Saturday, May 18, 2024
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संपादकीय – किराये पर परिवार…!

साभार : Cinema axis

अब जापान में किराये के रिश्तेदार मिलने लगे हैं। डेली वेज वाले कलाकार भी हैं। जो दिन में परिवार के सदस्य की एक्टिंग करते हैं और शाम को अपनी दिहाड़ी के पैसे अपनी जेब में डाल के वापिस घर को निकल लेते हैं। यह कलाकार चर्च में साथ जाने के लिये, किसी पार्टी में परिवार बनने के लिये, स्कूल में विद्यार्थी के अभिभावक बनने के लिये यानी कि किसी भी किरदार को निभाने को तैयार होते हैं बस दाम सही मिल जाने चाहिये।

मुझे याद है कि मैंने फ़ेसबुक पर एक बार एक पोस्ट लिखी थी। पोस्ट एक ऐसी महिला के बारे में थी जो कि डिमेन्शिया की शिकार थी और उसे अपने घर का पता भूल गया था। वह महिला (अंग्रेज़) मेरे निकट आ कर बोली कि वह अपना घर नहीं ढूंढ पा रही। उससे ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था। मगर उसे अपने घर का पता याद था। उसके चेहरे की घबड़ाहट साफ़ बता रही थी कि वह कितनी परेशान है।
यहां लन्दन में अकेलापन किसी बीमारी से कम नहीं होता… जो अकेलेपन का शिकार है वह तो बीमार होता ही है मगर उसके अकेलेपन को देख कर महसूस करने वाले की आंखें गीली हुए बिना नहीं रह पातीं।  मैनें अपने स्मार्ट फ़ोन से उसके घर का पता ढूंढ लिया और उसे उसके घर पहुंचा दिया। अपने घर को भूल जाने का दर्द तब पहली बार महसूस किया…
यह अकेलापन ब्रिटेन और यूरोप तक सीमित नहीं है। अब इसे भारत के महानगरों में भी महसूस किया जा सकता है। सच तो यह है कि मुझे स्वयं अकेला रहने का अभ्यास है मगर मैंने इस अकेलेपन को एकांत में परिवर्तित कर लिया है। मुझे एक वैश्विक परिवार की अनुभूति मेरे वो तमाम मित्र और शोधार्थी देते हैं जो निरंतर मुझ से संपर्क बनाए रखते हैं और पल भर के लिये भी मुझे अकेला महसूस नहीं करने देते।
पिछले सप्ताह अकेलेपन के मसले पर अपनी बेटी आर्या के साथ बातचीत हुई तो हमारी सोच एकदम नई दिशा की ओर बढ़ चली। इस बातचीत ने मुझे इस विषय पर बहुत से देशों के बारे में सोचने और खोजने पर विवश कर दिया।  इस खोज ने मुझे ख़ासा हैरान भी किया जब मैंने पाया कि जापानी लोग इस सिंड्रोम के सबसे अधिक शिकार हो रहे हैं।
जापान में अकेले रहने का चलन इतना बढ़ चुका कि अब वहां पारिवारिक ढांचा बुरी तरह से चरमरा रहा है… लगभग ख़त्म हो रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन एंड सोशल सिक्योरिटी का डेटा कहता है कि साल 2040 तक जापान के 40 प्रतिशत से ज्यादा घरों में सिंगल लोग होंगे, जो शादी की औसत उम्र पार कर चुके होंगे। परिवार के नाम पर उनके पास बूढ़े माता-पिता होंगे। ऐसे ही अकेले लोगों के अकेलेपन को दूर करने के लिये जापान में रेंटल-फैमिली बिजनेस चल पड़ा है। इसमें किराये पर परिवार के सदस्य मिल सकते हैं।
मुझे 1958 की बी.आर. चोपड़ा की फ़िल्म ‘साधना’ की याद सबसे पहले आई जिसमें सुनील दत्त प्रो. मोहन की भूमिका निभाते हैं। प्रो. मोहन अपनी माँ की ज़िद पूरी करने के लिये एक पत्नी रजनी (वैजयन्ती माला) किराये पर ले आता है। मगर यह एक इमोशनल फ़िल्म थी जिसमें स्थान-स्थान पर तनाव महसूस किया जा सकता था।
इसी साल रिलीज़ हुई एक फ़िल्म ‘ट्रायल पीरियड’ में जेनेलिया डिसूजा का पुत्र अस्थाई पिता मंगाने की मासूम सी मांग रखता है।  बेटे की ज़िद के बाद जेनेलिया मानव कौल को किराये का पिता बनाकर घर पर लाती है और ऐसा कुछ करने को कहती हैं कि उनका बेटा मानव को बिल्कुल पसंद ना करे। लेकिन हो जाता है इससे उलट और कहानी यही से अलग मोड़ ले लेती है। यह एक कॉमेडी फ़िल्म है, भारत का सामाजिक सच नहीं।
जापानियों में काम को लेकर एक तरह का पागलपन देखा जा सकता है। यहां तक कि बहुत अधिक काम करने के चक्कर में बहुत सी मौतें भी होने लगी हैं। इसके बाद भी जापान में युवा से लेकर बूढ़े तक – सभी लगातार काम किए जा रहे हैं। वे न तो परिवार को वक्त दे पाते हैं, न ही उन्हें परिवार बनाने की फुर्सत है। यही वजह है कि वहां परिवार नाम की संस्था लगभग समाप्त होने की कगार पर है।
इसलिये अब वहां किराये के रिश्तेदार मिलने लगे हैं। डेली वेज वाले कलाकार भी हैं। जो दिन में परिवार के सदस्य की एक्टिंग करते हैं और शाम को अपनी दिहाड़ी के पैसे अपनी जेब में डाल के वापिस घर को निकल लेते हैं। यह कलाकार चर्च में साथ जाने के लिये, किसी पार्टी में परिवार बनने के लिये, स्कूल में विद्यार्थी के अभिभावक बनने के लिये यानी कि किसी भी किरदार को निभाने को तैयार होते हैं बस दाम सही मिल जाने चाहिये।
सच तो यह है कि अब यह एक उद्योग का रूप धारण करता जा रहा है। अलग-अलग रिश्तेदारों के लिये पूरे कैटेलॉग तक उपलब्ध हैं। भिन्न श्रेणियों के लिये किराये भी कम या ज़्यादा हैं। बूढ़े मां या बाप की देखभाल के लिये (जीवन) साथी की ज़रूरत हो या फिर स्वयं बूढ़े लोग किसी जवान बेटे बेटी का सहारा ढूंढ रहे हों… तमाम तरहे के विकल्प उपलब्ध करवाए जा सकते हैं।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि यहां लोग कुछ घंटो के लिए दोस्त तक किराये पर लेते हैं जिनके साथ वे थोड़ी देर बातचीत ही कर सकें या फिर कुछ वक्त बिता सकें। यहां रोमांटिक साथी भी किराये पर मिलते हैं। किराये के लिए ऐसे पति-पत्नी भी उपलब्ध होते हैं जिन्हे बच्चों के साथ कहीं दावत वगैरह में ले जाना हो। लोगों की पसंद नापसंद का ख्याल रखा जाता है और यहां तक कि भावनात्मक सामग्री तक विकल्पों के तौर पर दी जाती है।
ज़ाहिर है कि हम सोचेंगे कि किसी भी देश में अचानक यह स्थिति कैसे उत्पन्न हो गई। सच तो यह है कि इसकी शुरुआत तब हुई थी जब जापान में शहरी-करण तेज़ी से बढ़ रहा था और युवा नौकरी करने के लिए अकेले ही शहरों में रहने आने लगे थे। ऐसे लोगों के लिए रिश्तेदारों की सुविधा देने से शुरुआत हुई और आज यह काम बहुत सारी कम्पनियां सफल बिज़नस के तौर पर कर रही हैं। यहां केवल दो हजार येन में ही कुछ घंटों के लिए माता, पिता, भाई, बहन आदि किराये पर मिल जाते हैं। इस कारोबार में भी अकेले रहने वाले युवा ज्यादा हैं जो कमाने के साथ परिवार के माहौल को खुद को परखना चाहते हैं।
इस बिज़नस में सबसे सफल कंपनी जो अधिकांश रिश्तेदार उपलब्ध करवा देती है उसका नाम है ‘फ़ैमिली रोमांस’। पिछले कुछ सालों में इसने ख़ासी लोकप्रियता हासिल की है। कंपनी के सी.ई.ओ. इशी युइची एक मध्यम आयु वर्ग के व्यक्ति हैं। उनकी एक महिला मित्र थी जो कि एक ‘सिंगल मदर’ यानी कि ऐसी माँ थी जिसका पति उसके साथ नहीं था। उनकी मित्र ने इशी युइची को बताया कि उसके ‘सिंगल मदर’ होने की वजह से उसके पुत्र पर ख़ासा नकारात्मक असर पड़ रहा है।  एक टीवी इंटरव्यू में उस महिला मित्र ने बताया कि जब उसके दोस्त ने उसके बेटे का पिता होने का किरदार निभाना शुरू किया तो बच्चे पर तो असर दिखाई दिया ही बल्कि उसके बेटे की किंडरगार्डन समिति के रुख में भी परिवर्तन दिखाई देने लगा। इसके बाद ही दोनों ने सोचा कि इसे एक व्यवसाय का रूप भी दिया जा सकता है।
अब ‘फ़ैमिली रोमांस’ कंपनी का ख़ासा विस्तार हो चुका है। मगर कंपनी ने कुछ बुनियादी नियम भी बना रखे हैं। एक व्यक्ति एक समय में केवल पांच परिवारों के लिये ही भूमिका निभा सकता है। और उन्हें इस झूठे रिश्ते की बात को छिपा कर भी रखना होगा। यही काम युईची को सबसे अधिक मुश्किल काम लगता है। जिन बच्चों को समझा दिया गया है कि अमुक व्यक्ति उनका पिता है, उसे यह भूमिका तब तक निभानी होगी जब तक असली माता या पिता सबके सामने सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार न हो जाएं।
हमें याद रखना होगा कि मानवीय संपर्क का अभाव अपने आप में एक जेल की तरह का आभास दे सकता है। जो लोग ऐसी स्थितियों से पीड़ित होते हैं वे अक्सर निराश महसूस करते हैं और अवासद में पड़ जाते हैं। यही आगे चलकर बीमारी का कारण बन सकता है और व्यक्ति की उम्र कम कर सकता है। यह चलन जापान में कुछ इस कदर बढ़ गया कि किराये के परिवार का उद्योग एक सच्चाई के रूप में उभर कर सामने आ गया।
एक व्यक्ति जिसने अपने लिये पत्नी और बेटी किराये पर ली थी, उनके साथ रहता ख़ुश महसूस कर रहा है। जब तक उस व्यक्ति से उसके असली परिवार की बात न की जाए तो वह उसके चेहरे पर निरंतर प्रसन्नता दिखाई देती है। सच तो यह है कि उसकी पत्नी की एक लंबी बीमारी के बाद कई साल पहले मृत्यु हो गई थी। उसके बच्चे उससे अलग हो गए और वह रह गया अकेला… ऐसे में ‘फ़ैमिली रोमांस’ ने उसे पत्नी और बेटी किराये पर देकर उसके जीवन में ख़ुशियों के रंग भर दिये।
इशी युइची स्वयं भी एक एक्टर है। वह क्ई वर्षों से एक 12 वर्षीय लड़की के पिता का किरदार निभा रहा है। उस लड़की के पिता की मृत्यु ऐसी उम्र में हो गई थी कि लड़की को उनका चेहरा तक याद नहीं है। उसके लिये इशी युइची ही पिता है।
यदि ग्राहक कभी भी सच्चाई प्रकट नहीं करता है, तो उसे यह भूमिका अनिश्चित काल तक जारी रखनी होगी। अगर बेटी की शादी होती है तो उसे पिता बनना होगा, और फिर किसी दिन नाना का किरदार भी निभाना पड़ सकता है। इसीलिये ग्राहक से यह पहले ही पूछ लिया जाता है, “क्या आप इस झूठ को लंबे समय तक छिपाए रखने के लिये तैयार हैं?”
‘फ़ैमिली रोमांस’ का बिज़नस कुछ इस क़दर फैल गया है कि पांच वर्ष पहले तक युईची ने 2,500 से अधिक एक्टरों को इस काम के लिये नौकरी दे रखी थी। ज़रा सोचिये सिनेमा में जब कलाकार इकट्ठे काम करते हैं तो कितने किस्म के विवाद जन्म लेते हैं… कितनी अफ़वाहें उड़ती हैं… कितनी दुश्मनियां पैदा होती हैं। यहां तो कोई थियेटर की स्टेज या सिनेमा का सैट नहीं होता है… सीधा-सीधा जीवन होता है और उस जीवन में करनी होती है जीवंत अदाकारी। एक्टर अपना जीवन तो जी ही नहीं सकता, वह निरंतर एक्टिंग करने के लिये अभिशप्त है।
हम इन्सानी रिश्तों के बारे में जितना कुछ जानते हैं, इससे एक बात तो साफ़ ज़ाहिर है कि जापानी समाज के लिये यह स्थिति ख़ासी कष्टदायक है। मगर इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि ऐसे कठिन हालात में इन्सानी भावना को जीवित रखने के लिये यही एक ठीक रास्ता है। आजतक किसी प्रकार का अध्ययन नहीं किया गया है ऐसे रिश्तों का इन्सानी सोच और फ़ितरत पर क्या असर हो सकता है। मगर एक बात तो सच है कि यदि ऐसे किराये के परिवार इन्सानी अकेलेपन का इलाज साबित हो सकते हैं तो इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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46 टिप्पणी

  1. बहुत ही मर्मस्पर्शी संपादकीय तेजेन्द्र जी, मित्र, भारतीय दर्शन विश्वगुरु ऐसे ही नहीं कहा जाता था , अर्थ ( धर्म अर्थ, काम, मोक्ष,वाला) में मात्र धन नहीं था धन संबंधी बातों को वित्त से संबोधित किया जाता रहा है। अर्थ एक विशाल विषय था ,मनुस्मृति अर्थ तंत्र की पुस्तक है वैसे ही चाणक्य जिसने अर्थ शास्त्र कौटिल्य नाम से लिखा , इन सब में एक व्यवस्थिक सामाजिक ढांचे की परिकल्पना कर उसका जैसे निर्माण बो तक बताया । संयुक्त परिवार उसी की देन है। यह एकाकी पन जिसकी चर्चा आपने की और जो भुक्तभोगी हैं वे जान सकेंगे कि संयुक्त परिवार का महत्व। हम भारतीय खास कर अपर वर्ग आज दिशाहीन मात्र एक संतान के समर्थन में हैं और किसी की क्या बोलूं मेरे तेन बढ़ते बेटियों में सबके एक एक लड़की है और कि बात करने से कहते हैं किनके को पाल लें तो बड़ी बात। ऐसे में संयुक्त परिवार तो समाप्त हो गया और फिर जब एक लड़किनससुराल चली जाएवी तो यह एकाकीपन दूर करने को कोई सहारा तो चाहिए होगा। तब क्या उपाय किराए के परिवार लाएं या कुछ अन्य उपाय करें। आपने लेखन में अपने को व्यस्त कर एकाकीपन पर कुशलता से विजय पा ली ऐसे सब तो नहीं हो सकते। सारे प्रश्नों के मूल में न्यूनतम परिवार का होना ही है। नमन।

    • सुरेश सर, आपने हमेशा की तरह परंपराओं को जोड़ते हुए संपादकीय के अर्थ समझाए हैं। आपकी टिप्पणी तो हमें जीवन को समझने में सहायक सिद्ध होती है। हार्दिक आभार।

  2. मानवीय रिश्तों में नाटकीयता का प्रवेश । कहते हैं घर -परिवार रिश्तों की महक से सुवासित रहता है । नकली फूल की सुगंध भी नकली ही होगी जो स्थाई नहीं होगी।
    फिर भी, क्षणिक ही सही, यदि कोई अकेली आत्मा सुकून पा जातीं हैं तो इसे भला ही कहा जायेगा। लेकिन इस प्रवृत्ति के दूरगामी परिणाम एक स्वस्थ समाज की दृष्टि से भले नहीं होंगे। कृत्रिमता और वास्तविकता के अंतर को समझना ही होगा।
    भारत में कई कारणों से संयुक्त परिवार की प्रथा समाप्त सी हो रही है। “हम दो-हमारा एक” -इस सोच के चलते अनेक रिश्ते भी समाप्त होते जा रहे हैं । उस एक बच्चे की संतानों के लिए बुआ, मौसी,चाचा,ताऊ जैसे रिश्ते तो होंगे ही नहीं। सोचनीय बात यह भी है कि एक एक संतानें हैं , फिर भी जनसंख्या विश्व में पहले स्थान पर है। कारण का निवारण यहां भी होना चाहिए।
    अकेलेपन से गहन व्यथा और क्या होगी! इससे बचने के उपाय सोचने ही होंगे – जहां नाटक न हो,सब सत्य हो, सुखद हो।
    संपादकीय में इस बिंदु को उठाकर आपने सभी को सोचने के लिए प्रेरित किया, इसके लिए साधुवाद!

    • रचना जी जापान में कोई भी इन रिश्तों में स्थाई सुगंध नहीं ढूंढ रहा। समाज के हालात ऐसे हो गये हैं कि इस समस्या में से कुछ लोगों ने अपने लिये बिज़नेस का एंगल ढूंढ लिया है। यदि सब सत्य रह पाता तो भला इस नाटक की आवश्यकता क्यों रहती। हर भाषा में मौसी, बुआ, चाचा, ताऊ नहीं होते… कहीं कहीं केवल अंकल और आंटी होते हैं।

  3. संपादक महोदय
    सुबह-सुबह ऐसा मार्मिक संपादकीय पढ़कर मन विचित्र भावों से भर गया है! समझ में ही नहीं आ रहा है कि इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया दें,!बस मुझे आनंद फिल्म का जॉनी वाकर द्वारा बोला गया संवाद याद आ रहा है,”यह दुनिया एक रंग मंच है जहांपनाह!”
    जापान कि इस स्थिति ने सारी दुनिया को सचमुच रंगमंच और हर मनुष्य को अपने चेहरे पर दूसरा चेहरा लगाए हुए एक कलाकार बना दिया है। अपना वास्तविक जीवन जीने के लिए किसी के पास जीवन में समय ही नहीं है।
    हमें तो बस राम झरोखे बैठकर सबका मुजरा ही लेना है!
    “अपनी तो ऊपर- नीचे थोड़ी आगे या पीछे कट जाएगी
    अगली पीढ़ी का क्या होगा ओ जनाबेआली”

    • सरोजिनी जी इस मज़ेदार टिप्पणी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया। आपको संपादकीय ने विचित्र भावों से भर दिया औ आपने सवाल पूछ लिया अगली पीढ़ी का क्या होगा जनाब-ए-आली… आभार।

  4. बेहद विचारणीय विषय और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े वे सवाल जिनका जवाब हमारी लाइफ स्टाइल में ही कहीं छुपा हुआ है

  5. माना आपके पास पैसे हैं, पर किराये पर क्या क्या खरीदोगे? आपने साधने फिल्म का जिक्र किया जीसे मैंने हाल ही मे देखा है । वहाँ तो किराये कि आई हुई लड़की पत्नी बन गई पर वास्तव में अपने अपने नहीं हो पाते तो किराये के क्या होंगे ? कोई भी रिश्ते तो निभाना पड़ता है और वोह ही कम होता जा रहा है । ज्यादातर सोच यही है कि इसमे मेरा लय लाभ है । ऊपर से अगली पीढ़ी में कम बच्चे हो रहे हैं जिससे परिवार वऐसे ही सीमित होते जा रहे हैं। अकलेपन को दूर रखने के लिए जो भी है, उसे संभालों ।

    • बलबीर जी, एक संपादक के तौर पर मैंने अपने पाठकों को जापान के स्थिति से अवगत कराया है। मैं इस स्थिति की वकालत नहीं कर रहा। बस हमें इस बात का ख़्याल रखना है कि भारत में ये स्थितियां न आने पाएं। हम इसे एक वार्निंग की तरह समझ लें।

  6. इन्सान एक ऐसी चीज़ है जो कभी खुश या संतुष्ट हो ही नहीं सकती। सोचने और अविष्कार करने की समझ के चलते। अब अकेलापन या बिखरे परिवार हैरान नहीं करते। जीवन एक चक्र है ऐसे ही घूमता है। जहांँ से चलता है लौट कर वहीं पहुंँचता है। कुछ पीढियांँ किसी भी प्रयोग के परिणाम जानने में लगती हैं। पहले इन्सान पशुओं की तरह अकेला था, फिर साथ रहना सीखा, परिवार बनाया। संयुक्त परिवार बना। फिर न्युकलिर परिवार। उसमें भी घुटन होने पर एकाकी।
    प्रयोग चल रहा है। जब इससे परेशानी होगी तो फिर वही क्रम चलेगा, या सृष्टि समाप्त होगी और नये मानव नवीन संगठन और संरचना इज़ाद करेंगे। हमारे हाथ में कुछ नहीं है सिवाय इसके जो परिस्थिति हो उसका त्वरित निदान और उपचार करें।
    जापान वाले बुद्धिमान हैं। अकेलेपन को दूर करने का त्वरित उपाय (first aid) खोज लिया है। ऐसी व्यवस्था जिसमें बेरोजगारों को रोजगार मिल रहा है। अकेलों को परिवार मिल रहा है। जब कोई चीज़ स्थाई होती है, जिसका विकल्प नहीं होता। वहां घुटन, झगड़े और टूटन होती है। इस स्थिति में विकल्पों की असीम संभावनाएं हैं। सब कुछ अस्थाई है। इसलिए दोनों पक्षों की win win situation है। अभी ये व्यवस्था (?) अच्छी चल रही है कभी दूरगामी हल भी निकलेंगे। जीवन आशा और नए प्रयोगों से चलता है। चलता रहेगा। आप अच्छे-अच्छे सम्पादकीय लिखते रहेंगे। हम पढ़ कर खुश होते रहेंगे। आज एक समस्या पर विचार कर रहे हैं। कल दूसरी निकल आयेगी। जिन्दगी चार दिन की है, हंँसते-रोते कट जायेगी। धन्यवाद।

    • शैली जी ये कोई एक्सपेरीमेंट या प्रयोग नहीं है। जापान में यह एक समस्या है। समस्या में से आपदा में अवसर ढूंढने वाले लोग तो होते ही हैं। यहां भी हैं उन्होंने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए कलाकारों की भर्ती कर ली है और अपना धंधा चला रहे हैं।

  7. अत्यंत संवेदनशील एवं विचारणीय लेख। जब परिवार एवं परिवार से मिलता स्नेह एक बोझ सा लगा, परिवार के प्रत्येक सदस्यों के प्रति कर्तव्य एक बोझ लगने लगा , स्वार्थी लोग इस बोझ को उतारने लगे । रिश्तों का महत्व भूलने पर सामाजिक बंधनों से मुक्त हो गए। अब इस अकेलेपन के लिए स्वयं को दोष दें। और यह किराए का परिवार, यह एक्टिंग, यह अस्थाई सौहार्द से उबना स्वाभाविक है… होना भी चाहिए…। अंततः इससे यदि आत्मज्ञान उदभासित हो जाए तो, पुरे विश्वभर में इस बीमारी का वाइरस न विस्तार ले।

    आपका संपादकीय सदैव एक दिशा -दर्शक है…. आदरणीय सर

    • अनिमा जी आपको हमारे संपादकीय एक दिशा-दर्शक लगते हैं, यह जान कर तसल्ली हुई। यह संपादकीय इसीलिये लिखा गया है ताकि यह वायरस और देशों में न फैलने पाए। आपका हार्दिक आभार।

  8. मानव जीवन के आयाम को छूता एक और चौंकाने वाला कड़वा और मुँह बाये यक्ष प्रश्न?
    व्यक्तिगत महत्त्वआकांक्षाओं का सुरसा edition है किराये के रिश्ते और परिवार।
    इस मानवीय पहलु को micro/ सूक्षम अंदाज़ में बंया करने के लिए आदरणीय तेजेंदर शर्मा जी को बधाई।

  9. विचारणीय लेख है। समस्या हमारी पीढ़ी ने उपजाई है क्योंकि हमारे दादा-नाना संयुक्त परिवार में रहते थे। हमारा बचपन संयुक्त परिवार में बीता। एक- दो बच्चे और एकाकीपन हमने आने वाली पीढ़ी को दी। उन्हें बचपन से अच्छा इंसान नहीं अपितु अमीर बनने की घुट्टी पिलाई..यह एकाकीपन हमारी बोई फसल है हमें ही काटनी और पचानी है

  10. आदरणीय तेजेंद्र जी!
    आपके संपादकीय का हेडिंग हमेशा ध्यानाकर्षित तो करता ही है साथ ही आश्चर्यचकित भी करते हुए पढ़ने की भी जिज्ञासा और उत्सुकता को बढ़ा देता है।

    वैसे अकेले होने और अकेलेपन में बहुत अंतर होता है ।कई बार ऐसा होता है कि इंसान अकेला रहकर भी अकेला नहीं होता और कई बार भीड़ में रहकर भी अकेलेपन की पीड़ा से ग्रसित रहता है। यह मानवीय प्रकृति वह स्थितियों पर निर्भर करता है। जाहिर है कि अकेला होना बुरा नहीं है,अकेले रहते हुए इंसान अपने आप को व्यस्त रख सकता है पर अकेलापन अधिक तकलीफदेह है।पाश के शब्दों का प्रयोग करें तो यह एक मुर्दा खामोशी की तरह होता है जो गहन अवसाद की ओर ले जाता है।यह शायद डिप्रेशन के आगे की स्थिति है जो अवसाद के परिणाम की ओर इंगित करती है।
    संपादकीय को पढ़कर यह प्रश्न अचानक ही मन में उठा कि ऐसी स्थिति बनी ही क्यों?
    विदेश में रहने वाले अपने रिश्तेदारों और विशेष तौर पर विदेश में रहने वाले अपने विद्यार्थियों से ,जो फेसबुक और व्हाट्सएप पर हमसे जुड़े हुए हैं, उनसे पता चला कि रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता वहांँ की मिट्टी में उतनी और वैसी नहीं है जैसी भारत में है। यह संस्कृति की भिन्नता भी हो सकती है। कहीं-कहीं तो बालिग होने के बाद बच्चों को अपने माता-पिता से अलग ही रहना पड़ता है। यह सोचकर ही आश्चर्य होता है कि अकेले होने को तो वहाँ पोषित ही किया जाता है जिसकी उपज अकेलापन होना किसी हद तक संभावित है।
    अभी 3 वर्ष पूर्व हमारे स्कूल के के प्रथम बैच का भूतपूर्व विद्यार्थी अचानक हमारा पता ढूंँढते हुए हमारे घर आया।हमें आश्चर्य हुआ।वह 2 घंटे बैठा और उसने बताया कि वह 20 साल अमेरिका में रहकर और अब नौकरी छोड़कर हिंदुस्तान लौट आया है। उसने बताया कि उसके बच्चे और पत्नी भी आना चाहते थे आपसे मिलने पर उसे हमसे बहुत सी बातें करनी थी इसलिए अगली बार का वादा कर वह अकेले ही आया था ।उसने कहा कि उसे हमसे बहुत सी बातें करनी हैं ।वह 2 घंटे अपनी बात सुनाता रहा और हम सुनते रहे। यह सुखद व आश्चर्यजनक पल थे!
    जब हमने उससे पूछा कि लौटने का कारण क्या है, तो उसने बताया कि “आपने जो कुछ हमें सिखाया और जो संस्कार दिए मैं चाहता हूंँ कि वह सब मैं अपने बच्चों को दे पाऊंँ। मेरे बच्चे भी उतनी ही अच्छी हिंदी सीख पाएँ और अपनी संस्कृति से जुड़ पाएँ, जिस तरह मैं जुड़ा हूंँ और वह सब हिंदुस्तान में रहकर ही संभव हो सकता था।”
    हमें विश्वास नहीं हो रहा था कि यह वही संदीप है जो क्लास में बहुत अधिक वाचाल था ।हमेशा लड़कियों से लड़ता रहता था और जब कभी मना करो तो कहता था कि “मैडम क्या करें? लड़ने के लिए घर में बहने भी तो नहीं है!” वह हमारे स्कूल का सबसे अच्छा बैच रहा।
    बच्चे जिस माहौल में रहते हैं जो कुछ देखते हैं ,वही बेहतर सीख पाते हैं।
    आज का दिन हमारे लिए खास भी है और अविस्मरणीय भी। आज हमारे साथी को साथ छोड़े 17 वर्ष हो गए । जो साथ जीवन छोड़कर चला जाता है उसका वियोग एक मजबूरी है ,किंतु जीवित रिश्तों के टूटने से सिर्फ रिश्ता ही नहीं टूटता बल्कि बहुत कुछ टूटता है। सर्वप्रथम विश्वास टूटता है और यही सबसे अधिक दर्द देता है,अपनेपन की डोर टूटती है। रिश्तों के टुकड़े किरच-किरच होकर चुभते रहते हैं जीवन पर्यन्त।जो तोड़ता है‌उसे कोई फर्क न पड़ता हो‌ पर‌ जिसे तोड़ा जाता है वह पुनः जुड़ने की उम्मीद लिये हर दिन थोड़ा -थोड़ा टूटता रहता है। जबकि तोड़ने वाला तत्काल फ्री हो जाता है
    भारत इस मामले में अन्य देशों से बेहतर है ,हालांकि निरंतर बढ़ते वृद्ध आश्रम यह प्रमाणित करते हैं कि विदेशी हवा का प्रकोप यहांँ भी फैल रहा है जो बेहद तकलीफदेह है।
    जापान को जितना पढ़ते हुए जाना ,उसके प्रति मन में एक अलग ही छवि थी ;इसलिए जब आपकी संपादकीय पढ़ी तो बेहद दुख हुआ ,यह अविश्वसनीय सा लगा ।”रैंटल फैमिली बिजनेस” अकल्पनीय है। इसे फिल्म में देखना मंनोरंजन की दृष्टि से अच्छा लग सकता है पर वास्तविक जीवन में इसे हल्के में लेकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ।यह वायरल बुखार की तरह हवा में घुल जाएगा। वैश्विक स्तर पर ही इसका निदान आवश्यक है ।कारण ढूंँढकर उसे दूर करना आवश्यक है। इंसान काम करने की चाह में या फिर अधिक पैसा कमाने की चाह में, पूंजीपति बनने की महत्वाकांक्षा में,स्वयं को मशीन ना समझे यह जरूरी है ।जहांँ तक रिश्तों का बिजनेस बनना इसका पूर्ण समाधान नहीं है ।इसके दूरगामी परिणाम ठीक नहीं होंगे संवेदनशीलता अंतर्मन से संबद्ध है ,विक्रय की वस्तु नहीं। जीवित और मृत में अंतर समझना होगा। मशीनी जीवन ,पैसा और परिवार के महत्व को समझना होगा। नकली रिश्ते अगर लंबे समय तक वास्तविक खुशी दे सकें तो अच्छा ही है पर लंबा समय भी क्या उन रिश्तों में उनके प्रति संवेदनाओं को जन्म नहीं दे पाता होगा? प्यार उत्पन्न नहीं कर पाता होगा? इतने में तो जानवर भी अपना हो जाता है फिर तो अपन इंसान हैं ! जापान की इस घटना से बचपन की एक कथा अनायास ही याद आ गई।
    एक बार गुरु नानक देव अपने शिष्यों के साथ एक गांँव में पहुँचे उन्होंने देखा कि वहांँ के लोग बहुत ही दुष्ट प्रवृत्ति के थे। परस्पर मिलकर नहीं रहते थे। आपस में लड़ते- झगड़ते रहते थे !किसी के मन में किसी के प्रति कोई भी अपनापन, दया या करुणा का भाव नहीं था।मानवता से तो मानो किसी का परिचय ही ना था।
    अपने कुछ समय के प्रवास में गुरु नानक जी ने यह सब महसूस किया।जब गांँव से लौटने लगे तो गांँव की ओर मुख करके उस गांँव को बसे रहने का आशीर्वाद दिया।
    आगे चलकर जब वह दूसरे गांँव में पहुंँचे। उस गांँव के लोग बहुत ही सज्जन थे ।उनमें आपस में बहुत अधिक प्रेम था। सब लोग बहुत मिलजुल के रहते थे सभी ने गुरु नानक जी का बहुत अधिक सत्कार किया। गुरु नानक जी जितने दिन वहांँ रहे संतुष्ट व प्रसन्न रहें और जब जाने लगे तो गांँव से बाहर आकर उन्होंने उजड़ जाने का आशीर्वाद दिया।
    उनके शिष्यों को बड़ा आश्चर्य हुआ! उन्होंने गुरु जी से निवेदन किया कि जिस गाँव के लोग अच्छे नहीं थे बुरी प्रवृत्ति वाले थे, उन्हें तो आपने बसे रहने का आशीर्वाद दिया और जिस गांँव के लोग अच्छे थे उन्हें उजड़ जाने के लिए कह रहे हैं। यह बात समझ में नहीं आई।
    तब गुरु नानक ने उन्हें समझाया कि जो लोग दुष्प्रवृत्ति वाले हैं वे अगर वह उजड़ जाएँ तो बाहर जाएंँगे और बाहर जाकर यही गंदगी फैलाएंगे इसीलिए मैंने उस गांँव के लोगों को बसे रहने का आशीर्वाद दिया कि वह एक ही जगह बने रहें यही बेहतर है ;और इस गांँव के लोग अच्छे हैं अगर यह गांँव उजड़ भी गया तो इस गांँव के लोग जहांँ भी जाएंँगे वहांँ अच्छाइयों का ही प्रसार करेंगे, मानव गुणों का ही विस्तार करेंगे इसलिए मैंने इन्हें उजड़ जाने का आशीर्वाद दिया। ताकि अच्छाइयों का प्रसार हो।
    चाहत सिर्फ इतनी है कि जापान का यह ‘रैंटल परिवार बिजनेस ‘ बाजारवाद के प्रभाव से विस्तार पाने के बजाय जापान से भी खत्म हो।उसकी विडम्बना वायरल होकर सब जगह न फैले।
    शुक्रिया आपका तेजेंन्द्र जी! इस महत्वपूर्ण संपादकीय को पढ़वाने के लिये।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपने एक लंबी टिप्पणी के माध्यम से पुरवाई के पाठकों को स्थिति के अन्य पहलुओं से भी अवगत करवाया है। आपका हार्दिक आभार।

  11. आपका ताजा सम्पादकीय पढ़ा जापानी लोगों के अकेलेपन का और उसके समाधान का | सुबह सात बजे से जब से उक्त आलेख पढ़ा है मैं अभी तक सकते में और हूँ किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ | ये कैसी त्रासदी है ? ये कैसा विकास है क्या यही उन्नति और सम्पन्नता है जब धीरे धीरे सरे आपके आपसे दूर चले जाएँ और फिर आपको अपने भी पैसों के बल पर ही जुटाना पढ़े | आपके लेखन ने इस दर्द को बहुत मार्मिक ढंग से उभारा है आधुनिक विश्व की ज्वलंत और अपरिहार्य बुराई | हमारा भारत भी धीमे धीमे उसी और बढ़ रहा है क्या अब भी हम हमारे पुरातन सनातानीय आदर्शों को दकियानूसी कहेंगे जहाँ शांती संतोष बड़े परिवार और कम सुविधा ही जीवन की सफलता के परिचायक थे | आपके एक सम्पादकीय ने कई पहलू उजागर किये कितने ही प्रश्न खड़े कर दिए मुझे याद आये चंडीगढ़ की वे पाश सोसायटी जहाँ दिन भर तो मौन उदास सड़कें दिखती है और शाम को उन सडकों पर चलते या पार्क में बैठे हाथों में छडी लिए कुछ बूढ़े और कुछ कुत्ते | मुझे याद आये दूर दराज आदिवासी इलाकों के वे गाँव जहाँ के सारे युवा आदमी और औरतें मजद्प्प्री करने बाहर जा चूजे हैं और घरो में केवल बीमार , बूढ़े या बच्चें हैं बस |आपका आज का सम्पादकीय बहुत विचलित कर गया आपको बहुत बहुत साधुवाद इस ज्वलंत मुद्दे को साधुनिक विश्व को याद दिलाने के लिए आगाह करने के लिए | धन्यवाद आभार

    • प्रिय भाई महेश जी, आप पर संपादकीय का इतना भावनात्मक असर हुआ, यह सच में इस संपादकीय की उपलब्धि है। यह इसीलिये लिखा है ताकि भारतवासियों को यह प्रेरणा मिल जाए कि हमें इस तरह की स्थिति भारत में नहीं आने देनी। आपका हार्दिक आभार।

  12. Your Editorial of today startles even though it is very interesting.
    The concept of hiring a companion has been a familiar practice with wealthy people like Rajas but hiring a ‘family member’ like a father or a mother( like people in Japan are doing through an agency like FAMILY ROMANCE) is something very sad and difficult to accept here in India.
    It is true the basic need of each human being is to be loved,yet here in India
    people in general are wise enough never to hire a ‘ family ‘ n would rather live without it.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  13. बहुत अच्छा. विचारणीय संपादकीय..समाज में बढते जा रहे अकेलेपन और अवसाद की.स्थिति भयावह हो चली है .भौतिकता की अंधी दौड में सबको पीछे छोड़कर आगे निकल जाने की लालसा ने परिवार की अवधारणा को गहरी चोट पहुंचाई है.और अब जब उपलब्धियों के शिखर पर पहुंच गये तो उस हर्ष और उल्लास को महसूस करने वाला ..अपनी.हर खुशी में.शामिल रहने.वाला परिवार ही साथ नही है ..आज यह स्थिति केवल जापान ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में.भारत में भी.उत्पन्न हो रही है .अभी हाल ही में दिल्ली मे घटित घटनाये साक्षी हैं.यदि परिवार की कमी पूरा करने के लिए ऐसा कोई प्रयत्न किया भी जाता.है .चाहे किराये पर ही सही ..एक दिन परिवार और विवाह का महत्व भी समझा जायेगा ..सकारात्मक रहें.और इस विवशता पर विचार करने की भी जरूरत है.आपका संपादकीय बहुत ही जादुई तरीके से वस्तुस्थिति की पडताल करता है .हार्दिक धन्यवाद आभार भाई..सादर प्रणाम

    • पद्मा जी आपने लिखा है कि “आपका संपादकीय बहुत ही जादुई तरीके से वस्तुस्थिति की पड़ताल करता है।” यदि यह स्थिति भारत में उत्पन्न हो रही है तो यह तो ख़तरे की घंटी कही जा सकती है। हमें प्रयास करना होगा कि यह स्थिति भारत में विस्तार न पा सके।

  14. यह सच में बेहद आश्चर्यजनक है… जो सुखद तो कतई नहीं…. शीर्षक से मुझे लगा व्यंग्य है….. पर टिप्पणी पढ़ कर जिज्ञासा हुई…. लगता है आधुनिकता से उत्तर आधुनिकता और अब इतर आधुनिकता की ओर जा रहा है समाज।….क्या युग पलटने वाला है… स्थितियाँ भयावह नजर आ रही हैँ….. गांव से शहरों की ओर पलायन, शहर से मेट्रोज़ की तरफ…. जो होगा क्या उसे मानवता झेल पाएगी…?.. अभी तक इस बात को पचा नहीं पा रही कि कोई पिता की एक्टिंग करते हुए अपना जीवन गुज़ार देगा…. अकेलेपन से लड़ने के लिए दोगलेपन का सहारा….? और उस पर यह कि हम बहुत धार्मिक होते जा रहे हैँ…. धार्मिक होने की भी हम शायद एक्टिंग ही कर रहे हैँ…. हमारी आने वाली पीढ़ियों को हम क्या दे रहे हैँ…… प्रदूषित पर्यावरण….. जल संकट…. ऊर्जा संकट…. और अब यह संस्कृति संकट……. भारत में परिवार नामक संस्था बहुत सुदृढ़ है….. ईश्वर करे उससे टकराकर यह मुसीबत हमारे देश में बौनी साबित हो….. बहुत उम्दा सम्पदकीय….. बधाई व धन्यवाद…..

  15. मित्र , रुदाली फ़िल्म याद है अपने यहाँ तो काफ़ी पहले से मृत्यु पर रोने वाली भी बुलायी जाती रही हैं

  16. प्रदीप भाई रूदालियां रोने के लिये किराए पर लाई जाती हैं मगर वे परिवार का हिस्सा नहीं बनती हैं। जापान का सिलसिला अलग है। वहां परिवार नाम की संस्था टूट की कगार पर है। मामला गंभीर है और हमारा प्रयास होना चाहिये कि यह समस्या भारत का समस्या न बन पाए।

  17. आपने जापान में बढ़ते अकेलेपन दूर करने के लिए ‘फ़ैमिली रोमांस’ कंपनी का उद्धरण दिया है। जो अकेलेपन से त्रस्त व्यक्ति को एक सदस्य देती है जो उससे बात करके या उस परिवार का सदस्य बनकर उसे परिवार का एहसास कराता है। मुझे लगता है यह समस्या अब सभी विकसित देशों में यहाँ तक कि भारत में भी होने वाली है। आज का युवा कैरियर के लिए बच्चे ही नहीं चाहता। जिसके हैं भी तो सिर्फ एक। बच्चा तो अकेलेपन के अवसाद से गुजरता ही है। ज़ब बच्चा अपने कैरियर के लिए बाहर चला जायेगा तब समय के साथ ऐसे दम्पत्तियों को भी अकेलेपन की विभीषिका से गुजरना पड़ेगा। रिश्ते परिवार की नींव होते हैं लेकिन आज यही नींव खोखली होती जा रही है। अगर समय रहते इंसान नहीं चेता तो उसे रहना भी अकेले ही पड़ेगा तथा मरना भी अकेले ही पड़ेगा।
    आगे आने वाली समस्याओं को दर्शाता विचारोतेजक संपादकीय के लिए बधाई।

  18. जापान की यह स्थिति पूरे विश्व की त्रासदी बन सकती है
    क्योंकि सब जगह यही हो रहा है। आज पढ़ रही हूँ लेकिन आज से कई साल पहले
    मैंने एक लघुकथा लिखी थी कि उधर के बाबा और दादी लेकर ग्रैंड पेरेंट’स
    डे’ पर बच्चों को जाना पड़ा था, जिनमें एक बच्चे की त्रासदी ये थी कि उसके
    पेरेंट्स उसके ग्रैंड पेरेंट्स को पुराने मकान में छोड़ कर आ गए थे और
    दूसरे बच्चे के पिता इतनी जल्दी गाँव से अपने पिता को ला नहीं सकते थे।
    कुछ और भी है कहानी में। उसका जिक्र नहीं करूंगी लेकिन ये जरुर चाहती
    हूँ कि हमारे देश की संस्कृति में समाज संस्था व परिवार संस्था एक
    महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
    आज जो एकल परिवार की बढ़ती प्रवृत्ति ने बुजुर्गों को
    जिस दलदल में फंसा दिया है उसका यही निदान कम से कम हमारे देश में नहीं
    ही हो सकता है। इस तरह तो सृष्टि भी समाप्त हो जायेगी। कब तक जापान में
    ये चलता रहेगा क्योंकि किराये के रिश्तों में कोई संवेदनाये नहीं होती
    है। आज भले माध्यम उम्र के लोग अपने अभिभावकों से अलग रहने में सुख अनुभव
    करते हैं क्योंकि उनकी जीवन शैली उनका कहीं भी कोई स्थान नहीं होता है और
    फिर एक दिन ये किराये के संबंधों को भी अगर जरूरत होगी तो फिर उनके लिए
    शायद नयी फौज तैयार ही नहीं होगी और क्या एक दिन जापान जैसे देशों का
    अस्तित्व समाप्त न हो जाएगा। बिना प्रलय के सर्वनाश हो जाएगा।
    कम से कम अपने देश को तो इससे बचाना होगा।

    • आपने संपादकीय को गहराई से समझते हुए उस पर सार्थक टिप्पणी की है रेखा जी। हार्दिक आभार।

  19. संपादकीय अंश – अब जापान में किराये के रिश्तेदार मिलने लगे हैं। डेली वेज वाले कलाकार भी हैं। जो दिन में परिवार के सदस्य की एक्टिंग करते हैं और शाम को अपनी दिहाड़ी के पैसे अपनी जेब में डाल के वापिस घर को निकल लेते हैं। यह कलाकार चर्च में साथ जाने के लिये, किसी पार्टी में परिवार बनने के लिये, स्कूल में विद्यार्थी के अभिभावक बनने के लिये यानी कि किसी भी किरदार को निभाने को तैयार होते हैं बस दाम सही मिल जाने चाहिये।

    मेरी टिप्पणी – हालांकि इसे खबर के रूप में देखूं तो यह पुरानी हो चुकी है। लेकिन कोई बात या खबर पुरानी होकर भी नई कैसे बनी रह सकती है उसी की बानगी है यह।

    प्रिय Tejendra Sharma सर हर रविवार ThePurvai.com पुरवाई पत्रिका के पोर्टल पर संपादकीय प्रस्तुत करते रहते हैं। समसामयिक विषयों पर आधारित इन संपादकीय पर पुरवाई के ग्रुप में भी चर्चा होती रही है। अब तक जितने भी संपादकीय मैंने पढ़े आपके शायद ही कोई एक दो हैं जिन्हें पढ़ पर अच्छा ना लगा हो।

    90,95 फीसदी आपके संपादकीय दिल को छू जाते हैं। समसामयिक विषयों के इतर राजनीति, आर्थिक, सामाजिक विषयों पर आपकी पकड़ लाजवाब है। लेकिन यह संपादकीय पढ़कर मुझे जरा भी हैरानी नहीं हुई। कारण इसके पीछे मेरी अपनी पारिवारिक परिस्थितियों में भी छुपा हुआ है।

    बल्कि यह तो शुरुआत है और हम सभी ने अपने पूर्वार्ध का प्रतिफल निश्चित तौर पर पाना है। सभी ने अपने अच्छे बुरे किए का किसी ना किसी तरह भुगतान करना ही है। ऐसे में किराए पर परिवार जैसी धारणाएं बन रही हैं या हकीकत में ऐसा हो रहा है तो गलत भी नहीं है।

    अमूमन हर इंसान अपने भीतर से मानवीय मूल्यों को भूलता ही जा रहा है जो कि इसे शास्त्रों की नजरों से जोड़कर देखें तो यह मानवीय मूल्य और अभी गिरेंगे। दुनिया चाहे कितनी भी आशान्वित हो। बड़े बड़े लोग कहे जाने वाले विद्वान या किसी भी विचारधारा के लोग ये कहते रहें की समय बदल रहा है, बदलेगा हम और यह दुनिया बेहतर होगी। तो मैं इस मामले में जरा भी आशान्वित नहीं।

    भारतीय शास्त्रों पर पूरा भरोसा आंख बंद करके किया जा सकता है और जिन्होंने उन्हें पढ़ा है उस आधार पर यह कलियुग की ठीक से शुरुआत भी नहीं हुई है। किराए पर परिवार निश्चित तौर से संपादकीय उम्दा लिखा गया। और आज के हालात को बयां भी कर था है। बल्कि बहुत जल्द भारत में भी ऐसी कंपनियां खुल जाएंगी जहां किराए पर परिवार मिलने लगेंगे।

    बुजुर्ग लोग ऐसे ही नहीं कहते थे – बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया।

    तो जिसके पास पैसा होगा वह रिश्ते भी खरीद लेगा। जो की हमारे भारतीय समाज में भी हर गांव, शहर में आंतरिक रूप से खरीदे ही जा रहे हैं। और परिवार बनाकर करना भी क्या है? हम सब अमर तो है नहीं। इसलिए भी मैं भौतिक सुख की और कम ध्यान देता हूं। हां इतना हो की आप अच्छे से रह खा पी सकें। बाकी जीने के लिए दो रोटी काफी होती है।

    हम इंसान है सम्मान जनक जीवन जी सकें इसलिए ही हम सजग इंसान इसकी कोशिश में रहते हैं। बाकी सब तो मोह, माया, मिथ्या है। केवल खाओ पियो और ईश् गुणगान करो। अंत समय में यही साथ जाना है केवल।
    यहां कोई आपका अपना सगा नहीं। ना मां बाप ना भाई बहन। केवल आपके कर्म आपके सगे होंगे।

    हर हर महादेव ❤️❤️
    (फेसबुक पर भी हुबहू साझा किया गया है)

  20. एक ऐसा संपादकीय जिसको पढ़ने के बाद एकदम संज्ञा शून्य हो गई हूँ, कुछ शब्द निलकते ही नहीं l कुछ कहने की स्थिति में आते ही पहला शब्द निकलता है घोर भौतिक्तावाद या अंधी दौड़ l लेकिन ठहरकर सोचने पर लगता है कि बच्चे बुरे ना भी हों तो भी ग्लोबलाइज़ेशन के इस दौर में वो माता- पिता के साथ रह ही पाए यह हमेशा संभव नहीं है l माता- पिता भी अपना स्नेहिल रिश्तों से बसा बसाया शहर छोड़कर बच्चों के पास हमेशा के लिए चले जाए ऐसा वो चाहते नहीं l वृद्धवस्था का अकेलापन ऐसे भी गंभीर समस्या बन कर उभरता है और इसके समाधान तलाशने ही होंगे l फिर भी किराये के परिवार की अवधारणा से सहमत नहीं हो पा रहीं हूँ l इसका भौतिक कारण ये है कि इसका लाभ केवल पैसे वाले ही उठा सकते हैं l दूसरा कारण ये है कि इसमें दोनों को पता होता है कि भावनात्मक जुड़ाव एक सीमा तक ही रखना है l असली रिश्ते यूँ सोच-सोच कर नाप तोल कर कहाँ बनते हैं l झूठ तो झूठ ही है l अलबत्ता सेवा और टाइम पास कराने वाला कोई मिल जाता है l मुझे कविता वर्मा का उपन्यास “अब तो बेलि फैल गई” याद आ रहा है, जिसमें दुबई में दूसरा परिवार बसा चुके पिता का पुत्र जब भारत में माँ से बार -बार अपने पिता के बारे में पूछता है तो एक व्यक्ति उसका पिता बन कर फोन पर बात करने के पेशकश करता है l इन उलझते रिश्तों को हकीकत में कैसे निभाया जाएगा, कहा नहीं जा सकता l हमारे देश में भी टूटते बिखरते परिवार भविष्य में क्या- क्या आकार लेंगे या ले सकते हैं , ये समपादकीय उनकी दस्तक है … जिसे गंभीरता से सुना जाना चाहिए l

    • वंदना जी आपकी प्रतिक्रिया का एक-एक शब्द आपकी भावनाओं का सही चित्रण कर रहा है। हार्दिक आभार।

  21. बहुत ही चिंतनीय स्थिति है जापान की। इसको बहुत ही गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। माता-पिता, भाई बहन, पुत्र पुत्री, पति-पत्नी आदि ये महज़ रिश्तो के नाम नहीं होते बल्कि एक निश्चल व स्नेहिल भाव होता है और इनके द्वारा व्यक्ति को जो प्रेम, साहस, स्नेह, विश्वास मिलता है, वह अमूल्य है कोई कीमत नहीं हो सकती और यदि यही मानवीय जीवंत संबंध किराए पर बिकने लगे तो बहुत खराब स्थिति है….. यह आलेख बहुत ही महत्वपूर्ण है और इसे पढ़ कर कोई भी पाठक यह सोचने पर विवश हो जाएगा कि आखिर ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं क्यों हो रही है और ऐसी स्थिति न उत्पन्न हो इसके लिए हमें सचेत रहने की आवश्यकता है… एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए यह बहुत आवश्यक है।

  22. जो बातें सिनेमा की कहानियों में देखते/सुनते थे वे असल जीवन का हिस्सा हो रहीं हैं ।
    पढ़कर सोचना स्वाभाविक है कि यदि इस कार्य में भी प्रतियोगिता बढ़ गई तो वो गीत पुनः प्रासंगिक होगा —
    मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसान की कीमत कुछ भी नहीं ।
    Dr Prabha mishra

  23. इस पर क्या टिप्पणी दूॅं, मैं निर्णय नहीं कर पा रही ? सामान्य रूप से तो नहीं, संभवतः भारत में ऐसा होने लगे, मैंने भी एक फ़िल्म देखी थी, रेखा जी और राजकिरण जी की थी । गंभीरता से विचार करें तो जीवन कहीं न कहीं नाटकीय मानकों पर…..! बहुत कुछ लिखूॅं या कुछ भी नहीं, किंतु मानव जीवन के भावानात्मक पहलुओं, सुकोमलता, संजीदगी, मासूमियत इत्यादि पर क्या असर पड़ेगा और कितना, यह उस स्थिति -परिस्थिति से दो -चार होने वाला शायद ही कह पाएगा, बाकी तो भगवान सबका मङ्गल करें

  24. सब कुछ सहज सुलभ होते, आधुनिकतम युग की नई परिभाषा है आपका यह संपादकीय, जिसमें अब संयुक्त परिवार और रिश्ते भी बाजारवाद के बढ़ते साम्राज्य की परिधि में आ पहुंचे हैं।जहां हर वस्तु का विकल्प और प्रतिरूप तत्क्षण उपस्थित है। अति महत्वपूर्ण विषय की गंभीरता को परखता आपका यह संपादकीय वास्तव में चिंतनीय है।

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