संपादकीय : ए.ओ. हयूम से सोनिया गान्धी तक कांग्रेस की कथा 3

कांग्रेस एवं अन्य राजनीतिक दल लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा के राज में संविधान एवं लोकतन्त्र को ख़तरा है। मगर सच तो यह है कि कांग्रेस एवं अन्य दलों में भीतरी लोकतन्त्र जैसी कोई व्यवस्था है ही नहीं। हम गान्धी परिवार, ममता बैनर्जी, मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नवीन पटनायक आदि के स्थान पर किसी बाहरी व्यक्ति की पार्टी अध्यक्ष के पद पर सोच भी नहीं सकते।

कांग्रेस पार्टी पिछले दो दशकों से अपनी भद्द पिटवाने में माहिर होती जा रही है। दस वर्ष तक मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री पद पर बिठाने का नाटक तो जनता ने सह लिया मगर कांग्रेस वर्किंग कमेटी वाला नाटक तो अभी तक किसी के गले नहीं उतरा है। 
पहला नाटक राहुल गान्धी ने किया कि मैं अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे रहा हूं। अब गान्धी परिवार से कोई अध्यक्ष नहीं बनेगा। मगर चमचे, कड़छियां और पतीले शोर मचाने लगे। आख़िरकार पार्टी के अस्तित्व को बचाए रखने के लिये सोनिया गान्धी को एक बार फिर से कुरबानी करनी पड़ी और पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष बनना पड़ा।  
इस बीच शोर मच गया कि सोनिया गान्धी की तबीयत ठीक नहीं रहती। इसलिये वे अंतरिम अध्यक्ष पद से मुक्ति चाहती हैं। अबकी बार चमत्कार यह हुआ कि कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गान्धी को एक चिट्ठी लिख मारी। 
चिट्ठी लिखने वालों में गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, शशि थरूर, विवेक तन्खा, मुकुल वासनिक, जितिन प्रसाद, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, एम वीरप्पा, मोइली, पृथ्वीराज चव्हाण, पी.जे. कुरियन, अजय सिंह, रेणुका चौधरी, मिलिंद देवड़ा, राज बब्बर, अरविंदर सिंह लवली, कौल सिंह ठाकुर, अखिलेश प्रसाद सिंह, कुलदीप शर्मा, योगानंद शास्त्री, संदीप दीक्षित जैसे नाम शामिल थे। 
इस चिट्ठी ने तो हड़कंप मचा दिया। इस चिट्ठी में जो पांच मुद्दे विशेष तौर पर उठाए गये थे उन में शामिल थे – 
पहला – कि कांग्रेस पार्टी में नीचे से ऊपर तक बदलाव होने चाहिए. 
दूसरा – कि कांग्रेस पूर्णकालिक अध्यक्ष का चुनाव करे और पार्टी की लीडरशिप प्रभावी तरीके से काम करे.
तीसरा – कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के चुनाव कराए जाएं
चौथा – कि ब्लॉक स्तर पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के स्तर पर और ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के स्तर पर चुनाव कराए जाएं।
पांचवां – कि बीजेपी के खिलाफ एक नए मोर्चे का गठन किया जाए जिसमें पूर्व कांग्रेसी नेता और ऐसी पार्टियां हों जो बीजेपी का विरोध करती हैं.
इसके बाद गांधी परिवार के करीबी नेताओं ने इसे पार्टी विरोधी गतिविधि बताकर इन 23 नेताओं का विरोध शुरू कर दिया। मनमोहन सिंह, कैप्टन अमरिन्दर सिंह, अंबिका सोनी आदि ने इन नेताओं पर आरोप लगाए कि ये अब तक सोनियां गान्धी के कारण हलवा पूरी खाते रहे हैं और अब अचानक तलवार लेकर सामने आ गये हैं। 
राहुल गान्धी ने तो कपिल सिब्बल और ग़ुलाम नबी आज़ाद पर सीधे सीधे इल्ज़ाम लगा दिया कि वे भाजपा से मिले हुए हैं। ग़ुलाम नबी आज़ाद ने तो सीधे सीधे इस्तीफ़ा देने की पेशकश कर दी। जल्दी से अग्नि शमन कार्य प्रारम्भ हुआ और दिखावा किया गया कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। 
इस पूरे एपिसोड से एक बात तो साफ़ हो गयी कि कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र जैसी कोई स्थिति नहीं हो सकती। गान्धी परिवार – सोनिया, राहुल और प्रियंका के बाद पार्टी का स्थान आता है। जहां किसी ने इन के बाहर नेतृत्व देखने की बात की तो वो पार्टी विरोधी गतिविधि के अंतर्गत मामला हो जाएगा। 
शोर मचाया जाता है कि भाजपा सरकार बनने के बाद से देश में संविधान और लोकतन्त्र को ख़तरा है मगर  आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। 
सोनिया गान्धी ने 1998 में काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद का भार संभाला। तब से 2020 तक वे ही पार्टी की अध्यक्ष रही हैं। बीच में दो वर्ष के लिये राहुल गान्धी अध्यक्ष बने और उनके त्यागपत्र के बाद से सोनिया गान्धी फिर से कार्यवाहक अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठी हैं।
जबकि भाजपा में उसी काल में दस बार अध्यक्ष के चुनाव हुए और उनके अध्यक्षों में शामिल हैं –  कुशाभाऊ ठाकरे (1998-2000), बंगारू लक्ष्मण (2000-2001), जेना कृष्णमूर्ति (2001-2002), वेंकेया नायडु (2002-2004), लालकृष्ण अडवाणी (2004-2006), राजनाथ सिंह (2006-2009), नितिन गडकरी (2009-2013), राजनाथ सिंह (2013-2014), अमित शाह (2014-2020), जगत प्रसाद नड्डा (20 जनवरी 2020 – से वर्तमान समय तक)।
कांग्रेस एवं अन्य राजनीतिक दल लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा के राज में संविधान एवं लोकतन्त्र को ख़तरा है। मगर सच तो यह है कि कांग्रेस एवं अन्य दलों में भीतरी लोकतन्त्र जैसी कोई व्यवस्था है ही नहीं। हम गान्धी परिवार, ममता बैनर्जी, मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नवीन पटनायक आदि के स्थान पर किसी बाहरी व्यक्ति की पार्टी अध्यक्ष के पद पर सोच भी नहीं सकते। 
और जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो लगता है ए.ओ. हयूम ने जिस कांग्रेस पार्टी की स्थापना 135 साल पहले 28 दिसम्बर 1885 को की थी उस पर ताला लगाने का काम अब वर्तमान गान्धी परिवार ही करेगा।
तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

4 टिप्पणी

  1. सम्पादकीय ,कांग्रेस पार्टी के वर्तमान सच का आईना है।
    परिवार आधारित पार्टी का अंत बहुत पहले हो जाना था।कांग्रेस
    आई (I)दिसम्बर तक (गयी)होने के आसार हैं,या चिट्ठी ग्रुप नया दल निर्मित कर ले ।

  2. भारत देश की महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पार्टी का
    स्पष्ट विश्लेषण किया है आपने

  3. पार्टी तो आज़ भी अच्छी है …लेकिन यह सभी अपने परिवार के नाम की अटकलों के साथ अड़े हुए हैं और खामियाजा पार्टी भुगत रही है..

  4. कांग्रेस पार्टी का दमदार ऐक्सरे सामने रखने के लिए सम्पादक को साधुवाद।

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