Saturday, May 18, 2024
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संपादकीय – हैं और भी खेल… क्रिकेट के सिवा!

हाल के वर्षों में खेल नीति का अस्तित्व महसूस होता दिखाई देने लगा है। भारतीय खिलाड़ियों से हम ओलंपिक मेडल की भी अपेक्षा करने लगे। पहले हमारे सबसे बड़े हीरो मिल्खा सिंह थे जो कि मेडल जीत नहीं पाए… मगर बिना किसी सहायता या मार्गदर्शन के चौथे स्थान पर रहे। आज एथलेटिक्स में भारतीय खिलाड़ी विश्व के अन्य खिलाड़ियों को न केवल कड़ी चुनौती देते हैं बल्कि मेडल पर अपना हक़ भी समझते हैं।

क्रिकेट विश्व कप, इज़राईल-हमास युद्ध और भारत की चुनावी राजनीति के चलते हमारा ध्यान एक ऐसी उपलब्धि की ओर गया ही नहीं जो कि हम सभी भारतवंशियों के लिये गर्व का विषय है। पिछले बहत्तर वर्षों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि भारतीय खिलाड़ियों ने एशियाई खेलों में सौ से अधिक पदक जीत कर भारत का मान बढ़ाया।
हाल ही में 19वें एशियाई खेल-2022 (जो कि वर्ष 2023 में आयोजित किये गये) चीन के हांगझू ओलंपिक स्पोर्ट्स सेंटर स्टेडियम (जिसे बिग लोटस भी कहा जाता है) में संपन्न हुए। उसमें चीन (383), जापान (188) और दक्षिण कोरिया (190) के बाद पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा भारत जिसने 107 पदक जीते। भारतीय खिलाड़ियों ने 28 स्वर्ण, 38 रजत एवं 41 कांस्य पदक जीत कर देश को एशियाई खेलों में अब तक का सबसे उत्तम तोहफ़ा दिया।
याद रहे कि इससे पहले जकार्ता एशियाई खेलों (2018) में भी भारत ने पिछले वर्षों से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 16 स्वर्ण पदकों के साथ 70 पदक जीते थे, जो कि उस समय तक का भारत  का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।
एक ज़माना था जब भारत विश्व में हॉकी के लिये जाना जाता था। फिर कुछ समय बीत जाने के बाद भारत में खेल का अर्थ केवल क्रिकेट बन कर रह गया। बीच-बीच में टेनिस, बेडमिन्टन और शतरंज भी अपनी-अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे मगर भारतवंशियों को बुख़ार तो हमेशा क्रिकेट का ही चढ़ता रहा। अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ी बस राज्य स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपलब्धियों से संतोष कर लेते। बीच-बीच में कभी कोई खिलाड़ी चमत्कार कर लेता तो उसकी फ़ोटो अख़बारों में आ जाती। लेकिन भारत की कोई परिभाषित खेल नीति नहीं थी।
हाल के वर्षों में खेल नीति का अस्तित्व महसूस होता दिखाई देने लगा है। भारतीय खिलाड़ियों से हम ओलंपिक मेडल की भी अपेक्षा करने लगे। पहले हमारे सबसे बड़े हीरो मिल्खा सिंह थे जो कि मेडल जीत नहीं पाए… मगर बिना किसी सहायता या मार्गदर्शन के चौथे स्थान पर रहे। आज एथलेटिक्स में भारतीय खिलाड़ी विश्व के अन्य खिलाड़ियों को न केवल कड़ी चुनौती देते हैं बल्कि मेडल पर अपना हक़ भी समझते हैं।
भारतीय एथलीटों का प्रदर्शन इस बार पदकों के मामले में बेहतरीन रहा और उन्होंने 6 स्वर्ण, 14 रजत और 9 काँस्य मिला कर कुल 29 पदक जीते। वहीं शूटिंग स्पर्धा में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 7 स्वर्ण, 9 रजत और 6 कांस्य पदक समेत 22 पदक जीते। और हॉकी के पुराने मुरीदों को अवश्य यह देख कर सुकून मिला होगा कि भारतीय हॉकी टीम ने फ़ाइनल मुक़ाबले में जापान को 5-1 से पराजित कर गोल्ड मेडल जीत लिया। इस तरह एशियन चेंपियन होने के नाते भारतीय खिलाड़ियों ने पेरिस ओलंपिक के लिये अपना स्थान पक्का कर लिया।
2023 एशियाई खेलों में ई-स्पोर्ट्स और ब्रेक-डांसिंग दो नए खेलों की शुरुआत की गई। इनके अतिरिक्त क्रिकेट तथा गो, जियांगकी एवं शतरंज जैसे बोर्ड गेम जो 2018 एशियाड में शामिल नहीं किये गये थे, वर्ष 2023 एशियाई खेलों में पुनः उनकी वापसी की गई।
हेप्टाथेलॉन, डिस्कस थ्रो, वूशु सांडा और जेवलिन थ्रो जैसे खेलों में यदि भारत स्वर्ण, रजत और काँस्य पदक जीतता है तो मन कहता है कि अब हम अपने बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर बनाने के स्थान पर खिलाड़ी बनाने के बारे में सोच सकते हैं। ये सब वो युवा खिलाड़ी हैं जिन्होंने ऐसे समय में इन खेलों को अपना समय दिया जब कोई अन्य इनके बारे में सोच भी नहीं रहा था।
यह सच है कि भारतीय माता-पिता अभी भी खेल को एक कैरियर के तौर पर नहीं सोच पाते हैं। वहीं यह भी सच है कि खेल कोई ऐसा गुण या जायदाद नहीं है जो पीढ़ी दर पीढ़ी उत्तराधिकार के तौर पर हासिल हो सके। सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर को पुत्र अपने पिताओं की तरह क्रिकेट में स्थान नहीं बना पाए।
हमें लगता है कि हमें पुरवाई के पाठकों को एशियाई खेलों के इतिहास की भी थोड़ी जानकारी दे देनी चाहिये। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कई एशियाई देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त की तथा भारतीय अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने एशियाई खेलों के आयोजन का प्रस्ताव रखा ताकि सभी एशियाई देशों का प्रतिनिधित्त्व किया जा सके। पहले एशियाई खेल वर्ष 1951 में नई दिल्ली में आयोजित किये गये थे। इन खेलों को अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा मान्यता प्राप्त है।
साल 1951 के एशियाई खेल के सभी इवेंट मेजर ध्यान चंद नेशनल स्टेडियम में आयोजित किए गए थे, जिसे नेशनल स्टेडियम के नाम से भी जाना जाता है।
इन खेलों में ग्यारह देशों के कुल 489 एथलीट – अफगानिस्तान, बर्मा (वर्तमान म्यांमार), सीलोन (वर्तमान श्रीलंका), इंडोनेशिया, ईरान, जापान, नेपाल, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और मेजबान भारत ने इसमें हिस्सा लिया था। पहले संस्करण में कुल 57 खेलों में पदक के लिए स्पर्धा हुई थी।
जापान ने सबसे अधिक 60 पदक जीते थे, जबकि मेजबान भारत ने कुल 51 पदक जीतकर एशियाई खेलों की पदक तालिका में दूसरा स्थान हासिल किया था।
साल 1951 के एशियाई खेलों का आयोजन पहले साल 1950 में ही होना था। लेकिन, तैयारियों में देरी के कारण उसे स्थगित कर दिया गया था। इन खेलों का दूसरा आयोजन 1954 में फिलीपींस के मनीला शहर में किया गया और तब से यह प्रतियोगिता हर चार साल के अंतराल पर आयोजित की जा रही है।
आज तक नौ अलग-अलग देशों ने एशियाई खेल की मेजबानी की है। थाईलैंड ने सबसे अधिक चार बार प्रतियोगिता की मेजबानी की है, जिसमें साल 1966, 1970, 1978 और साल 1998 का संस्करण शामिल है। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक ने सभी चार एशियाई खेल की मेजबानी की है।
दक्षिण कोरिया ने तीन बार (साल 1986, 2002 और साल 2014) एशियन गेम्स की मेजबानी की है। वहीं, हांगझोऊ 2023 को मिलाकर चीन तीसरी बार एशियाई खेलों की मेजबानी करेगा। इससे पहले चीन ने साल 1990 और साल 2010 के संस्करण की मेजबानी की थी।
भारत ने दो बार एशियाई खेलों की मेज़बानी की है। साल 1951 में पहला संस्करण आयोजित करने के बाद भारत को दूसरी बार साल 1982 में खेलों के इस महाकुंभ के मेज़बानी का अवसर मिला। मगर 1982 के खेलों का आयोजन वित्तीय घोटालों के कारण विवादों में घिरा रहा।
बारहवें एशियाई खेलों का एक विशेष महत्व यह था कि ये 2 से 16 अक्तूबर 1994 के बीच जापान के हिरोशिमा नगर में आयोजित हुए। इन खेलों का मुख्य संदेश एशियाई देशों में शांति और सौहार्द को बढ़ाना था। इस पर ख़ासा ज़ोर दिया गया क्योंकि 1945 में इस शहर पर पहला परमाणु बम गिराया गया था। पूर्व सोवियत संघ से स्वतंत्र हुए कज़ाख़स्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़बेकिस्तान को इन खेलों में शामिल किया गया।
ये पहले एशियाई खेल थे जो किसी देश की राजधानी में आयोजित नहीं हुए थे। पहले खाड़ी युद्ध के बाद इराक़ को खेलों से निलंबित रखा गया था। 42 देशों के 6828 एथलीटों ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और कुल 34 स्पर्द्धाएँ आयोजित हुईं। बेसबॉल, कराटे और आधुनिक पेंटाथलन इन खेलों में शामिल हुए।
वर्ष 2017-18 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ज़मीनी स्तर के एथलीटों को एक मंच प्रदान करने तथा संपूर्ण भारत में खेल के बुनियादी ढाँचे का निर्माण करने के लिये परिकल्पित एक योजना खेलो इंडिया की शुरूआत की जिसके परिणामस्वरूप भारत एक खेल राष्ट्र में परिवर्तित हो रहा है। खेलो इंडिया योजना युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय की प्रमुख केंद्रीय क्षेत्रक योजना है।
व्यापक स्तर पर भागीदारी और खेलों में उत्कृष्टता बढ़ाने के दोहरे उद्देश्यों को प्राप्त करने की दृष्टि से सरकार ने 15वें वित्त आयोग (वर्ष 2021-22 से 2025-26 तक) के दौरान “खेलो इंडिया – खेल के विकास के लिये राष्ट्रीय कार्यक्रम” की योजना को जारी रखने हेतु 3165.50 करोड़ रुपए के परिव्यय का निर्णय लिया है। इस योजना के नतीजे एशियन गेम्स में पदकों के रूप में दिखाई दे रहे हैं।
इन खिलाड़ियों के लिये एक ख़ूबसूरत पल था जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एशियाई खेल 2023 में कमाल करने वाले खिलाड़ियों से मुलाकात की। इस दौरान खेल मंत्री अनुराग ठाकुर और अन्य नेता भी मौजूद रहे। दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में हुए इस कार्यक्रम में पीएम मोदी ने हांगझोऊ से लौटे सभी खिलाड़ियों का स्वागत किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एशियाई खेलों के दौरान लगातार खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाते रहे थे और हर पदक जीतने वाले खिलाड़ी को बधाई दी थी।
हमारी तमाम खेल फ़ेडरेशनों को यह ख़्याल रखना होगा कि भविष्य में हमारा लक्ष्य हर बार पिछले खेलों से अधिक पदक हासिल करना हो। हमें विवादों से बचना होगा। हमारे खिलाड़ियों और फ़ेडरेशन के अध्यक्षों के दिमाग़ में केवल एक ही बात रहनी चाहिये… अधिक पदक… और अधिक पदक!
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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41 टिप्पणी

  1. सम्पादकीय खेल परिदृश्य के संदर्भों में सही समय पर खेल प्राधिकरणों और सरकारों का ध्यान आकृष्ट करने में सक्षम होगा यदि वे गौर नहीं करते है तो युवाओं की प्रतिभा के लिए समुचित अवसर नगण्य रहेंगे ..साधुवाद!
    डाॅ देवेन्द्र गुप्ता
    आश्रय, खलीनी.शिमला हिमाचल प्रदेश

  2. हैं और भी खेल,,,, ग़ालिब के शेर का रौब जताता बताता संपादकीय,,,,एशियन गेम्स को एक नज़र में परंतु बहुआयामी अंदाज़ ए बंया लबरेज़ तिस पर भी हम भारतीय जन की खेल शक्ति को दर्शाता सार्थक लेख जिसमें रोचकता का पुट है और सही अर्थों में वर्तमान का राजनैतिक नेतृत्व संपादकीय में दिए गए श्रेय का सच्चा और पक्का अधिकारी है। हमारी बेटियों बहनों ने अपनी शक्ति का खुल कर और खिल कर प्रदर्शन किया है।
    आदरणीय डॉक्टर तेजेंद्र शर्मा जी को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

    • भाई सूर्यकांत जी पुरवाई संपादकीय पर इस सकारात्मक एवं सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।

  3. कितनी जानकारी दे देते हैं आप तेजेन्द्र जी, सच्चे मायने में आपका संपादकीय एक पूर्ण संपादकीय होता है। कई लेख मैन भी लिखे हैं खेलो पर परंतु जो आंकड़ों के साथ इतिहास अपने दिया वह स्तुत्य है।
    1966 तक हॉकी पर एक छत्र राज्य था फिर धीरे धीरे साम्रज्य घिसकने लगा। मैं आदिवासी क्षेत्र से हूँ जहाँ हॉकी के पहले कप्तान और पहले ओलिंपिक मैडल लेन वाले जयपालसिंह मुंडा ने खेल खेला था अतः हमारा क्षेत्र हॉकी के प्रति काफी संवेदनशील था अब तो लोग क्रिकेट ही खेलते हैं , बचपन मे टेनिस बॉल और दीवार पर विकेट बना कर ही क्रिकेट खेला जैसा कि भारत किब90 प्रतिशत जनता खेलती है। फुटबॉल और हॉकी खूब खेले थे। और हमारे युग मे अशोक कुमार की ड्रिबलिंग देख कर जो रोमांच आता था वह अवर्णनीय है।
    साधुवाद इतने शानदार लेख के लिए।

    • सुरेश भाई जब आप जैसे साहित्य के वरिष्ठ ऑलराउण्डर पुरवाई संपादकीय की सराहना करते हैं तो दिल ख़ुद ही धन्यवाद कह उठता है। आभार।

  4. सभी को सादर नमस्कार और आदरणीय शर्मा जी को साधुवाद।1951 से शुरू हुआ सफर लगातार उत्तरोत्तर विकास की ओर अग्रसर है भारतीयों के लिए गर्व के क्षण हैं।लेख के माध्यम से एशियाई खेलों का इतिहास भी संक्षिप्त में जानने का अवसर मिला है। पुरवाई परिवार की मैं नयी सदस्या हूं आशा रखती हूं कि भविष्य में भी ‌ज्ञान वर्धक, सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर विचार पठन हेतु मुझे मिलते रहें। तुहिना प्रकाश शर्मा पुष्कर राजस्थान

  5. हैं और भी दुनिया में सम्पादक बहुत अच्छे पर आपका है अंदाज़े बयां और ।
    खेल सिर्फ खेलने वालों और देखने वालों का मनोरंजन नहीं यह भी युद्ध की तरह देखा जा रहा है।पूर्ण प्रशिक्षण लेकर एथलीट्स खेल रहे हैं और अंतराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पैर जमाते नज़र आ रहे हैं ।
    यह बात जैसे ही भारत की वर्तमान सरकार को समझ आयी कि क्रिकेट के अलावा भी कई खेल हैं जो सम्पूर्ण भारत के युवाओं को जोड़ सकते हैं, उन्होंने इस ओर ज्यादा सोचना शुरू किया है।
    साधुवाद आपने आंकड़ों सहित जानकारी दी।
    Dr Prabha mishra

  6. सुन्दर सराहनीय रोचक सम्पादकीय
    साहित्य के साथ खेलों पर नज़र
    बधाई एवं शुभकामनाएं

  7. खेल आधारित एक बेहतरीन संपादकीय। एशियाई और ओलंपिक खेल के इतिहास की एक विस्तृत जानकारी तथा भारतीय खिलाड़ियों प्रदर्शन का आंकड़ा सराहनीय है। खेल और साहित्य के समन्वय का सुंदर प्रयास है। एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन 107 पदकों के साथ बहुत ही शानदार रहा। सच में हमारे मन में पदक जीतने की भूख बढ़ती रहनी चहिर। बेहतरीन संपादकीय के लिए धन्यवाद।

  8. एकदम सही कहा आपने कि क्रिकेट के सिवाय और भी खेल हैं अच्छा और एक ज़रूरी आलेख इस विषय पर।

  9. आपके सम्पादकीय पढ़ कर GK सुधर जाती है। कई बार रिफरेंस के लिए भी सम्पादकीय पलट लेती हूँ। इतनी मेहनत से लिखने के लिए धन्यवाद और शुभकामनाये। गुलामी के कारण सीखे हुए खेल ने वास्तव में अमरबेल की तरह काम किया। भला हो मोदी जी का , उनके जैसा प्रधान मंत्री भारतीयों की भाग्य से मिला। जिसने कहा कि, खेलो इण्डिया!!! खेल खेल में भारत खेल गया और सुर्ख़रू हुआ। आज भी याद आता है कि 72 ओलंपिक में भारत मात्र 1 कांस्य पदक जीता था। कितना दुःख हुआ था।
    एशियाड के सभी खिलाड़ियों सहित भारत सरकार और जनता को बधाई। आशा कर सकते हैं कि आने वाले ओलंपिक खेलों में भी भारत अच्छा प्रदर्शन कर सकेगा।
    भारत में माहौल बदलेगा और क्रिकेट के अलावा अन्य खेल और उनके खिलाड़ियों के बारे में बातचीत होती रहेगी। पुराने समय की भारतीय हॉकी महिला टीम के परिवारों की गरीबी के किस्सों की तरह के किस्से ना सुनने को मिलें। खिलाड़ियों को एक सुविधापूर्ण जीवन यापन करने भर को पैसे मिल सकें। नीरज चोपड़ा की तरह वह भी स्टार खिलाड़ी बन कर प्रसिद्धि पा सकें। केवल धोनी, विराट और रोहित ही स्टार ना रहें।

    • शैली जी आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हमें और बेहतर लिखने की प्रेरणा देती है।

  10. खेलों इंडिया खेलो
    और जमकर खेलो
    ढेरों पदक घर लाने को
    दिल लगा कर खेलों

    लिखो तेजेन्द्र जी ,और बहुत लिखो,
    शब्द शब्द शोध कर हमारे लिए लिखो,

    आपके संपादकीय की हमें प्रतीक्षा रहती है,
    हर संपादकीय में विस्तृत जानकारी रहती है,
    आपके परिश्रम का लाभ हम सब पाते हैं
    घर बैठे आनन्द से ‘जानकार’बन जाते हैं
    हर्र फिटकरी लगती नहीं ,और रंग चोखे पा जाते हैं।।
    बढ़िया संपादकीय के लिए धन्यवाद

  11. तेजेंद्र जी का संपादकीय समसामयिक और हर -हमेशा सुन्दर रहा है l
    भारत के खिलाड़ियों और हम सबको भी शुभकामनाएं !

  12. Your Editorial of today is as informative and as encouraging vis- a – vis the achievements of our Indian players in the field of sports.
    You have rightly pointed how till a few years back Indian parents never felt Sports was a good career for their children.Also how it is not necessary that a child of a good sportsperson will be as successful as his parent.
    You have also mentioned the history of ASIAN GAMES and how varied and distinctive they are and how we know now cricket is not the only sport where Indians shine: there are many others too.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  13. खेल तो हमेशा शौक के तौर पर लिया गया। राष्ट्रीय खेल हॉकी भी इतनी लोकप्रिय नहीं है, जितनी कि क्रिकेट को लोकप्रियता मिली है क्योंकि क्रिकेट में पैसा बहुत मिलता है। क्रिकेट खिलाड़ियों के पास अकूत सम्पत्ति है । ओलम्पिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय खेलों के पदकधारी खिलाड़ियों को किस स्तर की नौकरी मिल पाती है और पदकों से जीवन नहीं चलता है।
    खेलों में सरकार की मनोबल बढ़ाने में सहभागिता एक सार्थक और उत्साहवर्धक कदम है। खेल अकादमियों की अनियमितताओं के प्रति भी सरकार और मंत्रालय को सजग रहने की जरूरत है।

  14. आपका आज का संपादकीय एशियाई खेलों की ऐतिहासिकता बताता हुआ यह भी संदर्भित करता है कि 1951 में पहली बार भारत में नई दिल्ली में एशियाई गेम हुए थे जिसमें भारत ने 51 पदक जीतकर एशियाई खेलों की पदक तालिका में दूसरा स्थान हासिल किया था।
    यह जानना भी रोचक है कि द्वितीय विश्व युद्ध के भारतीय अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने एशियाई खेलों के आयोजन का प्रस्ताव रखा ताकि सभी एशियाई देशों का प्रतिनिधित्त्व किया जा सके।
    इस बार भारत ने एशियन गेम 107 पदक जीत कर चौथा स्थान प्राप्त किया है। अब भारतीय माता -पिता के मन की ग्रंथि अवश्य दूर होगी जो सदा अपने बच्चों से यहीं कहते थे खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब ।
    लेकिन हर तरह के खेल और खिलाड़ियों को वहीं मान और सम्मान देना होगा जो हम क्रिकेट के खिलाड़ियों को देते हैं। तभी स्थिति में बदलाव आएगा।

    सदा की तरह विचारोतेजक संपादकीय…
    साधुवाद आपको।

    • सुधा जी आपकी विस्तृत और सारगर्भित टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।

  15. एशियाई खेलों के बारे में सर्वसमावेशी जानकारी वाले इस संपादकीय के लिए आपको साधुवाद।
    इस बार कुश्ती में शायद हम कुछ पिछड़ गये, वरना हमारे पदकों की संख्या और अधिक होती।
    भारत में अब सुविधाओं का अभाव नहीं‌ है। बस खेलने वाले चाहिए। क्रिकेट के प्रति रुझान इसलिए बढ़ा है कि आइपीएल‌ की किसी टीम में चुने जाने पर भी खिलाड़ी काफी पैसा कमा लेते हैं। अन्य खेलों के साथ ऐसा नहीं है।
    अगर खिलाड़ी चमक न पाए तो उसे जीविका के भी लाले पड़ सकते हैं। इसलिए आज भी खेल करियर नहीं है। उसके साथ साथ पढ़ना जरूरी है। जिस दिन यह बाध्यता खत्म हो जाएगी, ‌भारत भी चीन और कोरिया जितने पदक जीतने लगेगा।

  16. तेजेन्द्र भाई: पुरवाई के सम्पादकीय की रिसर्च के बाद जब उन ख़्यालों को एक अजब अंदाज़ से ब्यान करने का जो आपका लहज़ा और तौरतरीका है वो वाकई में बहुत ही काबिले तारिफ़ है। खेलों के बारे में इतनी सारी जानकारी पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
    इस में कोई शक नहीं कि भारत में अधिक्तर माँ बाप जब बच्चों के भविष्य के बारे में सोचते हैं, तो उस में sports काफ़ी नीचे वाली सीढ़ी पर होता है। इसका सब से बड़ा कारण सही मार्गदर्शन और सहायता का अभाव रहा है। लेकिन अब समय के साथ साथ इस सोच में भी काफ़ी बदलाव देखने को मिलता है। सरकार की ओर से “खेलो इंडिया” अभियान से तो sports career को बहुत मान्यता मिलने लगी है और माता पिता जब अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचते हैं तो अब sports भी एक choice हो गया है। हमें पूरा विश्वाश है कि भारत के खिलाड़ी अब हर प्रकार के खेलों में ख़ूब सारे मैडल जीतेंगे।

    • विजय भाई, मेरे संपादकीय एक कहानीकार के संपादकीय होते हैं। ज़ाहिर है कि उनमें पठनीयता तो भरने का प्रयास करता ही हूं। और आपकी टिप्पणी से पता चलता है कि काफ़ी हद तक सफल भी हो जाता हूं। आभार।

  17. आ.तेजेन्द्र जी!
    आपके संपादकीय में आप विषय को तथ्यों सहित बारीकी से लिखते हैं । इसके अतिरिक्त विषय के प्रति भी उत्सुकता रहती है, क्योंकि वह भी विशेष रहते हैं।
    यही दो गुण आपके संपादकीय को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं और जिज्ञासु भी बनाते हैं।
    ओलंपिक में 100 मेडल मिलना नीचे थी देश और देशवासियों के लिए करिश्मा की तरह बहुत खुशी की बात है।
    क्रिकेट का जुनून तो नजर आता है लेकिन यह बात भी सही है कि और भी खेल है क्रिकेट के अतिरिक्त जो नाम रोशन करने में सहायक है, स्वयं का भी और देश का भी।
    एशियाई खेल कब शुरू हुए, कहां-कहां खेले गए, कितनी-कितनी बार खेले गए, कौन-कौन सा खेल खेला गया, कौन सा शामिल होने वाला है, किस- किस देश में हुए? सभी जानकारियां बहुत विस्तृत तौर पर अपने दीं।
    संपादकीय की पुस्तक निकल जाएगी तो यह प्रतियोगिता परीक्षाओं की दृष्टि से बच्चों के लिए बहुत अधिक हेल्पफुल होगी।
    बेहतरीन संपादकीय के लिए एक बार पुणे बधाई भी और शुक्रिया भी।

  18. बहुत सुंदर विस्तार से लिखा गया जानकारीयुक्त संपादकीय l देश के लिए इन गौरव के पलों में वाकई हमारा ही नहीं मीडिया का भी ध्यान नहीं गया l क्रिकेट के अतरिक्त किसी खेल को इतनी मीडिया कवरेज नहीं मिलती l ऐसे समय में अपका संपादकीय आना आत्म गौरव के इन पन्नों को सहेजना है, इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं l अब जब खेलों की ओर ध्यान दिया जा रहा है तो इसमें आम भारतीय को गौरव महसूस होना चाहिए l ताकि भविष्य में माता -पिता अपने बच्चों के खेलों के प्रति रुझान को किताबों के बोझ तले ना दबा दें l

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