होम अपनी बात संपादकीय – भारतीय मीडिया… एक मज़ाक!

संपादकीय – भारतीय मीडिया… एक मज़ाक!

40
984

संपादकीय - भारतीय मीडिया... एक मज़ाक! 3

यह पूरी पटकथा लगता है जैसे किसी बॉलीवुड फ़िल्म से उधार ली गयी है। एक ईमानदार पुलिस अफ़सर है जो किसी बड़े राजनीतिज्ञ के दामाद और सिने अभिनेता के पुत्र को ड्रग्स के मामले में गिरफ़्तार करता है। राजनीतिज्ञ कसम खाता है कि ईमानदार पुलिस अफ़सर की वर्दी उतरवा देगा और जेल की चक्की पिसवाएगा। वह अपने रसूख़ से यह करने में कामयाब भी हो जाता है। कहीं फ़िल्म की कथा असल जीवन में भी तो नहीं दोहराई जाएगी। यदि ऐसा होता है तो लोगों का न्याय प्रक्रिया से विश्वास उठ भी सकता है। मगर बॉम्बे हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि यदि मुंबई पुलिस समीर वानखेड़े को गिरफ्तार करना चाहती है तो 72 घंटे का नोटिस देना होगा।

हिन्दी सिनेमा के लोकप्रिय कलाकार शाहरुख़ ख़ान के पुत्र आर्यन ख़ान की ड्रग्स मामले में गिरफ़्तारी के मामले में इतना अहित ख़ान परिवार या नारकॉटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का नहीं हुआ है, जितना कि भारतीय मीडिया का हुआ है। मीडिया बुरी तरह एक्सपोज़ हुआ है। साथ ही एक्सपोज़ हुई है भारत की न्याय पद्धति। 
आज के समाचारवाचकों को एंकर कहा जाता है। एंकर का काम होता है जहाज़ को डूबने से बचाना मगर टीवी एंकरों का बस चले तो सब कुछ समुद्र में डुबा दें। 
आर्यन ख़ान के मामले में टीवी चैनलों एवं यू-ट्यूब ब्ल़ॉगर्स का रवैया पूरी तरह से इकतरफ़ा रहा… या तो इस तरफ़ या उस तरफ़। राजदीप सरदेसाई, रवीश कुमार, अभिसार शर्मा, अजित अंजुम, पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे मीडिया कर्मियों ने एक पक्ष पकड़ लिया तो अर्णव गोस्वामी, अमीश देवगुण, सुधीर चौधरी, अमन चोपड़ा और सुशांत सिन्हा का अलग पक्ष रहा। कैपिटल टीवी के डॉ. मनीष कुमार निजी राय को ही समाचार समझते हैं। 
अधिकांश टीवी एंकर अब समाचार सुनाते नहीं हैं बल्कि अपनी अपनी राजनीतिक सोच के तहत समाचार बुनते हैं। जिस तरह एक लंबे अरसे तक हिंदी साहित्य एक विचारधारा के दबाव में लिखा जाता रहा ठीक उसी तरह अब चैनल अपने अपने मालिकों और मुख्य संपादक के हिसाब से समाचार गढ़ते हैं। 
कुछ टीवी चैनल चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे आर्यन को जेल होनी ही चाहिये तो कुछ का मानना था कि 23 साल के बच्चे पर ज़ुल्म ढाया जा रहा है। दोनों ही पक्ष के एंकर अपनी अपनी दलीलें और सुबूत दे रहे थे।
उनकी इन बेवक़ूफ़ियों के चलते लोग भारत की अदालतों पर सवालिया निशान लगा रहे थे। और इल्ज़ाम भारतीय जनता पार्टी से होते-होते सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पहुंच रहे थे। 
इन तथाकथित ‘समाचार-वाहकों’ के साथ जुड़ गये महाराष्ट्र के एक मंत्री, एन.सी.पी. के नवाब मलिक। मलिक साहब ने एन.सी.बी. के समीर वानखेड़े की जन्मपत्री खंगाल डाली। सबूत जुटाने में लग गये कि समीर के पिता मुसलमान हैं; समीर भी मुसलमान है; उसकी पहली पत्नी भी मुसलमान थी; समीर ने झूठा प्रमाणपत्र देकर एस.सी./एस.टी. कोटे से नौकरी हासिल की; समीर वानखेड़े को शाहरुख़ ख़ान से खुंदक… बॉलीवुड से खुंदक है क्योंकि उसकी बीवी को हिंदी फ़िल्मों में काम नहीं मिला। जो बात किसी को समझ नहीं आ रही कि समीर वानखेड़े की निजी बातों से इस ड्रग मामले का क्या रिश्ता है।  
कुछ टीवी चैनलों के लिये यह अग्नि में 100 प्रतिशत शुद्ध घी था तो कुछ चैनलों के लिये कोरी बक़वास। सोशल मीडिया पर तो एक जोक भी ख़ासा वायरल हो रहा है, किसी की कुंडली, जन्म पत्रिका, खोया हुआ प्यार, पुराना लफड़ा, पुरानी गर्ल फ़्रेण्ड, स्कूल गर्ल फ़्रेण्ड, कॉलेज की फ़ोटो निकलवाना हो तो संपर्क करे... :- नवाब मल्लिक।” 
दरअसल इन दिनों मेरी आयुवर्ग के लोगों को प्रतिमा पुरी, सलमा सुल्तान, शम्मी नारंग, सरला महेश्वरी, अविनाश कौर सरीन, कोमल जी बी सिंह, नीति रवीन्द्रन, तेजेश्वर सिंह, रिनी साइमन खन्ना, मीनू तलवार या फिर बाद में एस.पी. सिंह या राहुल देव जैसे बहुत से समाचार वाचकों की याद अवश्य आएगी जो समाचारों को शालीनता से सुनाया करते थे। वे अपना ग़ुस्सा या ख़ुशी कभी टीवी स्क्रीन पर ज़ाहिर नहीं होने देते थे। आजकल के एंकर तो अपने विरोधियों की पराजय के बारे में सुनते ही टीवी स्क्रीन पर डाँस करना शुरू कर देते हैं। हैरानी तो तब हुई जब कुछ मीडिया एंकरों ने आर्यन ख़ान की गिरफ़्तारी और ज़मानत के मामले को आर्यन ख़ान के बॉलीवुड लाँच से जोड़ दिया और कहा कि यह तो आर्यन का ज़बरदस्त लाँच हो गया। 
ऐसा अहसास हो रहा था कि आर्यन ख़ान की ज़मानत की घोषणा होने के बाद मीडिया चैन की साँस लेगा मगर ऐसा होता नज़र नहीं आता। यह ब्रेकिंग न्यूज़ ने समाचारों का बेड़ा ग़र्क कर दिया है। ब्रेकिंग न्यूज़ के ऐसे ऐसे हेडिंग दिख रहे थे – ‘ज़मानत का समाचार सुन कर आर्यन ख़ान ने क्या प्रतिक्रिया दी’… ‘ज़मानत मिलने के बाद आर्यन की रात कैसी बीती…’ ‘मन्नत की मन्नत पूरी हुई…’ ‘अब दीवाली मन्नत में मनाई जाएगी!…’ ‘जेल में ही बीतेगी आर्यन ख़ान की एक और रात…’ ‘आर्यन खान की आज जेल से ‘घर-वापसी’ के लिए शाम 5:30 बजे डेडलाइन…’ ‘आर्यन की एक और रात जेल में..’ ‘कल सुबह आर्यन घर पहुंचेंगे..’ ‘आर्यन के घर के बाहर प्रशंसकों की भीड़.’
वैसे यह बताया गया है कि आर्यन ख़ान को एक लाख रुपये की श्योरिटी पर ज़मानत मिली है और यह ज़मानत जुही चावला ने दी है जो कि शाहरुख़ ख़ान की सह-कलाकार भी रही हैं, आई.पी.एल. और रेड चिलीज़ की पार्टनर भी। हाई कोर्ट में वकील मानशिंदे ने बताया कि जुही चावला बचपन से आर्यन को जानती हैं। 
बॉम्बे हाईकोर्ट ने आर्यन खान को शर्तों के साथ बेल दी है, जिनके अनुसार, आर्यन को अपना पासपोर्ट सरेंडर करना होगा… वे कोर्ट या एन.सी.बी. को बिना बताए विदेश यात्रा नहीं कर सकते। विदेश जाने के लिये उन्हें अनुमति लेनी होगी। वे दूसरे आरोपियों से संपर्क नहीं कर सकते और न ही केस के बारे में बयानबाज़ी कर सकते हैं। और आर्यन को हर शुक्रवार एन.सी.बी. के दफ़्तर में हाज़री लगानी होगी।  
भारत में ज़मानत मिलने का तरीका भी बाबा आदम के ज़माना का है। आज जबकि आर्यन के वह्टसएप चैट को सुबूत माना जा रहा है, ऐसे में ज़मानत के काग़ज़ 17.30 से पहले जेल तक पहुंचाने का तरीका बदलने की ज़रूरत है। आर्यन को गुरूवार को ज़मानत मिली और शनिवार को वह अपने घर वापिस पहुंच गया। चारों तरफ़ शाहरुख़ की एक फ़िल्म का संवाद दिखाई और सुनाई दे रहा है… “हार कर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं!’
हैरानी तो यह हो रही है कि टीवी चैनल आर्यन की रिहायी को इस तरह लाइव दिखा रहे हैं हैं जैसे कोई राष्ट्रीय स्तर की घटना हो रही हो। एक ध्यान देने लायक बात यह भी है इस बीच दक्षिण के सुपर स्टार और हिन्दी फ़िल्मों के जाने-माने कलाकार माधवन के 16 वर्षीय पुत्र वेदांत ने तैराकी में सात पदक जीते। मगर किसी भी चैनल ने न तो इस बात को उछाला और न ही पिता पुत्र के साक्षात्कार किये। यानी कि निगेटिव समाचार ही ब्रेकिंग न्यूज़ बनता है। 
याद रहे कि नवाब मल्लिक ने अपनी बंदूक की नाल एक बार फिर समीर वानखेड़े की ओर कर दी है और कहा है कि क्रूज़ पर एक दाढ़ी वाला शख़्स मौजूद था जिसका नाम काशिफ खान है… वह फ़ैशन टीवी का इंडिया-हेड है… वह देश भर में फैशन शोज कराता है, जिसमें धड़ल्ले से ड्रग्स बेची, इस्तेमाल की जाती है। वह बड़े पैमाने पर सेक्स रैकेट चलाने का काम करता है। क्रूज़ पर उस दिन एक पार्टी काशिफ़ ख़ान ने भी दी थी। उसने सोशल मीडिया पर लोगों को इन्वाइट भी किया था। समीर वानखेड़े के काशिफ़ के साथ अच्छे संबंध हैं।
वहीं दूसरी ओर के समर्थकों का आरोप है कि नवाब मलिक के अपने दामाद को आठ महीने ड्रग्स के चक्कर में जेल में काटने पड़े थे। इस बात का बदला लेने के लिये नवाब मलिक समीर वानखेड़े से बदला लेने को उतारू है।  
मगर इस पूरे हादसे ने आम भारतीय को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यदि शाहरुख़ ख़ान के पुत्र को जेल से ज़मानत मिलने में 27 दिन लग गये तो जिन माँ-बाप के पास मुकुल रोहतगी, सतीश मानशिंदे, और अमित देसाई जैसे दिग्गज वकीलों को देने के लिये पैसे नहीं होंगे उनकी औलादें कब तक भारतीय जेलों में सड़ती रहेंगी। आर्यन की गिरफ़्तारी तो राष्ट्रीय मुद्दा बन गयी मगर उन हज़ारों का क्या होगा जो कई सालों से जेल में ज़िंदगी जीने को अभिशप्त हैं। और एक बात याद रखनी होगी कि आर्यन ख़ान और अन्य आरोपितों को केवल ज़मानत मिली है… अभी वे आरोपों से बरी नहीं हुए हैं। 
याद रहे भारत के 75 प्रतिशत कैदी अण्डर ट्रायल की श्रेणी में आते हैं। उनमें से कुछ तो पाँच-पाँच साल से जेल में सड़ रहे हैं। भारत में न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या बहुत कम है। बहुत से रिक्त स्थान भरे जाने हैं। मुख्य न्यायाधीश एवं भारत सरकार को इस विषय पर भी संज्ञान लेना होगा। 
यह पूरी पटकथा लगता है जैसे किसी बॉलीवुड फ़िल्म से उधार ली गयी है। एक ईमानदार पुलिस अफ़सर है जो किसी बड़े राजनीतिज्ञ के दामाद और सिने अभिनेता के पुत्र को ड्रग्स के मामले में गिरफ़्तार करता है। राजनीतिज्ञ कसम खाता है कि ईमानदार पुलिस अफ़सर की वर्दी उतरवा देगा और जेल की चक्की पिसवाएगा। वह अपने रसूख़ से यह करने में कामयाब भी हो जाता है। कहीं फ़िल्म की कथा असल जीवन में भी तो नहीं दोहराई जाएगी। यदि ऐसा होता है तो लोगों का न्याय प्रक्रिया से विश्वास उठ भी सकता है। मगर बॉम्बे हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि यदि मुंबई पुलिस समीर वानखेड़े को गिरफ्तार करना चाहती है तो 72 घंटे का नोटिस देना होगा।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

40 टिप्पणी

  1. सम्पादकीय में इन दिनों के ताजा प्रकरण पर अच्छी टिप्पणी है
    मीडिया सरकार और कानून के बीच हस्तक्षेप करना छोड़ दें तो हालात बदल सकते हैं,रसूखदारों से हटकर आम आदमी पर भी मीडिया की निगाह होनी चाहिए ।
    समाचार सुनाते नहीं अपने हिसाब सेख़बरों को बुनते है यह सच है ,पहले के एंकरों की प्रतिष्ठा का स्मरण संपादकी में करना अच्छा लगा ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  2. बहुत बढ़िया संपादकीय। अभिनेता माधवन के बेटे ने तैराकी में मैडल लिए हैं उसकी कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नही है,यह बात मेरे भी दिमाग़ में आई थी। चूँकि आर्यन खान शाहरुख खान का बेटा है ,न्यूज़ चैनल्स को तो इसी से फ़ायदा होगा। जिनको आम आदमी सत्ता चलाने का हक़ देता है उन्हें लचर होती कानूनी व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए,जो किसी भी समाज या देश में अनुशासन कायम रखने के लिए अति जरूरी है। भविष्य में प्रतिरोध किस रूप में आएगा अकल्पनीय है। तेजेन्द्र जी आपके लिए खूब शुभकामनाएं। हम आपके संपादकीय पढ़ते रहे ।

    • प्रगति जी आप जैसे प्रबुद्ध पाठकों की प्रतिक्रिया पत्रिका को हौसला देती है। धन्यवाद।

  3. इसके आगे की दास्ताँ मुझसे से सुन
    जब आर्यन ख़ान जेल से बेल पर रिहा होकर अपने हाइ प्रोफ़ाइल आवास पर पहुँचे तो अपार जनसमूह ने परिवार के साथ जिस गर्मजोशी और आतिश बाज़ी ढोल नगाड़ों के साथ स्वागत किया गया , वो किसी भी दीवाली से बढ़ कर था।
    इस इज़हार-ए-खुशी के अन्दाज़ से जनता देश और दुनिया को क्या सन्देश जाता है ! क्या आर्यन ने बहुत अच्छा प्रदर्शन कर जीत हासिल की, क़ानून और अदालतों ने जो किया उसकी हार का जशन है। हम और हमारी जनता किस ओर अग्रसर है !
    क़ानून व्यवस्थाओं का मज़ाक !
    रेव मेव जयते !

  4. सटीक संपादकीय। सचमुच मीडिया चैनलों का रवैया अतिशयोक्ति रूप मे होता है

  5. अत्यधिक सारगर्भित एवं सटीक सम्पादकीय।
    इस पूरे प्रकरण से सर्वाधिक नुकसान यह हो सकता है कि आम जनता का विश्वास न्यायपालिका से भी उठ सकता है, जो समाज के लिये अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
    मीडिया तो हमेशा से सन्देह और अविश्वास के घेरे मे रही ही है।
    सम्पूर्ण तन्त्र को इस स्थिति पर गम्भीरता से विचार करना चाहिये।

    • आपने बिल्कुल सही कहा वर्मा साहब। इस प्रकरण से बहुत से सवाल उठ खड़े हुए हैं।

  6. बहुत ही सटीक संपादकीय। मीडिया का जैसे कोई वजूद ही नहीं रह गया। जिधर ढलान मिली, हल्ला गुल्ला मचाते हुए बह गए।

  7. वास्तव में सठीक संपादकीय है। हमारी और हमारे राजनेताओ की गंधी हरकते बहुत ही शर्मनाक बात है।

  8. वाकई आर्यन के मामले में भारतीय मीडिया का रवैया बेहद शर्मनाक था, ऐसे ही नवाब मलिक का रवैया भी सराहनीय नहीं कहा जा सकता, वैसे हर मामले में मीडिया के दो खेमे बन चुके हैं जिन्हे किसी भी तर्क से कोई लेना देना नहीं है, वे बस किसी भी तरह अपनी विचार धारा को व्यक्त करते हैं,

  9. समसामयिक विषय का सांगोपांग विवरण देता एक और संपादकीय पढ़ कर अच्छा लगा। सुशांत सिंह प्रकरण के बाद से, बॉलीवुड से जुड़े प्रकरणों का पूरा ट्रायल मिडिया ही कर डालता है, न्यायालय ने क्या कहा, सामन्य जनता को इसकी जानकारी तक नहीं हो पाती। दुःखद स्थिति है, मीडिया के लिए अचार संहिता की आवश्यकता है, अन्यथा भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बिगड़ जाएगी। न्यायिक प्रक्रिया तो लगभग निष्क्रिय हो गई है। शोचनीय स्थिति है

  10. एक बेबाक़ लेख। समझ नहीं आता कि ये तथाकथित चौथा स्तम्भ भारत को जोड़ता है, तोड़ता है या और confuse करताहै।
    आपको शानदार लेख के लिए बधाइयाँ

  11. एकदम सटिक! तेजेंद्र जी !
    सभी टी वी चैनल आजकल वकील बने हुए हैं, बस काले कोट नही पहने। दो मिनिट सुनने के बाद पता चल जाता है की यह चैनल किस पक्ष की वकील है। ये वकील पूरे जोश से बेहूदी बाते करते हैं।

  12. सर आपने अच्छे से विश्लेषण किया है। मीडियाकर्मी अपनी राह से भटक रहें है। न्याय व्यवस्था में भी सुधार की आवश्यकता है।

  13. सामयिक विषय पर एक सटीक संपादकीय । बहुत सारे प्रश्न आपने उठाये हैं, उनपर विचार करना निहायत ही ज़रूरी है । मीडिया का रोल हमेशा की तरह आज भी कटघरे में है, वहीं न्यायालय की प्रक्रिया में भी जाने कब सुधार आयेगा । आम आदमी हमेशा की तरह आज भी बदहाल और मायूस है , एक ईमानदार ऑफ़िसर के लिए दुआओं के सिवा कुछ नहीं कर सकता ।

  14. सटीक विचारणीय सम्पादकीय। जो कुछ भी आजकल टी वी चेनलों पर हो रहा है उससे साफ जाहिर होता है कि समाचार सच से कोसों दूर होते हैं उनको केवल अपनी टी आर पी से मतलब होता है ।

  15. आर्यन की गिरफ़्तारी और रिहाई को मीडिया ने ख़ूब महिमामण्डित करके पेश किया है। इस सारे प्रकरण को सम्पादकीय में आपने बख़ूबी उजागर किया है। आम आदमी न्यायप्रणाली से भी निराश हो चला है। व्यवस्था की जड़ें खोखली हो गयी हैं। क्या ये स्थितियाँ कभी बेहतर होंगी, एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह यों ही मुँह चिढ़ाता रहेगा।

  16. शशि मैम आपकी टिप्पणी हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। आपने सही सवाल किया है – क्या ये स्थितियाँ कभी बेहतर होंगी….

  17. आम जनता को हर जगह मसाला चाहिए। खाने में, अड़ोस पड़ोस में, सिनेमा में, राजनीति में, ख़बरों में …. मीडिया हाउस बस बिज़नेस चला रहे हैं। टी आर पी के लिए गलत सही कोई मायने नहीं रखता। कई जगहों पर तो डरा धमका कर ऐड लिए जाते हैं। आज बाबा रामदेव पूरी मीडिया हॉउस को कमर्शियल एड न दे रहे होते तो शायद दवा में हड्डी मिलाने के जुर्म में अंदर होते। आज बाहुबली हमारे नवयुवकों के आदर्श हैं। सिनेमा में तो खलनायक ही असली नायक हैं। आर्यन के रूप में नया संजय दत्त बनता देख रहा हूँ मैं तो !
    आशुतोष

  18. यह संपादकीय सही मायने में हर साधारण नागरिक की सोच का प्रतिनिधित्व कर रहा है । समाचार निष्पक्ष होना चाहिए । आज के सभी समाचार चैनल्स समाचार कम, अपनी राय अधिक पेश करते हैं ..या कहें कि थोपते हैं । व्यूअरशिप बढ़ाने के प्रयोजन से ख़बरों को चटपटा बनाकर परोसा जाता है । ब्रेकिंग न्यूज़ को और ज़ोरदार बनाने के लिए एंकर्स जब ताण्डव शुरु कर देते हैं , हास्यास्पद लगने लगता है । ख़ामियाज़ा यह कि ड्रग्स जैसे गंभीर मुद्दे भी बस एंटरटेनमेंट का ज़रिया बनकर रह जाते हैं । इसके दूरगामी प्रभाव घातक हो सकते हैं ।
    इस व्यवहार पर नियंत्रण अति आवश्यक है – ज़िम्मेदार मीडियाकर्मियों को इस दिशा में भी काम करना चाहिए ।

    — रचना सरन

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.