संपादकीय - कृषि कानून की वापसी और संसद 1
साभार : Sangbad Pratidin

सरकार को किसी प्रकार की ग़लतफ़हमी नहीं रहनी चाहिये। यदि सरकार सोचती है कि इस घोषणा के बाद किसान वापिस घरों को चले जाएंगे को तो यह केवल मुग़ालता ही कहा जा सकता है। सरकार के इस निर्णय से संसद की स्थिति कमज़ोर हुई है। अब किसान एम.एस.पी. पर अड़ जाएंगे और आंदोलन वापिस लेने की शर्त बना लेंगे। अन्य राजनीतिक दलों को भी पता चल गया है कि “झुकती है सरकार बस झुकाने वाला चाहिये।” किसान नेताओं ने साफ़-साफ़ कह दिया है कि आंदोलन तभी वापिस होगा जब एम.एस.पी. पर कानून बन जाएगा। अब हर नागरिक… हर संस्था यही समझेगी कि वर्तमान सरकार कमज़ोर है, उसे दबाया जाए तो यू-टर्न ले लेगी।

भारत के राष्ट्रपति ने जून 2020 में कृषि से जुड़े तीन अधिनियम जारी किये। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन 3 नए विवादित कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा, ‘साथियो, मैं देशवासियों से क्षमा मांगते हुए, सच्चे मन से और पवित्र हृदय से कहना चाहता हूं कि शायद हमारी तपस्या में ही कोई कमी रह गई होगी जिसके कारण दिए के प्रकाश जैसा सत्य, कुछ किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाए।’ पीएम ने आगे कहा कि चूंकि सरकार हर प्रयास के बावजूद किसानों को समझा नहीं पाई, इसलिए कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला लिया गया है… इसकी प्रक्रिया भी इसी संसद सत्र में पूरी कर दी जाएगी। मैं आज अपने सभी आंदोलन-रत किसान साथियों से आग्रह कर रहा हूं कि गुरु पर्व के पवित्र दिन आप अपने-अपने घर लौटें, अपने खेतों में लौटें, अपने परिवार के बीच लौटें। आइए, एक नई शुरुआत करते हैं। नए सिरे से आगे बढ़ते हैं।’
अधिकांश किसानों एवं पुरवाई पाठकों को इन तीन कानूनों के बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी। तो हमारा कर्तव्य बनता है कि इन तीनों कानूनों की जानकारी अपने पाठकों को दें – 
पहला कानून था- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम -2020’ (The Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation Act), दूसरा कानून था- कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020 (The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement of Price Assurance and Farm Services Act)’ और तीसरा कानून था- आवश्यक वस्तुएं संशोधन अधिनियम 2020 (The Essential Commodities (Amendment) Act)’
कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम – 2020
इस कानून के तहत देश के किसानों को उनकी उपज बेचने के लिए अधिक विकल्प मुहैया कराना मुख्य उद्देश्य था। ये कानून देश के किसानों को अच्छी कीमत पर अपनी फसल बेचने की स्वतंत्रता देता था। इसके अलावा यह, राज्य सरकारों को मंडी के बाहर होने वाली उपज की खरीद-फरोख्त पर टैक्स वसूलने से रोक लगाता था। इस कानून के तहत किसान अपनी फसलों को देश के किसी भी हिस्से में किसी भी व्यक्ति, दुकानदार, संस्था आदि को बेच सकते थे। इतना ही नहीं, किसान अपनी उपज की कीमत भी खुद तय कर सकते थे।
कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020
इस कानून के तहत देशभर के किसान बुआई से पहले ही तय मानकों और तय कीमत के हिसाब से अपनी फसल को बेच सकते थे। सीधे शब्दों में कहें तो यह कानून कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़ा है। इस कानून को लेकर सरकार का कहना था कि इसके जरिए किसानों को नुकसान का जोखिम कम रहेगा। इसके अलावा उन्हें फसल तैयार होने के बाद खरीदारों को जगह-जगह जाकर ढूंढने की भी जरूरत नहीं होगी। इतना ही नहीं, इसके जरिए देश का किसान समानता के आधार पर न सिर्फ खरीदार ढूंढ पाने में सक्षम होगा बल्कि उसकी पहुंच बड़े कारोबारियों और निर्यातकों तक बढ़ जाएगी।
आवश्यक वस्तुएं संशोधन अधिनियम 2020
फसलों के भंडारण और फिर उसकी काला बाजारी को रोकने के लिए सरकार ने पहले Essential Commodity Act 1955 बनाया था। इसके तहत व्यापारी एक सीमित मात्रा में ही किसी भी कृषि उपज का भंडारण कर सकते थे। वे तय सीमा से बढ़कर किसी भी फसल को स्टॉक में नहीं रख सकते थे। नए कृषि कानूनों में आवश्यक वस्तुएं संशोधन अधिनियम 2020 के तहत अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी कई फसलों को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया। सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय आपदा, अकाल या ऐसे ही किसी विपरीत हालात के दौरान इन वस्तुओं के भंडारण पर कोई सीमा नहीं लगेगी।
याद रहे कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इन अधिनियमों पर 18 महीने के लिये रोक लगा दी थी और ये अधिनियम लागू नहीं किये जा सके। 
किसानों के प्रतिनिधियों ने इन तीनों बिलों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठाया और सुप्रीम कोर्ट द्वारा नामित समिति से बात करने से मना कर दिया मगर सरकार एक महीने तक इस मामले में अड़ी रही।
इन बिलों पर किसानों की आपत्तियां ये रही हैं: इससे अनिश्चितता बनी रहेगी; वर्तमान में यह व्यापार मंडी से व्यवस्थित है और किसान इतना समय उपज बेचने में नहीं लगा सकता। भारतीय किसान परम्परागत खेती करता है। किसान को नई फ़सल उगाने में कठिनाई होगी दूसरे किसान की स्वतंत्रता खत्म हो जायेगी किसान बड़े कान्ट्रेक्टर का ग़ुलाम होकर रह जाएगा। निवेशक बर्फ खानों आदि में निवेश करेगा। इससे चीजों की कीमत बढ़ेगी। किसान भी प्रभावित होगा निवेशक अपने निवेश पर अधिकतम लाभ कमाना चाहेगा।
इस बीच दिल्ली से जुड़े बार्डरों पर लगभग पक्के आशियाने बना लिये गये। किसान आंदोलन के चेहरे के रूप में राकेश टिकैत उभर कर सामने आए… बहुत से विवाद उठे… लाल किले पर तिरंगे का अपमान हुआ… कई किसानों ने अपनी जान की कुरबानी दी… केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा पर केस चल रहा है कि उसने किसानों को अपनी कार के नीचे किसानों को रौंद डाला… अजय मिश्रा पर त्यागपत्र देने का दबाव बन रहा है… किसानों पर भी केस चल रहे हैं कि एक लड़की का रेप हो गया और बॉर्डर पर एक इन्सान को मार कर टाँग दिया और लखीमपुर खीरी में भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी।
भारत सरकार ने किसानों को आंदोलन-जीवी कहा और पूरे आंदोलन को आढ़तियों का आंदोलन बताया। पूरे मामले को बहुत नौसिखिया अंदाज़ में निपटाया गया। जो सरकार यह दावा करती हो कि उसके गृह-मंत्री की तुलना सरदार पटेल से की जा सकती है, उस सरकार ने स्थिति को समझने में बहुत अपरिपक्वता दिखाई।
जब सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों को 18 महीने के लिये मुलतवी कर दिया था, उस समय सरकार को नाक बचाने का एक मौक़ा मिला था कि चुपके से कानून वापिस ले ले। मगर सरकार ने यह मौक़ा गंवा दिया।
अब ज़ाहिर है कि सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों के डर से सरकार ने कृषि कानून वापिस लेने का निर्णय लिया है यदि ऐसा है तो क्या लोग ग़लत कह रहे हैं? कुछ लोगों का कहना है कि लखीमपुर खीरी के हादसे से डर कर सरकार पीछे हट रही है… इसमें भी कोई ग़लत सोच नहीं है। 
सरकार और विपक्ष की प्रतक्रियाएं में ख़ासी मज़ेदार हैं। जहां एक ओर कृषि मंत्री, गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी के निर्णय का स्वागत किया वहीं विपक्षी नेताओं ने सरकार को आडे हाथों लिया।  
प्रियंका गांधी ने कहा, “उनपर लाठियाँ बरसायीं, उन्हें गिरफ़्तार किया।अब चुनाव में हार दिखने लगी तो आपको अचानक इस देश की सच्चाई समझ में आने लगी।
अखिलेश यादव ने बहुत ड्रामाई अंदाज़ में ट्वीट किया, अमीरों की भाजपा ने भूमि अधिग्रहण व काले कानूनों से गरीबों-किसानों को ठगना चाहा. कील लगाई, बाल खींचते कार्टून बनाए, जीप चढ़ाई लेकिन सपा की पूर्वांचल की विजय यात्रा के जन समर्थन से डरकर काले-कानून वापस ले ही लिए।
मायावती ने टिप्पणी की, “फैसला लेने में देरी कर दी. यह फैसला बहुत पहले ले लेना चाहिए था. साथ ही एमएसपी को लेकर भी सरकार फैसला करे।
अशोक गहलोत का कहना है, “तीनों काले कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा लोकतंत्र की जीत एवं मोदी सरकार के अहंकार की हार है।
केजरीवाल भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने भी ट्वीट किया, “आज जनतंत्र की जीत हुई है। किसानों ने सभी सरकारों को बता दिया – जनतंत्र में सिर्फ और सिर्फ जनता की मर्ज़ी चलेगी, अहंकार नहीं चलेगा।
सरकार को किसी प्रकार की ग़लतफ़हमी नहीं रहनी चाहिये। यदि सरकार सोचती है कि इस घोषणा के बाद किसान वापिस घरों को चले जाएंगे को तो यह केवल मुग़ालता ही कहा जा सकता है। सरकार के इस निर्णय से संसद की स्थिति कमज़ोर हुई है। अब किसान एम.एस.पी. पर अड़ जाएंगे और आंदोलन वापिस लेने की शर्त बना लेंगे। अन्य राजनीतिक दलों को भी पता चल गया है कि “झुकती है सरकार बस झुकाने वाला चाहिये।” किसान नेताओं ने साफ़-साफ़ कह दिया है कि आंदोलन तभी वापिस होगा जब एम.एस.पी. पर कानून बन जाएगा। अब हर नागरिक… हर संस्था यही समझेगी कि वर्तमान सरकार कमज़ोर है, उसे दबाया जाए तो यू-टर्न ले लेगी। हमेशा कहा गया है… निर्णय लेने से पहले सोचो… ताकि बाद में यू-टर्न लेने से बचा जा सके… वरना नरेन्द्र मोदी और इमरान ख़ान में फ़र्क क्या बचेगा !
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

22 टिप्पणी

  1. अति सरहनोय कृषि कानून की विस्तृत परिचय और वर्तमान स्थिति का विवरण । परन्तु इस पूरे घटनाक्रम में विश्व गुरु ने किसानों को न समझा पाने को तपस्या में कमी बताते हुए पीछे मुड़ कर कपड़े झटकार लिए ! ये तो चिराग़ तले अँधेरा वाली कहावत साबित हुई । जो अपने देश मे ही लोगो को न समझा पाए वो कितना खोखला विश्व गुरु का दावा है। पिछले सात वर्ष में जितने वादे किए किसी एक को भी नही निभाया जैसे महँगाई कम करना, पेट्रोल के भाव आधे करना, दो करोड़ लोगों को रोज़गार के बजाय नोकरी चले जाने आदि। अब किसान कैसे विस्वास करे । प्रजातन्त्र और संवैधानिक प्रक्रियाओं का मखोल बनाना। कृषि कानून संसद में पास कर राष्ट्रपति ने अध्यादेश जारी किया, लेकिंन रद्द करने के लिए सड़क पर खड़े होकर बिना किसान प्रतिनिधियों को विस्वास में लिए, बिना बातचीत किये, बिना किसानों की समस्याओं को संज्ञान में लिए, आनन फानन में रद्द करने का निर्णय की बात की ! जिसका संवैधानिक प्रक्रिया में कोई मूल व औचित्य नहीं ! क्या अब देश मे कपि संविधान, कोई संसद, कोई न्यायालय आदि नही रहे जो देश के प्रशसन को मार्गदर्शन दे और देश के प्रत्येक नागरिक विशेष रूप से उपरोक्त सन्दर्भ में किसी किसान को असुविधा न हो !
    नए कृषि कानून को लागू करने का श्रेय भी सरकार का, रद्द करने का श्रेय भी सरकार का !!!
    चित भी मेरी, पट भी मेरी और अंटा मेरे बाप का !!!
    किसानों बजाओ ताली औऱ थाली !!

  2. तात्कालिक मुद्दे पर बहुत ही सटीक और विस्तृत संपादकीय। किसानी मुद्दे पर विस्तार से उनकी समस्या पर बात और इनसे जुड़े सभी मुख्य राजनेताओं की इस फ़ैसले पर सामने आ रही गतिविधियों का अच्छा विश्लेषण किया आपने।
    सुंदर संपादकीय के लिए साधुवाद आदरणीय।
    यह सच है यदि वर्तमान सरकार या मोदी जी यह सोचते हैं कि किसानी मुद्दा खत्म हो गया है तो यह एक ग़लतफ़हमी ही है। इस निर्णय से उठने जा रही समस्याओं के लिए सरकार जितनी जल्दी एक्शन ले ले, भारतीय राजनीति के लिए उतना बेहतर होगा।
    सादर।

  3. विस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद , मेरी समझ से यह पूरा आंदोलन निहित राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित रहा। जिसे किसान या विपक्ष अपनी जीत समझ रहा है, वो मूर्खता है, एक अच्छी बात को नकार कर ख़ुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारी है। मुझे तो यही लगता है कि – “कुछ बड़ा होने को है……. शेर दो कदम पीछे हटा है.”

  4. ऐसा मंज़र और हालात है कि कहीं कुछ समझ ही नहीं आता कि क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है!

  5. दुखद स्थिति है इस देश की जहाँ लेखकों का एक बड़ा वर्ग भी सरकार की विचारधारा के विरोध में इन कानूनों को लेकर लगातार झूठ फैलाता रहा है आखिरकार उसकी मंशा पूरी हो गई।
    विस्तृत जानकारी दी आपने लेकिन इस जानकारी को भी यह वर्ग नजरअंदाज कर देगा।

  6. यह मोदी सरकार का बेहद गलत फैसला है उसने अपनी ही अडिग छवि पर लोगो को हंसने का मौका दिया, यह मोदी सरकार ने सत्ता की ललक में खुद के ताबूत पर कील ठोकना है क्योंकि इस कदम से मोदी समर्थको को बेहद निराश किया है जो उन्हे मोदी से दूर ही करेगी

  7. Congratulations Tejendra ji for presenting the Farmers ‘ issue in the context of the Indian Prime Minister’s withdrawal of the CONTROVERSIAL FARM BILLS so objectively.
    This matter of great importance and its repercussions has been dealt by you in details and from various angles most dispassionately.
    Please accept my warm regards and best wishes
    Deepak Sharma

  8. सम्पादकीय आर्थिक विकास के एक संवेदनशील मुद्दे पर है ।
    सिक्के के दोनों पहलुओं पर विचार किया जाए तो यह कह सकती हूँ कि एक विशाल लोकतंत्र वाले राष्ट्र में जन भावनाओं का सम्मान करते हुए कृषि बिल वापस लिया जाना प्रधानमंत्री के उच्च आदर्शों की सोच है ,सम्मान योग्य है यह ।पूर्व के शासन ने कृषकों पर सहकारिता आंदोलन थोपा था जो कृषकों को कभी समझ नहीं आया और वह सरकारी आंदोलन बनकर रह गया।
    विकसित देश के विकास मॉडल पर काम करना हिम्मत और पूरे राष्ट्र की राजनीतिक दलों के सहयोग से संभव हो सकता है ,पर भारत में भ्रम की स्थिति निर्मित की गई क्योंकि विकास नहीं वोट की राजनीति चाहते हैं सभी ,तभी तो आजादी का अमृत महोत्सव का समय है और अर्थ शास्त्र में मार्शल और राबर्टसन पढ़ाया जा रहा है।मोदी चाहते हैं महात्मा गांधी को पढ़ाया जाए ।
    बेहतरीन संपादकी हेतु साधुवाद
    Dr prabha mishra

  9. सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, निहित स्वार्थ पहले हैं जनता का भला बाद में। मोदी सरकार यदि यही फ़ैसला पहले ले लेती, तो इस समय आलोचना का पात्र न बनना पड़ता। चुनाव सर पर हैं, इसलिए ये विवादित क़ानून वापस लेने पर भी साधुवाद नहीं मिल रहा है। अन्यथा यह कृषि बिल वापस लेने पर सम्मान मिलता।
    अस्तु । आपके सम्पादकीय ने स्थिति का विश्लेषण करके दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है।

  10. बहुत बढ़िया और विस्तृत जानकारी आदरणीय।

    यही कार्य पहले कर दिया होता बहुत उम्दा होता।
    देर ही सही फैसला ले लिया बधाई।

  11. कृषि कानून के ज्वलंत मुद्दे पर तथ्यपरक विस्तृत जानकारी। हार्दिक धन्यवाद आपका

  12. बहुत सामयिक विषय ।
    सच बात तो यह कि ये किसान है ही नहीं । ये सत्ता के खिलाफ राजनीतिक हथियार है , जो सोची समझी चाल के साथ चलाये जारहे हैं। वास्तविक किसान तो अपनी किस्मत के भरोसे खेत में खड़ा है ।

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