समीक्षक
डॉ रवि रंजन ठाकुर
कहानी अपने भीतर बहुत कुछ ऐसा छुपाए होती है जो सहृदय पाठकों से एकांत में संवाद करती है। यह संवाद पाठकों को कई आयाम ढूंढने या समझने में सहायक होता है। कहानी की विशेषता आदिकाल से यह रही है कि यह चराचर जगत के सत्य को किसी ने किसी रूप में व्यक्त करती है। वर्तमान समय वह संक्रमण का समय है, जब मनुष्य के भीतर धर्म, आध्यात्म, आधुनिकता, राजनीति, इतिहास समाज इत्यादि को लेकर कई अंतर्द्वंद्व पनप रहे हैं। इन पर मनुष्य अपनी सोच या अनुभव से विजय भी प्राप्त कर रहा हैं। इस अंतर्द्वंद से निकलने में जिस स्पष्ट एवं सुचिंतित संदर्भ की आवश्यकता होती है वह हमें विभिन्न दर्शन व चिंतन से प्राप्त होता है। कहानी दर्शन को अपने में समाहित किए होती है एवं चिंतन के लिए हमें प्रेरित करती रहती है।
आधुनिक समय में सांस्कृतिक बदलाव हमें सर्वत्र दिखाई देता है। आवरण किसी आधुनिकता को ढक नहीं सकता- इसी तरफ यह कहानी संग्रह “हाजरा का बुर्का ढीला है” संकेत करता है। इसमें तबस्सुम जहां ने यह साफ करने का प्रयास किया है कि धर्म चाहे जितने जोर लगा ले, वह आधुनिक बदलाव को रोकने में अक्षम है। महत्वपूर्ण यह है कि यह किसी भी समुदाय एवं धर्म में परिलक्षित किया जा सकता है। मनुष्य की अपनी समस्याएं होती हैं जिनमें चढ़ता उतरता हुआ अपने जीवन को गति प्रदान करता है। इस क्रम में वह कितने ही ऐसे पहलुओं से गुजरता है,जो कहानी को जन्म देने वाला होता है। इस कहानी संग्रह की सभी कहानियां इस पहलुओं की देन है। महामारी जैसे भयानक दुष्काल का वर्णन कई बड़े रचनाकारों की कहानियों में मिलता है। इस कहानी संग्रह में भी महामारी की विभीषिका को तबस्सुम जी ने इंगित करने का प्रयास किया है। देखा जाए तो ‘मौत बे आवाज आती है’ कहानी में मौत के जो भयानक संकेत का यहाँ वर्णन है, वह लोग दृष्टया प्रचलित है। लेकिन कहानी का ताना-बाना इतनी बारीकी से तैयार किया गया है कि इसमें यह तथ्य पाठकों के अंतर मन को मथ कर रख देता है। ‘रोटी से जीवन शुरू और रोटी से अंत’ जैसे संवाद किसी एक मनुष्य की बात ना होकर यह संपूर्ण मनुष्य के जीवन की स्थिति को प्रकट करता है।
‘पानी और आसमान’ कहानी में बदलाव और मछली को लेकर जो संवाद प्रस्तुत किए गए हैं वह अपनी कलात्मकता में ‘विनोद कुमार शुक्ल’ के बराबरी में रखा जा सकता है। संवाद छोटे और लोक से उद्धृत हैं। अपनी कलात्मकता में यह लेखन कला की श्रेष्ठ को प्रदर्शित करने वाला है।‘अपने-अपने दायरे’ कहानी में लेखिका गर्मी का वर्णन करते हुए कहती हैं कि “गर्मी अपना दायरा उलांघ रही थी। सूरज अपना गरम पैमाना छलका रहा था। लोग बेहाल परेशान,पसीने से दो-चार हो रहे थे।” वातावरण का इतना वास्तविक वर्णन बेहद सराहनीय है जो समय का चित्रण सफलतापूर्वक हमारे समक्ष प्रस्तुत कर देता है।
इसी क्रम में देखा जाए तो ‘झूठा ईश्वर’ कहानी प्राचीन कलेवर में आधुनिक संदर्भ को व्याख्यायित करने वाली है। यह कहानी अपने शिल्प एवं सुगठित रचना कौशल के कारण पाठकों के ऊपर कई प्रकार से प्रभाव छोड़ने का प्रयास करती है। हाजरा का बुर्क़ा ढीला है कहानी में एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अपनी देह जनित हीन भावना से उबरने का हर संभव प्रयास करती है। ‘भूसे की सुई ‘कहानी स्त्री के स्वयं को साबित करने की कहानी है जिसमें नौकरीजीवी वर्ग के जद्दोजहद को दिखाया गया है पितृसत्ता की शिकार स्त्री की दास्तान ’गुरु दक्षिणा’ कहानी प्रस्तुत करती है। पुरुष प्रधान समाज में स्त्री का स्वयं के लिए स्वयं को साबित करना कितना कठिन है, इसमें देखा और परखा जा सकता है। विकृत पितृसत्ता का स्वरूप जो यहाँ उजागर होता है वह बेहद चौंकाने वाला है।
स्त्री के मनोभाव को कहानीकार, इतने जीवंत रूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर सकी हैं तो उसका प्रमुख कारण यह है कि वह स्वयं स्त्री हैं एवं स्त्री को स्त्री की नजर से देखती हैं। और यही कारण है कि इन कहानियों में स्त्री का जो दर्द उभरता है वह संपूर्ण स्त्री की स्थिति को बयां करने वाली है। अपने स्वरूपगत विकास में इस संग्रह की कहानियां एक से दूसरे पायदान पर आगे की तरफ बढ़ते हुए चलती हैं। संपूर्ण संग्रह में कहानी दर्शन के विभिन्न आयाम से सुगमतापूर्वक अवगत कराती चलते हैं। कहानी पाठकों के मन पर गहरा छाप छोड़कर उन्हें चिंतन के नए आयाम से अवगत कराती है।इस संदर्भ में कहा जाए तो यह कहानी संग्रह अपने आप में सफल है।
इस कहानी संग्रह में जो विस्तृत कैनवास है उसमें नैतिक मूल्यांकन देखा जा सकता है। आधुनिक कहानियों में अराजकता और आधुनिकता का जो घाल-मेल वर्तमान समय में दिखाई देता है, उस तरह का विवाद तबस्सुम जी की कहानियों में दिखाई नहीं देता है। खुशी इस बात से महसूस होती है कि यह कहानी संग्रह अपनी छोटे कलेवर में सांस्कृतिक बदलाव के कई पहलुओं से हमें अवगत कराता है। जिनमें कोरोना जैसी भयानक महामारी का पहलुगत परिचय मिल जाता है। इस कहानी संग्रह में विभिन्नता को देखते हुए कहानीकार के चिंतन फलक को समझा जा सकता है। इस संग्रह की कहानियाँ न केवल पाठकों को झंझोड़ती हैं अपितु उनकी आँखों को भी नम कर जाती हैं। विसंगतियों का ऐसा ताना बाना लेखिका ने बुना है लगता है दृश्य सामने ही घटित हो रहा हो। कहानी पढ़ते हुए सभी चरित्र सामने जीवंत हो उठते हैं। भाषा और उसकी शैली पर कमाल की पकड़ लेखिका की रही है।
डॉ तबस्सुम जहां का कहानी संग्रह ‘हाजरा का बुर्क़ा ढीला है‘ में छोटी बड़ी 12 कहानियाँ हैं जो अनेक मानवीय मूल्यगत संस्कारो के ओतप्रोत नज़र आती हैं। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित पेपर बैक संस्करण के इस संग्रह में कुल 94 पेज हैं और इसका मूल्य 175 रुपए है।
डॉ रवि रंजन ठाकुरजी
आपके द्वारा रचित तबस्सुम जहां का आधुनिक सांस्कृतिक बदलाव से ओतप्रोत कथा-संग्रह : हाजरा का बुर्का ढीला है की समीक्षा पढ़ी।
अच्छी समीक्षा है सर!
बहुत बहुत बधाइयाँ आपको।