संपादकीय : यह दीवाली कुछ अलग सी रही... 1
हिन्दू स्वर्ग और नरक में तो आवाजाही लगी रहती है मगर ईसाई हैवन और  इस्लामी जन्नत तो तभी खुलेंगी जब कयामत का दिन यानि कि डे ऑफ़ जजमेण्ट आ जाएगा। तब तक क्या वहां आइस एज यानि कि चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़ है। क्योंकि वहां तो एँट्री हो नहीं सकती। फिर ईसाई और इस्लामी आत्माएं  कहां भटक रही हैं?

अबकी बार दीवाली 27 अक्टूबर को पड़ी। भारत के लिये यह एक ख़ास दिन है। इसी दिन कबाइलियों के आक्रमण के जवाब में राजा हरिसिंह ने कश्मीर को भारत में शामिल करने के काग़ज़ात पर हस्ताक्षर किये थे।

आज कश्मीर चर्चा का विषय है। आर्टिकल 370 हटाया जा चुका है और कश्मीर एक राज्य से यूनियन टेरेटरी बन चुका है। इस ऐतिहासिक घटना के बाद हमारी पहली दीवाली आयी है। 

जबसे नरेन्द्र मोदी प्रधान मन्त्री बने हैं, वे हर साल दीवाली मनाने के लिये कश्मीर में भारतीय सेना के जवानों के पास पहुंच जाते हैं और उन्हें अपने हाथों से मिठाई खिला कर उनकी दीवाली को ऐतिहासिक बना देते हैं। जवान भी अपने प्रधान मन्त्री को अपने साथ पाकर अपने परिवार से दूर होने के अहसास से मुक्ति पा जाते हैं।

मैं निजी तौर पर बिल्कुल धार्मिक नहीं हूं। कभी किसी को दीवाली, होली, ईद, क्रिसमिस पर बधाई नहीं देता। मुझे धर्म केवल दिखावा लगते हैं। अधिक से अधिक समाज को सही ढंग से चलने का निर्देश देने वाली नियम पुस्तिका। कैसे जीना है, रहना है, खाना है पीना है और पहनना है। 

दक्षिणपन्थी मुझ पर विश्वास नहीं करते और शक़ की निगाह से देखते हैं तो वामपन्थी मुझे संघी, भाजपाई और मोदी भक्त कहते नहीं थकते। 

जबकि मेरा मानना है कि हर धर्म का भगवान अपने आपको सर्वशक्तिमान बताता है और उसकी पूजा अर्चना ना करने पर दण्ड देने की धमकी भी देता है। 

धर्म हमेशा मेरे मन में संशय पैदा करता है। मन में सवाल कुलबुलाने लगते हैं। कई बार तो भगवान के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े होने लगते हैं। यदि कोई सचमुच का भगवान है तो वो अपने नाम पर हो रही बेहूदगियों को सहन कैसे करता है। 

फिर सोचता हूं कि हिन्दू स्वर्ग और नरक में तो आवाजाही लगी रहती है मगर ईसाई हैवन और  इस्लामी जन्नत तो तभी खुलेंगी जब कयामत का दिन यानि कि डे ऑफ़ जजमेण्ट आ जाएगा। तब तक क्या वहां आइस एज यानि कि चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़ है। क्योंकि वहां तो एँट्री हो नहीं सकती। फिर ईसाई और इस्लामी आत्माएं  कहां भटक रही हैं?

ऐसे में मेरे लिये कोई भी त्यौहार मनाना बहुत मुश्किल हो जाता है। एक बात और, मेरे बाऊजी बहुत धार्मिक व्यक्ति नहीं थे। अपनी युवावस्था में उनका एक अंग्रेज़ महिला से प्रेम भी हो गया था। जब देशप्रेम के चक्कर में बाऊजी को जेल हो गयी तो उस युवती के माता पिता अपनी बेटी का भविष्य बचाने के लिये उसे इंग्लैण्ड वापिस ले गये। 

मेरी माँ करीब 15 वर्ष की थीं जब उनकी शादी हुई। 30 जनवरी 1948 को जिस दिन गान्धी जी की हत्या हुई थी। यानि कि शादी का दिन बहुत ही यादगार था। इसलिये माँ को भी पूजा अर्चना की कोई ख़ास ट्रेनिंग नहीं मिली थी। बस शिवजी को मानती थीं। उन्हीं को याद करती थीं… आज भी करती है। मगर उन्हें धार्मिक अनुष्ठानों की अधिक जानकारी नहीं थी।

मैं लंदन में अकेला रहता हूं और त्यौहार वाले दिन अपने आपको और अकेला कर लेता हूं। नहीं चाहता कि मुझे कोई भी धार्मिक त्यौहार याद भी आए। यहां लंदन में हर भारतीय त्यौहार ख़ासी धूमधाम से मनाया जाता है… एक सामाजिक अनुष्ठान के तौर पर। मगर मुझे सब बनावटी सा लगता है। बस अकेले में ख़ुश हो लेता हूं। हां मेरा एक वैश्विक परिवार है… उस परिवार के सदस्यों से लगातार संपर्क बना रहता है।

इस बार ना जाने क्यों जी चाहा कि मैं भी दिये जलाऊं। अपने भारत के जवानों के नाम। उनको कहूं कि हमारी दीवाली आपके नाम है। हम चाहे भारत में रहें या विदेश में हमारे दीप केवल आपके लिये जलेंगे। अब मुझे नहीं पता कि राम वापिस अयोध्या पहुंचे या नहीं मगर मेरी जन्मभूमि के रखवाले अब चौड़ा सीना लिये जब चाहें सीमा के उस पार जाकर आतंकियों को सबक सिखा आते हैं। मेरे लिये दीवाली के मतलब बदल गये हैं… मेरी दीवाली की अब एक यूनिफ़ॉर्म भी है और मुझे अटेन्शन किये जाती है।

तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

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