Wednesday, June 12, 2024
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संपादकीय – समान नागरिक संहिता… कितने पेंच!

भारत की वर्तमान सरकार ने निर्णय तो ले ही लिया है कि समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। इससे पहले सरकार धारा 370 और तीन तलाक पर कानून बना भी चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरला मुद्गल निर्णय (वर्ष 1995) और पाउलो कॉटिन्हो बनाम मारिया लुइज़ा वेलेंटीना परेरा केस (वर्ष 2019) में भी सरकार से समान नागरिक संहिता लागू करने का आह्वान किया था।

आजकल भारतीय मीडिया में केवल एक ही समाचार छाया हुआ है – समान नागरिक संहिता यानी कि यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड। सरकार एवं विपक्ष आज केवल एक ही विषय पर चर्चा करता दिखाई दे रहा है। टीवी चैनलों पर इसी विषय पर ज़ोरदार बहस हो रही है। कुछ राजनीतिक दल इसे मुस्लिम विरोधी कह रहे हैं तो कुछ चुनावी एजेंडा।
भारत में जब कभी भी किसी विषय पर राजनीति होती है तो तुरन्त संविधान की दुहाई दी जाती है। पुरवाई के पाठकों को हम बताना चाहेंगे कि 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान पारित हुआ और 26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से लागू हुआ। इसी दिन को हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। हर लोकतंत्र गणतंत्र भी हो यह ज़रूरी नहीं है। ब्रिटेन में लोकतंत्र है मगर यहां राजशाही भी है क्योंकि देश का मुखिया राजा है। गणतंत्र में राष्ट्रपति का चुनाव होता है।
भारतीय संविधान किसी भी गणतंत्र का सबसे लंबा लिखा गया संविधान है जिसे पूर्ण रूप से तैयार करने में 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन का समय लगा था। भारतीय संविधान में पहला संशोधन वर्ष 1951 में किया गया था। यह संशोधन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा 10 मई, 1951 को किया गया था जिसे बाद में 18 जून, 1951 को संसद द्वारा पारित किया गया था। यह संशोधन भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग पर रोक लगाता है।
हमें एक बात का ध्यान रखना होगा कि भारतीय संविधान लिखने वाले लोग चाहे कितने भी महान थे मगर थे तो इंसान ही। और इंसान तो ग़लतियों का पुतला है। तो संविधान में भी कुछ गलतियाँ हुईं, जिनमें अब तक 105 बार संशोधन किया जा चुका है। समान नागरिक संहिता के पक्ष और विपक्ष में बोलने वाले इसी संविधान की रो-रो कर दुहाई दे रहे हैं।
मुझे विश्व के अधिकांश देशों की यात्रा करने का अवसर मिला है। मैं रहता भी लंदन में हूं। इसलिये विश्व के अन्य देशों के बारे में थोड़ी जानकारी रखता हूं। मेरी जानकारी के मुताबिक अमरीका, यूरोप, रूस, इसराइल, जापान और तमाम इस्लामिक देशों में ‘पर्सनल लॉ’ जैसी किसी भी सुविधा का प्रावधान नहीं है। जो भी देश का कानून है वो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है। ब्रिटेन में नेशनल हेल्थ सर्विस की सेवा तमाम नागरिकों को समान रूप से उपलब्ध है फिर वे चाहे ईसाई हों या मुसलमान, यहूदी या हिन्दू। सभी को ब्रिटेन के कानून के अनुसार ही चलना होता है।
समान नागरिक संहिता जिन मुद्दों पर असर डालेगी वो हैं – विवाह, तलाक, गोद लेने का अधिकार, संपत्ति पर अधिकार एवं लैंगिक समानता। इससे किसी भी धर्म के अनुयायियों की धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। होगा बस यही कि जैसे फ़ौजदारी मुकद्दमों का कानून (आपराधिक कानून) सब धर्मों पर समान रूप से लागू होता है, ठीक वैसे ही सिविल कानून भी सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होगा।
सवाल यह नहीं है कि गोवा में क्या होता है या मणिपुर में या फिर पारसी या मुसलमानों के समाज में। मुद्दा केवल इतना सा है कि समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद उपरोक्त मामलों में सभी पर एक ही कानून लागू होगा और भारतीय अदालतों पर बोझ कम होगा।
समान नागरिक संहिता का दबाव तो उस समय से ही बनना शुरू हो गया था जब 1985 में शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने उनके शौहर को गुज़ारा भत्ता देने का निर्णय पास किया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इस आदेश को मुस्लिम पर्सनल लॉ में दख़लअंदाज़ी बताया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़बरदस्त विरोध करने लगे। राजीव गांधी की सरकार ने 1986 में कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिये और संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बदल दिया।
जब तीन तलाक पर कानून बना और इसे अपराध घोषित कर दिया गया तो अधिकांश मुस्लिम महिलाओं ने चैन की सांस ली थी कि अब उन पर तलाक की तलवार नहीं टंगी रहेगी। मगर हम पुरवाई के पाठकों को बताना चाहेंगे कि अपराध केवल तलाक-ए-बिद्दत को घोषित किया गया था यानी कि एक ही सांस में तीन बार तलाक, तलाक, तलाक कह कर पत्नी का त्याग कर देना। तलाक की पद्धति में कोई बदलाव नहीं आया था। अब भी तलाक शरिया के अनुसार ही हो रहा था।
दो अन्य तरह के तलाक हैं – तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन। तलाक-ए-हसन के तहत शौहर अपनी पत्नी को पहली बार तलाक कहता है। फिर एक महीने बाद दूसरी बार तलाक कहता है और एक महीना और बीत जाने पर तलाक कहता है। इस तरह तलाक पूरा हो जाता है। यदि इस बीच दोनों में सुलह हो जाए तो तलाक रद्द हो जाता है।
तलाक-ए-अहसन में शौहर तलाक तो एक ही बार कहता है, मगर उसके बाद दोनों तीन महीने के लिये एक ही छत के नीचे रहते हैं। अगर इस बीच सुलह हो जाए तो तलाक निरस्त अन्यथा पत्नी घर से बाहर। और इन दोनों तरीकों का इस्लामिक शरिया कानून के मुताबिक पालन किया जाता है। देश के कायदे कानून से इसका कुछ लेना देना नहीं है।
ब्रिटेन और अमरीका जैसे देशों में इस तरह तलाक नहीं दिया जा सकता है। यहां तलाक और गुज़ारा भत्ता सब अपने मुल्क के कानून के तहत ही हो सकता है। और मैंने कभी इन मुल्कों में किसी को इसके विरुद्ध आवाज़ उठाते भी नहीं सुना है।
भारत में विविधता की बात बहुत ज़ोर-शोर से उठाई जाती है। मुझे लगता है कि अमरीका शायद एक अनोखा देश है जहां सभी लोग बाहर से आकर बसे हैं। वहां के मूल निवासी (रेड इंडियन) तो अल्पसंख्यक हैं। दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है जिसके नागरिक अमरीका में जाकर नहीं बसे। भला इससे अधिक विविधता कहां देखने को मिलेगी। मगर वहां किसी प्रकार के पर्सनल कानून का कोई प्रावधान नहीं है।
इससे एक बात तो साफ़ ज़ाहिर हो जाती है कि यदि सरकार सक्षम और सबल है तो उसके तमाम नागरिक कानून का पालन करते हैं। मगर जब सरकारें और राजनीतिक दल ही तुष्टिकरण और वोट बैंक के चक्करों में पड़े रहें तो जो ‘वोट बैंक’ हैं, उन्हें भी तो हक़ है कि अपनी मांगें सरकारों से मनवाएं।
यदि 1986 में राजीव गांधी ने (जिनके पास लोकसभा में तीन चौथाई बहुमत था) वोट बैंक के बारे में न सोचा होता और मज़बूती से मुल्लाओं और मौलवियों का सामना किया होता तो समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में देश उसी दिन आगे बढ़ गया होता।  जब सुप्रीम कोर्ट का निर्णय हमारे मन मुताबिक होता है, हम उसकी तारीफ़ करने लगते हैं। जहां निर्णय हमारे विरुद्ध हुआ, हम उसकी बुराई करने से बाज़ नहीं आते।
भारत की वर्तमान सरकार ने निर्णय तो ले ही लिया है कि समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। इससे पहले सरकार अनुच्छेद 370 और तीन तलाक पर कानून बना भी चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरला मुद्गल निर्णय (वर्ष 1995) और पाउलो कॉटिन्हो बनाम मारिया लुइज़ा वेलेंटीना परेरा केस (वर्ष 2019) में भी सरकार से समान नागरिक संहिता लागू करने का आह्वान किया था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में समान नागरिक संहिता की वकालत करते हुए कहा है कि एक ही परिवार में दो लोगों के लिये अलग-अलग नियम नहीं हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट बार-बार डंडा मारता है और कहता है कि कॉमन सिविल कोड लाओ। लेकिन ये वोट बैंक के भूखे लोग इसमें अड़ंगा लगा रहे हैं। याद रखिये भाजपा सब का साथ, सब का विकास की भावना से काम कर रही है।
इस बीच उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता का मसौदा बन कर तैयार हो गया है। इस पर भी सवाल तो बनता ही है कि क्या भारत के हर राज्य का अपना अलग कॉमन सिविल कोड होगा या केन्द्र सरकार द्वारा बनायी गई समान नागरिक संहिता पूरे देश पर लागू होगी।
समान नागरिक संहिता को लेकर सांसदों की राय जानने के लिए संसदीय स्थायी समिति की 3 जुलाई को बैठक बुलाई गई है. इस मुद्दे पर विधि आयोग, कानूनी मामलों के विभाग के प्रतिनिधियों को बुलाया भी बुलाया गया है। उम्मीद तो यह भी लगाई जा रही है कि नई संसद के पहले सत्र यानी कि मानसून सत्र में समान नागरिक संहिता बिल पेश किया जा सकता है। नई संसद के पहले ही सत्र में आंधी, तूफ़ान और ओले पड़ने की संभावना है…
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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40 टिप्पणी

  1. यूसीसी एक दिवा स्वपन की मानिंद हमारे गणतंत्र के दोगलेपन को दर्शाता है।चुनौती पेश करता है।भारत कबीलों और सपेरों का देश है या फिर विश्व का सबसे बड़ा जनसमूह है। आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी का संपादकीय युवा पीढ़ी को एक संक्षिप्त परंतु सारगर्भित अंदाज़ से विषय की पृष्ठभूमि और वैश्विक स्थिति से अवगत करता है।
    कल्पना कीजिए कि हमारे कोर्ट में पड़े सभी लंबित मामले तुरत निपटा दिए जाएं और अंग्रेजी की कहावत Justice delayed is justice denied ke अंदाज़ में गणतंत्र चले तो यही भारत अमेरिका के समान हो सकता है।परंतु इसके लिए सारे राजनैतिक दलों को अपने क्षुद्र स्वार्थ और वोट बैंक की राजनीति को अलविदा कहना होगा।
    बात किसी एक पार्टी के प्रस्ताव की प्रशंसा या दुःशंसा नहीं है वरन राष्ट्रहित की है।land of law को तो मानना ही होगा।
    बस यही सब तो है इस संपादकीय में!!!
    पुरवाई के संपादक इस संदर्भ में बधाई के पात्र हैं।इस से सहमत सभी विद्वत जन अपने अपने फेसबुक पेज या अन्य सोशल मीडिया पर साझा कर व्यवहारिक सपोर्ट दे सकते हैं।

    • बहुत अच्छा प्रस्ताव है, सूर्य कांत जी। यहाँ अत्यन्त संक्षिप्तता से मुद्दे को बेहद स्पष्टता से समझाया है। इसका प्रसार और प्रचार सम्भवतः इस दिशा में तिल भर ही सही प्रगति कर सके। जनमत बनाना ही हमारे हाथ में। धन्यवाद

    • प्रिय भाई सूर्यकांत जी, आपकी सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार। हमारा प्रयास रहता है कि संपादकीय 1300 से 1500 शब्दों के भीतर ही रहे। इसी में जितनी जानकारी पाठकों तक पहुंचाई जा सके रुचिकर ढंग से पेश की जाए। यह भी प्रयास किया जाता है कि हमारा संपादकीय टीवी चैनलों की तरह शोर न मचाए।

  2. शानदार तेजेन्द्र जी। आपने बहुत अच्छी तरह विषय पर बात की है। समान नागरिक संहिता लागू होना ही चाहिए। जो विरोध कर रहे हैं ये वे लोग हैं जो एक खास समाज को वोटों के लिए संतुष्ट रखना चाहते हैं।

  3. शानदार तेजेन्द्र जी। आपने बहुत अच्छी तरह विषय पर बात की है। समान नागरिक संहिता लागू होना ही चाहिए। जो विरोध कर रहे हैं ये वे लोग हैं जो एक खास समाज को वोटों के लिए संतुष्ट रखना चाहते हैं।

  4. UCC का भविष्य अब लोकसभा के हाथ में पहुँचने वाला है । यही समय होगा, हमारे चुने हुए नेताओं की इस संवैधानिक प्रक्रिया के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने का। जब विपक्षी दल स्वस्थ डिबेट का बाँध तोड़ कर निरंकुशता पर उतर आते हैं तो शर्मनाक दृष्य हृदय को क्षुब्ध कर देते हैं। विषयवस्तु से भटके बिना लोकसभा से एक निर्णायक घोषणा आ सके , यही आशा है ।

    • नीलम जी आपकी सार्थक टिप्पणी हमारे लिये महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।

  5. कुछ बातें पहले लिख चुकी हूँ, उन्हें ना दोहराते हुए, इस ज्ञानवर्धक संपादकीय के लिए धन्यवाद। भारत का संविधान बनने में महीने भर का समय लगता अगर आज के ज़माने की तरह कॉपी पेस्ट की सुविधा होती। लिखा या बनाया क्या ही गया है? समानता के मौलिक अधिकार की सीधे-सीधे हत्या होती रही पर्सनल लॉ से। लेकिन गाँधी का देश, जहाँ एक संप्रदाय VVIP ठहरा दिया गया। सत्ता का नुस्खा भी लिख कर दे दिया, तुष्टीकरण जिसने किया, सत्ता पर उसका कब्जा। अंध गाँधी भक्ति, का खामियाजा ये देश स्वतंत्रता से पहले से ही भुगत रहा है। बस एक सपने की तरह है, समान नागरिक संहिता। ईश्वर विपक्ष को सद्बुद्धि दे, तो देश आगे बढ़े। आमीन

    • शैली जी आप का निरंतर प्रोत्साहित करना हमारे लिये बहुत मायने रखता है। कॉपी पेस्ट वाली बात आपने भली कही।

  6. Your Editorial of today details the Muslim Personal Law alongwith a
    mention of how it is not honoured in most of the countries abroad which follow a uniform code of laws for all their citizens while in India this practice does not exist.
    All eyes on 3rd July now how things work out for a conclusive programme that the present Government plans to set forth vis a vis UCC.
    We stand better informed now after reading your Editorial of today.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  7. आदरणीय संपादक महोदय

    नव युवाओं को समान नागरिक आचार संहिता की आवश्यकता का इतिहास बताने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और बधाइयां ।
    मैं आपके इस विचार से कि ,संविधान लिखने वाले भी मनुष्य ही थे ,जिनसे गलतियां होना स्वाभाविक है’ पूर्णत: सहमत हूं। मनुष्य होना तो एक बात है ही साथ ही बदलते हुए सामाजिक परिवेश, साधनों की उपलब्धता आदि के कारण भी कई बार संविधान के नियम अनुपयोगी सिद्ध होते हैं, ऐसी दशा में समय-समय पर संशोधन होना तो आवश्यक है ही।हालांकि समान नागरिक आचार संहिता ना होना ,”धर्मनिरपेक्ष और पर्सनल लॉ का एक साथ होना सचमुच भारत के लिए लज्जा जनक ही रहा है ।
    पता नहीं कब भारत से बहुसंख्यकों को इस विरोधाभास की गंभीरता समझ में आएगी।
    जिस कौम उनके नेताओं ने भारतवर्ष को क्षत-विक्षत किया उसी कौम को भारत की वोट की राजनीति ने विशिष्ट नागरिक बनाकर उन्हें हमेशा सम्मान दिया, विशेष सुविधाएं दे दे कर उन्हें दुस्साहसी बना डाला,जो 75 वर्षों तक विशेषता का तमगा लटकाए घूमते हैं वह समानता को भला कैसे सहन करेंगे ?ऊपर से उन्हें भड़काने वाले लोग और अधिक उनका उत्साह बढ़ाते हैं, सचमुच भारत के भाग्य का ईश्वर ही रखवाला है।

    ईश्वर हमें सद्बुद्धि दें और हम भारत को सचमुच एक शांतिप्रिय ,धर्मनिरपेक्ष और समृद्धि राष्ट्र बना पाएं ईश्वर से यही प्रार्थना और देश के लिए यही शुभकामना है।

    • सरोजिनी जी आपने मुद्दे को सही रूप में पकड़ा है। इसी विरोधाभास को ख़त्म करने के लिये समान नागरिक आचार संहिता लागू करने का विचार बनाया जा रहा है।

  8. समान नागरिक संहिता के बिना देश की भावी प्रगति संभव नहीं। आपने इसके लिए पूर्व सरकारों के रवैये को स्पष्ट करके जो उल्लेख किया है, वह सराहनीय है। हर आम आदमी इस चीज के विषय में दोनों पक्षों की बात सुनकर उसकी उपयोगिता को समझ नहीं पाता है। आप ने बहुत अच्छी समीक्षा की।

  9. आप हमेशा ही संक्षेप में बड़े मुद्दों को शानदार आवरण देते हैं। समय गतिशील और परिवर्तनशील है।आज आस्थायें, मान्यताएं सभी में परिवर्तन हो रहा है और समय की मांग है कि संविधान में भी बहुत कुछ परिवर्तन होना चाहिए। ना कि लकीर के फकीर बने रहे। संविधान में अनुच्छेद-368 स्वंय चिल्लाकर कहता है- ‘मैं बदलना चाहता हूं।’

  10. भारत के वर्तमान परिदृश्य पर सम्पूर्ण विवरण
    पर अच्छे विचार तलाक- ए हसन और अहसन का उल्लेख बहुत बारीकी से किया
    कई हिंदू इस बात से अनभिज्ञ होंगे ।सम्पादकीय जानकारियों से भरपूर ।साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  11. बहुत ही सारगर्भित और जानकारीयुक्त संपादकीय लेख।
    शुभकामनाएं सर जी।
    धन्यवाद ।

  12. यूं तो ucc विभिन्न लिंग,धर्म,जाति से संबंधित प्रत्येक भारतीय नागरिकों के लिए एक समान कानून का पक्षधर है, किंतु भारत जैसे विविधतापूर्ण, बहुसंस्कृति,धर्म से आच्छादित संपृक्त राष्ट्र होने के कारण ही यूनिफॉर्म सिविल कोड एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा भी है, क्योंकि प्रत्येक धर्म और जातियों के प्रथागत परंपराओं, नियमों और मान्यताओं पर समान नागरिक संहिता ही मान्य होगी। किसी भी नियम और संहिता का क्रियान्वयन सही प्रकार से हो, इसके लिए कुछ राष्ट्र की जनता का अधिकांशत शिक्षित होना अपरिहार्य है,अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम सदैव कष्टकारी ही होते हैं।अत: इसके क्रियान्वयन से पूर्व भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र के संदर्भ में इसके हित-अहित को ध्यान में रखना भी अत्यावश्यक है, साथ ही इसकी चर्चा प्रत्येक जाति धर्म के प्रमुखों के मध्य उनके विचारों को ध्यान में रखते हुए, समस्त के कल्याण में राष्ट्रीय सामंजस्य,सद्भाव के सुविचार को जन-जन तक पहुंचाना आवश्यक है। यह कार्य समस्त जाति-जनजाति, धर्मगुरुओं आदि की सुसहमति से हो तो सोने पर सुहागा होगा,जो कि दुष्कर कार्य तो लगता है किंतु असंभव नहीं है। इस प्रकार इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से ना देख कर प्रत्येक स्वार्थ और भेदभाव की मानसिकता से पूर्णत: मुक्त होकर मतैक्य रुपी सुचिंतन और व्यापक समावेशित रूप में जनता- जनार्दन के सम्मुख प्रस्तुत किया जाए तो सर्वथा उचित होगा, क्योंकि निसंदेह राष्ट्र के लिए समान नागरिक संहिता एक आवश्यक व सर्वहितकारी नियम सिद्ध होगा।
    पुनःअत्यंत ज्ञानवर्धक, गंभीर और ज्वलंत विषय पर सारगर्भित संपादकीय के लिए साधुवाद।

  13. आप रहते तो इंग्लैंड में हैं पर भारत की समकालीन स्थिति को पूरी तरह पहचानते हैं और समान नागरिक संहिता के संबंध में आपके सही विश्लेषण से लोग इस विषय की सत्यता और तथ्यात्मक स्थिति को जानेंगे। कांग्रेस का इतिहास गवाह है कि वर्ष 1935 में नेहरू ने भी समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था परंतु तब कांग्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ नेताओं ने उसका विरोध किया था। इतिहास खुद को पुनः दोहरा रहा है, आज कांग्रेस समर्थन नहीं विरोध कर रही है। एक देश में एक कानून तो होना ही चाहिए। मोदी है तो मुमकिन है। यही सही समय है इसे लागू कर दिया जाना चाहिए ‌। आपका धन्यवाद,पुरवाई के पाठक इस विषय के महत्व को समझेंगे।

  14. आज के अपने संपादकीय – समान नागरिक संहिता… कितने पेंच! में भारत और अन्य देशों का तुलनात्मक विश्लेषण और अध्यन कर आपने समान नागरिक संहिता के बारे में विस्तृत जानकारी दी है।

    अगर हम देश में एकता और भाईचारे की बात करते हैं तो समान नागरिक संहिता लागू करनी ही होगी क्योंकि एक देश में सभी नागरिकों के लिए अलग -अलग क़ानून, पक्षपात का द्योतक है जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। अगर कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं तो उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ तुष्टिकरण है।

  15. संपादक महोदय !
    नमस्कार
    बहुत सुंदर विचारणीय मुद्दे पर चर्चा करने के साथ ही आपने ऐसी जानकारी दी जिनसे मैं परिचित नहीं थी।
    आपके संपादकीय की यह विशेषता बहुत प्रभावित करती है कि विदेश में रहने के बावजूद आप अपने देश के सभी महत्वपूर्ण विषयों पर दृष्टि रखकर उसका स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं।
    मुझे तो प्रत्येक संपादकीय में नई जानकारी प्राप्त होती है।जैसे इसमें तलाक के बारे में जानकारी प्राप्त हुई।
    समान नागरिक संहिता तो होनी ही चाहिए और उसका पालन भी गंभीरता पूर्वक होना चाहिए।
    धन्यवाद

  16. पुरवाई का सम्पादकीय, हमेशा जो सही और न्यायसंगत बात होती है, उसी का समर्थन करता है। मैं भारत की एक जागरूक नागरिक होने के नाते समान नागरिक संहिता को लागू करने की पुरज़ोर वक़ालत करती हूँ, क्योंकि यह क़दम राष्ट्रहित में है।
    आदरणीय तेजेन्द्र जी ! आपने विषय के सभी पहलुओं पर सटीक प्रकाश डाला है जिससे कुछ नयी बातें भी हमें मालूम हुईं। आपका ज्ञान-वैविध्य सराहनीय है।

  17. तेजेन्द्र जी:
    तलाक-ए-बिद्दत, तलाक-ए-हसन तथा तलाक-ए-अहसन की जानकारी के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।
    आपका बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक सम्पादकीय पढ़ कर मुज़फ़्फ़र रज़्मी के निमन्न शेर की याद आ गई।
    “ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
    लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।”

    काश, 1986 में राजीव गान्धी कट्टरपंथियों के आगे घुटने न टेक कर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को जाइज़ करार कर देते तो आज यह सब देखने को नहीं मिलता।

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