यही कोई पाँच बजे का समय था, दीदी अपनी बालकनी में बैठी कोई पुस्तक पढ़ रहीं थी । चेहरा उन्होने दीवार की तरफ कर लिया था, जिससे आँखों पर धूप न पढ़े । अचानक ज़ोर से आवाज सुनाई दी, “दीदी… दीदी…” आवाज इतने ज़ोर की थी कि कोई भी चौंक जाए । छोटी–सी चुटकी, उपहारों से लदी-फँदी, माथे पर बड़ा-सा टीका लगाए, अपने मम्मी-पापा के साथ, टुम्मक-टुम्मुक चली आ रही थी । वह शायद अपना यही रूप दीदी को दिखाना चाह रही थी । दीदी ने इशारे से कहा, घर जाकर फ्रेश होकर आना, फिर अपन बैठकर बातें करेंगे । 
शाम के सात बजे ही नहीं थे कि चुटकी अपनी दलबल के साथ दीदी के घर में दाखिल हो गई । चुटकी को देखकर ही लग रहा था कि उसे बहुत सारी बातें दीदी को और अपने साथियों को बतानी थीं । 
दीदी ने पूछा “हाँ चुटकी बोलो, क्या बताने वाली थीं …?”
चुटकी बोली, “दीदी आज हम लोग दादाजी की फ़ेक्ट्री में गए थे, पता है वहाँ क्या-क्या हुआ….?”
रोहन बोला “… जल्दी बोल न क्या-क्या हुआ, फालतू बोर कर रही है….” । 
बेचारी चुटकी का सारा उत्साह चला गया । रुयासी-सी हो गई । दीदी ने रोहन को डांटते हुये कहा, “रोहन ऐसे किसी को नहीं बोलते, चुटकी तुमसे छोटी है न, छोटों को ऐसे नाराज नहीं करते….”  रोहन अपनी अकड़ में ही बोला, “क्या है दीदी, छोटों को नाराज नहीं करते, बड़ों को नाराज नहीं करते…, फिर किसको नाराज करते हैं …?” दीदी एकदम गंभीर हो गईं और बोली, “किसी को नहीं, हमेशा ऐसी कोशिश करो, जिससे कोई तुमसे नाराज न हो, अभी आप लोग बच्चे हैं, अभी से आप सीख जाएंगे की किसी को नाराज नहीं करना है तो हमेशा के लिए ये अच्छी आदत पड़ जाएगी, समझे बच्चू । बोलो चुटकी, क्या बोल रहीं थीं तुम ? अब सिर्फचुटकी बोलेगी और कोई बीच में नहीं बोलेगा…”  चुटकी बोली, “आज हमारे घर के सभी लोग, हमारे दादाजी की फेक्ट्री गए थे । आज फेक्ट्री बंद थी । फ़ेक्ट्री को अच्छे से सजाया गया था । सब वर्कर्स अपने बच्चों के साथ आए थे । वर्कर्स लोग अच्छे-अच्छे कपड़े पहन कर आए थे । दादाजी ने भाषण दिया, दो वर्कर्स को इनाम दिया । फिर सब ने खाना खाया, मेरे पापा ने सबको टीका लगाया, मिठाई का डब्बा दिया, फिर दादाजी ने माइक पर जाकर बोला, “साथियो, इस वर्ष हमारी फ़ेक्ट्री को बहुत लाभ हुआ है, इसलिए आप सब को बोनस दिया गया है, बोनस की धनराशि आपके बैंक में भेज दी गई है । फिर सब ने तालियां बजाईं, फिर हम सब जीप में बैठ कर घर आ गए । बस मुझे इतना ही याद है…” ऐसा लग रहा था जैसे कोई नन्हा-सा नेता रटा हुआ भाषण पढ़ रहा है । 
दीदी बोली, “कोई बता सकता है, फ़ेक्ट्री में सब प्रोग्राम क्यों हुआ ?” नीरव बोरियत-सी आवाज में बोला, “पता नहीं इसके दादा जी की फ़ेक्ट्री में क्या-क्या होता रहता है” । “चलो छोड़ो, अच्छा ये बताओ, आप लोग आज स्कूल क्यों नहीं गए ?” सब एक साथ बोल पड़े, “आज तो हमारी छुट्टी थी, हुर्रे…” 
“किस बात की छुट्टी है, कोई बता सकता है” ।
बातूनी तान्या बोली, वह तो हमको नही मालूम” 
“वेरी गुड, छुट्टी है, मालूम है, पर क्यों छुट्टी है किसी को नहीं मालूम”
सब बच्चे एक-दूसरे का मुंह देखने लगे । दीदी स्वयं बोली, “आज है श्रमिक दिवस, या मजदूर दिवस । चुटकी जो वर्कर्स बोल रही थी न, वे ही मजदूर या श्रमिक हैं । 1 मई को सारी दुनिया में श्रमिक दिवस या मजदूर दिवस मनाया जाता है । आप लोग तो जानते ही हैं, कोई भी फ़ेक्ट्री या कारख़ाना मजदूरों के बिना नहीं चल सकता । 1 मई को सभी जगह छुट्टी रखी जाती है, मजदूरों का सम्मान किया जाता है, ज़्यादा अच्छे मजदूरों को विशेष इनाम और सर्टिफिकेट वगैरह दिये जाते हैं । इसके अलावा, इस दिन मजदूरों के वेतन के बारे में, उनके काम के हालात सुधारने के बारे में, कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं । इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य, मजदूरों के कार्य के घंटे निर्धारित करना और उनको बराबर वेतन दिलवाना है । अमरीका में, उद्योग को बढ़ावा देने के लिए, मजदूरों से 15-15 घंटे काम करवाया जाता था । इसके खिलाफ़ मजदूरों ने आवाज उठाई । दूसरे सामाजिक संगठनों ने भी मजदूरों का साथ दिया और उसके बाद कार्य के लिए 8 घंटे निर्धारित कर दिये गये ।
मजदूर दिवस सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के 80 से भी ज्यादा देशों में मनाया जाता है । हमारे देश भारत में, मजदूर दिवस, 1 मई 1923 से मनाना शुरू हुआ” ।
“….1 मई को सिर्फ मजदूर दिवस ही नहीं है, एक और महत्वपूर्ण दिन है, कोई बता सकता है ? सबने न में मुंडी हिला दी । दीदी ने ही बताया “1 मई को महाराष्ट्र दिवस भी मनाया जाता है । इसी दिन वर्ष 1960 में महाराष्ट्र राज्य बनाया गया था । और एक बात बताऊँ, इसी दिन गुजरात दिवस भी है । इसी दिन, इसी वर्ष मतलब 1 मई, वर्ष 1960 को गुजरात राज्य भी बना था । है न मजेदार बात, एक दिन में तीन त्यौहार ….” 
बातूनी सौम्या बीच में बोले बिना न रह सकी, अरे वाह, एक दिन में तीन-तीन त्यौहार, कितना अच्छा होता, तीनों त्यौहार अलग-अलग होते तो हमें स्कूल से तीन छुट्टियाँ मिलती….”  बड़बोला रोहण भी कहाँ चुप रहने वाला था । फटाक से बोला, “…सौम्या को तो हमेशा छुट्टियाँ चाहिए । अब छुट्टियाँ भूल जा, पढ़ाई पर ध्यान दे…”  “जा…जा… पढ़ाई के लिए अपनी चिंता कर, मानीटर तू अपने क्लास का है, हम लोगों का नहीं …, दीदी समझाओ न इसको…” 
देखो, छोटी–छोटी बातों पर झगड़ा करोगे तो कहीं भी सफलता नहीं मिलेगी । हम अभी यही बातें कर रहे थे कि मजदूरों ने, एकजुट होकर, आंदोलन करके ही अपने अधिकार हासिल किए । आप लोग तो एकता दिखा ही नहीं रहे हैं । आज आप लोग प्रोमिस करो, झगड़े नहीं करोगे । प्रोमिस दीदी, प्रोमिस दीदी और मेरे नन्हें श्रोता हँसते-हँसते वहाँ से चले गए ।

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