संपादकीय - पाकिस्तान के हालात और रवैया 1
सांकेतिक चित्र (साभार : India TV News)

पाकिस्तान के सत्तापक्ष और विपक्ष को इस समय एकता दिखाने की आवश्यकता है। किसी भी पक्ष को इस भयंकर आपदा के समय राजनीति नहीं करनी चाहिये। सत्ता पक्ष को चाहिये के वे पाकिस्तानी सरकारों की बदनाम ख्याति से हट कर इस आपदा के लिये मिलने वाली सहायता की राशि का हिसाब-किताब पारदर्शिता के साथ रखे और उस धनराशि को दुखी जनता की मुसीबतों को कम करने में ही ख़र्च करे। और विपक्ष को इस समय सरकार की आलोचना करने के स्थान पर स्वयं आगे आकर बेघर और बेकार हुए लोगों को हौसला और मदद पहुंचानी चाहिये।

भारत में महाराष्ट्र और कर्नाटक में जिस तरह बाढ़ का प्रकोप दिखाई दे रहा है, उससे हमारा ध्यान अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान की ओर भी जाता है जहां बाढ़ ने 12 वर्षों के बाद एक बार फिर भयंकर उत्पात मचा दिया है। 
कुछ प्रलय का सा अहसास हो रहा है। घर, मकान, दुकानें, सड़कें सब पूरी तरह पानी में डूबे हुए हैं। चारों ओर विनाश का अहसास हो रहा है। पहले ही पाकिस्तान बुरी तरह से कर्ज़ों में डूबा हुआ देश है; उस पर एफ.ए.टी.एफ. की तलवार लटकी रहती है। पाकिस्तान के अपने एंकर चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि उनके प्रधानमंत्री कटोरा लेकर भीख मांगते नज़र आते हैं। उस पर कोरोना ने बची-खुची अर्थव्यवस्था का बेड़ा ग़र्क कर दिया था।
अब यह बला! बाढ़ की वजह से खेती की जमीन का बड़ा हिस्सा डूब चुका है… इससे देश में अनाज, सब्ज़ियां, फल और दूसरे खाद्य पदार्थों की किल्लत हो रही है। 
पाकिस्तान की जलवायु परिवर्तन मंत्री शेरी रहमान के अनुसार, “इस विनाशकारी बाढ़ से देश की 45 प्रतिशत उपजाऊ भूमि का कटाव हो गया। अधिकांश भूमि सिंध के दक्षिणी प्रांत में है, जिसमें से आधी से ज्यादा भूमि अभी भी बाढ़ के पानी से लबालब है। उन्होंने बताया कि इस बाढ़ के चलते पाकिस्तान को अब तक 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 796.8 बिलियन रुपयों का नुकसान हुआ है और 3.3 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं।”
ज़ाहिर है कि पाकिस्तानी नागरिक अपनी सरकार की जम कर बुराइयां कर रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान मौक़े का पूरा फ़ायदा उठा रहे हैं और शाहबाज़ शरीफ़ की सरकार की धज्जियां उड़ा रहे हैं। मगर सच तो यह है कि आपदा इतने भयानक स्तर की है कि विश्व की कोई भी सरकार इस समस्या से निपटने में अपने आपको असहाय पाती।
पाकिस्तान में आई बाढ़ पर अजीब-अजीब सी प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं। एक प्रतिक्रिया के अनुसार “पाकिस्तान में हर तरफ तबाही पसरी है। नदियों के पानी की रफ्तार कम हुई… लेकिन मुसीबतों का अंबार लग गया है। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के लोगों के ऊपर आई ये आफ़त सिर्फ आसमानी नहीं है, इसमें चीन की भी देन है।”
सोशल मीडिया में एक ख़बर डॉन समाचारपत्र के हवाले से भी वायरल हुई कि, “पाकिस्तान में आई इस बाढ़ की वजह वहां के लोगों का नमाज न पढ़ना है।” इस तरह के समाचारों से पाकिस्तान की ख़ासी जग-हंसाई हुई है। हालांकि बाद में यह भी कहा गया कि यह केवल अफ़वाह है। मगर जो नुक़्सान होना था वो तो हो गया। 
एक तरफ़ तो पाकिस्तान दुनिया के सामने मदद की गुहार लगा रहा है, तो दूसरी तरफ़ एक अजब किस्म का रवैया वहां के लोग और सरकार अपना रहे हैं। शायद इसीलिये पाकिस्तान के वित्त मंत्री मिफ्ताह इस्माइल ने भारत से सब्ज़ियों और खाने-पीने की दूसरी चीज़ों के आयात पर लगे प्रतिबंध ख़त्म करने का संकेत दिये थे। 
अब दिक्कत यह है कि भारतीय संसद द्वारा कश्मीर में धारा 370 को समाप्त करने के बाद पाकिस्तान ने कठोर रवैया अपनाया था। उस समय के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारत के साथ सभी प्रकार के व्यापार संबंध समाप्त करने की घोषणा कर दी थी। इमरान ख़ान तो इसी इंतज़ार में बैठा होगा कि वर्तमान सरकार भारत से सहायता ले और तहरीक-ए-इन्साफ़ सड़कों पर निकल आए।
मिफ़्ताह इस्माइल ने माना कि पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर फसलों को बर्बादी हुई है और सब्ज़ियों जैसी रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों के दाम आसमान छू रहे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में वित्त मंत्री मिफ्ताह इस्माइल ने सवालों के जवाब देते हुए कहा कि उन्होंने वाणिज्य और वित्त सचिवों से भारत से खाने-पीने की चीज़ें मंगाने के प्रस्ताव पर विचार किया है। अगले कुछ दिनों में वो इस पर प्रधानमंत्री के साथ बातचीत करेंगे। लेकिन आयात शुरू करने से पहले कैबिनेट की मंज़ूरी लेनी होगी।
बस यहीं पेंच फंस गया और मामला अधर में अटक गया। पाकिस्तान ने दुबई और अन्य देशों से सब्ज़ियां और अनाज मंगवाना शुरू कर दिया – चाहे वहां से भी भारतीय सब्ज़ियां ही दुगने दामों पर पाकिस्तान पहुंच रही थीं। भारत से तो सड़क के रास्ते सीधा सामान पहुंच सकता था – न कोई हवाई मार्ग और न ही समुद्री। 
पाकिस्तान का एक वीडियो फ़ेसबुक पर ख़ासा वायरल हुआ है जिसमें कुछ लोग बलोचिस्तान के राज्य कलात में टमाटर सड़कों पर फेंकते और कुचलते हुए दिखाई दे रहे हैं। पता चला कि ईरान ने पाकिस्तान की सहायता के लिये टमाटरों की एक खेप भेजी। मगर कट्टरपंथी सुन्नी लीडरों ने एक शिया देश ईरान से टमाटर लेने से इन्कार कर दिया। यानी कि अब टमाटर भी शिया और सुन्नी होने लगे। कहा जाता है न विनाश काले विपरीत बुद्धि!
ट्विटर पर लोग इस घटना पर हैरानी भी ज़ाहिर कर रहे हैं। गल्फ़ टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक कई किसानों ने क्वेटा-कराची नेशनल हाई-वे ब्लॉक कर दिया जिससे ईरान से आ रहे ट्रकों की आमद रोकी जा सके। साथ ही ईरान से आए ट्रकों से टमाटर की पेटियां निकालकर सड़कों पर फेंक दी गयीं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, क्वेटा बलूचिस्तान के जमींदारों का कहना है कि उनकी फ़सल बाज़ार में आने के लिए तैयार है, ऐसे में वे ईरान से टमाटर का आयात नहीं होने देंगे। यहां के जमींदारों की फसल तैयार होने के बावजूद प्याज और टमाटर का आयात करना प्रदेश के जमींदारों को आर्थिक नुकसान पहुंचाने जैसा है।
शेरी रहमान के वक्तव्य के बाद अब पाकिस्तान सरकार को डर लग रहा है कि देश को लगभग 40 अरब डॉलर के नुक्सान होने का अनुमान है। राहत और पुनर्वास कार्यों की निगरानी और समन्वय के लिए स्थापित एक संयुक्त नागरिक-सैन्य निकाय और एन.एफ.आर.सी.सी. के अध्यक्ष, इकबाल ने कहा है, ‘हम विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक, प्रांतीय और संघीय सरकारों की मदद से बाढ़ से हुए नुकसान के व्यापक आकलन की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।’
अमरीका ने मंगलवार को पाकिस्तान को 30 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता देने का ऐलान किया है। वर्तमान संकट की वजह से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को भी बड़ा झटका लगा है। इस संकट से बचने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री दुनिया भर से मदद मांग रहे हैं… वहीं कुछ देश पाकिस्तान की मदद करने के लिए आगे आए है. साथ ही अमरीका ने यह मदद पाकिस्तान में आयी आपदाओं से लड़ने के लिए की है क्योंकि यह पाकिस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी बाढ़ आपदा है।
अमेरिकी विदेश मंत्री टोनी ब्लिंकन ने कहा भी है कि, ‘इस मुश्किल घड़ी में हम पाकिस्तान के साथ खड़े हैं… “जिस तरह पाकिस्तान भयानक विनाशकारी बाढ़ से पीड़ित है, संयुक्त राज्य अमेरिका – यूएस.एआईडी के माध्यम से- भोजन, सुरक्षित पानी और आश्रय जैसी महत्वपूर्ण मानवीय सहायता के लिए 30 मिलियन अमरीकी डॉलर प्रदान कर रहे है.”
कई देश इस संकट में पाकिस्तान को सहायता प्रदान करने के लिए आगे आए हैं। पाकिस्तान और संयुक्त राष्ट्र ने 16 करोड़ डॉलर के प्रारंभिक वित्त पोषण के लिए अपील जारी की है, जिसमें से कई देशों की ओर से 15 करोड़ डॉलर की सहायता का संकल्प जताया गया है।
संयुक्त राष्ट्र के केंद्रीय आपातकालीन प्रतिक्रिया कोष के अलावा अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जापान, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर मुख्य दानदाताओं में शामिल हैं।
खबर में संयुक्त राष्ट्र के स्थानीय एवं मानवीय समन्वयक जूलियन हार्निस के हवाले से कहा गया, हम आर्थिक सहायता जुटाने के अभियान में काफी सफल रहे हैं और मौजूदा परिस्थितियों में 15 करोड़ डॉलर की सहायता के लिए संकल्प जताया जाना अहम है। त्वरित अपील के तहत अब तक केवल 3.8 करोड़ डॉलर की सहायता प्राप्त हो सकी है।
पाकिस्तान के सत्तापक्ष और विपक्ष को इस समय एकता दिखाने की आवश्यकता है। किसी भी पक्ष को इस भयंकर आपदा के समय राजनीति नहीं करनी चाहिये। सत्ता पक्ष को चाहिये के वे पाकिस्तानी सरकारों की बदनाम ख्याति से हट कर इस आपदा के लिये मिलने वाली सहायता की राशि का हिसाब-किताब पारदर्शिता के साथ रखे और उस धनराशि को दुखी जनता की मुसीबतों को कम करने में ही ख़र्च करे। और विपक्ष को इस समय सरकार की आलोचना करने के स्थान पर स्वयं आगे आकर बेघर और बेकार हुए लोगों को हौसला और मदद पहुंचानी चाहिये।  
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

16 टिप्पणी

  1. कहते हैं, जैसा किसी के साथ करेंगे वैसा जल्दी या देर वापस लौट के आयेगा। संपूर्ण विश्व के लिए आतंकवाद के बीज बोले वाले देश का अपना भला कैसे होगा? जिस देश की आधारशिला घृणा और नफ़रत रही, उसे किसी की दया का भी हक़ नहीं होना चाहिये।
    यदि उस देश या जाति में ‘कोई वास्तव भलामानुस है’, तो ईश्वर उसकी रक्षा करे। अपनी दुर्दशा के लिए ये देश स्वयं उत्तरदायी है। अतः भारतीय होने के कारण, हृदय से सहानुभूति महसूस नहीं होती।
    पाकिस्तान की विस्तृत जानकारी देते हुए एक श्रेष्ठ संपादकीय के लिए हार्दिक धन्यावाद।

    • शैली जी इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद। दरअसल पुरवाई की सहानुभूति उन लाखों लोगों के साथ हैं जो प्रकृति की मार झेल रहे हैं।

  2. In your Editorial of today your emphasis on the Governing Party and the Opposition Party coming together to face the flood crisis in Pakistan is very valid indeed.
    It is very unfortunate that Pakistanis are spurning at the tomatoes sent by Iran with a high population of Shia Muslims and crushing them on the roads while also not allowing the trucks carrying to move forward.
    Your detailed study of this misfortune and damage caused by the floods and the aid supplied by Western countries is laudable.
    Regards
    Deepak Sharma

  3. बाढ़ की भीषण स्थिति की विस्तृत और विश्लेषणात्मक जानकारी देता संपादकीय….बाढ़ के विषय में पाकिस्तान में आई टिप्पणी वाकई हास्यास्पद है

    • धन्यवाद जया। प्रयास किया है कि बिना किसी पूर्वाग्रह के हालात की जानकारी पुरवाई के पाठकों तक पहुंचाई जा सके।

  4. पाकिस्तान अपने किए की ही सज़ा काट रहा है, कोई मदद करके भी उसे नही बचा सकता जैसा कि टमाटर के बारे में आपने लिखा है, विपक्षी एकता न भारत में हो सकती और न पाकिस्तान में इसलिए ये मुद्दा ही नहीं है, अपने बड़े भाई भारत की सरपरस्ती में जिस दिन आ जाएगा बच जाएगा, जितना दूर जाएगा खत्म होता जायेगा, जो करना है उसे ही करना है, हम आप चिंता करके भी कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उसे खुद अपनी चिंता नहीं

  5. पाकिस्तान के सत्तापक्ष और विपक्ष को इस समय एकता दिखाने की आवश्यकता है। किसी भी पक्ष को इस भयंकर आपदा के समय राजनीति नहीं करनी चाहिये।

  6. क़ुदरत ने कोविड जैसी महामारी दिखाई जिसमेंदुनिया भर का इंसा अपनी जान बचाने का उपाय ढूंढ रहा था ,इसके बाद भी अगर किसी देश के सत्ताधारी विपदाओं की आड़ में अपने लाभ और सिर्फ राजनैतिक दुश्मनी निकाल लेने के अवसर ढूंढ रहे हों तो इससे दुखद क्या हो सकता है ।ख़ुदा भी ज़मीं पर उतर आए तो सोचेगा कि इनकी कैसे मदद करूँ जो अपनी ही मदद नहीं कर सकते ।
    सम्पादकीय मानव हित और उसकी रक्षा के तरीकों की खोज है ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  7. आपका सम्पादकीय पाकिस्तान के आम आदमी के भले व रक्षा की सार्थक बात कर रहा है। हम भारतीय तो वैसे भी मानवीय आधार पर ही “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” की भावना रखते हैं, फिर वो चाहे दोस्त हो या दुश्मन।
    इतनी विशाल आपदा के समय भी शिया सुन्नी के बीच फैली नफ़रतों को पाकिस्तान तरह दे रहा है, यह उसके लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।

  8. सुंदर, सार्थक और ज्ञानवर्द्धक सम्पादकीय! जितने विस्तार से पाकिस्तान की स्थिति और उस संदर्भ में विश्व के कुछ देशों के सहयोगी व्यवहार रेखांकित हैं, उससे कहीं अधिक चिंतन के लिए स्पेस उपलब्ध है। इस बार का संपादकीय देर तक भीतर गूँज पैदा किए रहा। सोच ज़ारी रही। अर्थों के कई द्वार खुलते,बंद होते रहे… इस विशेष प्रस्तुति हेतु हार्दिक अभिनंदन!

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