भारत में इस बात पर अवश्य शोध होना चाहिये कि हमारे नेता जब राजनीति में प्रवेश करते हैं, उनकी आर्थिक स्थिति उस समय क्या होती है और नेता बनने के चन्द वर्षों बाद क्या होती है। यह कैसे संभव हो सकता है कि यदि नेता भ्रष्ट नहीं हैं तो इतनी जल्दी इतने अमीर कैसे हो जाते हैं।  भारत के युवा विद्यार्थियों को यह जानना और समझना होगा कि दल चाहे कोई भी क्यों न हो – चारों ओर बस दलदल ही फैली हुई है। आर्थिक अपराधों में फंसे राजनीतिक नेता भारतीय न्याय प्रक्रिया के चलते ज़मानत पा लेते हैं और फिर वर्षों तक अदालतों में केस चलता रहता है।

भारत में सरकार किसी भी दल की क्यों न हो, विपक्ष जांच एजेंसियों के विरुद्ध बयानबाज़ी करता ही रहता है। इन एजेंसियों की तुलना पिंजरे में बंद तोते से की जाती है जो अपने मालिक के हुक्म पर बोलता है काम करता है। 
हाल ही में आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को सी.बी.आई. द्वारा गिरफ़्तार करने पर विपक्षी दल बहुत ज़ोर-शोर से सी.बी.आई. के विरुद्ध बयानबाज़ी करने लगे। इन दिनों जितनी बुराई और आलोचना इन अधिकारियों की हो रही है, उससे हैरानी होती है कि वे बेचारे सांस कैसे ले पा रहे होंगे। 
एक आरोप जांच एजेंसियों पर निरंतर लगाया जा रहा है कि वे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की जांच नहीं करते मगर विपक्ष के नेताओं के पीछे हाथ धो कर पड़े हैं। कल ही राजस्थान के विवादित कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा कि, “सी.बी.आई. (केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो) और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के ज़रिये 95 प्रतिशत मुकदमे सिर्फ़ विपक्षी नेताओं के विरुद्ध दर्ज हुए।” 
जांच करने पर पाया जाएगा कि सचिन पायलट या अन्य नेता कुछ ग़लत नहीं कह रहे हैं। ऐसा ही हो रहा है। मगर हमें याद रखना होगा कि सी.बी.आई. की दोषियों को सज़ा दिलवाने की दर यानी कि ‘कन्विक्शन रेट’ 70 से 75 प्रतिशत है। जब सी.बी.आई. की जांच में आए दोषियों को अदालतों द्वारा सज़ा हो जाती है तो कम से कम हमें इस बात की तो तसल्ली है कि सी.बी.आई. अपना काम ठीक कर रही है। और कहावत कि ‘इस हमाम में सब नंगे हैं’ राजनीतिज्ञों पर सटीक बैठती है।
भारत में इस बात पर अवश्य शोध होना चाहिये कि हमारे नेता जब राजनीति में प्रवेश करते हैं, उनकी आर्थिक स्थिति उस समय क्या होती है और नेता बनने के चन्द वर्षों बाद क्या होती है। यह कैसे संभव हो सकता है कि यदि नेता भ्रष्ट नहीं हैं तो इतनी जल्दी इतने अमीर कैसे हो जाते हैं।  भारत के युवा विद्यार्थियों को यह जानना और समझना होगा कि दल चाहे कोई भी क्यों न हो – चारों ओर बस दलदल ही फैली हुई है। 
आर्थिक अपराधों में फंसे राजनीतिक नेता भारतीय न्याय प्रक्रिया के चलते ज़मानत पा लेते हैं और फिर वर्षों तक अदालतों में केस चलता रहता है। इस समय तो विपक्ष के सबसे बड़े नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी नेशनल हैरॉल्ड मामले में ज़मानत पर ही चल रहे हैं। यानी कि जिन कैदियों को सज़ा नहीं हो पाती है, उसमें अदालती कार्यवाही का भी एक उल्लेखनीय हाथ है। 
अभी हाल ही में दिल्ली के शराब काण्ड में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया फंसे तो उनकी पार्टी ने हंगामा खड़ा कर दिया। चारों ओर शोर मचा दिया कि देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षा मंत्री को अच्छी शिक्षा देने के जुर्म में सी.बी.आई. ने गिरफ़्तार कर लिया। सच तो यह है कि यह गिरफ़्तारी उनकी ‘शराब बिक्री पॉलिसी’ को लेकर हुई है। वैसे लगता है कि आम आदमी पार्टी के पास काबिल नेताओं की कमी है क्योंकि मनीष सिसोदिया के पास कुल मिला कर 18 विभाग थे। राजनीतिक पार्टियों को मामले को ट्विस्ट देने में महारथ हासिल है। यही काम भारतीय जनता पार्टी करती थी और और वही काम तमाम विपक्षी दल कर रहे हैं। 
अब तो इस मामले में तेलांगना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर रॉव की पुत्री कल्वाकुंतला कविता का नाम भी जुड़ गया है। प्रवर्तन निदेशालय उनसे बातचीत कर रहा है। विपक्षी नेता अपना वही पुराना राग अलाप रहे हैं – क्या भाजपा के नेता “राजा हरिशचन्द्र की औलाद हैं?” सवाल वही है कि क्या भाजपा नेता का भ्रष्ट साबित होना, विपक्ष के नेताओं के भ्रष्टाचार पर परदा डाल देगा या उसका औचित्य सिद्ध कर देगा। 
इस आलेख के ज़रिये ‘पुरवाई’ पत्रिका अपने पाठकों को बताना चाहेगी कि सी.बी.आई. में ऊपरी दर्जे के अधिकारी बनने के लिये पहले यू.पी.एस.सी. (संघ लोक सेवा आयोग) की परीक्षा पास करनी होती है और उसके बाद वे बनते हैं आई.पी.एस. अधिकारी। उसके बाद वे केन्द्रीय जांच ब्यूरो में जाने का विकल्प इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं इंस्पेक्टर पद के लिये एस.एस.सी (कर्मचारी सेवा आयोग) की स्नातक स्तर परीक्षा (सी.जी.एल.) पास करनी होती है। ये लोग अनपढ़ या कम बुद्धि वाले लोग नहीं होते हैं। युवा पीढ़ी की क्रीम होते हैं ये लोग और इनके पास होता है कुछ कर गुज़रने का माद्दा। 
यू.पी.एस.सी. यानी कि सिविल सर्विस परीक्षा के बारे में तो काफ़ी जानकारी उपलब्ध है। एस.एस.सी. के लिये चार पेपर पास करने होते हैं। उनमें से दो ऑब्जेक्टिव टाइप और दो लिखित पेपर होते हैं। यहां भी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक की ही है। 
जब इतनी मेहनत करके अधिकार सी.बी.आई. में आते हैं तो उन्हें इतनी अपेक्षा तो होती ही होगी कि उनको अवांछित आलोचना का शिकार न बनाया जाए। प्रश्न बहुत सीधा है – क्या एक असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर अपने विभागाध्यक्ष से पंगा ले सकता है? क्या एक निचले तबके का कर्मचारी अपने उच्च-अधिकारियों के अवहेलना कर सकता है? तो सी.बी.आई. के अधिकारी में आदेश का पालन करते हैं। ध्यान इस बात पर देना है कि जब उन्हें कोई केस सौंपा जाता है तो उस केस को वे कितनी ईमानदारी से हल करने का प्रयास करते हैं। 
सीबीआई में सब इंस्पेक्टर के वेतन का ग्रेड 9,300-34,800 भारतीय रुपए प्रति माह है और सीबीआई इंस्पेक्टर 4,200 रूपये के ग्रेड वेतन में है और हाथ में कुल वेतन 44,000 भारतीय रुपए प्राप्त होते हैं। किसी भी सी.बी.आई. अफ़सर या इंस्पेक्टर में जिन गुणों की अपेक्षा की जाती है, उनमें शामिल हैं – तीव्र, विश्लेषणात्मक मन; शारीरिक फिटनेस; सहनशीलता; मानसिक सतर्कता; एकाग्रता का उच्च स्तर; अवलोकन की उत्सुक शक्तियां; तर्कसंगत, रेशनल और विश्लेषणात्मक सोच; यात्रा करने की शक्ति; लंबे, अनियमित काम के घंटे के अनुकूल कार्य करने की योग्यता; दूरस्थ और खतरनाक क्षेत्रों में काम करने की शक्ति।
ज़ाहिर है कि हमारे पाठकों के मन में यह प्रश्न भी उठ रहा होगा कि इस ‘पिंजरे के तोते’ का गठन कब हुआ होगा। तो हम आपको बता दें की सी.बी.आई. का गठन 1 अप्रैल 1963 में किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की रक्षा से संबंधित गंभीर अपराधों, उच्च पदों पर भ्रष्टाचार, गंभीर धोखाधड़ी, ठगी व गबन और सामाजिक अपराधों (विशेष रूप से आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी, कालाबाज़ारी और मुनाफ़ाखोरी) का अन्वेषण तय किया गया था।
कुछ समय पश्चात सी.बी.आई. को चर्चित हत्याओं, अपहरण, विमान अपहरण, चरमपंथियों द्वारा किये गए अपराध जैसे अन्य अपराधों की जाँच का उत्तरदायित्व भी सौंपा जाने लगा।
सी.बी.आई. केवल केंद्रशासित प्रदेशों में स्वतः संज्ञान लेकर अपराधों की जाँच कर सकती है। केंद्र सरकार किसी राज्य में अपराध की जाँच के लिये सी.बी.आई. को अधिकृत कर सकती है लेकिन ऐसा केवल संबंधित राज्य सरकार की सहमति से किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय सी.बी.आई. को राज्य की सहमति के बिना भी देश में कहीं भी किसी अपराध की जाँच का आदेश दे सकते हैं।
वर्ष 2014 में लोकपाल अधिनियम ने सी.बी.आई. के निदेशक की नियुक्ति के लिये एक समिति का प्रावधान किया जिसके अध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री होते हैं  तथा अन्य सदस्य – विपक्ष के नेता / सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता, भारत का मुख्य न्यायाधीश / सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश होते हैं। 
यू.पी.ए.-1 एवं 2 के ज़माने में लगभग 60 प्रतिशत जांच के मामले विपक्षी दलों पर करवाए जाते थे। उन दिनों सी.बी.आई. को कांग्रेस ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन’ या ‘पिंजरे का तोता’ कहा जाता था। आज भारतीय जनता पार्टी के राज में इसे ‘भाजपा का दामाद’ और आयकर विभाग व प्रवर्तन निदेशालय के साथ मिला कर ‘त्रिमूर्ति’ कहा जाता है।
समस्या यह है कि न तो नेता और न ही जनता इन तथ्यों से अवगत है कि सी.बी.आई. अधिकारियों की योग्यता क्या होती है और वे कितने मेहनती और कमिटिड होते हैं। बस उन पर आसानी से कीचड़ उछाल दिया जाता है। ये जवान अवश्य ही भीतरी तौर पर ख़ासे मज़बूत होंगे जो इतनी अनर्गल आलोचनाओं के बावजूद अपना पूरा काम निष्ठा और ईमानदारी से करते हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि यह संपादकीय पढ़ने के बाद हमारे पाठक सी.बी.आई. के प्रति अपनी सोच में कुछ बदलाव अवश्य महसूस करेंगे।  
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

41 टिप्पणी

  1. बहुत बढ़िया विश्लेषण अच्छी जानकारियों के साथ। आपका शोध पूरा होता है बड़ी बात है। खूब शुभकामनाएं तेजेंद्र जी।

    • भारत में इस बात पर अवश्य शोध होना चाहिये कि हमारे नेता जब राजनीति में प्रवेश करते हैं, उनकी आर्थिक स्थिति उस समय क्या होती है और नेता बनने के चन्द वर्षों बाद क्या होती है। ..,? प्रश्न बहुत ही सार्थक है किंतु हमारी शिक्षा प्रणाली प्रश्न पूछना सिखाती ही नहीं, उत्तर रटना सिखाती है। अंको की अंधाधुंध दौड़ में, गेम में बच्चे जीवन के बाकी पक्षों को जानबूझकर इग्नोर करते चले जाते हैं। और वे राजनीतिक लाभों के चक्रव्यूह में फँसते चले जाते हैं ,राजनीति का हिस्सा बन राजनीति करने लग जाते हैं उन्हें भी मालूम नहीं पड़ता।

  2. अत्यंत सूक्ष्म व शानदार विश्लेषण, आपने बहुत ही सुंदर जानकारी प्रदान करी, सीबीआई में चयनित होने की प्रक्रिया की जिन्हें सामान्य जानकारी भी नहीं है वे भी उनपर कीचड़ उछालते हैं । महत्वपूर्ण शोधपरक आलेख सर..

  3. तेजेन्द्र जी
    नमस्कार
    आपके संपादकीय में हर बार कुछ नवीन जानकारी होती है। इसके लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं।
    लेकिन हर डिपार्टमेंट में कुछ ऐसे लोगों का प्रवेश हो ही जाता है कि भुक्तभोगी परेशानी महसूस करते हैं।अनुभव होने से कुछ बातों का खुलासा होता है किंतु पूरा ज्ञान न होने से किसी टिप्पणी का कोई अर्थ नहीं।
    वैसे राजनीति को तो दूर से प्रणाम है।
    धन्यवाद
    डॉ.प्रणव भारती

  4. तजेंद्र शर्मा जी नमस्कार

    बहुत सुंदर विश्लेषण। और आपने सही कहा कि जब राजनीति में आते हैं तो उनके पास कुछ नहीं होता जब भी राजनीति में आते हैं तो उनके पास अचानक इतना पैसा जमा हो जाता है। तजेंद्र जी आप लिखने से पहले बहुत शोध करते हैं और जिस भी विषय पर लिखते हैं उसको बड़ी बारीकी से अच्छे ढंग से पढ़ते हैं और विचार-विमर्श करते हैं। आपकी लेखनी को कोटि-कोटि नमन।
    इसी प्रकार हमेशा निर्भय होकर लिखते रहें।

  5. सम्पादकीय में भारत की उत्कृष्ट जाँच एजेंसी “सी बी आई “पर विचार देकर आपने उनका
    मान ,सम्मान और गौरव में श्री वृद्धि की है ।
    देश का जागरूक नागरिक ही उनकीं निष्पक्षता
    को समझ सकता है ।
    जय हिंद
    Dr Prabha mishra

    • प्रभा जी, जो उठता है सीबीआई का मज़ाक उड़ाने लगता है। पुरवाई ने महसूस किया कि उनका पक्ष भी रखा जाना चाहिए।

  6. पिंजरे में कैद तोता…आज का आपका संपादकीय वर्षो से सी. बी. आई. जैसे महत्वपूर्ण विभाग पर लग रहे लांछन पर विहंगम दृष्टि डालते हुए पुरवाई के पाठकों को सी. बी. आई. अधिकारियों तथा इंस्पेक्टरों की योग्यता, उनकी कर्मठता तथा दबाव में कार्य करने की क्षमता के बारे में अत्यंत स्पष्टता बता रहा है।

    किसी के बारे में अनर्गल आरोप लगाना उसकी कार्य क्षमता को प्रभावित करना है। ज़ब सामान्य लोग पकड़े जाते हैं तब कोई बात नहीं किन्तु ज़ब करोड़ों के घोटाले करते राजनीतिज्ञ पर आरोप लगते हैं तो संस्थाओं के साथ अधिकारियों की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े किये जाते हैं, ऐसा क्यों?

    आरोप लगने पर अगर जाँच हो रही है तो बजाय यह कहने के कि होने दो जाँच, दूध का दूध, पानी का पानी हो जायेगा, ऐसा दिखावा करने लगते हैं जैसे उन पर लगाए गये आरोप गलत हैं…और तो और इन्हें न्यायपालिका पर भी विश्वास नहीं है। ऐसा करके ये इन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर तो आघात कर ही रहे हैं, स्वयं की विश्वसनीयता को भी आमजनों की नजरों में गिरा रहे हैं।

    पर राजनीति जो न कराये…

    • सुधा जी इस सटीक और सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार। आपने संपादकीय के मर्म को पकड़ा है।

  7. यक़ीनन आप निष्पक्ष एवं बेबाक़ राय रखते हैं हमेशा अपनी सम्पादकीय में । बहुत बहुत बधाई आपको

  8. पिंजरे के तोते में सभी परी कथाओं के जादूगर या जादूगरनी (villain and vamp) के प्राण होते हैं। तो पिंजरे का तोता ख़ासा जाना-पहचाना चरित्र है। सम्भवतः इस पिंजरे के तोते में भी बहुतों की जान होती है।
    ऐसे लोगों के लिए ‘भुजवा तेली से राजा भोज’ हो जाना कोई बड़ी बात नहीं।
    योग्यता की जहां तक बात है, वह भारत की गला काट प्रतियोगिताओं को उत्तीर्ण करने वाले सभी प्रतियोगियों में होती है (मुलायम और अखिलेश का में एक जाति विशेष के कुछ प्रतियोगी अपवाद हैं)। लेकिन जो प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था(?) चली आ रही है, उसमें योग्यता से अधिक ‘adjustment’ की ज़रूरत होती है।
    आशा ही की जा सकती है कि जैसे बहुत कुछ सुधरा है वैसे यह भी सुधर जाये।
    नेता कोई भी हो विपक्ष या पक्ष का, जाँच होने पर 99.99% पर कई अपराध सिद्ध हो जायेंगे। वैसे राजपद तक पहुँचाने वाले रास्ते अपराध, अन्याय और अनैतिकता से भरपूर होते हैं। कौटिल्य से लेकर आधुनिक राजनीतिक विचारकों को पढ़ यही निष्कर्ष निकलता है। सिंघासन बत्तीसी के महाप्रतापी राजा विक्रमादित्य भी हत्या किये बिना सिंहासन नहीं पा सके थे। ऐसे में बहुत सी अपेक्षायें व्यर्थ हैं।
    आपके सुशोधित सम्पादकीय, विचारोत्तेजक होते हैं। आप के परिश्रम को प्रणाम।

  9. सर, राजस्थान की रा..नीति में सभी साऊकार साऊकार मौसेरे भाई है। ये बारी बारी में अपना जादू भी दिखाते है। इन ईमानदारों के सहायकों की दुकानें भी जमकर चलती है। देश की प्रतिष्ठित केंद्रीय सेवा upsc की तैयारी करवाने वाले गुरुजी ने राजस्थान की शिक्षक भर्ती परीक्षा को राष्ट्रीय शिक्षक भर्ती परीक्षा कहा है। किंतु इस बार राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली शिक्षक भर्ती परीक्षा भी खामियों से सुसज्जित हो गई।
    आपके लिखे लेख को पढ़कर अंतर्मन में गुदगुदी हो रही है। कम ही साऊकार है जो अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों के दर्शन करवाते है। भला, उन गुरुओं से उन्हें क्या लेना देना? मगर उनकी चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं तो जिनसे बहुत कुछ काम हो उनकी…!!!
    मैं तो जिस प्रकार से भगवान में विश्वास रखता हूं उसी प्रकार से शासन व्यवस्था में

    • महेश भाई आपकी टिप्पणी में भी शब्दों की जादूगरी महसूस की जा सकती है। आभार।

  10. आदरणीय संपादक महोदय
    नमस्कार
    आपके संपादकीय जो बहुत शोध और विचार के बाद लिखे जाते हैं हमें भी विवश करते हैं कि हम आत्मावलोकन करें। प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों और सीबीआई के अधिकारियों के प्रति मेरे मन में सदा से श्रद्धा रही है परंतु इन पदों पर कार्य करने वाले अधिकारी भी ‘मानव’ ही हैं ।अधिकारियों के आदेशों की अवहेलना कर, स्वतंत्र रूप से जांच कर पाना क्या इन लोगों के लिए संभव हो पाता होगा? असल बात तो शासन कर रहे दल का भी यह दायित्व बनता है कि इन अधिकारियों को स्वतंत्र रूप से जांच करने की स्वतंत्रता मिले, उनके द्वारा किए गए की गई जांच के आधार पर न्यायालय शीघ्रता से कार्यवाही करें, दोषियों को दंड मिले! इन सब से जनता का विश्वास इन संस्थाओं पर बढ़ेगा।, राजनीति ऐसा दलदल है कि इसमें प्रवेश करने पर कपड़े गंदे होना अवश्यंभावी है। यदि ईश्वर कृपा करें और कुछ प्रतिशत ही राजनेता ऐसे हो जो इस दलदल में उतरने पर कपड़ों पर केवल दाग के साथ परिश्रम कर जनता की सेवा करें तो स्थिति में सुधार हो सकता है। वरना तो इस दलदल में लथपथ होकर उलझ कर वहीं खड़े रह जाने वाले ही दिखाई देते हैं ‌।
    कुछ भी हो इस अत्यंत विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए आपको बधाइयां
    ईश्वर आपको शक्ति दे कि आप इसी तरह निर्भीक हो आगे भी हमें निष्पक्ष जानकारियां देते रहे।

    • सरोजिनी जी ऐसी टिप्पणी पढ़ने के बाद संपादकीय पर की गई मेहनत सफल हो गई। हार्दिक आभार।

  11. बहुत ही बारीकियों के साथ विश्लेषण किया गया आलेख है, जो निष्पक्ष के साथ साथ तथ्यपरक भी है। यही एक खाँटी सम्पादक के गुण है। साधुवाद

  12. Your Editorial of this time holds a brief for CBI and speaks of their selection having been based on success in their career preceded by having got through in a highly prestigious competitive exam.
    The terms of the service itself demands obedience to the ruling party and they are obliged to carry out its orders.
    However very sagaciously you also point out how every government uses this CBI to hunt the opposite party members which should not be so,ideally speaking.
    Congratulations n regards
    Deepak Sharma

  13. बहुत ही सटीक विश्लेषण के लिए हार्दिक बधाई . राजनीतिज्ञ चोर-चोर मौसेरे भाई हैं . आज करंट यहाँ लगा तो कल वहाँ पर होहल्ला हो जाता है . करंट से कोई जनहानि की संभावना के खतरे नहीं हैं इसलिए जब जिसको मौका मिलता है —- लगते हैं .
    सूरत बदलने के आसार भी नहीं हैं
    पर जनता और वोटर सोच ले तो
    जो आज हैं उनके कोई आसार नहीं हैं .
    समसामयिक विषय पर बैहतर लेखनी , साधुवाद

    • दीपक जी बहुत बहुत धन्यवाद। आपकी इस करंटमई टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  14. गलत को गलत और सही को सही कहने का मादा रखना ही होगा फिर चाहे आपको उसका खामियाजा ही क्यों ना भोगना पड़े। आदर्श लोकतंत्र के लिए यह करना जरूरी है।
    सीबीआई जिनके आगे घुटने टेकती हैं वे शिक्षा और अनुभव में उनसे कम होते हैं। इस बात को जनता को भी समझना होगा और व्यवस्था को भी।

  15. बहुत अच्छा विश्लेषण किया आपने। सही काम कर रहे अधिकारियों को आलोचना का शिकार बनाना राजनीति की आदत रही है पर अब यह शोर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। दूसरे की बदनामी अपनी नेक नामी नहीं कर सकती, इसको और सी बी आई अधिकारियों की योग्यता को आपने तथ्यात्मक तरीके से समझाया। एक और आवश्यक, स्ंतुलित और महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए बधाई।

  16. आपने सी.बी.आई. का स्पष्ट चित्र ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया है। आप जो भी विषय सम्पादकीय के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं, वह शोधपूर्ण और सभी आयामों को समेटता हुआ ही सदा होता है ; जिसे पढ़ कर पाठकों की दृष्टि को विस्तार मिलता है।
    हार्दिक साधुवाद स्वीकारें।

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