कर बैठी पागल।किसी से कहा भी नहीं,नहीं कह पाई ये दिल की नादानी।मेरे इस दुनिया से जाने पर बहुत रोई चुपके-चुपके।दिल को समझाया, जब यह घर देखा तो उसका मन किया मेरी यादों के साथ रहने का। उसे लगा इस घर से राब्ता है।घर उसे प्यार से देख रहा है, घर सुन रहा है,एक साथी की तरह पूरे दिन की दास्तान। सामने अरब सागर जिसके तट पर ठठारे मारती बड़ी -बड़ी लहरें, जॉगर्स पार्क। बस मन यहीं ठहर गया उसका।
इस अथरंगी संगी घर के साथ ।
किचन में कुछ जल रहा है
ओह खोयी-खोयी सोनिया भूल गई, ग्रीन टी के लिये गैस चूल्हे पर पानी रख कर आई थी।
मैं नॉब बंद करूँ
नहीं नहीं, उसे लगेगा कोई है यहाँ
शुक्र है वह आ गई है।
खराश की दवाई लेकर लेटते ही आँख बंद होने से पहले घर को जी भरके देखा है उसने।ये सी फेसिंग घर उसका सपना था।दिन में भी सपनें देखती है सोनिया। दिवाकर,पूजा, गुड़िया,शैली और शोभित उसे मुंगेरी लाल कहते हैं।
सोनिया इस घर के कोने-कोने में रची-बसी मेरी याद को अकेली आत्मसात करने आई है।कुछ मिटाना नहीं चाहती,सहेजना चाहती हैँ मेरी जिजीविषा को।
अब मेरी प्रिय किताबें नहीं हैं यहाँ, पटना वाले घर में रखी हैं।किताबों को याद रखता हुआ खाली रैक है बस।
सुना है न आपने!किताबी कीड़ा था मैं!
कला,दर्शन,विज्ञान संगीत,सब पर पढ़ता,अकेले में गुनगुनाना, नाचना,अच्छी पंक्तियाँ दोहराना पसंद था मुझे।
मेरा एकांत मुझे रचता था।मेरी सोशल वॉल देखी आपने?वॉन गो की पेंटिंग,सात्रे के कोट्स से भरी।
Man Is Nothing Else But What He Makes of Himself”
मैं खुद को गढ़ने में जुटा रहा।जैसा भी किरदार निभाता,उसमें डूब जाता।क्रिकेटर, डिटेक्टिव का किरदार मुझमें समा गया था। धोनी(अपने माही)ने बायोपिक देखकर गले लगा लिया था मुझे ।
याद आ गए मेरे धरती पर बिताये गए सुनहरे दिन।
वहाँ मैं रोज़ छूता था अपनी बालकनी से गगन को,मैंने चाँद पर घर ले लिया था।
बालकनी में कभी टेलीस्कोप था जिससे मैं अनगिनत सितारों की टोह लेता था। वफादार फ़ज मेरा रात -दिन का साथी।हम दोनों रात की नीरवता में बालकनी के एक़ कोने पर टिक जाते। तब मैं आकाश के हर तारे से बात करता,फ़ज दुम हिलाता चुपचाप मेरी बातें सुनता।
जब मैं किसी तारे को देख कहता ये माँ है तो फ़ज़ मेरे पैरों से लिपट जाता।हम दोनों ऐसे मुस्कुराते जैसे जन्नत मिल गई।फिर और नए तारे खोजते,तब रात बीत जाती।अरब सागर की लहरों जैसी मुंबई में ज़िंदगी ठहरती कहाँ है।दौड़ता,हाँफता,रफ़्तार पकड़ता दिन और उससे पूरी -पूरी होड़ लेती चलती-फिरती जगमग रात।
हम जैसे कुछ लोगों के लिये पूरी दुनिया एक घर बन जाती है और घर एक भरी -पूरी दुनिया।
घर में रहने वालों की हर कच्ची-पक्की बंदिश का रिकार्ड रखती हैँ दीवारें ।
इस घर में कितने सपनें बने थे,पले थे मेरे।सपनों की लम्बी फेरहिस्त थी। उनको पूरा करने की आब थी।
क्या ये आब,अच्छाई मुझे झुलसा गई। इस ज़ालिम दुनिया में जीने के लिए सपनें छुपाने पड़ते हैं। ज़ब मैंने निकोस की जोरबा द ग्रीक पढ़ी तो घर भर के कान में दोहराया –
“The only thing i know is this, i m full of wounds and still standing on my feet.”
पर मेरा कोई गॉड फादर नहीं था, साथ ही नेपोटिज्म के चलते बड़े बैनर मुझसे दूर थे।
उदासी मुझे बेचैन कर रही थी।मैं दुनिया से रूठता जा रहा था।बस दीवारों का शून्य मेरे दिन -रात का साथी।पर आसपास कुछ ऐसे साथ आ जुटे जो मुझे गर्त में ड़ालते गए।मानता हूँ अपनी गलती।नया कुटिल साथ मुझे मेरी नाकामियों की तस्वीर दिखा रहा था।ड्रग्स ने उदासी को भुना लिया।ड्रग्स की डोज़ बढ़ाई गई, लैपटॉप खराब कर दिया गया, पुराना स्टॉफ बदला गया।मुझे डिप्रेशन का गंभीर मरीज बताते हुए ड्रग्स के नशे में बनाया गया वीडियो क्या सोची-समझी साजिश थी।
जाने क्यों सोनिया को याद आती है लियोनार्दो विंची की पेंटिंग द लास्ट सपर। लगता है यीशु के जैसे मेरे साथ भी उस रात यही हुआ।
अंतिम भोज पर उसके चारों ओर बैठे थे सभी जूडास
निरापद नहीं था वह अपने ही जनपद में।
मृत्यु से पहले रची गयी साजिश की तरंग
सदा होती है व्याप्त आपके आसपास
और तारी होता है प्रेम से सौंपा गया नशा भी
चूँकि प्रेम का स्वांग भी एक नशा है ,जिसके रक्त में घुलते ही
निर्विकार मृत्यु करती है अंतिम अट्टाहस
निष्प्रयोजन नहीं होता कुछ भी,कहीं भी, कभी भी।
उस तरंग से उपजी आखिरी स्मृति से
मुस्कराती हैं असहाय आँखें,देखती हैं अपने चारों ओर
कातार दृष्टि से खदेड़ती हैं साजिश की तरंग
करुणा उपजे आसपास,करती हैं इसका निष्प्राण,निष्फल प्रयास।
हत्या, दुर्घटना,रोग,आयु से
अंततः हरेक को लड़ना पड़ता है मृत्यु से!
मेरी पूर्व मैनेजर ने अपनी हत्या से ठीक पहले मुझे फोन करके उन लोगों का भेद खोल दिया था। अब मैं उनके लिये जिंदा खतरा था।मेरा मरना जरुरी था।उन छह लोगों से मैं अकेला लड़ा।एक आँख में चोट के,गले में फ़ज़ की बेल्ट के निशान थे।मुझे बेरहमी से मारा गया।आत्महत्या का जामा पहनाया गया।
सोनिया ने कुछ नहीं देखा पर घर ने सब देखा-सुना होगा।
चीखें,अहसास पानी से नहीं धुलते,पेंट से नहीं छुपते।बंद दरवाजों, खिड़कियों,दीवारों पर चस्पाँ है मेरी सच्चाई।
किसी ने सच कहा है –
“घर वह जगह है जहाँ आत्मा भी अपने कपड़े खोल देती है।”
अभी तो घर भी बेजान है,जैसे पाँच साल से कोमा में हो।घर के इर्दगिर्द कुछ लिपटा हुआ सा है।जैसे धूल का कण चस्पाँ हो आईने में,तब कुछ साफ दिखे और कुछ धुंध।
संगीत,गीत,नृत्य में चैतन्य का वास है।क्या मालूम,सोनिया संचेलकर के थिरकने, गुनगुनाने,पंछियों की तरह चहचहाने से एक़ दिन फिर से बेजान घर में जान आ जाए और वह मेरे लिए गवाही देने उठ खड़ा हो।इस गूंगे समाज से आजिज़ आकर एक़ दिन दीवारें जरूर बोलेंगी।
मुझे याद करती सोनिया घुटनों में सिर छुपाये, मौन होकर बैठी है।घर भी मौन है।पर सोनिया और घर के भीतर तूफान है।सामने अरबसागर की बेचैन लहरें हैँ। लहरें, घर, सोनिया मिलकर एक दिन ढूंढ लाएंगे सच की सीपी।
पर ये सच की सीपी भी खुली तो कोई अनमोल मोती,आपका यह नायक, नहीं मिलेगा, मिलेगी बस धूल।
- सोनू यशराज
