दिमाग़ में एक बात चल रही थी कि शायद ब्रिटेन की काउंसिल की ही तरह भारत के सरकारी तंत्र में भी बुरी तरह से फफूंद लग रही है। खाने पीने के सामान पर या घरों में लगी फफूंद कुछ एक इन्सानों को बीमार करती है या उनकी जान ले लेती है। मगर सरकारी तंत्र की फफूंद तो पूरे समाज को बीमार कर देती है और सभी की जान की दुश्मन बन जाती है। हमारा प्रयास होना चाहिये कि हम अपने घर, अपने जीवन और अपने प्रशासन से इस फफूंद को साफ़ करें। तभी एक स्वच्छ और साफ़ समाज का निर्माण हो पाएगा।
हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार ज़किया ज़ुबैरी जी बारनेट के कॉलिन्डेल क्षेत्र में काउंसलर हैं। हाल ही में उनके सामने एक ऐसा मामला आया जिसकी गहराई को मैं बिल्कुल भी समझ नहीं पाया। ज़किया जी ने बताया कि उनके इलाक़े के एक निवासी के घर में फफूंद की समस्या ख़तरनाक स्तर पर पहुंच गयी है। पूरे परिवार के स्वास्थ्य पर इसका असर हो रहा है।
ज़किया जी पूरी कर्मठता से उस परिवार की सहायता के लिये जुट गयीं। परिवार में एक माँ, दो बेटियां और एक बेटा। फफूंद का सबसे अधिक असर बेटे ख़ाकान पर हो रहा था। ज़किया जी संबद्ध अधिकारियों से निरंतर संपर्क बनाए हुए थीं। मुझे यह इन्हीं दिनों में पता चला कि भारत में जो लालफीताशाही चलती है उसकी शुरूआत अंग्रेज़ों ने ही की होगी।
एक रात तो हालात इतने ख़राब हो गये कि ज़किया जी को इस पूरे परिवार को अपने घर में रखना पड़ा। जब काउंसिल को पता चला कि काउंसलर ने इस परिवार को रात भर अपने घर रखा तो वहां हड़कंप सा मच गया। अगले ही दिन पूरे परिवार को एक होटल में रखने का प्रबन्ध किया गया। ज़किया जी ने महसूस किया कि उनके बेटे ख़ाकान की तबीयत कुछ अधिक ही ख़राब लग रही थी। उसे साँस लेने में बहुत कठिनाई हो रही थी।
ख़ाकान को हस्पताल पहुंचाया गया। अगले ही दिन उसे आई.सी.यू. में शिफ़्ट कर दिया गया। और तीन दिन के बाद ही ख़ाकान यह दुनिया छोड़ कर चला गया। ज़ाहिर है कि हर महकमा इस मौत के लिये अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के तरीके खोज रहा है।
अभी कुछ ही दिन पहले मैन्चेस्टर के निकट रॉशडेल में एक शिशु अवाब इशाक का फफूंद भरे फ़्लैट में रहने के कारण निधन हो गया। वह अभी पूरा दो वर्ष का भी नहीं हो पाया था। उसका जन्मदिन दिसम्बर महीने में था।



Your Editorial of this day brings to light a very significant issue relating to the health n worthiness of human life/ community/country and how it can be adversely affected or even destroyed by mould.
A very informative and valuable article.
Regards
Deepak Sharma
Thanks so much for such a quick reaction Deepak ji.
आपने अत्यंत महत्वपूर्ण स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधित मुद्दा एक साहित्यिक पत्रिका के संपादकीय के माध्यम से उठाकर एक तरह से विश्व को चेताने और जगाने का प्रयास किया है। अंतिम पंक्तियों में आपने फफूंद को सरकारी तंत्र से जोड़ दिया जो गज़ब है। वास्तव में लालफीताशाही की फफूंद पूरे समाज को सड़ांध से भर देने में सक्षम है।
हम तो सोच भी नहीं सकते थे कि फफूंद जानलेवा भी हो सकती है।
इस सार्थक टिप्पणी के लिए धन्यवाद जितेन्द्र भाई।
शायद नहीं सर, बल्कि निश्चित रूप से ब्रिटेन की काउंसिल की तरह भारत के सरकारी तंत्र को बुरी तरह से फफूंद लग चुकी है। आपके इस तर्क से सोरहो आने सहमत हुआ जा सकता है कि “खाने-पीने के सामान पर या घरों में लगी फफूंद कुछेक इन्सानों को बीमार करती है या उनकी जान ले लेती है, जबकि सरकारी तंत्र की फफूंद पूरे समाज को बीमार कर देती है और सभी की जान की दुश्मन बन जाती है।” वास्तव में हम सबका यह “प्रयास होना चाहिये कि हम अपने घर, अपने जीवन और अपने प्रशासन से इस फफूंद को साफ़ करें, तभी एक स्वच्छ और साफ़ समाज का निर्माण हो पाएगा।”
धन्यवाद भाई चंद्रशेखर। आपने संपादकीय के मर्म को पकड़ा है।
बढिया लेख।सीधे सरकारी तंत्र की पोल खोलता हुआ। बेहद संवेदनशील तरीके से ही बताता हुआ कि वह चाहे भ्रष्टाचार हो फफूंद, जानलेवा हो सकती है।
धन्यवाद दीपा।
एक बेहतर तुलनात्मक दृष्टि
धन्यवाद भूमिका।
उपयोगी संपादकीय, बधाई,
कोरोना महामारी के बाद कुछ दिनों तक भारत में ब्लैक फंगस का आतंक बना रहा। कई लोगों को आंखों से हाथ धोना पड़ा ,कई के करोना से क्षत-विक्षत फेफड़े काली फफूंद के कारण नष्ट हो गए और जीवन से हाथ धोना पड़ा ।सांस में जाकर त्वचा पर फैल कर फफूंद स्वास्थ्य को हानि पहुंचाती है परंतु साथ ही पौष्टिक भोजन भी तो है गुच्छी और दूसरे मशरूम हाई प्रोटीन वाले भोज्य पदार्थ भी हैं ।हां ,राजनीति और प्रशासन में लगी फफूंद अवश्य ही समाज को नष्ट करने वाली है।
सूर्य की कृपा पाने वाले देश भारत में फफूंद का प्रकोप उतना भयंकर नहीं होता जितना नाम और उमस भरे क्षेत्रों में होता है। राजनैतिक क्षेत्र में भी ‘सूर्य की किरणें’ आवश्यक है कि उसमें फफूंद ना लगे!
सरोजिनी जी, आपने संपादकीय को गहराई से पकड़ा है। धन्यवाद।
मस्तिष्क की फफूंदी हटाता हुआ संपादकीय, काश ब्रिटेन, भारत ही नहीं रूस-यूक्रेन सहित सम्पूर्ण विश्व के प्रशासन और जनता की फफूंद हट जाए तो विश्व कल्याण हो जाये।
हम धूप और लू की जगह में रहने वालों के लिए ख़तरा कम है, पर सावधानी रखनी चाहिए, ये आपने याद दिलाया। संपादकीय के क्षेत्र में नये गवाक्ष सा संपादिका प्रशंसनीय है।
शैली जी इस सारगर्भित टिप्पणी के लिये धन्यवाद।
साधारण से दिखने वाले विषय पर बेहद विलक्षण और प्रामाणिक संपादकीय आलेख के लिए तेजेन्द्र जी को साधुवाद
धन्यवाद पंकज भाई।
लाजवाब सर,साधरण फफूंद के रूद्र रूप से सरकारी तंत्र पर जोरदार प्रहार । प्रणाम है आपको।
धन्यवाद अंजु।
सम्पादकीय का शीर्षक पढ़कर याद आया “जहाँ न पहुँचे रवि ,वहाँ पहुँचे कवि ।आपकी दृष्टि नए विषय की ओर पहुँच गयी ,विकराल समस्या है ।
गम्भीर विश्लेषण है ।
साधुवाद
Dr Prabha mishra
प्रभा जी आपने अस्वस्थ होते हुए भी टिप्पणी की है। धन्यवाद।
बढ़िया लेख
धन्यवाद संगीता।
आपने सही लिखा है कि खाने पीने के सामान पर या घरों में लगी फफूंद कुछ एक इन्सानों को बीमार करती है या उनकी जान ले लेती है। मगर सरकारी तंत्र की फफूंद तो पूरे समाज को बीमार कर देती है और सभी की जान की दुश्मन बन जाती है। हमारा प्रयास होना चाहिये कि हम अपने घर, अपने जीवन और अपने प्रशासन से इस फफूंद को साफ़ करें। तभी एक स्वच्छ और साफ़ समाज का निर्माण हो पाएगा।
किन्तु क्या ऐसा हो पायेगा? घरों को तो इंसान साफ भी कर ले किन्तु समाज और प्रशासन…!!
सदा की तरह समाज को जागरूक करता, चेतावनी देता बेहतरीन संपादकीय।
धन्यवाद सुधा जी, आपने संपादकीय को समग्रता में पकड़ा है।
जानकारी युक्त संपादकीय बधाई।
धन्यवाद प्रमिला।
बहुत महत्वपूर्ण विषय है तेजेन्द्र जी ! मनुष्य के शरीर के ऊपर असर से लेकर मन-विचारों, यहाँ तक कि राजनीतिक तंत्र की फफूंदी के साथ जो दृश्य उपस्थित हुआ है, वह भयभीत करता है।बात देखने, सुनने में ज़रा सी लेकिन परिणाम कितने भयंकर !
यह फफूंदी शरीर, विचार व समाज को दुर्गंधित करने में कभी भी नहीं चूकती और एक गला हुआ सा एहसास देती है ।
फफूंदी का चित्र देखकर ही शरीर में कंपकपाहट होती है यदि मन के तंत्रों तक पहुँच जाए तो समाज को कैसे छोड़ सकती है?
इस प्रकार के संपादन के लिए आपको साधुवाद।
सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिए धन्यवाद प्रणव जी।
फफूंद के बारे में भारत में कोई जागरूकता नहीं है। भारत में लोग अपनी मूलभूत आवश्यकता ही पूरी नहीं कर पाते फिर सीलन के बारे में जान कर क्या कर लेंगे। अस्थमा के मरीजों को डाॅक्टर विशेष रूप से यह सलाह देता है कि आप फफूंद और सीलन से दूर रहें पर अधिकतर भारतीय मरीजों की मजबूरी होती है सीलन और फफूंद से पटे घरों में रहना। फफूंद से लड़ाई के साथ साथ गरीबी से भी लडना होगा।
भारती, पुरवाई के संपादकीय के माध्यम से हम ऐसे ही विषयों के बारे में जागरूकता पैदा करने का प्रयास करते हैं।
अंग्रेजों की व्यवस्था से ही उपजा भारतीय सरकारी तंत्र आरंभ से ही फफूंद के प्रकोप से ग्रस्त रहा है। यही कारण रहा कि भ्रष्टाचार कुव्यवस्था इसकी जड़ों में समाया हुआ है। इसके चलते आजादी के तुरंत बाद से ही जीप घोटाला मूंदड़ा कांड जैसे घोटाले सामने आने शुरू हो गए थे। यह सिलसिला अभी भी रुका नहीं है। स्वास्थ्य शिक्षा सुरक्षा आदि सारी व्यवस्थाएं फफूंद के प्रकोप से आज भी त्रस्त हैं. भारत में समस्या इसलिए भी ज्यादा भयावह है कि यहां साहित्य जगत भी फफूंद से बुरी तरह ग्रस्त है। वह साहित्य जो समाज देश को सभ्य सुसंस्कृत बनाने, दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. स्वाधीनता संग्राम के आंदोलन में नि:संदेह साहित्य जगत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन बाद में इसमें मठाधीशी का फफूंद ऐसा लगा कि पूरा साहित्य जगत ही खेमों बँटा अपने ही पैरों पर कुलड़ियां चलाता चला आ रहा है. हर मठ दूसरे को नकारता खुद को ही श्रेष्ठ बताने में अनवरत लगा हुआ है। इससे हिंदी साहित्य जगत का ही नहीं देश और समाज की जो क्षति हो रही है वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. सत्ता प्रतिष्ठान पर अंकुश लगाए रखने, उसे दिशाहीन होने से बचाए रखने की जो शक्ति मीडिया के साथ-साथ साहित्य जगत के पास होती है वह स्वयं ही बिखरी हुई है. सत्ता प्रतिष्ठान निरंकुश हो चुका है, लोकतंत्र भीड़ तंत्र में परिवर्तित होता चला जा रहा है. फफूंद की व्यापकता देखिए है कि समय-समय पर शासन प्रशासन में पारदर्शिता की बात करने वाली न्यायपालिका भी, घोर अपारदर्शी जजों की नियुक्ति की, कोलोजियम व्यवस्था को किसी भी सूरत में त्याग कर एक पारदर्शी व्यवस्था अपनाने को तैयार नहीं है. ऐसे में देश हैरान-परेशान है कि किससे से अपेक्षा करे कि वह एक फफूंद मुक्त सुदृढ़ शासन-प्रशासन स्थापित कर बेहतर स्वास्थ्य शिक्षा सुरक्षा आदि देशवासियों के लिए सुनिश्चित करेगा। आप ऐसे मुद्दों को उठाते रहते हैं इसके लिए यही कहा जा सकता है कि हमें इस आशा के साथ प्रयास करते ही रहना चाहिए कि एक दिन तो सुबह होगी ही, सूरज निकलेगा ही और तब तेज़ चमकीली धूप हर जगह व्याप्त सीलन को खत्म कर देगी, फफूंद कहीं नहीं दिखेगी, लोग असमय कालकवलित नहीं होंगे.
प्रदीप भाई आपके गुस्से और आशावादी सोच दोनों का स्वागत है।
आजकल फफूंद तो प्रायः समाज के हर वर्ग में लग गई है।
इसे कैसे दूर किया जाए विकराल समस्या है।
संभवत: कोई वैज्ञानिक इसे हटाने का उपकरण ढूंढ लेगा।
इसी आशा के साथ
डॉ •क्षमा पाण्डेय भोपाल मध्यप्रदेश
आजकल फफूंद तो समाज के हर वर्ग में लग
गई है इसे हटाने का उपकरण तो वैज्ञानिक ही खो
ज निकालेंगे।
डॉ •क्षमा पाण्डेय भोपाल मध्यप्रदेश
बढ़िया संपादकीय।
धन्यवाद क्षमा जी।
सार्थक सम्पादकीय लिखी आपने आदरणीय शर्मा जी, फफूँद इतनी ख़तरनाक हो सकती है ये हम सोच भी नहीं सकते। एक बात तो आपने सक्छ कही कि भारत में प्रशासन की फफूँद बहुत नुकसान कर रही है और ये बढ़ती ही जा रही है इसका कोई इलाज निकट भविष्य में तो दिखाई नहीं देता।