Sunday, July 26, 2026
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उपेक्षित वर्ग के संघर्ष को चित्रित करने वाली कथाकार स्वरूप कुमारी बख्शी

  • प्रो रुचिरा

स्वरूप कुमारी बख्शी का जन्म 22 जून, 1919 को लखनऊ में पंडित बद्री प्रसाद शिंगलू  ( कश्मीरी पंडित परिवार) के यहां हुआ । स्वरूप कुमारी बक्शी हिंदी की सुविख्यात, वरिष्ठ साहित्यकार हैं। इन्होंने कहानी, उपन्यास, लघु उपन्यास, कविता , खंडकाव्य, एवं नाटक, बाल-साहित्य जैसी अनेक विधाओं के द्वारा हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। इनकी लगभग  37 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सन्1940 में उनका विवाह वकील श्री राज कुमार बख्शी से हुआ था। इनका लौकिक शरीर 13 अप्रैल 2019 को पंचतत्वों में विलीन हो गया।

स्वरूप  कुमारी बख्शी के तीन कहानी संग्रह लोकप्रिय हैं। (1) कौड़ियों का नाच (टूटा हुआ चिराग, जंगीसिह, लुटेरे का दान, प्लास्टिक को दुनिया, निराली शान, काश्मीरी मुहल्ला, तितलियों की सभा, फ़ैशन की घुड़दौड़, इन्सानियत का नक़ाब और कौड़ियों का नाच ) (2) रेडियम के अक्षर-(मशीन की पीड़ा, घर की बेटी, बाँके और बन्नो, काश्मीर का फूल, कजली का प्रेमी, शीशे की मेम, मास्टर जी, ठंडी मशीन, मशीनों के आँसू तथा रेडियम के अक्षर) (3) निर्झर कन्या- (निर्भर कन्या, बन्नो की झाडू, नारी का आँचल, फीफी का फैशन, चुनरिया तारों की, अयोग्य बेटा, सेंट की शीशी, कोकिला, बुलबुल और जीवन की सात समस्याएँ )

स्वरूप कुमारी बख्शी की कहानियों के कथानको में विषय वैविध्य मिलता है। कहानी और रेखाचित्र के तत्वों को अपने में समेटे यदि ‘मास्टर जी ‘,’टूटा हुआ चिराग’,’ठंडी मशीन ‘,’जंगीसिंह’, जैसी कहानियां हैं तो अति आधुनिकता से युक्त, आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन, खोखलेपन, प्रदर्शन प्रियता , और धीरे -धीरे स्वयं भी यंत्र बनने का अंकन करने वाली ‘फैशन की घुड़दौड़ ‘,’तितलियों की सभा ‘,’ प्लास्टिक की दुनिया ‘,’काश्मीरी मुहल्ला ‘ सदृश कहानियां भी हैं। आधुनिक मनुष्य अपनी भारतीय संस्कृति और सभ्यता को भूल चुका है । उसे लगता है कि सभ्य, सुसंस्कृत होने का अर्थ है मदिरा सेवन करना, देर रात्रि तक पार्टियां करना, रेस में धन व्यय करना आदि। इस दृष्टि से ‘इंसानियत का नकाब’,’कौड़ियों का नाच’ महत्वपूर्ण रचनाएं हैं।

आधुनिक भौतिकतावादी युग में मनुष्य ने अपनी संवेदनाओं को खो दिया है। वह धीरे-धीरे मशीन में बदलता जा रहा है। दिन-रात ऐश्वर्य पूर्ण जीवन जीने की चाह में वह जीवन के सच्चे आनन्द से दूर हो गया है। उसके सभी संबंध अर्थ पर आधारित होते हैं। इस तथ्य को लेखिका ने बहुत सुंदर ढंग से ‘मशीन के आंसू ‘ और ‘मशीन की पीड़ा ‘ शीर्षक कहानियों में वर्णित किया है।

‘बांके और बन्नो ‘ तथा ‘घर की बेटी’ कहानियों में लेखिका ने दांपत्य जीवन में पति- पत्नी के मध्य होने वाले विभिन्न मतभेदों को व्यक्त किया है। ‘कजरी का प्रेमी’,’ रेडियम के अक्षर ‘,’कश्मीर का फूल’,’ शीशे की मेम ‘ सदृश्य कहानियों में जीवन के विभिन्न पक्षों के यथार्थ व मार्मिक चित्र उकेरे  गए हैं।

‘निर्झर कन्या ‘ संग्रह की सभी कहानियों में घटनाओं की तुलना में पात्रों की विशिष्ट प्रवृत्तियों को अभिव्यक्त करने में लेखिका की वृत्ति अधिक रमी है। ‘निर्झर कन्या ‘ की हमेशा प्रसन्न रहने वाली झरना, सभी समस्याओं का हल झाड़ू से निकालने वाली ‘बन्नो की झाडू ‘ कहानी की बन्नो , प्रतिकूल  परिस्थितियों से संघर्ष करती सिरमुंडा,  पुरुष वश में रहने वाली ‘नारी का आंचल ‘ की दुर्गा , ‘फीफी  का फैशन’ कहानी  की फीफी , सेवा में ही अपने जीवन को सफल मानने वाली ‘बुलबुल’कहानी की बुलबुल इत्यादि अपनी विशिष्ट चारित्रिक विशेषताओं के साथ अंकित हैं।

स्वरूप कुमारी  ने अपनी रचनाओं में निम्न उपेक्षित वर्ग के संत्रास, पीड़ा ,कुंठा, जीजिविषा, कभी ना खत्म होने वाले संघर्ष को पूरी ईमानदारी से चित्रित किया है। उनके पात्र वर्गगत हैं अतः उनमें उस वर्ग विशेष की विशेषताओं को सहजता से  देखा जा सकता है।  लखनवी शायर (‘टूटा हुआ चिराग’ कहानी) ; भोला (‘मशीन की पीड़ा’ कहानी ); केशव (‘रेडियम के अक्षर’ कहानी ) इसी प्रकार की रचनाएं हैं । मास्टर तुलसीराम ‘मास्टर’ कहानी में अपने छात्रों के दुर्व्यवहार पर भी उनके साथ जिस वात्सल्य भाव से व्यवहार करते हैं वह देखने योग्य है।

उनकी कुछ कहानियां जैसे ‘मशीन के आंसू’,’ प्लास्टिक की दुनिया’,’ इंसानियत का नकाब’,’ तितलियों की सभा ‘, ‘निराली शान’,’ कौड़ियों का नाच ‘ आदि के कथा नायक अथवा नायिका आधुनिक सभ्यता  का अंधानुकरण  करने वाले उन तथाकथित सभ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो झूठी शान शौकत के कारण अपना सब कुछ लुटा देते हैं । उनके लिए मदिरापान करना,  क्लबों में जाना, आयु से कम दिखने के लिए प्रसाधनों का अत्यधिक प्रयोग करना ही जीवन हैं। ऐसे लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति को मानने वालों को असभ्य समझते हैं। एक अति आधुनिक महिला का चित्रण लेखिका ने निम्न पंक्तियों में किया है – “डाली समाज की प्रेमिका है। विशेषकर जब से उन्होंने अपने पति को तलाक दे दिया है तब से तो वह बहुत प्रसिद्ध हो गई है। सुना है कि बहुत अमीर है और बड़े ठाठ से जिन्दगी बसर कर रही है। बंगला है, मोटर है, बैरा है। उनकी आमदनी का जरिया क्या है, यह किसी को मालूम नहीं है। उनकी आँखें सुन्दर हैं, होटल के साइन- बोर्ड की तरह चमकदार, शरीर छरहरा अँधेरे कमरों में जाने के लिये बनी हुई सीढ़ी की तरह घुमावदार । आवाज सुरीली जैसे शराबखाने के काउंटर पर सिक्कों की खनन- खनन।”(1)

‘घर की बेटी ‘ और ‘बांके और बन्नो ‘ की क्रमशः राजरानी और बन्नो अत्यधिक वाचाल हैं। क्रोध आने पर वे पति को मारकर घर से निष्कासित कर देती हैं किंतु कथांत तक अपने आचरण पर अनुताप करती हैं। लेखिका के पात्र स्वाभाविक हैं।

लेखिका ने अपनी कहानियों में सजीव, पात्रानुकूल, सोद्देश्य, शैक्षिक स्तरानुरुप, सारगर्भित, तर्कपूर्ण, उद्देश्यानुरूप संवादों की नियोजना की है। इनके पात्र किसी भी विषय पर गहराई से विचार व्यक्त करने में सक्षम हैं। माधव ( ‘मशीन की पीड़ा’ कहानी), केशव (‘रेडियम के अक्षर ‘ कहानी) इसी प्रकार के पात्र हैं। ‘अयोग्य बेटा’ कहानी के पात्र पंजाबी भाषा के शब्दों (रोट्टी न इयों खाणी, बांह वी दुखदी है )

का अधिक प्रयोग करते हैं। ‘निराली शान ‘ की चंपा के संवाद शुद्ध पूर्वी हिंदी में हैं। ‘ठंडी मशीन ‘कहानी की मारवाड़िन सोनाबाई मारवाड़ी भाषा बोलती है। उदाहरणार्थ –
“अय बिन्दणी !” बहू से बोली, “ई कोई आयो रहो सरकारी भेदियो करम फूटो । म्हांसू एक बात पूछो। वा पूछो कि आप टूथ पेस्ट करो या मंजण दातण । मैं बोल्यो आपां तो भाई दातण कर लेवाँ। फिर पूछवा लागो कि आपां मेज कुरसी पर खाओ वा अठणी-उठणी खा लेवो । तो मैं तो भाई कह दियो, किशाण री मेज कुरसी, उतरा नौकर काँ से लाऊँ। आपां तो सीदा-सादा चौका मां ही जीम लो। आप जादातर मोटर ॐ जाओ या रिक्शा ऊँ, कूण्न सवारी आप बत्तों। ए बाई, महाने तो घणों डर लागो ई कोई होय इणकम टैक्सवालो, आयो है पूछला को तई कि आपणी आमदणी कतरी की होय और सामणे मोटर खड़ी हो। तो मां तो वासो कह दियो, अजी जाओ जी, किशी मोटर किशा रिक्शा, आपाँ तो भई बश मां चली जाओ और राम जी मोखलिया पैर दिया मैं कोण वास्ते जाऊँ शवारी मां। ए भाई शाब आप ही बताओ इतरा पैशा कांशे आये । और जो आपाँ ये मोटर देखो तो या तो मेरे बेटे की हो, सरकारी अफशर हो, हैसियल राखवो कै तई राखणी पाड़े । ईको अतरो इस्तीमाल करूं तो पिटरौल रों खर्चों न हो जाय। ए बाई, रहा कोई इणकम टिक्शवालो ।”(2)

पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण  करते हुए भारतीय नवयुवक अपनी सभ्यता और संस्कृति को भूलते जा रहे हैं । वे आधुनिक होने का अर्थ केवल फैशन करना, क्लब में जाना, मदिरा सेवन करने को समझते हैं। अपनी कहानियों में लेखिका ने उन्हें इस ओर न जाने की प्रेरणा दी है। इसके अतिरिक्त उन्होंने सामाजिक आर्थिक वैषम्य (‘रेडियम के अक्षर’ कहानी), सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों, नारी जीवन की विषमताओं, सामाजिक पारिवारिक दोहरी भूमिका, विज्ञानिक आविष्कारों के कारण मशीन बनते मनुष्य की विडंबनाओं को लिपिबद्ध किया है।
लेखिका ने पात्रानुकूल, भावाभिव्यक्ति में समर्थ, पात्रों के शैक्षिक स्तरानुरुप भाषा का अवलंब लिया है। उर्दू फारसी शब्दों- (खुद, गुफ्तगू, हवास , अदीब), देशज शब्दों (टेम, दुर्दसा, ) अंग्रेजी शब्दों (डियर, हाइड्रोजन) एवं प्रांतीय शब्दों का यथास्थान समुचित प्रयोग किया है।
भाषा को समृद्ध करने के लिए लेखिका ने चित्रात्मक,अनुप्रासमयी, व्यंग्यात्मक, चमत्कारी शैलियों का प्रयोग किया है। उदाहरण स्वरूप –
(अ) अनुप्रासमयी शैली -“इतने में बाबा पहुंच गये।हम सबको फटकारा। चन्दू की चंदिया पर हल्की सी चपत लगाई और माफी मांगकर मेहमान को फर्श पर बैठाया।”(3)
(आ) व्यंग्यात्मक शैली — “दीनू के कानों में हवा की सीटियाँ -सी बज रही थीं। वह बार- बार कान को ढांपने का यत्न कर रहा था किन्तु कालर फटा हुआ था। फटा हुआ न होता तो सभा के मेम्बर मिस्टर भवानीदास उस लड़के को अपना कोट भला क्यों देने लगे वे ? दुर्गा भी किसी प्रकार अपनी हड्डियों को चादर की गठरी में, जो उसे शोभा रानी ने दी थी, छिपाये बैठा था। चादर फटी हुई थी, तभी तो उसे ओढ़ने को मिल गई वरना कौन गृहलक्ष्मी इतनी बुद्धू होगी कि घर की अच्छी चादर एक नौकर को दे डालेगी !” (4)

भाषा में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए लेखिका ने तुक साम्य का भी प्रयोग किया है –” वास्तविक बात यह है कि वह ऐसी कन्या को पत्नी बनना चाहता था जो उसके लिए लाये साइकिल , अंगूठी और बटन और लाये चांदी की छड़ी,  सोने की घड़ी, मोती की लड़ी ।”()(‘रेडियो के अक्षर’  कहानी संग्रह,  पृष्ठ 17)

क ई कहानियों में लेखिका ने मौलिक उपमाओं का प्रयोग कर रोचकता व सहजता की सृष्टि की है जैसे -” फटी हुई पाग के अन्दर से निकला हुआ उसका सिर ऐसा लग रहा था जैसे कोई बम का गोला हो, अभी फूटनेवाला “(5)
पात्रों के व्यक्तित्व को रूपाकार देने के लिए लेखिका ने उनके बाह्य रूपाकृति का अंकन चित्रात्मक शैली में किया है। उदाहरण स्वरूप ‘जंगीसिंह ‘कहानी से उद्धरण देखिए -“उसका चेहरा भी खूब था …रंगमुर्ख दीदे झरोखों की तरह बड़े बड़े कटावदार। नाक मीनार की तरह लम्बी, कुछ घुमाव लिये हुए। गाल गुम्बद की तरह फूले हुए, खूब गोल -गोल होंठ फाटक के कपाट की तरह मजबूत और दाँत नन्हें -नन्हें दीयों की कतार । बड़ी- बड़ी मूंछें, ऊपर की तरफ बटी हुई, नोकदार। सच कहूं जनाव, ऐसा मालूम हुआ करता था जैसे इधर और उधर दो सिपाही अपने हाथ में नेजा़ लिये उस चेहरे की हिफाजत कर रहे हैं।”(6)

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लखनऊ विश्वविद्यालय में इनके साहित्य पर निम्नलिखित शोध कार्य  हुआ है–
1.  मधु चतुर्वेदी, विषय:- स्वरूप कुमारी बख्शी के साहित्य का शैली वैज्ञानिक अध्ययन। (2003)
2.  संगीता दुबे, विषय:- स्वरूप कुमारी बख्शी की साहित्य साधना। (2007)
निष्कर्षत: कह सकते हैं कि लेखिका ने अपने समय की परिस्थितियों, समस्याओं को ‘यथार्थ के कटु’ चित्रों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। कथ्य और शिल्प दोनों ही दृष्टि से उनकी कहानियों के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

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संदर्भ–
1.गुप्ता, डॉ उर्मिला, स्वातंत्र्योत्तर कथा लेखिकाएं , पृष्ठ 72  पर उद्धृत

  1. ‘रेडियम के अक्षर’ कहानी संग्रह, ‘ठंडी मशीन ‘कहानी , पृष्ठ 78
  2. ‘कौड़ियों का नाच’  कहानी संग्रह, पृष्ठ 5
  3. ‘निर्झर कन्या’  कहानी संग्रह, पृष्ठ 34-35
  4. ‘निर्झर कन्या’ कहानी संग्रह, पृष्ठ 84
  5. गुप्ता, डॉ.उर्मिला, स्वातंत्र्योत्तर कथा लेखिकाएं, पृष्ठ 73 पर उद्धृत
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