Saturday, May 18, 2024
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ख्यालों का चाँद ( लघुकथा) रेणुका चितकारा

  • रेणुका चितकारा

अब भी  पता नही क्यों सहेज रखा है वो सामान जिसके बारे में मैं अच्छी तरह  जानती हूँ कि मेरे किसी काम नहीं आएगा, यादों की तरह  छिपा  रखा है दिल के उस छोटे से कोने में और   खुद की ही ऐसी कसमों का ताला लगा रखा है जिसकी चाबी  है ही नही ,
दिल में एक ओर  कुछ सुकून सा भी  है तुम्हे न पाने का  , तुमसे दूर होने का क्योकि   वो रिश्ता  जो विश्वासघात की नींव पर खड़े होने की कोशिश में था सही समय पर आये भूकंप ने उनका वजूद हिला दिया ।
लेकिन  एक ओर  कुछ कमी भी है इतने सालों के साथ में तुम्हारी रग रग से वाकिफ होने के बाद भी मैं  कैसे ये मान गई की तुम वैसे बन जाओगे जैसा मैं तुम्हे पसन्द करती थी जैसा मैं चाहती थी कि तुम बनो …..,
कैसे सब जानते हुए भी भरोसा कर लेती थी तुम्हारी झूठी बातों पर,
क्यों तुम्हारे सामने कुछ और नजर नही आता था मुझे,
क्यों तुम्हारी बातों के सिवा कुछ सुनाई नही देता था मुझे,
क्यों दुनिया के लाख विरोध के बाद भी मैं तुमसे जुड़े रहना चाहती थी तुमसे,
अब लगता है ये मेरे  तुम पर आँख बंद कर भरोसा करने की सजा  ही है  जो  आज तुम दूर हो मुझसे….
इतने दूर   जितना चाँद धरती से….
चाँद और तुममें कितनी समानता है न
सारी दुनिया की नजर रहती है उस पर
हर धर्म, हर उम्र के लोग अपने  अपने ख्यालों के आसमान में अपने अपने चाँद को देखते है
देखती तो मैं भी हूँ तुमको अपने हिस्से के आसमान में,
काली ,तारों से चमकती रात के  खुले आसमान  में तुमको खूब बातें सुना अपना सारा गुबार निकाल लेना चाहती हूँ
ऐसा लगता है जैसे तुम चुपचाप मेरे सामने खड़े मेरी सारी बातें सुन मुस्कुराते रहोगे जैसे पहले करते थे
कोफ़्त होती है   अब तुम्हारी मुस्कुराहट देख
क्या तुम मुझे दुखी कर के खुश रह सकते हो…..?
“कुमुद कहाँ हो यार”  सुबोध की आवाज सुनते ही वो अपनी ख्यालों की दुनिया को डायरी के पन्नो पर उकेरना बंद कर बाहर निकली ।
” आज जल्दी आ गए आप” अटकते हुए पूछा था कुमुद नें जैसे  उसकी  चोरी न  पकड़  ले वो ।
“यस मैडम, आज मौसम बहुत मस्त है तो सोचा आज  तुम्हे लॉन्ग ड्राइव पर ले चलूँ,  वैसे भी शादी के बाद से ऑफिस में काम इतना था कि तुम्हे ज्यादा समय भी नही दे पा रहा था ”  कुमुद को अपनी बाहों  में कसते हुए वो शरारत से बोला ।
“चलो जल्दी से रेडी हो जाओ फिर निकलते है” ।
“ठीक है आती हूँ  ”  बाहों की गिरफ्त से निकलते हुए कुमुद अंदर  चली गई ।
अपने  ख्यालों की हवाओं में उसकी  और सुबोध की तुलना हमेशा करती  आई थी वो  लेकिन  किसी एक की जीत नही होती थी ।
आज तो यह पल है  और आज कल  कभी एक जैसे नहीं होते हैं ,फर्क भी तो बहुत है तुम दोनों के बीच… ख्यालों में ही खोई वो  अब बाइक की पिछली सीट पर अपने आज को   पकड़ कर बैठी  चाँद को  लगातार देखती जा  रही थी   ।एक चेहरा गड्डमड्ड होता जा रहा था और धीरे धीरे एक  दूसरा चेहरा साफ दिखने लगा था उसे। उसने मुस्कुरा कर अपना चेहरा दूसरी और फेर लिया और अपनी बाँहों का घेरा और ज्यादा कस लिया ।
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