संपादकीय - क्या भारत में भी तालिबान बसते हैं ? 3

भारत को कम से कम स्थिति को सही ढंग से निपटने का प्रयास करना होगा। भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में कुछ आधारभूत ढांचे तैयार करने के कार्यक्रम शुरू किये थे। भारत को युद्ध जैसी स्थिति नहीं बनानी है। अपनी स्थिति को मज़बूत बनाना है और अफ़गानिस्तान में सत्ता किसी की भी हो, उसे महसूस करवाना है कि भारत के अहम किरदार के बिना अफ़गानिस्तान का कोई भविष्य नहीं है। 

मेरे एक अध्यापक हैं जो कि मेरे कॉलेज में हिन्दी पढ़ाया करते थे। अब क्योंकि मैं वहां अंग्रेज़ी ऑनर्स कर रहा था, तो ज़ाहिर है कि हिन्दी पढ़ने जैसी कोई स्थिति मेरे लिये बन भी नहीं पाई। मैं अपनी पढ़ाई नौकरी के साथ कर रहा था… सुबह को बैंक में नौकरी और शाम को बी.ए. ऑनर्स अंग्रेज़ी। बैंक की नौकरी को ध्यान में रखते हुए मैंने हिन्दी के स्थान पर अर्थशास्त्र विषय चुन लिया। इसलिये मुझे कभी भी उनसे सीधे पढ़ने का मौक़ा नहीं मिला। यानि कि मैं हिन्दी के किसी भी अध्यापक का विद्यार्थी नहीं बन पाया।  
मगर हमारे ज़माने में आपके कॉलेज के सभी अध्यापक आदरणीय होते ही थे… चाहे वे आपको पढ़ाएं या फिर न पढ़ाएं। मैं आज तक उनके साथ यह सम्मान का रिश्ता बनाए हुए हूं। उनसे बहस नहीं कर पाता। ऊंची आवाज़ में बोलने का तो सवाल ही नहीं उठता… मेरे व्हट्सएप संदेश के शब्दों में भी कभी हिंसा महसूस नहीं हो सकती।
समस्या यह है कि उनकी सोच वर्तमान भारतीय सरकार को लेकर रवीश कुमार और राजदीप सरदेसाई से मिलती जुलती है… उनकी सोच इकतरफ़ा पाता हूं। मगर आज तो हद ही हो गयी। मैंने उन्हें अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान की हिंसा का एक वीडिये भेजा तो उनका जवाब आया, नया है या पुराना पता नहीं… पर खौफनाक है। पागल उधर भी हैं और इधर भी।
मुझे पहली बार महसूस हुआ कि सर ज़्यादती कर रहे हैं। तालिबान की तरह एके-47 लिये आतंकवादी कश्मीर में तो दिखाई दे जाते हैं, मगर बाक़ी भारत में तो कहीं दिखाई नहीं देते। अब क्योंकि मैं अपने सर की सोच से परिचित हूं तो समझ सकता था कि वे कश्मीर की बात तो नहीं ही कर रहे। यानि कि वे हिन्दू आतंकवाद की बात ही कर रहे होंगे।
मैंने चुटकी लेते हुए लिखा, “जी सर नये तालिबान तो शांति दूत हैं।” 
खटाक से उनका जवाब आ पहुंचा, “यह मैंने कब कहा कि नए तालिबान शांति दूत हैं। मैंने खौफनाक शब्द का इस्तेमाल किया है । खतरनाक भी कह सकता हूं और हैं भी । लेकिन हम लोग हमेशा अपने देश में जो तालिबानहैं, उनसे आंखें चुरा लेते हैं। सच कहना खतरनाक होता है और एक तरफ़ा सच कहना उससे भी ज्यादा खतरनाक।” अब उन्होंने अपनी बात स्पष्ट कर दी थी। 
उस पर मैंने उन्हें जवाब दिया कि शायर मुनव्वर राणा भी यही कहते हैं जैसा कि आप कह रहे हैं। उनके मुताबिक वाल्मीकि भी रामायण लिखने से पहले डाकू था (थे नहीं)।  उनका जवाब आया, “उनका पूरा बयान उपलब्ध नहीं है। जो भी कहा होगा, उनका अपना अनुभव होगा। मेरी राय अपनी जगह है। 
इसके बाद मैंने उन्हें मुनव्वर राणा के बारे में दैनिक हिन्दुस्तान की एक समाचार क्लिपिंग भेज दी। उस पर उनकी टिप्पणी और भी मज़ेदार थी, “वैसे तो यह रिपोर्टिड बयान है। लेकिन इसे सही भी मान लिया जाए तो इस बयान पर अच्छी खासी बहस हो सकती है।
मुझे एक बात समझ में आ गयी कि अब सच की भी बहुत सी परिभाषाएं हो गयी हैं। एक मेरा सच है, दूसरा मेरे अध्यापक का सच है और तीसरा ‘बेचारा सच’ है। और यह जो तीसरा सच है न… ये सच में बहुत ही बेचारा है। इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। 
मेरी समस्या है कि मैंने कभी वाल्मीकि को रामायण के रचियता के अतिरिक्त किसी और रूप में सोचा ही नहीं है। इसलिये मैं डाकू रत्नाकर के बारे में कुछ जानता भी नहीं और जानने में कोई रुचि भी नहीं। मगर यह सोचना कि 2021 के तालिबान मध्यकाल के खूंखार आतंकवादी नहीं हैं और वाल्मीकि की तरह ऋषि बन चुके हैं… कम से कम मेरे बूते की तो बात नहीं है। 
अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भी एक तालिबान का सच है; एक अफ़ग़ानिस्तान की अपदस्थ सरकार का सच है; एक पाकिस्तान का सच है; एक अमरीका का सच है… और एक बेचारा सच है जो कहीं भटक रहा है। 
अफगानिस्तान से एक ख़तरनाक समाचार सामने आ रहा है कि आतंकी संगठन तालिबान ने सुरक्षा की जिम्मेदारी हक्कानी नेटवर्क को सौंप दी है।  हम सब जानते हैं कि हक्कानी नेटवर्क का अलकायदा से संबंध रहा है और पाकिस्तान की ख़ुफिया एजेंसी आईएसआई हक्कानी नेटवर्क पर सीधे कंट्रोल करती है। अमरिका के मोस्ट वांटेड आतंकवादी खलील हक्कानी को काबुल की सड़कों पर देखा गया। खलील हक्कानी पर अमेरिका ने 5 मिलियन डॉलर यानी करीब 37 करोड़ 15 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा है। 
समाचार मिल रहे हैं कि अफ़गानिस्तान की नेशनल रीकाँसीलियेशन काउंसिल के चेयरमैन अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह ने खलील अल रहमान हक्कानी से मुलाकात की है और काबुल की सुरक्षा की जिम्मेदारी हक्कानी नेटवर्क को सौंप दी है। याद रहे कि साल 2018 में जलालुद्दीन हक्कानी की मौत के बाद उसका बेटा सिराजुद्दीन इस नेटवर्क का मुखिया बन गया। अपनी दौलत, सैन्य बल और खूंखार पहचान के चलते वह तालिबान का नज़दीकी साथी बन चुका है।
अफ़ग़ानिस्तान की सड़कों पर हिंसा का नंगा नाच हो रहा है। काबुल हवाई अड्डे पर फ़ायरिंग हो रही है। काबुल से भागने वाले अफ़ग़ान नागरिक अमरीकी हवाई जहाज़ के पहियों से लिपट कर देश से बाहर जाने का प्रयास कर रहे हैं और हज़ारों फ़ुट की ऊंचाई से गिर कर जान से हाथ धो रहे हैं। उनमें अफ़ग़ानिस्तान का एक नेशनल फ़ुटबॉल प्लेयर भी शामिल है। 
तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा जमाते ही पाकिस्तान के तालिबान भी सक्रिय हो गये और लाहौर जैसे बड़े शहर में मीनार-ए-पाकिस्तान पर चार सौ पाकिस्तानियों ने एक युवती को उछाल उछाल कर उसके कपढ़े फाड़ डाले। बेहद वहशियाना व्यवहार किया उस महिला के साथ। प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस मसले पर चुप्पी साधे रखी मगर सोशल मीडिया पर उस महिला के विरुद्ध ही मुहिम शुरू कर दी गयी।
ख़लील-उर-रहमान ने इस हादसे पर कुछ वैसे ही बयान दिये जिसमें भारत के कुछ टीकाकारों की आवाज़ सुनाई देने लगी। उनका कहना है कि एक महिला ने कुछ गुंडों के साथ मिल कर यह सारा आयोजन रचाया और पाकिस्तान की विश्व में बेइज्ज़ती करवाई। यह पब्लिसिटी पाने का उस महिला का षड़यंत्र था। 
अफ़गानिस्तान में तालिबान जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि पहले वे अपने देशवासियों को वापिस मध्य-युगीन जीवन में जीने को बाध्य करेंगे और उसके बाद अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, युरोप, ब्रिटेन और भारत जैसे देशों के लिये नासूर बन खड़े होंगे। उनसे अपेक्षा करना कि वे सभ्य समाज जैसा व्यवहार करेंगे किसी सपने से कम नहीं है।
पाकिस्तानी नागरिक, मंत्री, सांसद, सोशल मीडिया… सब तालिबान की तारीफ़ें करते थक नहीं रहे। पाकिस्तान को लगने लगा है जैसे उनकी सेना ने कोई बहुत बड़ी फ़तह हासिल कर ली है। पाकिस्तान समझ नहीं पा रहा कि स्थिति कितनी नाज़ुक और विकट है। जिन तालिबान की शान में पाकिस्तान कसीदे पढ़ रहा है, वहीं पाकिस्तान पर हमले करने से पहले दो पल भी नहीं सोचेंगे। 
भारत को कम से कम स्थिति को सही ढंग से निपटने का प्रयास करना होगा। भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में कुछ आधारभूत ढांचे तैयार करने के कार्यक्रम शुरू किये थे। भारत को युद्ध जैसी स्थिति नहीं बनानी है। अपनी स्थिति को मज़बूत बनाना है और अफ़गानिस्तान में सत्ता किसी की भी हो, उसे महसूस करवाना है कि भारत के अहम किरदार के बिना अफ़गानिस्तान का कोई भविष्य नहीं है। 
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

12 टिप्पणी

  1. अच्छा सम्पादकीय मान्यवर,
    हुल्लड़ मुरादाबादी की कुछ पंक्तियाँ याद आईं,
    आपके और पुरवाई के पाठकों के लिए:
    :: ::
    आइना उनको दिखाने की ज़रुरत क्या थी
    वो हैं बन्दर ये बताने की ज़रुरत क्या थी
    भूखे बच्चे को पिलाते तो दुआएं मिलती
    सांप को दूध पिलाने की ज़रुरत क्या थी
    दो के झगडे में पिटा तीसरा तो चौथा बोला
    तुम्हे उसमे टांग अड़ाने की ज़रुरत क्या थी!
    -हुल्लड़ मुरादाबादी
    (बोरिस जॉनसन और मुन्नवर राणा की नज़र)

  2. In your Editorial you have very successfully brought out the distressing and horrifying state of affairs caused by the Taliban in Afghanistan.
    Congratulations Tejendra ji
    Warm regards and best wishes
    Deepak Sharma

  3. सम्पादकीय में “तीसरा बेचारा सत्य ” का अर्थ गहरा है ।सभी तथ्य
    शब्दसः सत्य हैं ।
    यह समय भारत के लिए भी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा से निबटने का नाज़ुक दौर है ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  4. सम्पादकीय का प्रारम्भ बहुत रोचक और उत्सुकतापूर्ण है। समग्र विवेचन निष्पक्ष है। वस्तुस्थिति का प्रबुद्ध विश्लेषण किया गया है। तीसरे ‘बेचारे’ सच पर ध्यान देने की आवश्यकता है। देखना है कि भारत के अहम् किरदार का ऊँट किस करवट बैठता है!!!!!

  5. आपके विचार जान कर बहुत प्रसन्नता हुई और कुछ सन्तोष भी.. कि स्वस्थ विचारों वाले व्यक्ति हैं..! बहुत से लोग तो, पता नहीं कैसे रवीश कुमार जैसे लोगों से बुरी तरह प्रभावित हैं, और सच्चाई न देखना चाहते हैं, न समझना चाहते हैं..! आपको बहुत, साधुवाद

  6. आदरणीय, यह भारत है, यहाँ बुद्धिजीवी बहुत अधिक मात्रा में हैं, यूँ भी जयचंद और मानसिंह हमारे इतिहास के चरित्र हैं। भारत की इतनी लंबी दासता का इतिहास यहाँ के वासियों की ‘नेकनियती’ का न भी इतिहास है।

  7. आप और हम खुले दिमाग के होने के कारण इन लोगों की बकवास पर भी सोच विचार लर उन्हे गलत ठहराते हैं। यह अच्छी बात है।

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