साहित्य और संगीत के अद्भुत साधक महाकवि प्रवासी भारत रत्न प्रोफ़ेसर प्रो हरिशंकर आदेश (7 अगस्त, जन्म 1936) अब हमारे बीच नहीं हैं। 27 दिसंबर की देर रात उनका स्वर्गवास हो गया। भारत के प्रवासी साहित्यकारों में सबसे अग्रणी पद्मभूषण से विभूषित प्रोफ़ेसर आदेश के दर्शन का सौभाग्य मुझे 2002 में तब मिला, जब मैं दस दिवसीय प्रवास पर त्रिनिदाद गया था।
उस वक्त प्रख्यात व्यंग्यकार  प्रेम जनमेजय जी चार साल की प्रतिनियुक्ति पर  वहीं थे और वहां के लोगों को हिंदी शिक्षण का पुनीत कार्य कर रहे थे। उनके मार्गदर्शन में ही वेस्टइंडीज विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन किया था । तब जनमेजय जी ने अनेक लेखकों के साथ मुझे भी आमंत्रित किया था। उस दौरान ही प्रेम जी और अनेक साहित्यकारों के साथ हम सब ने प्रोफेसर आदेश के निवास पर जाकर उनके कार्य को देखा था।
साहित्यकारों के प्रतिनिधि मंडल में नरेंद्र कोहली ,कन्हैयालाल नंदन और अशोक चक्रधर जैसे अनेक नाम थे । ब्रिटेन से तेजेंद्र शर्मा भी और पद्मेश गुप्ता आदि भी पधारे थे । अनेक नाम मैं भूल रहा हूं लेकिन सभी हिंदी के महत्वपूर्ण रचनाकार थे । आदेश जी का घर किसी साधक की कुटिया से कम न था। वे वहां न केवल हिंदी शिक्षण कर रहे थे वरन संगीत की शिक्षा भी दे रहे थे ।

प्रोफेसर हरिशंकर आदेश : एक महान प्रवासी साहित्यकार का अवसान 3

त्रिनिदाद में भले ही भारतवंशी बहुत अधिक है, पर हिन्दी वहां  जड़ नहीं जमा सकी थी । (यह अच्छी बात है कि अब बहुत से पुराने लोग भोजपुरी और अवधि को वहां जिंदा रखे हुए थे।  प्रोफेसर आदेश जी ने त्रिनिदाद में वहां रहकर हिंदी शिक्षण का बीड़ा उठाया। बाद में प्रेम जनमेजय  और सुरेश ऋतुपर्ण जैसे लेखकों ने भी  अपना महती योगदान किया ।
प्रोफ़ेसर आदेश ने त्रिनिडाड एंड टोबागो के साथ कनाडा को भी अपनी कर्म स्थली बनाई। वहां रहकर वे अपनी मातृभूमि यानी भारत को भूले नहीं । लगातार भारतीयों के संपर्क में रहते थे ।  कोल्हापुर विश्वविद्यालय में प्रो. हरिशंकर आदेश अतिथि प्राध्यापक के रूप में  भी आए। इस विश्वविद्यालय में दो बार जाने का मुझे अवसर मिला। यहां आदेश जी के साहित्य पर निरंतर शोध कार्य हो रहे थे।
आज के दौर में महाकाव्य लगभग नहीं के बराबर लिखे जा रहे हैं लेकिन हरिशंकर आदेश जी ने अनेक महाकाव्यों के रचना की। लगभग 350 पुस्तके उनकी प्रकाशित हुई आठ- दस महाकाव्य दस-पंद्रह खंडकाव्य शामिल है। उन के महाकाव्यों का उल्लेख जरूर करना चाहूंगा। ये हैं, अनुराग, शकुन्तला, महारानी दमयन्ती, ललित गीत रामायण, देवी सावित्री, रघुवंश शिरोमणी। खंड काव्यों की संख्या तो लगभग तीस है। हंस,महिमा,ललिता लक्ष्मी,हैतुक भक्ति, तपस्वी हाथी, आचरणवान साधु, मनोव्यथा,सावित्री, महाभारत कथा,देवी उपाख्यान, जनगीता,निष्पाप,रहस्य, साधना,  शव दहन स्थान, कोप भाजन,राजतनय, गरिमा , सत्संगति, महत्व,रह गई याद, पिछली सुधियाँ,रह गई याद आदि।
अपने 84 साल के जीवन में  आदेश जी ने  साढ़े तीन सौ से अधिक  पुस्तके लिखकर  यह सिद्ध कर दिया  कि वे  आत्मा से  सृजक है ।  उनका व्यक्तित्व किसी ऋषि से कम नहीं था।  मैंने त्रिनिदाद में देखा कि वे जहां रहते थे,  वहां आने वाले बच्चे, बूढ़े सभी उनके परम भक्त थे । एक बुजुर्ग महिला  जो हिंदी नहीं बोल पाती थी,  वह संगीत सीखने आदेश जी के आश्रम में नियमित रूप से आती थी। कुछ बच्चों ने  हिंदी बोलकर हमें अभिभूत कर दिया । कुछ ने अपनी ही लिखी कविता भी सुनाई।
विकिपीडिया में दर्ज उनका परिचय कुछ इस तरह से उपलब्ध है, “प्रो॰ आदेश ने कनाडा, अमेरिका व त्रिनिडाड के मिनिस्टर ऑफ रिलीजन, भारतीय विद्या संस्थान के महानिदेशक, श्री आदेश आश्रम ट्रिनिडाड के कुलपति, ज्योति एवं जीवन ज्योति त्रैमासिक के प्रधान संपादक तथा वर्ष विवेक एवं अंतरिक्ष समीक्षा के संपादक जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है। वे अंतर्राष्ट्रीय हिन्दू समाज अमेरिका तथा विद्या मन्दिर कनाडा के आध्यात्मिक गुरु, स्वतंत्र साहित्यकार एवं संगीतकार, संगीत निर्देशक, गायक, वादक, प्रवाचक, यायावर, मानद उप राज्यपाल व भूतपूर्व सांस्कृतिक दूत (भारत) भी रहे हैं। उन्होंने आश्रम कॉलिज ट्रिनिडाड में प्रधानाचार्य व हिन्दी तथा संगीत के प्रोफ़ेसर के पद पर आपने महत्वपूर्ण सेवाएँ समाज को अर्पित की हैं।”
प्रो आदेश ने  भारत में विद्या अध्ययन करने के बाद त्रिनिदाद में भारत के सांस्कृतिक दूत नियुक्त हुए  और उसके बाद तो वहीं के होकर  रह गए। त्रिनिदाद, कनाडा और अमेरिका  इन तीन देशों में  उनके अनेक शिष्य आज भी विद्यमान है।  प्रवासी भारत रत्न, प्रवासी हिन्दी भूषण, विश्व तुलसी सम्मान, मानस मनीषी, सुगन्धरा(संगीत), हमिंग बर्ड मैडल गोल्ड नैशनल एवार्ड (रिपब्लिक ऑफ़ ट्रिनीडाड एण्ड टोबेगो) वर्ल्ड लौरेयट (यू.एस.ए.), लिविंग लेजण्ड ऑफ़ ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी (यू.के.), इन्टरनैशनल पीस प्राईज़ (यू.एस.ए.) आदि अनेक सामानों से विभूषित है प्रोफ़ेसर आदेश। उन्होंने अनेक विधाओं में निरंतर लेखन किया।  बाल साहित्य लिखा। व्यंग्य भी लिखे। महत्वपूर्ण विषयों पर निबंधों की रचना की।  कविता तो उनकी आत्मा का ही शानदार थी । अपने कवि कर्म को उन्होंने इन पंक्तियों में रूपायित किया था
”कविता ही मेरा जीवन,
 मेरा जीवन ही कविता। 
मैं परिभाषा कविता की, 
मेरी परिभाषा कविता।।”
कविता ही उनका जीवन था। उनके जीवन में कविता ही केंद्र में रहती थी। साहित्य लेखन उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। वह बहुत बड़े संगीतकार भी थे। संगीत पर भी उनकी कुछ किताबें हैं।  त्रिनिदाद के अपने आश्रम में वे हिंदी शिक्षण के साथ-साथ संगीत शिक्षण भी किया करते थे।
सन 2020 वैसे भी पूरी दुनिया के लिए मनहूस साबित होता रहा है। इस दुखद घड़ी में एक और  दुखद घटना यह घटी कि हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण महाकवि हम सबके बीच से चला गया। कोविड-19 कारण दुखद घटना यह हुई कि  आदेशजी का निधन हुआ है लेकिन फ्लोरिडा में रहने वाले  उनके  बेटे और बेटी पिता के अंतिम संस्कार में  त्रिनिदाद नहीं पहुंच सके,  क्योंकि विमान सेवा ही स्थगित है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दोनों बच्चे अपने पिता का अंतिम संस्कार देखेंगे । कोरोना के कारण न जाने कैसे-कैसे दुखद दौरों से हम सबको गुजारना पड़ा है । प्रवासी साहित्य को एक ऊंचाई प्रदान करने वाले महान रचनाकारों में प्रोफ़ेसर हरिशंकर आदेश का नाम सदा-सदा के लिए अमर हो गया है। अपने काव्य संग्रह ‘लहरों के संगीत’ में आदेश जी ने मृत्यु के बारे में जो अपना दर्शन रखा था ,उसे मैं यहां प्रस्तुत करना चाहता हूं । उनकी एक कविता है ‘मृत्यु’, उसकी कुछ पंक्तियां देखें,
मृत्यु आती नहीं, जाती नहीं।
यह तो मील के पत्थर की तरह
सदैव अचल खड़ी रहती है, जो
हर जीवन पथिक का लक्ष्य होता है,
आगे बढ़ने के लिए।
मृत्यु एक पर्वत है,
अविचल, अटल,अक्षय,
जहाँ जीवन-घन
चलकर स्वयं ही पहुँचते हैं;
और झिमिर-झिमिर बरस कर
स्वयं बिखर जाते हैं।
पुन: जीवन बनकर उड़ने के लिए।
बहने के लिए।
इसके बाद और भी पंक्तियां हैं, जिनमें उन्होंने मृत्यु और जीवन के दर्शन को प्रस्तुत किया है। कहने का मतलब यह है कि प्रोफेसर आदेश जीवन और मृत्यु के द्वंद्व को समझते थे और उसके भय परे होकर अपने सृजन कर्म में रत रहते थे। मुझे उम्मीद है कि उनका वृहद लेखन हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों इस शोध का विषय बनेगा।दुर्भाग्य की बात है कि नई पीढ़ी के अनेक साहित्यकार उनके अवदान से  अपरिचित  हैं।  लेकिन अब गूगल के माध्यम से भी  प्रोफ़ेसर आदेश के साहित्य को  देखा परखा जा सकता है ।
प्रवासी साहित्य के नाम पर जो कूड़ा करकट पसर रहा है, उसका सफाया तभी हो सकता है जब प्रोफ़ेसर हरिशंकर आदेश जैसे महान रचनाकारों की परंपरा को आगे ले जाने का कार्य हो । वैसे उन पर बहुत से शोध हो रहे हैं। मगर भविष्य में भी होने चाहिए । जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, महाकाव्यों का जो वृहद सृजन उन्होंने त्रिनिदाद में रह कर किया, वैसा तो भारत में रहकर कोई भी साहित्यकार नहीं कर पाया। अब समय आ गया है कि भारत में भी आदेश के साहित्य के मूल्यांकन का सिलसिला निरंतर जारी रहे।

1 टिप्पणी

  1. प्रो आदेश के जीवन पर समग्र लिखने के लिए श्री गिरीश पंकज
    जी को साधुवाद ।
    डॉ प्रभा मिश्रा

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