संपादकीय : नागरिकता संशोधन क़ानून और विपक्ष का गैर जिम्मेदाराना रवैया 3

जबसे सी.ए.बी. यानि कि सिटिज़नशिप एमेण्डमेण्ट बिल (जो कि अब एक्ट बन चुका है) भारतीय संसद में पारित हुआ है, भारत में (और विशेष तौर पर भाजपा सरकार वाले प्रदेशों में) हिंसक प्रदर्शन आयोजित किये जा रहे हैं। विशेष ध्यान देने वाली बात है कि राजस्थान और मध्यप्रदेश में कोई हंगामा नहीं हुआ। मैं कहने ही जा रहा था कि शायद इन दो प्रदेशों के मुख्यमन्त्री एडमिनिस्ट्रेशन में बहुत सक्षम हैं, कि समाचार पढ़ने को मिला कि राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत स्वयं एक शांति मार्च का नेतृत्व करने जा रहे हैं।

राजनीतिक दलों की एक अजीब सी मानसिकता सामने आ रही है कि वे नरेन्द्र मोदी को हराने के लिये पूरे देश को जलाने में भी नहीं हिचकिचा रहे। सभी विपक्षी दल जो नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध चुनावों में भी इकट्ठे हुए थे और बुरी तरह से हार गये थे, एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध कौरवों की तरह  चक्रव्यूह रच रहे हैं। ज़ाहिर है कि कांग्रेस और उस से जुड़े दल इसमें एक अहम भूमिका निभा रहे हैं।

प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के बारे में कहा जाता है कि क्योंकि वे पहली पीढ़ी के प्रवासी होते हैं इसलिये उनका जुड़ाव अपने अपनाए हुए देश के साथ न हो कर अपनी जड़ों से अधिक होता है। वे नॉस्टेलजिक हो कर मुड़ मुड़ कर अपनी मातृभूमि की तरफ़ देखते हैं। अपनाए हुए देश से उनकी आस्था नहीं जुड़ पाती। वे अपने आपको उम्र भर भारतीय ही मानते रहते हैं और भीतर से भारत के मसलों से ही जुड़े रहते हैं। हम भारतीय तो प्रवासियों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी से भी ऐसे व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं और इसमें गर्व भी महसूस करते हैं।

जब मैं सोनिया गान्धी की स्पीच टीवी पर सुन रहा था तो मुझे उनकी आवाज़ और शब्दों में कहीं किसी दर्द का अहसास नहीं हुआ। भारत जल रहा है और उनके दल के लोग उस पागलपन को बढ़ावा दे रहे हैं, उन्हें इस बात का कोई अहसास नहीं है। उन्होंने अपने भाषण में नरेन्द्र मोदी  सरकार को तो कटघरे में खड़ा किया मगर एक बार भी प्रदर्शनकारियों से हिंसा रोकने की अपील नहीं की। लग रहा था जैसे वे केवल यंत्रवत शब्द बोल रही हैं। देश की संपत्ति जलने से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। दिमाग़ में एक बात आई, चाहे सोनिया गान्धी प्रवासी साहित्यकार नहीं हैं, मगर वे पहली पीढ़ी की प्रवासी तो हैं।

हालात पर निगाह डालते हुए एक सवाल और मन में आता है कि पूरे भारत में करीब 8000 विश्वविद्यालय हैं जिनके तहत 32000 से अधिक कॉलेज आते हैं। मगर जब हिंसात्मक आंदोलनों की बात होती है तो उसमें कुछ गिने चुने विश्वविद्यालयों के नाम  ही सामने आते हैं। एक प्रश्न मन में आना स्वभाविक है कि क्या उन विश्वविद्यालयों में हिंसात्मक प्रदर्शनों की भी ट्रेनिंग दी जाती है।  

गृह मंत्रालय ने तमाम समाचारपत्रों के माध्यम से ग्यारह सवालों के जवाब देते हुए साफ़ किया है कि सी.ए.ए. और एन.आर.सी. का भारतीय नागरिकों की स्थिति पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। इन हिंसक प्रदर्शनों में अधिकांश प्रदर्शनकारियों से जब पूछा गया कि  क्या उन्हें सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के बारे में कोई जानकारी है तो पाया गया कि उऩ्हें इस बारे में कुछ भी नहीं पता था। यहां तक कि फ़रहान अख़्तर और राकेश ओम प्रकाश मेहरा भी यह सवाल पूछे जाने पर बगलें झांकते नज़र आए।

फ़ेसबुक, व्हटस्एप और अन्य सोशल मीडिया इस मुद्दे को लेकर वायरल हो चला है। मगर अधिकांश लोग अपनी अपनी विचारधारा के अनुसार इन कानूनों का अर्थ निकाल रहे हैं। हम सबको ठण्डे दिल से देश की बेहतरी के बारे में सोचना होगा और यदि सरकार से किसी प्रकार का मतभेद है तो उसे बैठकर बातचीत से सुलझाया जा सकता है।… पत्थरबाज़ी और आगज़नी किसी भी समस्या को हल नहीं कर सकते।

तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

5 टिप्पणी

  1. बहुत ही सन्तुलित और तथ्यात्मक सम्पादकीय। एक सच्चे भारतीय की यही पहचान है कि वह दुनिया के किसी भी कोने में रहे, अपनी आत्मा में मातृभूमि की माटी बसाए रखता है। साधुवाद स्वीकारें

  2. बहुत सुचिन्तित सम्यक और तथ्यात्मक आकलन । मैं आपकी टिप्पणी से पूरी तरह इत्तिफाक़ रखता हूँ।राजनीति के हाशिये पर पड़ी ममता और सोनिया दोनों इसी बहाने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में लगे हैं।
    अनिल अनलहातु ।

  3. हिन्दुस्तान में विपक्षी दलों का सिर्फ और सिर्फ एक ही काम रह गया है कि हरेक मुद्दे पर सरकार की खिलाफत करे और जन भावनाओं को भड़काऐ।देश की उन्नति व सुरक्षा से उन्हें कोई सरोकार नहीं है।

  4. देश में जो चल रहा है, परंपरा के रूप में चल रहा है, इसकी जड़ें ग़हरे तक पहुंची हैं।खत्‍म होने में तो नहीं पर कम होने में वक्‍त लगेगा।

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