तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन और उनके पुत्र उदयनिधि स्टालिन

पुरवाई पत्रिका जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह और संत परमहंस आचार्य के बयानों का भी विरोध करती है। हमारा सरकार से और सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध है कि जिन-जिन नेताओं ने सनातन धर्म के विरुद्ध विष-वमन किया है उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाए और साथ ही गजेंद्र सिंह एवं संत परमहंस आचार्य पर भी कानूनी शिकंजा कसा जाए। हालांकि अभी तक दोनों तरफ़ से मौखिक हिंसा ही की गई है मगर हालात बिगड़ते देर नहीं लगती। वहीं हम भारत की सुप्रीम कोर्ट से भी आग्रह करना चाहेंगे कि वे मुद्दों का संज्ञान लेने में निष्पक्षता एवं संवेदनशीलता कुछ इस तरह दिखाएं कि सबको दिखाई दे।

तमिलनाडू के मुख्यमंत्री मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन (जिन्हें कि एम.के. स्टालिन के नाम से जाना जाता है) के पुत्र पिछले कुछ अरसे से ख़ासे विवादों के घेरे में फंसे हैं। उनके पुत्र का नाम उदयनिधि स्टालिन है और वे इसी नाम से जाने भी जाते हैं। यह स्टालिन शब्द इन पिता-पुत्रों के नाम में कैसे जुड़ा यह शोध का विषय हो सकता है।
वैसे विश्व के सबसे अधिक कुख्यात तानाशाह स्टालिन का नाम था जोज़फ़ स्टालिन जो कि रूस का तानाशाह था और जिसके बारे में कहा जाता है कि उसके कहने पर दो करोड़ से अधिक रूसियों को मौत के घाट उतार दिया गया था। कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें आमतौर पर माँ-बाप अपने बच्चों को नहीं देते हैं। भारत में कंस, रावण, मेघनाद या जयचन्द जैसे नामों से परहेज़ किया जाता है। इसी तरह वैश्विक स्तर पर हिटलर, स्टालिन और मुसोलिनी जैसे नामों का भी एक तरह से सामाजिक बहिष्कार किया जाता है।
उदयनिधि स्टालिन ने अपने नाम के अनुसार ही एक विवाद खड़ा कर दिया। याद रहे कि वे एक विधायक भी हैं और तमिलनाडु में एक मंत्री भी। वे एक सम्मेलन में अपना लिखा हुआ भाषण पढ़ रहे थे। सम्मेलन कोई साधारण सम्मेलन नहीं था। उसका शुभ नाम था – ‘सनातन उन्मूलन सम्मेलन’! उदयनिधि स्टालिन ने अपने लिखित भाषण में कहा, “इस सम्मेलन का शीर्षक बहुत अच्छा है। आपने ‘सनातन विरोधी सम्मेलन’ के बजाय ‘सनातन उन्मूलन सम्मेलन’ का आयोजन किया है. इसके लिए मेरी बधाई. हमें कुछ चीज़ों को ख़त्म करना होगा। हम उसका विरोध नहीं कर सकते।  हमें मच्छर, डेंगू बुखार, मलेरिया, कोरोना वायरस इत्यादि का विरोध नहीं करना चाहिए.”
“हमें इसका उन्मूलन करना चाहिए. सनातन धर्म भी ऐसा ही है. तो पहली चीज़ यही है कि हमें इसका विरोध नहीं करना है बल्कि इसका उन्मूलन करना है। सनातन समानता और सामाजिक न्याय के ख़िलाफ़ है। इसलिए आपलोगों ने सम्मलेन का शीर्षक अच्छा रखा है। मैं इसकी सराहना करता हूँ।”
यह सब उदयनिधि स्टालिन ने बोला और पढ़ कर बोला। इस सब की वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध है। इसलिये वे लाख कहें कि उनकी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है, कोई भी उन पर विश्वास नहीं कर पाएगा। परेशान करने वाली बात यह है कि जो काम विदेशी आक्रांता अपने आठ सौ सालों के आक्रमणों और राज में नहीं कर पाए, उदयनिधि स्टालिन यह काम आज वर्ष 2023 में करने के लिये तमिल लोगों की भावनाओं को उकसा रहा है।
डी.एम.के. सांसद ए. राजा ने सनातन के विरुद्ध विष वमन का गेयर बदलते हुए  कहा कि सनातन धर्म पर उदयनिधि का रुख बहुत नरम था। इसकी तुलना सामाजिक कलंक वाली कुछ बीमारियों से की जानी चाहिए, जबकि उदयनिधि ने इसकी तुलना डेंगू और मलेरिया से की है। राजा ने कहा, “सनातन धर्म की तुलना एड्स और कुष्ठ रोग जैसी सामाजिक कलंक वाली बीमारियों से की जानी चाहिए।”
वहीं, इंडी गठबंधन का हिस्सा बिहार के राष्ट्रीय जनता दल के नेता जगदानंद सिंह ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि तिलक लगाकर घूमने वालों ने भारत को गुलाम बनाया। आर.जे.डी. बिहार के अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने कहा, “देश गुलाम किस समय हुआ? क्या उस समय कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद, राम मनोहर लोहिया जैसे नेता थे?”
ध्यान देने लायक बात यह है कि मुंबई में विपक्षी दलों की मीटिंग के तुरंत बाद ही सनातन पर हमले होने लगे। जब इन हमलों के बारे में कांग्रेस के नेताओं से पूछा गया तो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे और कर्नाटक के आईटी-बीटी मंत्री प्रियांक खड़गे ने भी सनातन धर्म को लेकर विवादित बयान दिया है। सनातन धर्म पर तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि कोई भी धर्म जो असमानता को बढ़ावा देता है, वह बीमारी ही है। उन्होंने कहा, ‘कोई भी धर्म जो समानता को बढ़ावा नहीं देता है और यह सुनिश्चित नहीं करता है कि आपके पास एक इंसान होने की गरिमा है। मेरे अनुसार वह धर्म नहीं है। मेरे हिसाब से कोई भी धर्म जो आपके साथ इंसान की तरह व्यवहार नहीं करता है, वह धर्म नहीं है। इसलिए यह एक बीमारी जितना ही अच्छा है।
डीएमके नेता और शिक्षा मंत्री के. पोनमुडी ने भी सनातन धर्म पर विवादित टिप्पणी की है। के. पोनमुडी ने कहा कि इंडिया गठबंधन का गठन सनातनी विचाराधारा के विरोध में किया गया है। उनके अनुसार विपक्षी गठबंधन के सदस्य दलों में अन्य मुद्दों पर मतभेद हो सकता है मगगर सनातन विचारधारा को लेकर सभी एकमत हैं। डीएमके मंत्री ने कहा कि इंडिया गठबंधन का उद्देश्य सनातन धर्म के सिद्धांतों के खिलाफ लड़ने के लिए किया गया है. उन्होंने कहा कि हमारे बीच मतभेद हो सकते हैं लेकिन गठबंधन में 26 पार्टियां सनातन धर्म के खिलाफ लड़ाई में एकजुट हैं। उन्होंने कहा कि जब सनातन धर्म को खत्म करने की बात आती है तो हम सभी एक बिंदु पर सहमत होते हैं. हम सभी एक ही चीज चाहते हैं, समानता, सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षा, लैंगिक समानता.. आप और मैं केवल इस पर बोल सकते हैं, लेकिन जब हम राजनीति में जीतते हैं, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हम बदलाव कर सकते हैं।
कांग्रेस ने कहा कि उसे सनातन और राष्ट्रवाद पर ढोंगियों से प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि कांग्रेस सर्वधर्म समभाव में विश्वास करती है। हम लोगों को बीजेपी से राष्ट्रवाद, सनातन धर्म और आजादी के आंदोलन में योगदान का प्रमाणपत्र नहीं चाहिए क्योंकि इन सब पर उसका स्कोर जीरो है। मगर कांग्रेस पार्टी यह बात समझ नहीं पा रही है कि स्टालिन और राजा की टिप्पणियों से डी.एम.के. पार्टी का तो कुछ नुक्सान होने वाला नहीं, मगर कांग्रेस को इसका ख़मियाज़ा भुगतना पड़ सकता है।
वहीं स्टालिन ने आग में घी डालने का काम करते हुए कहा, ”हम अपनी बात पर कायम हैं और किसी भी कानूनी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं। हम द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इससे एक इंच भी पीछे नहीं हटने वाले।”
स्वाभाविक है कि भारतीय जनता पार्टी को घर बैठे एक ज्वलंत मुद्दा 2024 के चुनावों के लिये मिल गया। जे.पी. नड्डा, अमित शाह से लेकर स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस मुद्दे पर विपक्षी गठबंधन के नेताओं को ललकारते हुए पूछा कि वे सनातन धर्म पर अपना मत स्पष्ट करें। मगर हम सब जानते हैं कि राजनीति में कोई भी दल अपने पत्ते खोलने में विश्वास नहीं रखता। एक टीवी चैनल पर भारतीय जनता पार्टी की एक प्रवक्ता ने बहुत तीखा सवाल पूछा कि एम.के. स्टालिन, उदयनिधि स्टालिन और ए. राजा जब ईसाई धर्म अपना चुके हैं, तो उन्हें सनातन धर्म पर टिप्पणी करने का क्या हक़ है?
गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने विपक्षी गठबंधन को सनातन विरोधी करार देते हुए कहा कि, बाबर जैसे मुगल शासकों, अंग्रेजों और जबरिया धर्मांतरण के एजेंडा के साथ गोवा आए पुर्तगालियों ने सनातन हिंदू धर्म को मिटाने की कोशिश की थी, लेकिन ये सब इसमें कामयाब नहीं हो सके। अब ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल दल मिलकर सनातन धर्म को मिटाना चाहते हैं। इसलिए सनातन हिंदू धर्म के लोगों के लिए यही ठीक रहेगा कि वे इन दलों को भगाएं… विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में शामिल दलों के नेता सनातन हिंदू धर्म के बारे में लगातार अपशब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं और सनातन हिंदू धर्म का अपमान इस गठजोड़ की नीति है।
केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। इसमें वह कहते नजर आ रहे हैं, ‘जो सनातन के विरोध में बात करेगा उस जुबान को खींचकर बाहर निकाल लेंगे। जो सनातन की तरफ आँख उठाएगा उस हर आंख को हम अंगुली डालकर निकाल लेंगे।’
वहीं साधु संत भी सनातन धर्म के विरुद्ध लगातार विष-वमन होते देख और सरकार की ओर से कोई कार्यवाही न होते देख अपना आपा खोने लगे। इस बीच अयोध्या के एक संत परमहंस आचार्य ने एक वीडियो रिलीज़ किया है, जिसमें वह एक हाथ में उदयनिधि का पोस्टर और दूसरे हाथ में तलवार पकडे हुए नजर आ रहे हैं। इस वीडियो में उन्हें पोस्टर में बने उदयनिधि के सिर को तलवार से काटते हुए और फिर उसमें आग लगाते हुए देखा जा सकता है। संत परमहंस आचार्य ने अपनी वीडियो में नेता का सिर कलम करने वालों को 10 करोड़ रुपये का इनाम देने की भी घोषणा की। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
एक बेचारी नूपुर शर्मा होती थी। उसने स्टालिन और इंडी गठबंधन के नेताओं के मुकाबले अपने टीवी चैनल पर जो कहा था वो तो किसी लोरी जैसा रहा होगा। और वो आज तक अपना चेहरा छुपा रही है और सर तन से जुदा होने के ख़ौफ़ में जी रही है।
सबसे महान है भारत की सुप्रीम कोर्ट। उसने कुछ अपराधियों के लिये रात को बारह बजे भी अदालत का कमरा खोल कर सुनवाई की है। नूपुर शर्मा के मामले में उसे बहुत सी कड़ी हिदायतें भी दी हैं। जब उनका जी चाहता है वे स्वतः संज्ञान भी ले लेते हैं। मगर जहां तक सनातन धर्म के विरुद्ध विष-वमन और उसके निर्मूलन के बयानों का सवाल है सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर जल्द सुनवाई का अनुरोध भी ठुकरा दिया। चीफ जस्टिस ने कहा कि सुनवाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाए।
पुरवाई पत्रिका जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह और संत परमहंस आचार्य के बयानों का भी विरोध करती है। हमारा सरकार से और सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध है कि जिन-जिन नेताओं ने सनातन धर्म के विरुद्ध विष-वमन किया है उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाए और साथ ही गजेंद्र सिंह एवं संत परमहंस आचार्य पर भी कानूनी शिकंजा कसा जाए। हालांकि अभी तक दोनों तरफ़ से मौखिक हिंसा ही की गई है मगर हालात बिगड़ते देर नहीं लगती। वहीं हम भारत की सुप्रीम कोर्ट से भी आग्रह करना चाहेंगे कि वे मुद्दों का संज्ञान लेने में निष्पक्षता एवं संवेदनशीलता कुछ इस तरह दिखाएं कि सबको दिखाई दे।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

45 टिप्पणी

  1. संपादकीय स्टालिन और सनातन
    भारत के प्रांगण मे आजकल क्षुद्र राजनीति की फसल उगायी जा रही है। यथा नाम तथा गुण,,,, अब स्टालिन से और kya उम्मीद की जा सकती थी। लोकतंत्र में जब जनसमूह किसी एक को उसके बेहतर कार्य नीतियों और संस्कृति के फल स्वरूप जब सत्ता सौंपता है तो क्षत्रप् इस हद तक पतित होंगे इसी का आकलन इस संपादकीय में किया गया है।
    संतुलित संपादकीय,,,, जी सत्तासीन मंत्रियों और संत समाज के प्रतिनिधि की मौखिक हिंसा को बढ़ाती पर भी टिप्पणी है।
    और कोर्ट कु कुछ ज्यादा ही सख्त टिप्पणी जो कि नूपुर शर्मा की बात पर की गयी और खौफ़ में जीती महिला को भी उदाहरण दिया गया है।
    न्याय प्रणाली को उसकी जिममेंदारी बताता, यह संपादकीय आदरणीय तेजेंदर् शर्मा जी को सजग संपादकों की श्रेणी में पुनः उकेरता है।
    सादर

  2. आपका संपादकीय हमेशा की तरह बढ़िया है पर हमारे देश की स्थिति बद से बदतर होती दिखती है। लोगों की ज़िंदगी को सामान्य स्तर पर लाने के लिए कितने काम ज़रूरी हैं और हम हर समय (चुनाव आने के समय कुछ ज़्यादा) बस ऐसे मुद्दों में लोगों को उलझाए रखते हैं कि किसी से उनके काम के बारे में कोई जवाबतलबी न हो।

    • कितना अच्छा लगता है जब आप जैसे प्रबुद्ध पाठक विमान पर बैठने की प्रक्रिया में पुरवाई का संपादकीय न केवल पढ़ लेते हैं, मगर उस पर टिप्पणी भी कर देते हैं। प्रगति जी हार्दिक आभार।

  3. आज का संपादकीय किसी भी सनातनी भारतीय के हृदय के उबाल की शब्दों में अभिव्यक्ति है और बहुत सटीक है ; सराहनीय है क्योंकि निष्पक्ष है । आस्था का विषय हृदय से जुड़ा होता है और हृदय को आहत करने वाली हिंसा, भले ही मौखिक हो, दण्डनीय है।
    वर्तमान के राजनैतिक घटनाक्रमों पर गौर किया जाए तो तमाम विपक्षी दलों के सनातन विरोध पर संदेह दो बिंदुओं पर मुख्य रूप से सिमटता है ।
    प्रथम बिंदु – जो जगज़ाहिर है, अल्पसंख्यकों के नाम पर 19.75करोड़ की आबादी वाले एक धर्म-विशेष के लोगों को या फिर विश्व में तेज़ी से( बिना आवाज़ किये) फैलने वाले धर्म के लोगों को प्रभावित करके वोट बटोरने का इनका ऐजेण्डा है ।
    दूसरा बिंदु – इतनी निड़रता या कहें बेशर्मी के साथ बड़े मंचों से ये सब बातें कहने के लिए इन्हें कौन उकसा रहा है? क्यों नहीं हम उन विदेशी ताक़तों पर संदेह करें जो भारत के बढ़ते क़द से घबरा रही हैं और इन्हें बेहिसाब पैसा पहुंचा रही हैं देश के सामाजिक ताने-बाने को तार तार करने के लिए?
    सत्तालोलुपता ने देशहित की भावना को सदैव ख़त्म ही किया है … इतिहास गवाह है। भूतकाल में बड़े बड़े नेताओं ने यह सब किया है तो आज के स्टालिन से आदर्शों की उम्मीद रखना बेमानी है।
    ऐसे में विचार यह भी उठता है कि यदि वर्तमान सरकार सनातन के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए कदम उठा रही है तो क्या ग़लत कर रही है ? लेकिन हां , हिंसक बयानबाज़ी अपने पक्ष को कमज़ोर ही करती है , इससे बचना चाहिए। ग़लत आदर्श स्थापित न किये जायें, यह सबकी ज़िम्मेदारी है ।
    स्टालिन और इंडी के अन्य नेताओं की वैचारिक संकीर्णता शर्मनाक है, घातक है ।इसे रोकने के लिए न्यायपालिका को कठोर कदम उठाने ही होंगे।
    भावोत्तेजक संपादकीय के लिए साधुवाद!

    • रचना आपने संपादकीय को भिन्न बिंदुओं से परखा है औऱ उनकी व्याख्या की है। विपक्षी गठबंधन को हमने इंडी गठबंधन के रूप में स्थापित करने का प्रयास भी किया है। हार्दिक आभार।

  4. आपकी टिप्पणी सदैव ही निष्पक्ष और सारगर्भित होती है। सनातन धर्म कोई भौतिक वस्तु नहीं है कि उसका उन्मूलन कर देंगे। सदियों से प्रयास किए गये, सनातन का अर्थ ही है, जो समाप्त ही न हो। कितने शासक आये और चले गये लेकिन सनातन धर्म को छू नहीं पाये।
    वह सनातन ही है जो मानवता के मूल्यों का संरक्षण कर रहे हैं, आज भी वेदों, पुराणों की बात अखण्ड हैं, गीता का दर्शन अखण्ड है। सनातन न किसी को समाप्त करने की बात करता है और न होता है, न होगा।

    • रेखा जी आपको पुरवाई के संपादकीय पसंद आते हैं, उसके लिये हार्दिक आभार। आपकी टिप्पणी महत्वपूर्ण है।

  5. बहुत ही अच्छा संपादकीय है सर।जहाँ इस मुद्दे पर ज्यादातर लेखक बिरादरी चुप है वहाँ आपने इस मुद्दे को गंभीरता से रखा।

  6. आपने सही लिखा है और इसमें भी कोई दोराय नहीं कि सुप्रीम कोर्ट को इस बार तत्काल संज्ञान लेकर सनातन के प्रति हो रही टिप्पणियों से समाज में फैल रहे वैमनस्व को रोकने का काम करने के साथ राजनीतिक दलों को खासकर बीजेपी को जो बैठे बिठाए एक मुद्दा दे दिया, उसकी ज़मीन खत्म करने का काम करना चाहिए लेकिन उसका रवैया बेहद गैर जिम्मेदाराना प्रतीत हो रहा है तो वहीं संदेह से भरा हुआ है क्योंकि यदि वो आतंकियों के लिए रात को अपने दरवाज़े खोल देती है और नुपुर शर्मा के प्रति गंभीर टिप्पणी करने में यकीन करती है तो इस मामले में क्यों धृतराष्ट्र बनी हुई है!?

  7. सब ठीक है l लेकिन…. सोचना यह है कि ऐसी उक्तियाँ क्यों सामने आ रहीं हैं?
    केवल चुनावी मुद्दे के तौर पर या कुछ और???

    हमेशा की तरह सटीक विश्लेषण सर

    • अनुपमा जी स्टालिन एण्ड कंपनी को लगता है कि ऐसे बयान देकर उनकी पार्टी को तमिलनाडू में वोट मिलेंगे। मगर वे नहीं समझ रहे कि गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। हार्दिक आभार।

  8. निर्भीक,सटीक और तटस्थ सम्पादकीय पढ़ कर अच्छा लगा। विदेश में रहते हुए हिन्दुओं के मन में सनातन के लिए प्रेम और मान है, जबकि हमारे देश के हिन्दू, भारत की शाश्वत पहचान का अपमान ही नहीं उन्मूलन करने पर उतारू हैं।
    सुप्रीम कोर्ट के दोगले चरित्र को आपने सही ढंग से प्रस्तुत किया। आतंकी को बचाने के लिए मध्यरात्रि में कोर्ट जाग उठता है। बलात्कारी में अच्छे नागरिक की संभावना दिखती है, उसे सुधरने का अवसर देता है। नूपुर शर्मा को चेतावनी देता है, जबकि उसने लिखित पुस्तक की बात उद्धृत की थी। लेकीन कुछ शांतिप्रिय नेता जो सामूहिक नरसंघार की घोषणा करते हैं। उनके लिये मूक बधिर हो जाता है, अन्धा तो पहले से होता है।
    भारत की आर्थिक और वैश्विक प्रगति से बहुत से चौधरी देश बौखलाए हुए हैं। विपक्ष अपनी लगातर हार से बौखलाया है, दोनों मिल कर भारत और भारतीयों का अहित कर रहे हैं। शोचनीय स्थिति है।

    • शैली जी आप की स्थितियों के प्रति नाराज़गी समझ आती है। स्थिति सच में शोचनीय है। टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  9. कन्नदासन एक तमिल कवि, गीतकार और लेखक थे जो अपने शुरुआती दिनों में कट्टर नास्तिक थे। वह द्रविड़ आंदोलन के सदस्य थे, जो हिंदू धर्म और जातिवाद का विरोधी था। 1954 में, उन्हें डीएमके नेता करुणानिधि ने एक सार्वजनिक बैठक में रामायण की एक प्रति जलाने के लिए कहा था। कन्नदासन सहमत हो गए, लेकिन ऐसा करने से पहले, उन्होंने खुद किताब पढ़ने का फैसला किया। वह रामायण से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे जलाने का मन बदल लिया और अंततः उन्होंने डीएमके छोड़ दी। वह हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले बन गए और उन्होंने “अर्थमुल्ला हिंदू मदम” (सार्थक हिंदू धर्म) नामक पुस्तक लिखी, जिसमें सनातन धर्म का अर्थ समझाया गया। किताब बेस्टसेलर बन गई.कन्नदासन की नास्तिकता से आस्था तक की यात्रा दिलचस्प है। इससे पता चलता है कि सबसे कट्टर नास्तिक भी परिवर्तन के लिए तैयार हो सकते हैं यदि वे दूसरे पक्ष की बात सुनने को तैयार हों। यह रामायण की शक्ति को भी दर्शाता है, जो दिल और दिमाग को बदलने की क्षमता रखता है।

    • अजय भाई आपने कन्नदासन जी का उदाहरण देकर संपादकीय के महत्व और गरिमा को ऊंचाई प्रदान की है। हार्दिक आभार।

  10. बहुत चिंतन पूर्ण आलेख!
    विचारणीय यह है कि इतने बड़े समुदाय को चंद सिरफिरे अपनी सोची – समझी टिप्पणी से आहत करते हैं, और सुप्रीम cort शांत और
    निश्क्रिय बैठा रहता है.इस देश में न्यायपालिका उपर से नीचे तक सबसे भ्रष्ट और निकृष्ट है.

  11. Your references to various discussions on the term ‘ Sanatan Dharma’ in your Editorial of today are indeed adroit.
    Your own view on the comments made by representatives of different parties is as objective and balanced as can be.
    So are your suggestions made to your readers for a better understanding of this issue.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  12. Kannadasan was a Tamil poet, lyricist, and writer who was a staunch atheist in his early days. He was a member of the Dravidian Movement, which was opposed to Hinduism and casteism. In 1954, he was asked by the DMK leader Karunanidhi to burn a copy of the Ramayana in a public meeting. Kannadasan agreed, but before doing so, he decided to read the book himself. He was so impressed by the Ramayana that he changed his mind about burning it, and he eventually left the DMK. He became a believer in Hinduism and wrote a book called “Arthamulla Hindu Madham” (Meaningful Hinduism), which explained the meaning of Sanatana Dharma. The book became a bestseller.
    Kannadasan’s journey from atheism to belief is a fascinating one. It shows that even the most staunch atheists can be open to change if they are willing to listen to the other side. It also shows the power of the Ramayana, which has the ability to change hearts and minds.
    Kannadasan’s story is a reminder that we should always be open to learning new things, even if they challenge our beliefs. It is also a reminder that there is beauty and wisdom to be found in all religions, even those that we may not agree with. ajaykanagat2003@yahoo.com
    Bengaluru 13/09/2023

  13. सनातन धर्म की भांति ही ‘सनातन’ आपकी निर्भीकता और सुस्पष्टता को नमन,महोदय
    “न कोई रहा है न कोई रहेगा , सनातन हमारा ‘सनातन’ रहेगा,
    मिटाने की इसको जो ठानेगा कोई,वह बेमौत अपनी स्वयं ही मरेगा।”

    • सरोजिनी जी हमारा प्रयास हमेशा यही रहता है कि निर्भीक रूप से सत्य के साथ खड़े दिखाई दें। आपकी टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  14. राष्ट्रवाद एक विचार है और सनातन एक परंपरा, धर्म तो इससे भी अलग धारणा है तीनों को मिलाकर देखने से वही होगा जो इस समय चल रहा है ।सनातन शास्वत है जिसका आदि और अंत नहीं वह हमेशा नवीन है ।
    सम्पादकीय से पाठक सनातन की तह तक पहुचेंगे,साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  15. बहुत ही सार्थक आलेख है.. धर्म एक बहुत संवेदनशील मुद्दा होता है। धर्म किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है… और उस पर आपत्तिजनक बयान देना, यह निंदनीय है सनातन धर्म एक प्रकार की जीवन शैली है..इसमें सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया जैसी लोक मंगलकारी विराट भावना व्याप्त है।

  16. सनातन धर्म पर इतनी आसानी से कोई भी टिप्पणी करके लोग इसलिए इतराते, धमकी देते, निश्चिंत हो घूम लेते हैं, न्यायालय भी कोई महत्व न देकर आराम कर लेता है क्योंकि स्वयं सनातनियों ने अपनी सनातन संस्कृति, शास्त्र और शस्त्र को दूर से प्रणाम किया हुआ है. वो भूल गए गीता दर्शन कि ” अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: ।” जिस दिन उसने यह नारा दिया, क्रियान्वयन को तत्पर दिखा कि ” सनातन का जो अपमान करेगा, शिरोच्छेद का सामना परिवार करेगा.” उसी दिन सबकुछ ठीक हो जाएगा. उन्हें यह समझना ही होगा कि अपने मान सम्मान, धन, धर्म संस्कृति की रक्षा स्वयं की जाती है. किसी सरकार, संगठन, न्यायालय आदि से अपेक्षा नहीं की जाती कि वो करेगा. आपका साथ कोई तभी देगा जब आप उसे शक्तिशाली दिखेंगे, नहीं तो वही होगा जो हो रहा है…
    जैसे अभी नूंह में भगवान शिव की पूजा आराधना करने गए हजारों सनातनियों पर मुस्लिमों ने बड़े रणनीतिक ढंग से गोलियों, बमों, पत्थरों से हमला कर दर्जनों की हत्या कर दी, बलात्कार किया, थाना सहित करीब दो सौ गाड़ियों को फूंक दिया. जब वहां सो कर जागा प्रशासन कार्यवाही करने लगा तो महान न्याय मूर्तियाँ ने आधी रात को घर पर अदालत लगा कर कार्यवाही रोक दी.

    • आपके आक्रोश को समझ सकता हूं प्रदीप भाई। हिंसा किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकती। आपकी टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  17. आज के अपने संपादकीय ‘सनातन और स्टालिन ‘ में सनातन धर्म के ऊपर अनर्गल आरोपों का आपने न केवल बेबाकी विश्लेषण किया है वरन उसकी महत्ता को भी निरुपित करने के साथ रूस के तानाशाह जोसफ स्टालिन का नाम लेते हुए, प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है कि कोई भी माता -पिता अपने बच्चों के नाम कुख्यात व्यक्तियों के नाम पर नहीं रखते लेकिन कुछ लोग ऐसा करते हैं। कुछ वर्ष पूर्व ही सैफ अली खान और करीना कपूर ने अपने बेटे का नाम तैमूर रखा था।
    मुग़ल और अंग्रेज जिस धर्म का बालबांका नहीं कर पाये उसे मिटाने की बात इंडी गठबंधन के कुछ दल ऐसे कर रहे हैं मानो यही इनका एकसूत्रीय एजेंडा है। सनातन धर्म कोई एक विचार नहीं है, यह धर्म किसी पर अपनी विचारधारा नहीं थोपता वरन विचार विचारविमर्श का अधिकार देता है। हाँ अब कुछ हिन्दू धर्मवलम्बी भी तैश में आकर बदला लेने की बातें कर रहे हैं जो गलत है किन्तु दूसरों को भी सोचना होगा कि हर धर्म का सम्मान आवश्यक है।
    आज मैंने दैनिक जागरण पेपर में पढ़ा। ग़दर -2 देखने के पश्चात् किसी युवक ने (नाम दिया है ) ‘हिंदुस्तान की जय’ कहा तो उसे चार लोगों ने पीट -पीटकर मार दिया। हिन्दू धर्म से अधिक सहिष्णु धर्म और कोई नहीं है। सब धर्मो को मान देने वाले धर्म के प्रति इतना विष वमन। आपने सच लिखा है सुप्रीम कोर्ट भी किसी घटना पर स्वतः संज्ञान लेता है तथा किसी पर मूक बना रहता है। मुझे भी कभी -कभी ऐसा लगता है कि मानो वह भी किसी एजेंडे के तहत काम कर रहा है। नूपुर शर्मा अपनी जान बचाने के लिए छिपी हुई है जबकि उसे उकसाने वाला अभी भी कहीं अपनी कुत्सित मनोवृति का परिचय देते हुए लोगों को बरगलाने में लगा होगा।
    कहने को बहुत कुछ है पर इतना ही कहना चाहूँगी…

    यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा , सब मिट गए जहाँ से।
    अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।। सारे…

    कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
    सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।।
    सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा।

    • सुधा जी हम सब को यह ग़लतफ़हमी है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। इंडोनेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान सभी तो सनातन थे… यहां तक की कश्मीर में भी हस्ती मिट गई हमारी।… आपकी टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

      • सही पकड़े हैं।

        जी सच कहा पहले भारत अखंड था जिसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश म्यांमार सम्मिलित थे। अपनों की दगाबाजी, और महत्वकांक्षा ने हमारे देश के टुकड़े कर दिए। आज भी कमोबेश यही स्थिति है। अभी भी न चेते तो स्थिति और भयंकर हो सकती है।

  18. आदरणीय तेजेन्द्र जी ने!
    आप वास्तव में एक निष्पक्ष और निडर संपादक हैं। आपका संपादकीय सत्य को सत्य की तरह और प्रामाणिकता के साथ लेखनीबद्ध करता है,हमेशा से ही।
    आज का विषय संपादकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण भी है और उत्तेजित करने वाला भी ।फिर यह स्वाभाविक भी है। आपकी उत्तेजना लेखनी के माध्यम से आक्रोश जनित विरोध भी प्रकट कर रही है।
    सनातन के विरुद्ध विष-वमन करने वालों के प्रति कार्यवाही के निर्णय पर हम भी पुरवाई के साथ भी हैं और सहमत भी हैं।
    अपनी संस्कृति नाम के महत्व को समझती है इसीलिए 16 संस्कारों में से एक नामकरण संस्कार भी होता है और सोच समझकर नाम रखा जाता है।
    वैसे तो सम्मेलन को जो नाम दिया गया है “सनातन उन्मूलन सम्मेलन” वही अपने आप में हास्यास्पद है ।जो स्वयं ही शाश्वत हो ,कभी नष्ट न होने वाला हो उसके उन्मूलन का तो प्रश्न ही नहीं उठता। सम्मेलन का नाम रखने वालों को और उसकी हिमाकत करने वाले उदयनिधि स्टालिन सहित सभी को सनातन और उन्मूलन दोनों ही शब्दों का प्रयोग करने से पहले सोचना चाहिए था। वैचारिक विरोध तो फिर भी समझ आता है।और सनातन को बीमारी कहना,सुनना या समझना इनकी बीमार मानसिकता और पंगु सोच का ही परिचायक है। यह कोई खरपतवार नहीं जिसे उखाड़ फेंका जाए।उन्होंने अर्थ की दृष्टि से गलत शब्द का चयन किया।
    राजनेता सत्ता के मद में इतने अधिक दिग्भ्रमित हैं कि दिशा नजर नहीं आ रही और दशा उन्माद में संभल नहीं रही। समझ नहीं पा रहे कि उनके कृत्य और उनके शब्द उन पर कितने भारी पड़ेंगे।
    अगर यहांँ सनातन को धर्म कहते हैं तो यहांँ पर धर्म का अर्थ कर्तव्य बद्धता से है। कर्तव्य यानी करने योग्य, करने योग्य क्या है ?वह सत्य है! और सत्य क्या है? सत्य वास्तव में ईश्वर है! यह बात स्वयं भगवान कृष्ण ने गीता में कही है। करुणा, दया,परोपकार, समानता का भाव, अहिंसा यह सब इसकी विशेषताएंँ हैं।
    वर्तमान में धर्म के अर्थ को ही परिवर्तित कर दिया गया है और वही सब प्रकार के विवादों की जड़ है । वास्तव में जो नाशवान है। परिवर्तनशील है ,वह शाश्वत नहीं हो सकता ।धर्म की जिन परंपराओं, रूढ़ियों और सभ्यताओं की हम बात करते हैं, जिन पर विवाद और दंगे फसाद करते हैं ,यह सभी नाशवान और परिवर्तनशील है ।सभ्यताएं! यह नष्ट हो जाती हैं और रूढ़ियाँ और परंपराएँ बदलती रहती हैं इसलिए इनके सनातन होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
    वास्तव में सनातन सत्य के माध्यम से जीवन जीने की एक पद्धति है जो सत्य की अनुगामिनी है और यह सर्वाधिक प्राचीन है। सच कहा जाए तो दर्शन के स्तर पर कोई भी मज़हब हमारे दर्शन के आसपास ठहरता ही नहीं है। हिंदू दर्शन यह मानकर चलता है कि सब एक ही ब्रह्म का विस्तार है, सब में एक ही ब्रह्म है । जब
    ईश्वर ने सोचा- एकोsहम् बहुस्याम: ,तो इस संसार की सृष्टि हुई ।ऐसा विराट दर्शन और कहीं नहीं है और जो सनातन है वह इसलिए है कि उसने सबको आत्मसात किया है।
    सच पूछा जाए तो हमारे देश की छुआछूत की व्यवस्था ने ही नहीं हमारे देश को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है। दक्षिण भारत की सामंतवादी व्यवस्था ने वहांँ के लोगों को धर्म परिवर्तित करने के लिए मजबूर किया। कई राज्य और भी ऐसे थे जहां पर धर्म परिवर्तन का कारण छुआछूत या गरीबी रही।
    केरल के सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य को पढ़ते हुए पता चला कि उन पर कितने अत्याचार हुए, उन्हें दास बनाया गया प्रताड़ना से घबराकर उन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया बल्कि उस समय तो प्रत्येक घर के एक सदस्य को मुस्लिम बनना अनिवार्य घोषित हुआ था लेकिन उसके बाद भी इस विडंबना से कोई मुक्त न हो पाए।
    राजतरंगिणी में एक कथा है जिसमें ईश्वर ने और तत्कालीन शासकों ने उनके प्रति अन्याय पूर्ण व्यवहार नहीं किया शूद्रों के प्रति कुछ बुरा न सोचा न किया। यह सब जातिगत भेद सामन्तो और महन्तों ने अपनी सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए आरामदायक जिंदगी के तहत किया। सारे अधिकार इनके हाथ। अन्याय व अत्कीयाचार इंतहा रही।

    राजतरंगिणी की कथा कहती है किएक बार एक राजा को मन्दिर बनवाने के लिए जो जमीन चाहिए थी
    उसमें बीच में एक शूद्र का घर था।
    उसने वह घर देने से इनकार कर दिय ।आश्चर्य की बात यह रही कि राजा ने उसका घर नहीं हटवाया,राजा अनशन पर बैठ गया।राज्य में हाहाकार मच गया।
    शूद्र ने राजा का अनशन तुड़वाने के लिए अपना घर दे दियाऔर बदले में बहुत बड़ा मकान और धन राजा से प्राप्त किया। यह है सनातन धर्म!
    सनातन धर्म ऐसे ही सनातन नहीं बना है और न ही किसे के कहने से खत्म होने वाला है।न ही यह व्यक्ति हैं जिसका जीवन खत्म कर दिया जाए ,न ही वस्तु जिसे तोड़कर फेंक दिया जाए और न ही पौधा जिसे उखाड़ फेंका जाए। सनातनी चरित्र एवं भाव भारतीय संस्कृति का मूल है।यहांँ की मिट्टी में है, यहांँ की हवा में है जो हर भारतवासी के हृदय में प्राण-शक्ति के साथ रक्त में घुलकर धमनियों में निरंतर प्रवाहित हो रहा है।
    यह भ्रम जल्द ही दूर होगा।
    वैसे हरेक मजहब में सौ अच्छाइयांँ हैं,
    तो पचास बुराइयांँ भी हैं।
    बजाय दूसरे मजहब की खामियांँ निकालने के हमें भी अपनी कमियों को दूर करने की जरूरत भी है।
    सनातन किसी के कहने से समाप्त नहीं होनेवाला।
    जहाँ तक सुप्रीम कोर्ट की बात है ,अपेक्षा ही कर सकते हैं कि इस विषय‌ पर संज्ञान ले उम्मीद संशय के घेरे में है।
    एक वक्त था कि राजनेताओं में वैचारिक मतभेद हुआ करते थे जिसका प्रभाव उनके व्यक्तिगत संबंधों पर नहीं पड़ता था लेकिन आजकल राजनीति का कीचड़ इतना गहरा हो गया है नैतिकता दिखाई ही नहीं देती।
    इसमें महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद तेजेंद्र जी।

  19. तेजेन्द्र भाई:
    आपका सम्पादकीय स्‌ट्रेट टू दि पॉइण्ट। उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म को समाप्त करने पर दिये ब्यान पर जो लोगों की प्रतिक्रिया हुई है उस में अधिक्तर अतीत का ज़िक्र किया गया है कि इतना सब कुछ होने पर भी सनातन धर्म अटल है और हमला आवरों की पूरी कोशिशों के बाद भी इसे कोई मिटा न सका और भविष्य में कोई मिटा भी नहीं पायेगा। यहाँ हम यह भूल रहे हैं कि सनातन धर्म मिटा तो नहीं लेकिन इसको नुक्सान कितना पहुँचा है। कितने मन्दिर तोड़ कर मस्जिदें बनी। कितने लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। यदि उस समय हम इकठ्टे होकर हाथों में संतों की माला के साथ साथ महाराणा प्रताप का भाला भी लिये होते तो शायद बहुत से देश जो हमारे हाथों से निकल गये और भारत के टुकड़े हो गये वो शायद न होता। उदयनिधि के ब्यान का समर्थन करने वाले हिन्दु नेता तो बेपैंदी के लोटे हैं। उन्हें तो बस अपनी कुर्सी बनाने की लगी हुई है। उनका अपने ही सनातन धर्म क पतन या अपना ही भारत देश कहाँ जाये उन्हें इस से कोई मतलब नहीं, बस किसी तरह से कुर्सी मिल जाये। भारत की सुप्रीम कोर्ट की हर्कतों से भी ऐसा लगता है जैसे किसी के इशारे पर नाच रही है। समय आगया है कि इस अभियान का कस कर विरोध किया जाये और बता दो उदयनिधि को कि उसका लास्ट नेम स्टालिन अवश्य है लेकिन अगर वो जोज़ैफ़ स्टालिन बनना चाहेगा तो उसको सैंकड़ों जन्म लेने के बाद भी मुंह की खानी पड़ेगी।
    तेजेन्द्र भाई:
    आपका सम्पादकीय स्‌ट्रेट टू दि पॉइण्ट। उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म को समाप्त करने पर दिये ब्यान पर जो लोगों की प्रतिक्रिया हुई है उस में अधिक्तर अतीत का ज़िक्र किया गया है कि इतना सब कुछ होने पर भी सनातन धर्म अटल है और हमला आवरों की पूरी कोशिशों के बाद भी इसे कोई मिटा न सका और भविष्य में कोई मिटा भी नहीं पायेगा। यहाँ हम यह भूल रहे हैं कि सनातन धर्म मिटा तो नहीं लेकिन इसको नुक्सान कितना पहुँचा है। कितने मन्दिर तोड़ कर मस्जिदें बनी। कितने लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। यदि उस समय हम इकठ्टे होकर हाथों में संतों की माला के साथ साथ महाराणा प्रताप का भाला भी लिये होते तो शायद बहुत से देश जो हमारे हाथों से निकल गये और भारत के टुकड़े हो गये वो शायद न होता। उदयनिधि के ब्यान का समर्थन करने वाले हिन्दु नेता तो बेपैंदी के लोटे हैं। उन्हें तो बस अपनी कुर्सी बनाने की लगी हुई है। उनका अपने ही सनातन धर्म क पतन या अपना ही भारत देश कहाँ जाये उन्हें इस से कोई मतलब नहीं, बस किसी तरह से कुर्सी मिल जाये। भारत की सुप्रीम कोर्ट की हर्कतों से भी ऐसा लगता है जैसे किसी के इशारे पर नाच रही है। समय आगया है कि इस अभियान का कस कर विरोध किया जाये और बता दो उदयनिधि को कि उसका लास्ट नेम स्टालिन अवश्य है लेकिन अगर वो जोज़ैफ़ स्टालिन बनना चाहेगा तो उसको सैंकड़ों जन्म लेने के बाद भी मुंह की खानी पड़ेगी।

    • भाई विजय विक्रान्त जी यदि सनातन धर्म अटल होता तो इंडोनेशिया, अफ़ग़ानिस्तान, मलेशिया में पूरी तरह से समाप्त न हो गया होता और पाकिस्तान व बांग्लादेश का जन्म नहीं होता। इस धरती का नियम है, जो पैदा होता है वो ख़त्म भी होता है। इसलिये मैं इसे पूरी तरह से कानूनी दृष्टि से देख रहा हूं। दक्षिण के नेताओँ ने हेट-स्पीच की है, उन्हें सज़ा मिलनी चाहिये। ठीक उसी तरह दूसरे पक्ष को भी। इस मामले में कोई राजनीति नहीं होनी चाहिये।

  20. सुचिंतित, सारगर्भित, निष्पक्ष संपादकीय l स्टालिन नाम से याद आया कि कुछ समय पूर्व अभिनय क्षेत्र में प्रसुड़ध दम्पत्ति के पुत्र का नाम “तैमूर’ रखने पर भी भारतीय जन मानस आहत हुआ था l इसका कारण नाम से जुड़ी क्रूर स्मृतियाँ थीं l बुद्धिजीवी वर्ग उनके पक्ष में आया था l संभवतः यह माता -पिता की अल्पज्ञता रही हो , परंतु आपने सही कहा कि रावण और कंस जैसे नाम भी हमारे देश में नहीं रहे जाते l स्टालिन जैसे नाम एक खास सोच के परिचायक तो हैं ही l इतिहासविदों में इस बात पर भी मतभेद है कि आर्य भारत में बाहर से आए थे ? प्रमाण उनके पास भी हैं l कब कैसे सनातन संस्कृति को आर्य और द्रविड संस्कृति में बाँट दिया गया, आज अपने लाभ के लिए उसी वृक्ष की एक और फसल काटने की तैयारी है l वैसे भी धर्मनिरपेक्ष देश में ‘सनातन उन्मूलन’ की विचारधारा और उस के आधार पर बने “इंडिया गठबंधन” के विरुद्ध आवाज़ उठनी ही चाहिए l प्रश्न नूपुर शर्मा के समय सुप्रीम कोर्ट की आती सक्रियता और इस बात पर मौन रह जाने पर भी उठना चाहिए l सनातन को खतरा है कि नहीं इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम ऐसे विषाक्त विचारों की बेल को फैलने का अवसर ही क्यों दें जो समाज को अपने धर्म के अनुसार चलने देने के स्थान पर बाँटने का काम करे l आपकी बात से सहमत हूँ कि गजेंद्र सिंह एवं संत परमहंस आचार्य पर भी कानूनी शिकंजा कसा जाए। वो भी शुभयस्य शीघ्र्म l

  21. सनातन धर्म और आपके विचारों के आधार पर बहुत ही सुंदर और सटीक ढंग से अपने बेहतरीन अभिव्यक्ति दी है।

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