पुलिस भान पहाड़ी के पास आकर रूकी। सबस पहले कुछ जवान कूद कर उतरे। फिर एक कैदी को उतारा गया। कुछ पल गपशप करने के बाद वे कैदी को लेकर पथरीले रास्ते पर चलने लगे।
कैदी दुबला-पतला सा था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। कद दरमियाना, पर आँखें काफी  बड़ी-बड़ी थीं, जो उसके चेहरे को एक विशेष आभा प्रदान कर रही थीं।उसके एक हाथ में हथकड़ी बँधी थी ताकि वह भागे नहीं।लेकिन दूसरा हाथ कटा हुआ था।
रास्ते में चलते हुए एक जवान ने कहा,” तुम्हें मालूम है ?हम कहाँ ले जा रहे हैं?” वह मुस्कूरा कर रह गया।जैसे जाने हुए भवितव्य पर क्या कहना!जवान ने फिर पूछा। इसबार उसने निडर भाव से कहा,” तुम्हें तो मालूम होगा ही…”
“हाँ”
“तुम्हीं बताओ।”
“विशेष अदालत में।” जवान बौखलाया,” कुछ देर की औपचारिक सुनवाई के बाद तुम्हें वहाँ गोली मार दी  जाएगी।”
कैदी पर कोई असर नहीं पड़ा, उसने आराम से कहा,
“लेकिन यह तुम लोगों के लिए कोई नया अनुभव नहीं होगा।” फिर कूट भाव से हँसा, “कोई काम करो थकान तो होती है। तब और जब काम खत्म होने का नाम नहीं ले…”
उस जवान को कैदी की बात समझ में नहीं आयी, लगा जैसे उसका दिमाग मृत्यु के भय और संत्रास से उल्टा-पुल्टा सोच रहा हो… बड़े-बड़े विद्रोहियों की उसने ऐसी हालत देखी थी कि किसी को दया आ जाए, बीबी-बच्चे वाले तो और रेजा-रेजा टूट कर रोने-गिड़गिड़ाने लगते! लेकिन यह कैदी आम कैदियों से भिन्न था।
सैनिक अदालत पहुँच कर साथ चल रहे जवानों ने कुछ औपचारिकताओं के बाद उसे अदालत के सामने पेश कर दिया, जहाँ कई आॅफिसर पहले से बैठे थे। कुछ देर वे कुछ पेपर्स चेक करते रहे फिर एक आॅफीसर ने कहा,” तुम पर राज-द्रोह का मुकद्दमा है। राज्य सत्ता के विरोघ में आम जनता को भड़काने और षडयंत्र रचने का…”
कैदी चुपचाप लगाए गए अभियोगों को सुनता रहा।
” इस तरह के अपराध करने वालों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है, तुम्हारे जैसे आत्महंताओं के लिए यही कहा जा सकता है कि तुम लोग हिंसा में विश्वास करते हो… और अपने लिए भी निर्मम होते हो…”
” नहीं, मुझे जीवन से मोह है,मैं एक जिम्मेदार व्यक्ति हूँ। राज्यसत्ता जहाँ निरंकुश होती है, वहाँ विरोध हर संवेदनशील व्यक्ति का धर्म है, नागरिक अधिकारों का हनन कोई डेमोक्रेटिक सरकार कर भी कैसे सकती है।हम चुनाव के पक्ष में हैं…”
“देश जिस गृहयुद्ध के दौर में है ,उसमें चुनाव असंभव है…” किसी तीसरे आॅफीसर ने कहा।
” तब तुम्हारे किसी फैसले पर मेरा अख्तियार क्या है? तुम कभी मेरी तरह सोच भी तो नहीं सकते।”कैदी ने गहरे व्यंग से कहा,”मैं जानता हूँ तुम्हारा फैसला तय है।”
” नहीं तुम्हें पूरा मौका दिया जाएगा अपना पक्ष रखने के लिए , पर याद रखो, राज्यसत्ता से बगावत दंडनीय अपराध है। अदालत जब तक यह नहीं समझ लेगी कि तुम में नागरिकता नहीं बची, तब तक मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा…पहले वाले आॅफीसर ने कहा,” तुम्हें सोचने का एक अवसर तो मिलना ही चाहिए…”
कैदी हँसा,” संविधान का अनादर कर कोई कब तक सत्ता में रह सकता है, क्या तुम मेरे जैसै नागरिकों की हत्या कर यह लड़ाई जीत सकते हो…या फिर मृत्यु के डर से मैं बदल सकता हूँ?तुम्हें फैसला कर लेना चाहिए, जेल में और भी राजनैतिक कैदी इन्तजार कर रहे हैं तुम्हारे महान न्याय का…”
 ” अदालत तुम्हें आत्म-चिंतन के लिए
उतना समय तो देगी ही ताकि…न्याय का मतलब बचा रहे।” आॅफीसर उठ गए।
पहली बार वापस जेल ले जाते जवानों को भी आश्चर्य हुआ, अन्थथा हाथ बाँधकर उसके सिर में गोली मार दी जाती।पहाड़ पर चढ़ते हुए साँझ ढलने लगी थी । परिंदों की चहचहाहट गूँजने लगी।आसमान में डूबते सूरज की सिमटती लालिमा अजीब सुंदरता बिखेर रही थी। भान तक पहुँचते-पहुँचते अँधेरा घिर आया, पर झरने के पानी का शोर सुनाई दे रहा था।
कैदी ने गाया-
यह मेरा देश
यह मेरा संदेश
उतर रही यामिनी
बिखर रही रागिनी
सुंदरता अशेष!
किसी जवान ने मुस्कूरा कर कहा,” तुम्हारी आवाज सुरीली है, पर तुम्हारा हाथ कैसे कटा?”
“बम बनाते हुए उड़ गया…” कैदी ने  जंजीर बँधे हाथ से निस्सीम आकाश का अभिवादन करते हुए कहा,” अब वह दिन दूर नहीं…”
“कौन सा दिन?”जवान चौंका।
“यह मुझसे नहीं, इस आकाश से, नदी से ,पहाड़ से ,झरने से और वन पाँखियों से पूछो, जिन्हें तुम लोगों से मुक्ति चाहिए…कितने लहू के धब्बों और चीखों से घायल कर दिया है तुमने  इस धरती को…”
“आज तुम यह सब बोल सकते हो, पर कल तुम भी कुत्ते की मौत मरोगे।” किसी दूसरे जवान ने कुढ़ कर कहा।
“क्रांतिकारी कभी कुत्ते की मौत नहीं मरते।” कैदी ने प्रतिरोध करते हुए कहा।
आर्मी जेल के पास वैन रूकी। कैदी को उतारा गया। सभी कैदी कमरों में जा चुके थे। मेस से खाना लाकर उसे खिलाया गया और फिर सेल में डाल दिया गया। ।दूसरे कैदियों को विस्मय हो रहा था। आॅर्मी कैंप से प्राय कैदी लौट कर नहीं आते थे, तो क्या यह आदमी सरकारी गवाह बन गया? पर उसे जानने वाले इस बात पर कैसे यकीन कर सकते थे! कुछ देर तक आर्मी कैंप की घटनाएँ और जवानों से हुई बातें उसके दिमाग में घूमती रहीं।जल्द ही फिर उसे नींद आ गयी। आँखों में सुंदर सपने तिरने लगे…
गाँव में पीटर के पिता की जमींदारी थी। सेब के बगीचे। बगीचे के बीच में भव्य मकान। पहड़ी और झरने। उसका बचपन बहुत एकांत में बीता था। वह संकोची, संवेदन शी और भावुक था। मेघ और आकाश को निहारते हुए उसके अंदर कविता झरती थी।
स्कूल से आने के बाद वह प्रकृति के अनुपम दृश्यों के बीच खो सा जाता…
पिता कहते ,” इस तरह सचमुच तुम एक दिन कवि हो जाओगे पीटर … घुड़सवारी और क्रिकेट सीखो।मेरे मित्र कर्नल भास्कर ने वादा किया है कि बी.ए. के बाद लेफ्टिनेंट के पद पर तुम्हारी सीधी बहाली लेंगे वे…”
वह हँसता,” लेकि बंदूक और बारूद की यह नौकरी मुझे पसंद नहीं है पापा!मैं प्रोफेसर बनूँगा।”
“अरे ! क्या बोलते हो…” पिता मुँह बना लेते,” तुम बहुत इमोशनल.हो..तुम्हारा स्वभाव लड़कियों वाला है…
इण्टर करने के बाद उसने राजधानी के एक बड़े नामचीन विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और अध्ययन करने लगा। पढ़ाई के साथ कविता की एक एक किताब ‘ स्वप्न पंख’ लेकर भी कैम्पस में चर्चित रहा। पहाड़ का एकांत और उसका अशेष सौंदर्य  उसके व्यक्तित्व को यहाँ भी अलग राह पर ढाल रहा था, तभी उसकी एक दोस्त मनीषा ने एक रोज अचानक कहा,” हम लोग एक एजिटेशन पर जा रहे हैं… सरकार की नागरिक विरोधी निरंकुश नीतियों के विरोध में तुम भी चलो…”
” मैं…?” पीटर चौंका।
“हाँ तुम!” लड़की हँसी,” केवल कल्पना से नहीं, कर्म से भी कवि बनो…”
” क्यों नही।” झिझकते हुए उसने कहा। पर वह क्या जानता था कि इस जुलूस में उसका साथ  उस जहीन लडकी से छूट जाएगा। ऐसा ही हुआ था।
उस एजीटेशन में मनीषा पुलिस फायरिंग में मारी गयी थी।
उसने ने करवट बदली, कविता में अब आक्रोश का धुआँ था…
तुम छीन सकते हो
हजारों लोगो से उसकी आजादी
संगीन की नोक पर
आसमान से उसका नीलापन
पाखी से उसकी उड़ान
फूलो से उसके रंग
लेकिन हम लड़ेंगे
हाँ अब लड़ेंगे!
हर रात के बाद सुबह आती है। सुनहले दिन जलने के बाद अगले दिन नयी रंगत पकडते हैं।  कोलतारपुते रास्तों पर बिखरे खून उम्मीद की शाखों में फूल बन उग आते हैं,  एक सुंदर कल्पना खिलखिलाने लगती है ! अनंत तक फैला एक विश्वास  साँसों में महकने लगता है,  मनीषा कविता में एक पूरी मानवीय दुनिया थी… अन्याय के विरोध में , प्रतिकार में एक तनी हुई मुट्ठी!उस दिन लहू से लथपथ   स्वप्न बन कर वह समा गयी थी उसमें! पीटर के अन्दर एक  नये पीटर का मनीषा के रूप में जन्म!  हम लडेंगे!
….
सुबह संतरी की आवाज और आहट से वह जगा। उसे लगा, ओस से धुली पंखुड़ियों की तरह ताजा है उसका मन। वह बाहर निकल आया  बहुत से कैदी सैकडों सवालों के साथ उसका इन्तज़ार कर रहे थे। उसने हाथ उठाकर सूरज का अभिवादन किया और  फिर कहा,” आजादी!”
कैदियों ने भी सहज भाव से दुहराया, आजादी!”
पूरा जेल परिसर गूँज गया। जेलर भागा-भागा आया और  कुछ हिदायत देकर लौट गया। पुलिस में अफरा-तफरी मच गयी और वह चौकन्ना हो गयी। इन सब से अलहदा सूरज धीरे-धीरे जेल की हदबंदी को पार करने लगा।कैदी के चेहरे पर एक अनिवर्चनीय खुशी थी। वह अब भी सूरज का अभिवादन कर रहा था।
हंस, कथादेश, वागर्थ, पाखी, साखी,पश्यंती, सृजन सरोकार, किस्सा,आजकल, अहा जिन्दगी, वर्त्तमान साहित्य, कहन, गूंज, संवेद, दैनिक हिन्दुस्तान, नई बात, जनसत्ता,प्रभात खबर आदि पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ,आलेख व समीक्षाएँ प्रकाशित। सम्प्रति- प्रिंसिपल, पूर्णिया महिला काॅलेज पूर्णिया-854301 मो.न.-9431867283

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