Saturday, May 18, 2024
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संपादकीय – एक नये समाज का निर्माण

पिता प्रेम गुप्ता और पुत्री साक्षी गुप्ता

एक पिता ने अपनी बेटी पर ससुराल वालों द्वारा ढाये जा रहे ज़ुल्मो सितम के जवाब में अपनी बेटी को न केवल अपने घर वापिस बुला लिया बल्कि यह काम पूरी तरह से बैण्ड बाजे के साथ किया। ज़ाहिर है कि पिता का उद्देश्य बेटी के ससुराल वालों की बैण्ड बजा देने का ही रहा होगा। पूरे मुहल्ले में ससुराल वालों का मज़ाक उड़ रहा था और पीड़िता के पिता डंके की चोट पर अपनी बेटी को कुछ इस तरीके से अपने घर वापिस ले गये जैसे कोई बारात जा रही हो।

अब तक हम फ़िल्मों में भी देखते आए हैं और समाज में भी कि माँ-बाप अपनी बेटी को यही शिक्षा देते हैं कि यदि ससुराल में उसे प्रताड़ना भी मिल रही है तो बेटी किसी भी तरह रिश्ते को निभाए जाए। ख़ास तौर पर मध्यम वर्ग या फिर निम्न मध्यम वर्ग वाले माता-पिता बहुत मुश्किलों से लोन उठाकर बेटी का विवाह करते हैं, शायद इसीलिए इस बात की कल्पना भी नहीं कर पाते कि बेटी ससुराल से उठकर वापिस मायके आ जाए।
ऐसे माँ-बाप शायद समाज के तानों से भी डरते होंगे कि ‘लोग क्या कहेंगे!’ फिर घर में यदि कुंवारी छोटी बेटी बैठी हो तो और भी डर कि उसकी शादी कैसे होगी। यदि लड़की का भाई भी है तो सोच सकता है कि बहन का बोझ अब उसके कन्धों पर पड़ने वाला है।
वहीं कुछ ऐसे माता-पिता भी होते हैं जो अपनी बेटी के विवाहित जीवन में इतना अधिक दख़ल देते हैं कि वह बेचारी ससुराल में सैटल ही नहीं हो पाती। ऐसे माँ-बाप ख़ुद अपने हाथों से बेटी के संसार में कांटे बो देते हैं जो उन्हीं की बेटी को जीवन भर काटते हैं।
चाहे ससुराल वाले अपनी बहू पर अत्याचार करें या फिर अपने माता-पिता उसके जीवन में दख़लअंदाज़ी करें, पिसती तो लड़की ही है। दोनों ही मामलों में वो अपने पति और सास-ससुर से सामान्य रिश्ता नहीं बना पाती है।
बेटी का ससुराल की प्रताड़ना के कारण घर छोड़ना हमेशा एक दुःख का कारण ही बनता है। कोई भी माँ-बाप ऐसा नहीं सोच पाते कि चलो अच्छा हुआ बेटी ससुराल में नहीं बस सकी और वापिस अपने मायके में  आ गई है। विवाह नाम की संस्था बनी ही इस सोच पर थी कि कन्या एक परिवार में जन्म लेगी, दूसरे में विवाह होगा और परिवार का वंश आगे बढ़ता रहेगा।
भारत में तो विवाह भी जन्मपत्री मिला कर होते हैं। फिर भला ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न होती है कि किसी कन्या पर उसके ससुराल में ज़ुल्म किये जाएं। यहां तो मांगलिक होना भी एक समस्या है। लड़की मांगलिक हो तो दुल्हा नहीं मिलता और लड़का मांगलिक हो तो चाहे उसका सैलेरी पैकेज कुछ भी हो, उसे पत्नी आसानी से नहीं मिलती।
मगर कुछ ही दिन पहले झारखण्ड की राजधानी रांची से एक ऐसा समाचार सामने आया जिसने विवाह और परिवार नाम की संस्था की चूलें हिला कर रख दीं। हैरान करने वाली बात यह भी थी कि ऐसा समाचार मुंबई, दिल्ली, बंगलुरू, कलकत्ता जैसे महानगरों से नहीं आया। यह घटना घटित हुई रांची में जहां मध्यवर्गीय सोच के लोगों का बाहुल्य समझा जाता है।
समाचार यह आया कि एक पिता ने अपनी बेटी पर ससुराल वालों द्वारा ढाये जा रहे ज़ुल्मो सितम के जवाब में अपनी बेटी को न केवल अपने घर वापिस बुला लिया बल्कि यह काम पूरी तरह से बैण्ड बाजे के साथ किया। ज़ाहिर है कि पिता का उद्देश्य बेटी के ससुराल वालों की बैण्ड बजा देने का ही रहा होगा। पूरे मुहल्ले में ससुराल वालों का मज़ाक उड़ रहा था और पीड़िता के पिता डंके की चोट पर अपनी बेटी को कुछ इस तरीके से अपने घर वापिस ले गये जैसे कोई बारात जा रही हो।
आज ज़माना सोशल मीडिया का है। लड़की के पिता ने इस घटना का वीडियो बना कर फ़ेसबुक पर साझा किया और पूरी दुनिया को दिखा दिया कि उसकी सोच कितनी आधुनिक है। वह दकियानूसी विचारों के कारण अपनी बेटी का जीवन नर्क नहीं बनने देगा। आज बहुत से पिता यह सोच रहे होंगे कि उन्होंने यह साहस क्यों नहीं दिखाया। हम हर दूसरे दिन अखबारों में पढ़ते हैं कि किसी बहू ने ससुराल की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली। यदि उनके पिता ने भी साहस दिखाया होता तो शायद उनकी बेटियां आज ज़िन्दा होतीं।
हुआ कुछ यूं कि 28 अप्रैल 2022 को साक्षी गुप्ता नाम की लड़की का विवाह सचिन कुमार से हुआ था जो कि झारखण्ड के बिजली विभाग में काम करता है। पिता प्रेम गुप्ता ने शादी में लाखों रुपये ख़र्च भी किये… यानी कि शादी धूमधाम से की गई। मगर शादी के कुछ ही दिनों बाद पता चला कि सचिन कुमार पहले से ही शादी-शुदा था।
यही नहीं उसने एक नहीं दो-दो शादियां कर रखी थीं और साक्षी उसकी तीसरी पत्नी थी। ज़ाहिर है कि साक्षी को तो ज़बरदस्त शॉक लगा होगा जब उसे इस बात की जानकारी मिली होगी। समस्या यहीं तक सीमित नहीं थी। सचिन तीसरी शादी के बाद भी साक्षी के साथ नहीं रहता था। वह बजरा इलाक़े में अपने माँ-बाप से अलग एक किराए के मकान में रहता था। ऐसे में साक्षी को वापस अपने मायके जाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प बचा ही नहीं था।
साक्षी पर दबाव बनाया गया कि घर की बात को घर पर ही रहने दिया जाए। मगर साक्षी भला इस स्थिति से कैसे समझौता कर लेती। बात बिगड़ती गई और एक दिन विवाह की कच्ची डोर टूट गई। साक्षी के पिता प्रेम गुप्ता ने अपने दामाद की हरकतो को चुप रह कर सहने से इन्कार कर दिया और उन्हें सबक सिखाने का निर्णय लिया। उसने तय कर लिया कि वह साक्षी को अपने घर वापिस ले जाएगा। मगर वह यह काम चुपचाप नहीं करना चाहता था। साक्षी के ससुराल वालों को उनकी धोखाधड़ी के लिये समाज में उनकी करतूत का पर्दाफ़ाश करना तय कर लिया।
प्रेम गुप्ता ने ठीक वैसे ही बैण्ड बाजे का इंतज़ाम किया जैसे कि बारात के लिये किया जाता है। साक्षी के ससुराल के बाहर बैण्ड वैसे ही धुनें बजा रहे थे जैसे दुल्हा घोड़ी पर बैठा हो। साक्षी अपने दो कैरी-ऑन पहिये वाले सूटकेस लेकर ससुराल से बाहर आ गई।
प्रेम गुप्ता ने इस घटना का वीडियो बनाया और फ़ेसबुक पर पोस्ट करते हुए लिखा, “बड़े अरमानों के साथ लोग अपनी बेटियों की शादी धूमधाम से करते हैं। लेकिन कई बेटियों के जीवनसाथी और परिवार ग़लत निकल आते हैं। ऐसी बेटियों को ससुराल में प्रताड़ित और शोषित होने के लिए यूं ही न छोड़ दें। बल्कि जिस आदर और सम्मान से आपने बेटी को विदा किया था, उसी आदर और सम्मान के साथ उसे वापिस ले आएं, क्योंकि बेटियां बहुत अनमोल होती हैं।”
ससुराल से विदा हुई साक्षी गुप्ता ने बताया कि मैंने धूमधाम से शादी की थी, लेकिन ससुराल में खुश नहीं थी। बाद में पता चला कि पति पहले से ही दो शादी कर चुका है और उम्र में भी बड़ा है। बिजली विभाग में कार्यरत है… इसलिए अपने करतूतों को मैनेज करने की कोशिश करता रहा। वहाँ मैं घुट-घुट कर जीने को मजबूर थी। मैं तमाम माता-पिता से अनुरोध करती हूं कि अपनी बेटी को बोझ ना समझें और अगर आपकी बेटी कहीं मुसीबत में है तो उसकी मदद करें। सामाजिक कुरीतियों को दूर करने की कोशिश करें। साक्षी फिलहाल जयपुर में है।
वो लोग विलक्षण होते हैं जो समाज के बने-बनाए ढर्रे से अलग कुछ नया करने की हिम्मत रखते हैं। समाज के दकियानूसी नियमों के विरुद्ध आवाज़ उठाना आम आदमी के बस की बात नहीं होती। प्रेम गुप्ता ने एक नया कदम उठाया है और समाज को दिखाया है कि ज़माना नई करवट बदल रहा है। हम सब को बेटियों को बोझ समझना बंद करना होगा। बेटी की शादी करना उसे कुएं में फेंकना नहीं है। हमें पूरा विश्वास है कि पुरवाई के पाठकों का हार्दिक समर्थन साक्षी और प्रेम गुप्ता के साथ होगा।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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51 टिप्पणी

  1. हार्दिक साधुवाद सम्भवतः विश्व भर की स्त्रियों से जुड़े मुद्दे को सम्पादकीय में उठाने के लिए। साक्षी के पिता की हिम्मत की दाद देनी होगी, जिसने सुसराल वालों की ज़्यादती और बेईमानी को इस तरह समाज के सामने प्रस्तुत किया।
    पिछले सप्ताह पुरवाई की कुछ महिला सदस्यों ने हैरानी जताई थी कि स्त्रियां सुसराल और बच्चों की ज़्यादती क्यों सहती हैं? मुझे आश्चर्य हुआ था कि यह विषय स्वयं महिलाओं के लिए अबूझ क्यों? यदि लड़की को ससुराल भेज कर माँ-बाप उसके वापस आने के रास्ते बन्द कर देते हैं। सुसराल वाले लड़की पर अत्याचार करते हैं, तो लड़की क्या करे? अगर घर छोड़े तो क्या सड़क पर, इस निर्भया कांड करने वाली दुनिया में वह सुरक्षित रह सकती है? यदि वह इतनी आत्मनिर्भर नहीं कि घर से निकलने के बाद वह अपने लिये घर और आजीविका का इंतज़ाम कर सके तो, मायका सुसराल छोड़ कर वह कहां जाये? ऐसे में जो कुछ भी बीतता है सुसराल में वह सहती है। सहना मजबूरी होती है। आज के ज़माने में तो स्थिति तब भी बेहतर है। पिछली पीढ़ी तक स्थिति और बुरी थी। ऐसे में, अबला जीवन हाय… ही था।
    आशा है कि साक्षी के पिता से लोग शिक्षा लेंगे और बेटी का सीता- विवाह करके, उसका ‘दान’ करके उसे सुसराल वालों के रहमोंकरम पर नहीं छोड़ेंगे। धन्यवाद

  2. साक्षी के पिता ने सही किया। उस व्यक्ति को जेल भी भेजा जाना चाहिए। मैं हाल में साहारा में छपे कमलेश जैन का आलेख भेजता हूं,जिसमें आपकी पहली कही बात पर लिखा गया है कि आज मां-बाप की दखलंदाज़ी से भी लड़कियों का जीवन खराब है रहा है। लालची मां बाप लड़की की एक नहीं तीन तीन शादियां कर रहे और तलाक दिलाकर alimony में लाखों लेकर ऐश कर रहे।

  3. अनुकरणीय कार्य किया, पिता को साधुवाद और ऐसे समाजिक विषय पर लिखने के लिए आपको भी साधुवाद

  4. साक्षी गुप्ता के पिता के द्वारा बेटी का उसके ससुराल से ऐसा धूमधाम पूर्ण रेस्क्यू टाइप विदाई करा लेना बहुत नया है और सोशल मीडिया के जरिए सबको पता चली इस बात ने बेटियों के पक्ष में बात बनाई होगी,ऐसा माना जा सकता है मगर जीवन इवेंट नहीं होता। अत्यधिक दान दहेज के दिखावे सहित किए गए इस विवाह के उल्लेख से भी समाज में अच्छा संदेश नहीं जा रहा है। बेटियों को शिक्षा, आर्थिक मजबूती देकर स्वाधीन शख्सियत बनाना कि वे इस दुनिया को लोकतांत्रिक और समर्थ बनाए। कमज़ोरी का महिमा मंडन न हो।वे मनुष्य होने के अपने हक का हमेशा दावा करें, हमें यह करना है और सोचना है।
    उम्मीद करनी चाहिए कि साक्षी के पिता उसकी दूसरी शादी भी दान-दहेज के दिखावे के साथ करने के बारे में न सोच रहे हों।

    • चंद्रकला जी आपकी अनुभवी टिप्पणी विषय को नया दृष्टिकोण प्रदान करती है। हार्दिक आभार।

  5. तत्परिवर्तनं भव । बदलाव होने चाहिए। यह हमारे शास्त्रों में वर्णित है। कोई भी अच्छे कार्य के लिए या अच्छी बात होने के लिए बदलाव स्वीकार्य है , हमारा धर्म रूढ़िवाद कभी नही रहा। समय समय पर हमने सैकड़ों प्रयोग भी किये हैं और लड़कियां अन्य समाज की तरह भोग्या कभी नहीं मानी गयी।
    उपरोक्त घटना भी द्योतक है समाज मे होते शुभ परिवर्तन की। प्रेम गुप्ता ने साहस का कार्य किया साक्षी का निर्णय की नारी को कभी दबने वाली न समझो।

    • सुरेश भाई आप हमारे संपादकीय पर हमेशा सकारात्मक टिप्पणी भेजते हैं। हार्दिक आभार।

  6. अपनी पुत्री साक्षी के लिए उठाया गया श्री प्रेम गुप्ता का साहसी कदम उनके नाम की सार्थकता सिद्ध करता है।सचमुच पुत्री के प्रति उनका ‘प्रेम’ अनुकरणीय है इस बात की ‘साक्षी’ उनकी पुत्री है!
    ऐसे अकेले चने ही भाड़ फोड़ने की शक्ति रखते हैं।
    समाज के हर कोने पर अपनी पैनी नज़र रखने वाले संपादक जी की लेखनी को नमन!

    • प्रथमतः सुश्री साक्षी गुप्ता जी को साधुवाद! उनके पिता श्री प्रेम गुप्ता जी ने जो कदम उठाया, उससे समाज को अनेक संदेश ग्रहण करने चाहिए। सबसे पहली कठिनाई यह होती है कि पुरुष तो कई विवाह कर भी ‘शीलपूर्ण’ रहता है और स्त्रियों का जरा भी किसी पुरुष से संबंध बना नहीं कि ‘शीलभंग’ कर दिया जाता है। दुःखद तो यह कि पढ़े-लिखे और दुनियादारी को समझने का दावा करनेवाले, ‘आधुनिक विचारों का पोषक’ घोषित करनेवाले लोगों के बीच भी ऐसी दकियानुसी देखी जाती है। ‘आचरण की शुद्धता’ के इतने पैमाने तय कर दिए जाते हैं कि स्त्रियाँ हर स्थिति में घुट-घुट कर जीने के लिए विवश कर दी जाती हैं। साक्षी ने आरोपित ‘घुटन’ से स्वयं को इससे निकाला है तो परिवार और समाज को उसका पूरा साथ देना चाहिए। उसका पुनर्विवाह, यदि वह करना चाहे तो, भी उसी धूमधाम से होना चाहिए। श्री प्रेम गुप्ता के इस पहल को नमन है। निश्चय ही, पिता के इस साथ के बिना पुत्री का इस तरह मायके लौटना संभव नहीं होता। उसका पुनर्विवाह हो तो उसमें सम्मिलित होने की भी मेरी इच्छा है।

      मुझे ध्यान है, बिहार सरकार में एक कर्मचारी के रूप में कार्यरत मेरे पिता जी श्री सुरेंद्र प्रसाद जी (अब दिवंगत), जो जीवन-भर अपने गाँव के विकास के लिए समर्पित रहे, ने जब वर्ष 1990 में मेरे बड़े भाई साहब का विवाह हुआ तो उन्होंने भाभी जी यानी अपनी पुत्रवधू को ‘नीरो बेटी’ (उनका नाम श्रीमती निर्मला है) कहकर बुलाना शुरू किया था तो घर-बाहर सभी जगह उनका विरोध हुआ था, किंतु वे आजीवन उन्हें उनके नाम से ही पुकारते रहे।

      मैंने दिल्ली में अपने बड़े भाई साहब की उपस्थिति में अंतरजातीय प्रेम-विवाह कर लिया था। विवाह के कुछ महीनों बाद जब पहली बार अपनी पत्नी को लेकर गाँव गया तो तीन किलोमीटर पूर्व स्थित नदी के तट पर बैंड-बाजे और सैकड़ों ग्रामीणों को भेजकर उन्होंने हमारा स्वागतपूर्ण प्रवेश कराया था। पूरे गाँव में महिलाएँ, बच्चे, पुरुष हमारे स्वागत के लिए कतारबद्ध खड़े थे, वे खुली जीप को रोक-रोक कर हम जोड़ी को उत्सुकतापूर्वक देख रहे थे और अपना आशीष दे रहे थे। हमारे लिए वह सब अप्रत्याशित और रोमांच से भरा था। मेरे जीजा जी ‘सहबाला’ की भूमिका में हमारे साथ जीप में बैठ गए थे। मेरे सिर पर दूल्हे का सेहरा डाला गया था। हमारे दरवाजे पर सैकड़ों बड़े-बुजुर्ग हमारे स्वागत के लिए एकत्र थे। पता चला, यह सब पिता जी के परामर्श पर हुआ। ग्रामीणों ने उनकी इच्छा का आदर किया।

      मेरी माँ और महिलाओं ने मिथिला की पारंपरिक संस्कृति के अनुसार प्रत्येक विधि-विधान का पालन कर, अपना दुलार देकर हमारा गृह-प्रवेश कराया था। बहनों ने नेग लिया। कैसी मधुर स्मृतियाँ हैं!!!

      आज आपके संपादकीय ने 22 वर्ष पूर्व की यात्रा करा दी। पर कठिनाइयाँ भी कम नहीं हैं। समाज को अभी अनेक परिवर्तनों से गुजरना है। मनुष्य अनेक स्तरों पर जकड़ा है, जकड़ दिया जाता है, जकड़ने के लिए विवश किया जाता है। सावधान और सतर्क रहने की आवश्यकता है। ऐसे अमानवीय कृत्य होने से पूर्व बचाव आवश्यक है।

      • अशोक भाई आपने अपनी टिप्पणी में अपने जीवन के भीतर झांकने का मौका दिया। पुरवाई के पाठक इसे पढ़ कर पुरवाई के पाठकों को भी आपको जानने का मौका मिला। इस आत्मीय टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  7. बेटियों को उनकी परेशानी में सहारा देने का जज़्बा अनुकरणीय है।
    जहाँ डोली गई वहीं से अर्थी उठे जैसी क्रूर सीख देने वाला मायका अब बदल रहा है…परिवर्तन प्रशंसा योग्य है।

  8. बहुत बहुत बधाई व अभिनंदन आपको इस विषय को खुलकर सामने लाने के लिए। हद होती है जब माँएं स्वयं बेटी को चुप रहने की शिक्षा देती हैं। यानी ताउम्र बेटी दूसरों के सामने गिड़गिड़ाते हुए जीवन गुज़ार दे? क्यों भई, वह इंसान नहीं है?
    हाँ, आजकल उल्टे केसेज़ भी बहुत हो रहे हैं जहाँ लड़की ससुराल जाकर बैंड बजा रही हैं, इस विषय से कुछ हटकर हो सकती है मेरी बात लेकिन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ही बातें ग़लत हैं। विवाह जीवन को दुखी बनाने के लिए तो किया नहीं जाता है।
    यदि लड़की कम पढ़ी-लिखी है तब भी उसे ऐसे घर में तो रहना ही नहीं चाहिए जहाँ ऐसी स्थिति हो। अरे! कुछ भी सीख सकती है लड़की और अपने पैरों पर खड़ी रह सकती है।
    मुझे तो गुप्ता जी को मन से शाबासी व धन्यवाद देने का मन हो रहा है। आपके माध्यम से पहुंचे। बैंड-बाजे के साथ वापसी हुई यह जानकर तो आँखों के सामने दृश्य बन गया और आनंद आ गया । जब तक गुप्ता जी जैसी मानसिकता नहीं बनेगी, बेचारगी में ही फंसी रहेंगी लड़कियाँ और उनके माता पिता व परिवार भी।
    बहुत बहुत साधुवाद आपको तेजेन्द्र जी ।

    • प्रणव जी आपकी टिप्पणी पुरवाई के पाठकों के लिये महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।

  9. इस कार्य को अपने लेख के माध्यम से महत्व देने के लिए बधाई।
    लेख बहुत संतुलित है…अक्सर एक पक्षीय हो जाते हैं…यही सोच समाज में आनी जरुरी है। नये परिवार के साथ सामंजस्य बिठाने में धैर्य और समझदारी की एक तरफ दरकार है दूसरी ओर अन्याय के खिलाफ विरोध भी। माता-पिता के लिए उनकी बेटी,बहन के हक और अहमियत हमेशा बरकरार हैं,यह भरोसा बेटी ,बहन के मन में होना जरूरी है।
    अनुकरणीय उदाहरण। साधुवाद

    • सुनीता जी पूरा प्रयास रहता है कि किसी भी मुद्दे के सभी पहलुओं पर विमर्श किया जा सके। हार्दिक आभार इस सार्थक टिप्पणी के लिये.

  10. तेजेंद्र शर्मा सर बहुत बढ़िया लिखा है।
    पहले मां-बाप बेटियों को यह शिक्षा देते थे तेरी डोली यहां से निकली है अर्थी वहां से उठानी चाहिए।
    परंतु समय के साथ-साथ धारणाएं बदल गई हैं।
    हमारा समाज गलत दिशा की ओर जा रहा है।
    बेटियों को हर चुनौती का सामना डटकर करना होगा।
    अगर इसी तरह ससुराल का घर छोड़कर पिता के घर रहने के लिए आ गई तो आने वाले समय में बहुत सी मुसीबतें उत्पन्न हो सकती हैं।

    • प्रणाम सर
      बहुत ही बढ़िया लेख,आपका यह लेख पढ़कर ऋतुराज की वह पंक्तियां याद आ गई – मां ने कहा पानी में झांक कर,अपने चेहरे पर मत रीझना, आग रोटियां सेंकने के लिए हैं, जलने के लिए नहीं,वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह बन्धन है स्त्री के जीवन, मां ने कहा लड़की होना ,पर लड़की जैसी दिखाई मत देना। पिता बेटी की इस जज्बे को सलाम है फिर भी कर एक बात बहुत सोचने वाली है कि आज भी हम अपनी बेटियों की शादी में इतनी जल्दबाजी क्यों करते हैं क्यों पहले से सब अच्छे से इंक्वारी नहीं करते ।तीन-तीन शादी होने के बावजूद भी इतना अनजान रहकर अपनी बेटी की शादी कर देना। आज समय बदल रहा है मुझे लगता है हमें बच्चों को शादी से पहले एक दूसरे का जानने का मौका जरूर देना चाहिए जहां आज अंतर जाति विवाह की संख्या तेजी से बढ़ रही है मात्र एक प्रतिशत अरेंज मैरिज देखने को मिल रही है और उस एक प्रतिशत के साथ ऐसा धोखा यह बहुत दुख का विषय है।

      • अंजु जी आपने ऋतुराज के बेहतरीन पंक्तियां उद्धृत की हैं। इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  11. वाह्ह… यह एक नई दिशा है… परंतु सामाजिक स्थिति का परिवर्तन होना अत्यंत आवश्यक है। कईबार मिथ्यारोप भी लगाकर उसका लाभ उठाया जा सकता है…। यह उपक्रम सकारात्मक हो तो सब सही है। धन्यवाद सर

  12. जितनी भी प्रशंसा की जाए सो कम है।यह संपादकीय सही अर्थों में पत्रकारिता को परिभाषित करता है।यह संपादकीय पुरवाई की सोच को रेखांकित करता है कि जन हित के मुद्दों का स्वतः संज्ञान लेकर न्यायलाय की मानिंद कैसे नज़ीर स्थापित की जाती हैं। साथ ही साथ ,लीक से हटकर समाज के हित में कार्य करने वालों की सोच को कैसे प्रशंसित कर अनुकरणीयता को कैसे कलात्मक रूप से उजागर किया जाता है।
    पुनः संपादक महोदय को हृदय से बधाई।

    • आपकी टिप्पणी संपादक के लिये बहुत महत्वपूर्ण है भाई सूर्यकांत जी। हार्दिक आभार।

  13. काश कि इतनी हिम्मत हर वो पिता कर सकता जिसकी बेटी के ससुराल वालों द्वारा उस बेटी पर जुल्म किया जाता रहता है। इतने सामयिक और सार्थक मुद्दे को अपने संपादकीय में शामिल करने के लिए आपको बहुत बधाई और शुभकामनाएं

  14. चर्चित खबर विश्लेषणात्मक प्रसार उम्दा है ।
    प्रेम गुप्ता ने सही अर्थों में दुर्गा उत्सव मनाया
    धूमधाम से बेटी को घर वापस लाने से न तो समाज और न ही पास पड़ोस कोई चर्चा कर सकेगा ।ऐसे ही आदर्श समाज की स्थापना होगी।सम्भवतः आने वाले समय में ये न होगा कि
    “जो मैंने मान लिया वही आदर्श है ।
    Dr Prabha mishra

    • प्रभा जी, आपने प्रेम गुप्ता जी के कदम का स्वागत किया है। इस सार्थक टिप्पणी के लिये साधुवाद।

  15. एक पिता का जिन हालातों में बेटी को इतनी धूमधाम से वापस लाने के फैसला लिया सराहनीय है। इस लिए कि उस सचिन की छद्म दुनिया में फिर कोई साक्षी न फँसे।
    विवाह और परिवार संस्था, जो सृष्टि की संवाहक भी है, को जीवित रखने के लिए बेटी ब्याहने से पहले अच्छे से छानबीन करना जरूरी है। एक सचिन नहीं बल्कि कितने सचिन हैं इस समाज में। लड़कियों के माता-पिता भी परिवार संस्था पर आघात करने में कम नहीं हैं। आपने इस व्याधि का हर पहलू लिया है।

  16. इस ख़बर से मुझे कुछ ऐसा लगता है कि सचिन कुमार के माँ बाप ने अधिक दहेज के लालच में बार बार बेटे की शादी करने का जैसे धन्धा बना रख़ा था। दो बार तो यह काठ की हाण्डी चढ़ गई लेकिन तीसरी बार इसे बेइज़्ज़त होकर आख़िर फूटना पड़ा।
    इस मामले में, दाद देता हूँ प्रेम गुप्ता की जिन्होँने समाज के बँधे हुये दकियानूसी रिवाजों की परवाह न करते हुये अपनी लाडली बेकसूर बेटी का साथ दिया। बेटी को बैण्ड बाजे के साथ सुसराल से विदा करने में उनका चाहे जो भी मक्सद हो, वो इस में पूरी तरह से काम्याब हुये। प्रेम गुप्ता ने समाज को शीशा दिखा दिया कि बेटियाँ कोई गाजर मूली नहीं हैं जहाँ शादी के बाद सुसराल के हर व्यवहार को सहती रहें और आहें भी न भरें। इस केस में प्रेम गुप्ता ने जो पहल की है उस से समाज की आँखों पर ज़हरीली धूल जो जमी हुई थी उसकी कुछ परतें तो कम हुयीं।
    देश में आज भी बहुत सारी बेटियाँ हैं जो इस प्रकार के वातावरण में घुटघुटकर अपना जीवन जी रही हैं और मुँह से उफ़ तक नहीं कर रही हैं। ज़रूरत है प्रेम गुप्ता जैसे हिम्मत वाले पिताओं की जिन्होंने पहल करके समाज को रास्ता दिखाया है और आपको इस ख़बर को साझा करने के लिये बहुत। बहुत साधुवाद।

    • विजय भाई हमारा प्रयास रहता है कि समाज की वास्तविक स्थितियों से अवगत करवाते रहें। इस सार्थक टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

  17. Your Editorial of today speaks about a brave and different father who brought his daughter back from her in- laws ‘ place with full fanfare in order to shame the husband’s family.
    Actually you touch a very sensitive issue,here, where most of our Indian middle class families let their daughters suffer in her husband’s house n do not bring her back to her original family.
    A very good n worthy msg in the present times.
    Warm regards
    Deepak Sharma

    • Deepak ji, in fact many parents are face to face with such situation. But Prem Gupta took a unique step to deal with the situation. Such people become role-models in the society. Thanks so much for your remark.

  18. पिता द्वारा बेटी को ससुराल से पूरे सम्मान के साथ बेटी को ससुराल से वापस लाने के प्रेरक कदम पर बहुत ही सुंदर, प्रेरक संपादकीय l अमूमन बेटियाँ ससुराल में सोशन इसीलिए बर्दाश्त करती हैं क्योंकि माता -पिता उनके लौटने का दरवाजा बंद कर देते हैं l जो आ भी जाती हैं , वो समाज़ को खटकती हैं और माता -पिता को बोझ लगती हैं l ऐसे में प्रेम गुप्ता जियसे पिता को नमन बनता है जो नया केवल बेटी को वापस लाए बल्कि उस सम्मान की भी रक्षा की जिसे कुछ दिन बाद आस – पड़ोस वाले, परिचित -अपरिचित तोड़ ही देते l किसी भी सामाजिक बदलाव की पहल करने के लिए बहुत हौसले की जरूरत होती है , उम्मीद है अन्य बेटियों के पिता भी शोषण की अवस्था में उन्हें ससुराल के रहमो -करम पर अकेला नहीं छोड़ देंगे l

    • सर, आपके इस विचार से सहमत हूँ कि, ‘चाहे ससुराल वाले अपनी बहू पर अत्याचार करें या फिर अपने माता-पिता उसके जीवन में दख़लअंदाज़ी करें, पिसती तो लड़की ही है। दोनों ही मामलों में वो अपने पति और सास-ससुर से सामान्य रिश्ता नहीं बना पाती है। आज के बदलते सामाजिक परिदृश्य के इस पहलू को आपने अपने संपादकीय में स्थान दे कर उसे अधिक तार्किक, सुचिंतित और विवेक सम्मत दृष्टिकोण दिया है l पुनः बधाई

    • वंदना जी यह देख कर बहुत अच्छा लगा कि आपने अपनी टिप्पणी को दो भागों में पूरा किया है। इससे साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि आप ने इस विषय पर बहुत गंभीरता से विचार किया है। इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  19. विचारणीय लेख
    विवाह एक सामाजिक संस्था है। वर्तमान समाज की खोखली विचारधारा ने इसे कमजोर कर दिया है… शिक्षा से विनम्रता बढ़ने की बजाय अहंकार की भावना बढ़ती जा रही है… सामाजिक मूल्यों का मानव पतन होता जा रहा है!!

  20. यह ख़बर जब वायरल हुई तभी से लग रहा था कि प्रेम गुप्ता और साक्षी जैसे लोगों के चलते ही समाज में बदलाव आते हैं और ऐसे लोग पहल कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, उसे करते हैं।
    आपने अपने संपादकीय को इस ख़बर के आधार पर बुनकर उनके किए काम को और आगे तक पहुँचाया है और उस समाचार का समाज के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सटीक विश्लेषण भी किया है।
    इस नेक काम के लिए आपको आभार।

    • प्रगति, पुरवाई का यही प्रयास रहता है कि समाज में जो कुछ भी घटित हो रहा हो उसे सही परिप्रेक्ष्य में अपने पाठकों तक पेश कर सकें। हार्दिक आभार।

  21. भारतीय समाज की सदियों से चली आ रही कठोर
    मान्यता ससुराल के प्रत्येक जुल्म को बर्दाश्त करो,
    वहीं रहो , डोली जाएगी और मर कर ही छुटकारा
    होगा। बात लगभग तीन दशक पहले की है एक
    स्वाभिमानी पिता समाज की परवाह न करते हुए
    अपनी बेटी को ससुराल से इसीलिए वापिस ले आए
    ताकि वो जिंदा रहे।
    आपने अपने सम्पादकीय में बखूबी इस समस्या को न केवल दर्शाया है अपितु बहुत से लोगों की संवेदनाओं को झकझोरने का स्तुत्य प्रयास किया है। साधुवाद।

  22. इस बार का संपादकीय हर बार की अपेक्षा अतिविशिष्ट इसलिये है क्योंकि उसका विषय महत्वपूर्ण है।आपने भारतीय समाज के एक ऐसे दोष को उजागर किया है!एक ऐसा अन्याय जो एक लंबे समय से लड़कियों के वैवाहिक संबंधों के मामले में उनके जीवन के प्रति खिलवाड़ की तरह हो रहा है ,फिर कारण चाहे जो भी हो।वह अन्याय या अपराध किसी भी रूप में हो सकता है ,हो रहा है। वह धोखे के रूप में हो, दहेज के लालच में हो या फिर और कोई भी अन्य कारण हो सकते हैं क्योंकि कारणों की कमी नहीं।मन ही तो है।
    ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि लड़की को माता-पिता वापस लाए हों ऐसा पहली बार हुआ हो, क्योंकि ऐसे केस तो बहुत सारे देखने में आ गए कि माता-पिता लड़कियों को ले आए हैं। आजकल लड़कियांँ स्वयं भी जागरूक हो रही हैं और माता-पिता भी उत्तरदायित्व को समझ रहे हैं, भले ही प्रतिशत कम है।
    पर इस तरह खामोशी से लाने से लड़के वालों का कुछ नहीं बिगड़ता। जंगल में मोर नाचा किसने देखा की तरह।
    ढोल धमाके के साथ लाना लड़के वालों के प्रति क्रोध ,बदला व बेटी के प्रति सुख, शांति, सुकून के सम्मिलित मनोभावों का आनंदोत्सव रहा।
    हमारी ही बहन अपनी बेटी को लेकर आई तीन वर्ष पूर्व। सास की प्रताड़ना से त्रस्त उसने कठोर निर्णय लिया और परिवार ने साथ दिया।
    इस तरह की कम से कम 7-8 घटनाएं यहाँ हमारे ही आसपास की हैं तो पूरे भारत के बारे में क्या कहें।
    हमारी एक जूनियर ने कुछ दिन पूर्व बताया उसकी एक फ्रेंड के बारे में।उसने एक इंजीनियर जो साउथ का था ,लव मैरिज की। लड़की भी काफी पढ़ी लिखी है दिल्ली में जॉब करती थी। हस्बैंड का जॉब अमेरिका में लग गया वे वहांँ चले गए । कुछ दिन सब ठीक रहा लेकिन उसके बाद फिर मारपीट शुरू हो गई। जब- जब सास- ससुर इंडिया से वहां जाते हैं तो और भी ज्यादा उसकी तकलीफें बढ़ जाती हैं क्योंकि सास ससुर भी बेटे का ही साथ देते हैं।जबकि सास-ससुर भी बहुत पढ़े लिखे थे।
    दरअसल साउथ में इस तरह की प्रथा है कि मामा भांजे की शादी हो जाती है। वह संबंध महत्वपूर्ण मानते हैं।इस तरह पहले शादी तय हुई थी लेकिन किसी कारणवश हो नहीं पाई और फिर इससे इसकी शादी हो गई। लेकिन कुछ समय बाद भांजी का अफेयर फिर शुरू हो गया और उसके बाद यहां प्रताड़ना का दौर प्रारंभ हुआ। जो जारी है।यह एक माह पूर्व की खबर है।और विदेशी नियमों की अपनी बंदिशें कि न वापस ला सकते न वह लौट सकती।
    इस तरह की ढेरों कहानियांँ समाज में बिखरी पड़ी हैं।
    यह संपादकीय एक संदेश की तरह है सारे देश के लड़कों और लड़के वालों के लिए कि उनके अत्याचार और अन्याय को सहने का समय समाप्त हो गया है उन्हें संभल जाना चाहिये।
    एम बी ए की हुई इतनी सीधी ,इतने अच्छे परिवार की , बहुत ही खूबसूरत लड़की शादी के तीन माह बाद ही लौट आई। उसके पति का पहले ही किसी लड़की से संबंध था और उसकी उसी से शादी करने की इच्छा थी। माता-पिता को बताया ही नहीं था उसने। अनावश्यक दूसरी लड़की की जिंदगी बर्बाद हुई।
    कुंडली मिलान और कुंडली में मंगल वगैरह यह एक अलग बात है । यह जीवन का कठोर सत्य है कि जीवन में उतार-चढ़ाव, हानि- लाभ, दुख -सुख आते- जाते रहते हैं ! बिना संघर्ष किसी का जीवन नहीं गुजरता।परस्पर प्रेम सौहार्द्य,समझौता, समझदारी और विवेक से स्थितियांँ सँवरती हैं ;वहीं लालच ,अपेक्षाएंँ , जिद, अहम्, जबरदस्ती और अविवेकी सोच जिंदगी को तबाह कर देती है।
    निश्चित ही इस बार का संपादकीय भारतीय समाज के लिये मात्र घटना, विवरण,खबर या जानकारी नहीं बल्कि एक अति आवश्यक सामाजिक दोष को सबके सामने लाकर ; सबक और प्रेरणा के लक्ष्य को लेकर, सुधार की प्रबल भावना से लिया गया उद्देश्यपूर्ण प्रयास है। झारखंड की यह घटना एक रोशनी की तरह सारे समाज को सचेत कर रही है इसलिए यह संपादकीय अति महत्वपूर्ण है।
    इसे सबके सामने लाने का आपका प्रयास सराहनीय है तेजेंन्द्र जी!
    लेकिन इसके बाद भी प्रश्न शेष रहता है कि शिक्षा के विकास की वह कौन सी दिशा है?जिसका परिणाम इस रूप में बहुतायत में नजर आ रहा है? शिक्षा के साथ ही हमारे संस्कार और संस्कृति की अनदेखी और उपेक्षा, उच्च महत्वाकांक्षाएँ , व्यक्तिगत सुख, स्वार्थ अहंकार जिसे सैल्फ रिस्पेक्ट समझ बैठते हैं ,कुल मिलाकर ये सब युवावर्ग को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। वे समझ ही नहीं पा रहे कि स्वतंत्रता का मतलब स्वछंदता नहीं होता है।
    बस यहीं से सारे उपद्रव पोषित होते हैं।
    एक बेहतरीन संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयां।
    साक्षी गुप्ता और उसके पिता प्रेम गुप्ता के इस साहसिक निर्णय को सलाम

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