कुछ दिक़्क़तों के दिन रहे, शोर रात भर हुआ
इस तरक़्क़ी की ख़ुशी में, आज मैं बेघर हुआ   
दूर बस होता गया, फिज़ूल अपनी ज़िद लिए
ना हो मग़रूर आप पर, सोचा बहोत मगर हुआ 
चाँद उगता देश में भी, सूरज भी आता रोज़ होगा
पर खोजता परदेस में, कुछ हाल इस क़दर हुआ 
सुबह लाने के लिए, शाम बेचता है नगर ये
घर के सजाए ख़ूब कोने, ना वो गाँव ना शहर हुआ 
यूँ तो रेशमी रंगीनसी, है ख़्वाहिशों की ये ज़मी
और चाँद पाने के लिए, पहरदोपहर हुआ 
दौड़ थी बस जीत की, सो छोड़ आया मीत भी
उन्नति को क्या सज़ा दूँ, ख़ुद मैं दरबदर हुआ
कुछ दिक़्क़तों के दिन रहे, शोर रात भर हुआ
इस तरक़्क़ी की ख़ुशी में, आज़ मैं बेघर हुआ   

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