संपादकीय - कचरे के ढेरों तले दबते महानगर 1
सांकेतिक चित्र (साभार : The Indian Wire)

भारत में कचरा प्रबंधन मूल रूप से नगरपालिकाओं की जिम्मेदारी है। इसी जिम्मेदारी को सही ढंग से नहीं निभाने के कारण 1996 में सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार, राज्यों व नगरपालिकाओं के अधिकारियों के खिलाफ एक जनहित याचिका भी दायर की गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए भारत सरकार को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए थे। फलस्वरूप कचरा प्रबंधन के लिए नए नियम-कानून बने। भारत सरकार के पर्यावरण व वन मंत्रालय ने म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (मैनेजमेंट व हैंडलिंग) नियम, 2000 पारित किया। परंतु तब से आज तक स्थिति और अधिक ख़राब ही हुई है। कारण एक ही है कि किसी भी सरकार ने इस विषय पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए।

कुछ माह पहले दिल्ली से एक समाचार आया कि  राजधानी दिल्ली के उत्तरी इलाके में स्थित भलस्वा लैंडफिल साइट (कचरे के विशालकाय ढेर) में भीषण आग लग गई। दरअसल पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया कि यह हुआ क्या। मैं दिल्ली में दो दशक रहा था मगर भलस्वा नाम कभी सुना ही नहीं था। मेरे लिये यह लैंडफ़िल साइट भी एक नया सा विचार था। सीधे शब्दों में कहा जाए तो ये शहर भर का कचरा इकट्ठा करने की जगह ही है। यानी कि कचरे के पहाड़।
मैंने समय निकाल कर स्थिति को समझने का प्रयास किया तो पाया कि भारत में लगभग चार करोड़ टन कचरा हर रोज़ फेंका जाता है। उसे कहीं न कहीं तो रखना ही होगा। उसी से बनते हैं कचरे के पहाड़। आम तौर पर जब हम पहाड़ की बात सोचते हैं तो उसके साथ आँखों के सामने बर्फ़ से ढंकी चोटियां… हरे-हरे पेड़… सूरज की हल्की चमकती धूप… और न जाने कितने रोमांटिक ख़्याल दिल में आते हैं। मगर इन कचरे के पहाड़ों के साथ जुड़े हैं ज़हरीले पदार्थ और ज़हरीली गैस। 
भारत से हर साल करीब 277 अरब किलो कचरा निकलता है। यानी कि प्रति व्यक्ति लगभग 205 किलो कचरा। समस्या यह है कि इसमें से केवल 70 प्रतिशत कचरा ही इकट्ठा किया जा पाता है। बाकी कचरा ज़मीन और पानी में फैला रहता है। 
दिल्ली के ग़ाज़ीपुर और मुंबई के मुलुंड इलाके में कचरे के पहाड़ों को नज़दीक से देखा जा सकता है। मुंबई के देवनार इलाके में 18 मंज़िली इमारत की ऊंचाई जितना कचरे का पहाड़ बन चुका है। पिछले वर्ष बीबीसी से ने इस पहाड़ पर एक स्टोरी की थी जिसमें बताया गया था कि 19 साल की फरहा शेख़ वहां आने वाले कचरे के ट्रकों की प्रतीक्षा करती है। 
वह दरअसल  कूड़ा बीनने का काम करती हैं। बचपन से ही वह देवनार इलाक़े में इस कचरे के ढेर से कूड़ा उठाने का काम कर रही हैं। इस गंदे और चिपचिपे कचरे से वह बोतलें, गिलास और तार निकालती हैं ताकि उन्हें कचरा बाज़ार में बेच सके। लेकिन, इस कचरे में उसे सबसे ज़्यादा तलाश टूटे हुई मोबाइल फ़ोन की होती है।
कचरा भी दो तरह का होता है। एक जिसे ‘रीसाइकिल’ किया जा सके। और दूसरा जिसे केवल ‘डंप’ करना होता है। भारत में भारी मात्रा में कचरे के रिसाइकिल न हो पाने और इसे खुले में फेंके जाने की वजह मिला-जुला कचरा भी होता है नेशनल इंवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) के टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट सेंटर के हेड साइंटिस्ट डॉ. सुनील कुमार कहते हैं, “असल समस्या कचरा नहीं बल्कि मिक्स कचरा है। यानी ऐसा कचरा जिसमें सब्जियों-फलों के छिलके, कागज, प्लास्टिक, धातुएं, शीशा और इलेक्ट्रिक कूड़ा यह सब मिला हुआ हो। ऐसे कूड़े का निपटान बहुत मुश्किल होता है। अगर यह कूड़ा अलग-अलग हो तो इसका निपटान सरकारी और प्राइवेट दोनों ही चैनलों से किया जा सकता हैं।” 
हैरानी की बात यह है कि आज से लगभग एक दशक पहले नॉर्वे जैसा देश दुनिया से कचरा आयात करने लगा था क्योंकि उस री-साइकिल करने वाले कचरे से वहां बिजली निकालने का तरीका ढूंढ निकाला गया था। नार्वे की राजधानी ओस्लों में तो 50 प्रतिशत से ज्यादा बिजली की पूर्ति वातानुकूलन के लिए हीट कचरे को जला कर की जाती है। इस रिपोर्ट को दुनिया भर से अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं मिलीं। कुछ लोगों ने जहां इसे मज़ाक समझकर टाल दिया, वहीं कुछ लोग नार्वे द्वारा विकसित कचरे से ऊर्जा उत्पादन करने की तकनीकों से बहुत प्रभावित हुए।
अमरीका में 15 नवंबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय रीसाइकिल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। भारत में ऐसा कोई प्रचलन नहीं है। पिछले 75 वर्षों में भारत की कोई भी सरकार (चाहे केन्द्र स्तर पर या राज्य स्तर पर) अपने नागरिकों को इस कचरे के भयंकर परिणामों की जानकारी से अवगत नहीं करवा पाई है। भारत में यदि कोई ऐसा दिवस मनाया भी जाता तो राजनेता उसका भी वही हाल करते जो उन्होंने ‘राष्ट्रीय स्वच्छता दिवस’ का किया था – यानी कि पहले कचरा फैलाओ और फिर झाड़ू हाथ में लेकर उसे साफ़ करने का स्वांग रचते हुए फ़ोटो खिंचवा लो।  
लंदन में काउंसिल द्वारा अलग-अलग रंगों के डस्ट-बिन मुहैया करवाए जाते हैं। हरे रंग की बिन में घर का सामान्य कचरा। नीले रंग की बिन में री-साइकिल करने वाला कचरा और भूरे रंग की बिन में अपने घर के बाग़ीचे और बाड़ का कचरा (यानि कि पेड़ पौधों की कटाई का कचरा)। इसे लेने के लिये भी अलग-अलग दिन काउंसिल की गाड़ी आती है। इससे कचरे का निवारण बेहतर ढंग से हो जाता है। यदि सभी प्रकार का कचरा एक ही तरह की बिन में डाल दिया जाएगा तो उसे अलग करने में बहुत सी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी।
भारत अमरीका से चार गुना अधिक कचरा हर साल पैदा करता है। मगर उस कचरे से निपटारा पाने की इच्छा-शक्ति किसी भी राजनीतिक दल में नहीं है। राजनीतिक दलों को तो राजनीतिक कचरे से ही फुरसत नहीं मिलती। भला वे आम आदमी और देश के बारे में सोचने का समय कैसे निकालेंगे। यहां किसी भी राजनेता के यहां छापा मारा जाता है तो करोड़ों रुपये और गहने बरामद हो जाते हैं। मगर सरकारी बजट में कचरे से निपटने के लिये पैसे आवंटित करने का कोई प्रावधान नहीं होता। और यदि कोई कॉरपोरेशन ऐसा करती भी है तो उस बजट का अधिकांश हिस्सा भ्रष्टाचार की वेदी पर बलिदान हो जाता है। 
भारत में कचरा प्रबंधन मूल रूप से नगरपालिकाओं की जिम्मेदारी है। इसी जिम्मेदारी को सही ढंग से नहीं निभाने के कारण 1996 में सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार, राज्यों व नगरपालिकाओं के अधिकारियों के खिलाफ एक जनहित याचिका भी दायर की गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए भारत सरकार को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए थे। फलस्वरूप कचरा प्रबंधन के लिए नए नियम-कानून बने। भारत सरकार के पर्यावरण व वन मंत्रालय ने म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (मैनेजमेंट व हैंडलिंग) नियम, 2000 पारित किया। परंतु तब से आज तक स्थिति और अधिक ख़राब ही हुई है। कारण एक ही है कि किसी भी सरकार ने इस विषय पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ़रवरी 2022 में इंदौर (मध्य प्रदेश) में गीले कचरे से बायो सीएनजी बनाने के संयंत्र का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्चुअल लोकार्पण किया। इंदौर के देवगुराड़िया में नगर निगम द्वारा बनाए गए इस संयंत्र को एशिया का सबसे बड़ा बायो सीएनजी प्लांट बताया जा रहा है। 
गोबर-धन परियोजना को प्रधानमंत्री ने कचरे से कंचन बनाने की योजना बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले दो वर्षों में देश के 75 बड़े नगरीय निकायों में इस प्रकार के गोबर-धन बायो सीएनजी संयंत्र लगाने पर काम किया जा रहा है। यह अभियान भारत के शहरों को स्वच्छ, प्रदूषण-रहित बनाने और ग्रीन एनर्जी की दिशा में बहुत मदद करेगा। स्वच्छ भारत मिशन में हमारा अगला लक्ष्य यह है कि अगले दो-तीन वर्षों में शहरों को कूड़े के पहाड़ों से मुक्ति मिल सके और उन्हें ग्रीन ज़ोन में बदला जा सके।
पुरवाई परिवार भारत की केन्द्र एवं राज्य सरकारों से आग्रह करता है कि देश के तमाम शहरों में कचरे के बढ़ते पहाड़ों की ओर ध्यान दिया जाए और राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाए जाएं ताकि इस सुरसा जैसी समस्या से निपटा जा सके।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

32 टिप्पणी

  1. गम्भीर विचारणीय मुद्दा, इन्दौर के समान भारत के सब शहरों में युद्ध स्तर पर कार्य होना चाहिए। तब ही इस समस्या का समाधान निकलेगा। उपरोक्त सम्पादकीय में ‘ राजनेताओं को राजनीतिक कचरे से फुरसत नहीं मिलती ‘ अति सराहनीय पुरस्कार योग्य वाक्य ! एवं कचरे की समस्या अधिक गम्भीर मुद्दा !

  2. बहुत ही शोधपरक करके चिंताजनक विषय पर हाथ डाला है आपने तेजिंदर जी। सिर्फ़ स्वछता अभियान से काम नही चलेगा उससे निकली हुई समस्या का भी हल ढूंढना होगा। शायद आज के इस लेख से किसी समझदार को इस गंभीर समस्या का समाधान खोजने की इच्छा जागृत हो। सुंदर आलेख कृति के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं।

  3. बहुत ही सारगर्भित लेख है सर… वाकई में कचरा निपटान की समस्याया बहुत विकराल होती जा रही है। दिल्ली में रहने के कारण मैंने भी इस समस्या को देखा है ….वाकई में सरकार का ध्यान इस ओर अवश्य जाना चाहिए और साथ ही आम जनता को जागरूक होने की आवश्यकता है।

  4. कचरा कम हो अगर हम प्रयास करें तो! और जो भी हो अलग कूड़ेदान में हो ताकि उसे खाद बने, बिजली बने या रिसाइकल हो कर कोई सामान।

  5. गंभीर समस्या गंभीर निदान माँगती है । इसके लिए जागरूकता भी चाहिए और इच्छा शक्ति भी। दायित्व जितना सरकार का है उतना ही नागरिक का भी । हमारे यहाँ भी कचरा अलग अलग संग्रहण करने का चलन है पर कितना हो पाता है यह संदिग्ध ही है । गंभीर समस्या को उठाता हुआ प्रशंसनीय संपादकीय ।

    • पद्मा जी किसी भी समस्या का हल ढूंढने से पहले उसे समझना आवश्यक है। आपने जागरूकता और इच्छा शक्ति की बात सही कही है।

  6. संपादक महोदय !
    अत्यंत ज्वलंत विषय को पुरवाई का संपादकीय विषय बनाने के लिए साधुवाद.
    यह सही है कि प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता अभियान ने एक किस्म की जागरूकता पैदा की है, परंतु कचरा-प्रबंधन वर्तमान समय की बहुत बड़ी चुनौती है।
    साथ ही यह भी सही है कि हम बीते हुए समय में लौट नहीं सकते। विज्ञान की बरबादियों को देखने के बाद मन सुदूर अतीत में लौट जाना चाहता है जो केवल ख़यालो में संभव है।
    भोगवादी संस्कृति हमारी नियति बन चुकी है और वास्तविकता भी।
    उम्मीद करनी चाहिए कि आदमी कुछ रास्ता निकालेगा। बहुत अच्छा लिखा कि ‘राजनेताओं को राजनीति का कचरा करने से फुर्सत नहीं.

  7. कचरा और कचरे का निपटान।
    हालांकि ये समस्या पूरे विश्व की बनती जा रही है, लेकिन भारतीय संदर्भ में यहां के जनसंख्या घनत्व और अव्यवस्थित योजनाओं के चलते यह समस्या एक विकराल रुप धारण कर चुकी है। इस समस्या पर, हजारों मील दूर रहकर भी आपके द्वारा गहन विचार करना और इसे संपादकीय का विषय निःसन्देह आपकी जागरूकता का परिचायक है तेजेंद्र सर।
    भसलवा और गाजीपुर साइट जैसे कई पहाड़ देश के अलग-अलग कोनों में बढ़ते जा रहे इस समस्या की भयावहता भी दर्शाते हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से सरकारी सिस्टम इसके प्रति अलर्ट भी हुआ है लेकिन जान जागृति का अभी बहुत अभाव है।
    आपने जिस तरह अपने संपादकीय में इसकी विस्तृत जानकारी दी है और विषय को उठाने का प्रयास किया है, वह सराहनीय है और इस तरह के प्रयास भारतीय मीडिया संस्थानों को भी करने चाहिए, ऐसा मुझे लगता है। बहरहाल आपके इस सुंदर स्पष्ट वैचारिक संपादकीय के लिए दिल से साधुवाद सर।

    • प्रणाम सर,सर आप के मुद्दे हमेशा ही ज्वलंतशील रहते हैं आप सात समुंदर पार बैठ कर भी भारत की समस्या को इतनी बेहतरीन तरह से समझते हैं लोगों की लापरवाही की वजह से गीला और सूखा कूड़ा अलग नहीं हो पाता। एक समय था, जब अत्यधिक जागरूकता फैलाने पर भी सभी जन बिना हेलमेट के वाहन चलाते थे किन्तु जैसे ही 500 का चालान कटने लगा तब से सब हेलमेट का प्रयोग करने लगे। कचरे के पहाड़ बनते देख प्रशासन को ऐसा ही कोई कड़ा फैसला लेना होगा और आपने बिल्कुल फरमाया कि मीडिया इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है
      बेहतरीन लेख के लिए साधुवाद

      • अंजु सच तो यह है कि अनुशासन के लिये भीख नहीं मांगी जा सकती। अनुशासन तो कानून द्वारा जारी किया जाता है।

  8. In your Editorial of today you have rightly drawn attention to a very significant issue of the day as to how the waste of our households is of 2 kinds,the one that can be recycled and the one that is totally useless and how that waste could/ should be properly disposed of/ utilized.
    A compulsive read.
    Regards
    Deepak Sharma

  9. बेहतरीन! कचरा-निपटान समस्या भयंकर से भयंकरतम होती जा रही है और हम उस पर बिलकुल ध्यान नहीं दे रहे। इस समस्या को विभिन्न पहलुओं से छूता आपका यह सम्पादकीय शायद इसके जागरण की चिंगारी जला जाए। बड़ी समग्रता से आपने इस समस्या को पेश किया है।

    • धन्यवाद प्रगति। उम्मीद की लौ जलाए हूं कि शायद पुरवाई की बात सही जगह पहुंच जाए।

  10. बहुत बड़ी समस्या को रेखांकित करने के लिए आभार। यहाँ सरकार और नागरिक सभी आत्मा की शुद्धता में विश्वास रखते हैं पर्यावरण जैसा भी हो फर्क़ नहीं पड़ता…
    पोलीथीन, प्लास्टिक इतना अधिक हो गया है कि कचरे की समस्या सुलझती हुई लगती नहीं। सरकारी प्रयास बहुत हो रहे हैं, लेकिन उनको लागू करने वाले अपने भ्रष्ट विचारों के कारण सब सत्यानाश कर देते हैं। हर चौराहे और हर कॉलोनी में नीले और हरे कूड़ेदान लगे हैं, सूखे और गीले कूड़े के लिए, हर ज़िले में recycling क plants हैं, पर न लोग अलग- अलग कूड़ा डालते हैं न कूड़ा इकट्ठा करने वाले कर्मचारी ही कूड़ा अलग – अलग करने के लिए कहते हैं। नीतियों का दोष नहीं है, अनुशासन हीनता है जो औसत भारतीय नागरिक के DNA में है, वह कर्मचारी, अधिकारी या नागरिक कोई भी हो। नागरिक माशाल्लाह हैं, कूड़ेदान के पास कचरा फेंकते हैं, कूड़ेदान के अंदर नहीं। कूड़ा फेंकने के तरीके और कम कूड़ा निकालने की शिक्षा अगर बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं की जाती, तो अभी दो – चार पीढ़ियों तक कचरे की समस्या नहीं सुलझेगी.

  11. दुनिया के पर्यावरण संतुलन में बाधक ‘कचरा’विषय पर बेहतरीन विचार है’कचरा प्रबंधन वास्तव में आधारभूत समस्या है । स्वछता अभियान में भले ही शुरू में प्रदर्शन हुआ हो पर एक सफाई के प्रति जागरूकता तो आई
    असर की लहर चल पड़ी तो संभावना भी जागृत होगी ।
    इंदौर प्रथम ही सही प्रतियोगिता तो आरम्भ हुई ।
    आशा करते हैं आपकी सम्पादकीय भी असर करेगी ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

    • प्रभा जी आपकी टिप्पणी सकारात्मक है। हम सब आपके साथ आशा की ज्योति जलाते हैं।

  12. हमेशा की तरह इस संपादकीय में तेजेंद्र जी ने एक गंभीर समस्या को रेखांकित किया है। समस्या सचमुच सुरसा की तरह विशालकाय है और उसके दुष्प्रभाव पर्यावरण और जनजीवन तक प्रसारित हैं। सरकारी सक्रियता के साथ जनजीवन में नागरिकता के कर्तव्य के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना आवश्यक है।

    • अरुणा जी समस्या सच में बहुत विकराल है। सरकार और नागरिकों को मिल कर प्रयास करने होंगे।

  13. कचरे की भीषण “सुरसासमस्या” को इतनी चिन्ता के साथ आपने प्रस्तुत किया है, अब शायद राजनेता राजनैतिक कचरे से निकल कर इस समस्या पर ध्यान दें। यदि शेष राज्य भी इन्दौर के उदाहरण से सबक़ लें, तो यह श्रेय आपके सम्पादकीय को ही जाएगा।

  14. कचरे की इस भयावह समस्या का समाधान तो उपलब्ध है लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति के बिना कुछ भी सम्भव नहीं । साधारण नागरिक का इसकी भयावहता के प्रति गम्भीर होना भी बहुत ज़रूरी है । कचरे की समस्या साधारण जन के लिए तभी तक है जब तक वह उसके घर और रास्ते में हो । इसके दुष्प्रभाव से अनभिज्ञ वह उसमें इज़ाफ़ा करने से भी गुरेज नहीं करता ।
    अज्ञानता के चलते गंभीरता का अभाव है ।
    स्वच्छ भारत अभियान का भी मज़ाक यह कहकर उड़ाया गया था कि गम्भीर मुद्दों से भटकाने के लिए नया शग़ूफ़ा छोड़ा गया है।
    ख़ैर, समय रहते चेत जायें तो अच्छा है अन्यथा दुष्परिणाम भी जल्द ही दिखने शुरु हो जायेंगे ।
    आशा है कि यह सम्पादकीय लोगों की ऑंखें खोलने में कारगर साबित होगा ।
    शुभकामनाऍं !!

  15. सार्थक मुद्दे पर सम्पादकय.भारत से हर साल करीब 277 अरब किलो कचरा निकलता है। यानी कि प्रति व्यक्ति लगभग 205 किलो कचरा। समस्या यह है कि इसमें से केवल 70 प्रतिशत कचरा ही इकट्ठा किया जा पाता है। बाकी कचरा ज़मीन और पानी में फैला रहता है।

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